अंक- 2
(स्थान वही। कटियार और कमाण्डर- का प्रवेश। कटियार एक बोतल में पानी लिए हुए है।)
कटियार- (इधर-उधर देखकर) सर, यहाँ तो मोलई का पता नहीं है।
कमाण्डर- यह कैसे हो गया कटियार?
कटियार- क्या बताऊँ? मैं तो आपके साथ ही था।
कमाण्डर- किसी ने कोई शड्यंत्र किया है। सावधान कटियार! दीवार के भी कान होते हैं।
कटियार- तो अब?
कमाण्डर- जल्दी तय करो, हमें अब करना क्या है?
(कमाण्डर हाथ का रोल घुमाता है। रेडियो से समाचार की पुनरावृत्ति....देश की सीमाओं पर सेना का जमाव। हथियारों और विमानों की खरीद प्रस्तावित। सरकार के स्वास्थ्य के लिए एक व्यक्ति द्वारा प्राण अर्पित, सरकार द्वारा उसके वारिसों को पाँच हजार रूपये का अनुदान।)
कमाण्डर- सुनते हो कटियार। समाचार वाचक अब भी चिल्ला रहा है उसके वारिसों को पाँच हजार का अनुदान और वह व्यक्ति.. ..।
कटियार- हाँ वह व्यक्ति।
कमाण्डर- कटियार तुम समझ नहीं पा रहे हो कितनी उलझन मुझे हो रही है।
कटियार- मैं समझता हूँ सर।
कमाण्डर- अगर मोलई जनता में पहुँच गया।
कटियार- मोलई मर चुका है। हमारे रेकार्ड इसकी पुश्टि करते हैं। अब अगर वह जीवित होता है तो मोलई नहीं कोई और होगा। आप उसकी चिन्ता न करें। हमारी योजना के अनुरूप सरकार को मोलई की अर्थी में कन्धा देना था। सम्पूर्ण जनता को बता देना था कि सरकार सामान्य जनता का कितना ध्यान रखते हैं। एक मामूली आदमी की अर्थी में कन्धा देते हैं। जनता के लिए यह कितने गौरव की बात है कि सरकार उसकी षवयात्रा में सम्मिलित होते हैं। जनता जय-जयकार कर उठेगी कमाण्डर साहब! जनता के हृदय में बड़ी जगह होती है।
कमाण्डर- यहाँ तो सब चौपट हो गया कटियार। जब मोलई ही यहाँ नहीं है तो कन्धा देने वाली योजना कैसे पूरी की जा सकती है। तुमने हमें धोखा दिया है। हम तुम्हें भी.....
कटियार- सर इसमें चिन्तित होने की कोई बात नहीं है। सरकार
कन्धा देंगे। मोलई की अर्थी में ही कन्धा देंगे।
कमाण्डर- क्या बक रहा है? मोलई कहाँ मिलेगा? हम अपने सिपाहियों से यह भी नहीं कह सकते कि मोलई खो गया है। जब हमारे रिकार्ड में वह मर चुका है तो ज़िन्दा मोलई की तलाश कैसे की जा सकती है?
कटियार- मोलई को हम खोज लेगें। उसे मरा ही समझें....।
कमाण्डर- लेकिन यदि नहीं मिला तो....।
कटियार- तो...हाँ यदि नहीं मिला तब भी उसकी अर्थी उठेगी.... सरकार कन्धा देंगे आप थोड़ा विश्राम कर लें, थक गये हैं।
कमाण्डर- ठीक है, मुझे आराम की जरूरत है लेकिन इस काम में कोई दिक्कत न हो।
कटियार- नहीं होगी सर। मैं अभी खोजता हूँ।
(एक ओर से कटियार और दूसरी ओर कमाण्डर जाता है। बातुल का प्रावेश। बातुल इधर-उधर झाँकता है कुछ सोचता है. ...बुदबुदाता है।)
बातुल- सरकार ने पाँच हजार दिये हैं मोलई के वारिसों को। मैं तो कुछ जानता नहीं... आपमें से कोई उसका वारिस है?....यदि कोई हो तो जल्दी आ जाये....। मैं कोशिश करूँगा कि ये रूपये उसके वारिस को मिल जायें.....। मोलई मरा या नहीं इसके चक्कर में न पड़िए...रूपये लेने का जुगाड़ कीजिए... .क्यों ठीक है न?....कोई नहीं आता !पाँच हजार रूपये बहुत थोड़ी रकम है न!....यदि यह पाँच लाख होता तो षायद आ जाते.....आ जाते न! पर मोलई के वारिसों को पाँच लाख नहीं मिलेगा। वारिस बनना हो तो जल्दी आ जाओ। पाँच हजार रूपये कम नहीं होते। गाँजा,भाँग,जुआ,शराब किसी न किसी में तो काम आएगा ही। फिर भी कोई नहीं आता।.... हमारे नागरिक बड़े ईमानदार लगते हैं....झूठ-मूठ में वारिस बनना इन्हें कतई पसन्द नहीं...ऐसी जनता को मैं प्रणाम करता हूँ....चलूँ न....आप लोग नहीं आएँगे।
(एक ओर से बातुल जाता है। दूसरी ओर से कटियार और नायकम बात करते हुए आते हैं। कटियार कफ़न का कपड़ा अपने कंधे पर रखे हुए है।)
कटियार- बात पक्की हो गई न?
नायकम- बिल्कुल पक्की। सरकार उस व्यक्ति की अर्थी में कन्धा देने के लिए तैयार हैं। वे प्रतीक्षा कर रहे हैं....
कटियार- ठीक कहते हो मि.नायकम....... हम लोगों ने ही यह योजना बनायी थी.....उनकी सद्भावना का प्रचार हो.... जनता उनके मानवीय गुणों पर रीझ कर उन्हें अभयदान दे।. ...लेकिन वे थोड़ा रुक नहीं सकते?
नायकम- क्या कहते हो मि. कटियार? सरकार का प्रोग्राम बन चुका है। उनका कार्यक्रम कोई बच्चों का घरौंदा नहीं है....आकाशवाणी और दूरदर्शन यह समाचार प्रसारित कर रहे हैं कि सरकार एक मामूली आदमी की अर्थी में कन्धा दे रहे हैं। जनता उनके स्वागत के लिए पहुँचने लगी है और तुम कहते हो कि......
कटियार- बस थोड़ी ही.....थोड़ी सी गड़बड़ हो गई न इसीलिए...।
नायकम- थोड़ा-मोड़ा कुछ नहीं....सरकार सरकार हैं यह तो जानते हैं....।
कटियार- बस थोड़ा-सा......।
नायकम- कार्यक्रम में कोई फेरबदल नहीं होगा....बहुत मुश्किल है...हाँ कार्यक्रम करने में दस-पाँच मिनट देर हो सकती है।
कटियार- ठीक है....ठीक है.....मैं प्रबन्ध करता हूँ।
नायकम- हाँ बहुत जल्दी।
(नायकम तेजी से निकल जाता है। कटियार इधर-उधर चक्कर लगाता है।)
कटियार- इसे कहते हैं संकट...घोर संकट....सरकार पूरी नींद सो सकें इसीलिए यह कटियार....हाँ यह कटियार....नहीं अपने परिवार को रोटी देने के लिए....हाँ रोटी देने के लिए.....पर क्या रोटी के लिए इतना तूफान खड़ा करना?....नहीं....नहीं. ...सच कहीं और है.....है....(माथा ठोंक लेता है)....यह भी कोई....हाँ यह भी कोई....(इसी बीच जगरूप दिखाई पड़ता है। कटियार उसे पुकारता है।) जगरूप....जगरूप.... (जगरूप निकट आ जाता है।)
जगरूप- सरकार।
कटियार- सरकार को तुम्हारी जरूरत है....सख्त जरूरत है।
जगरूप- सरकार को!
कटियार- हाँ सरकार को.....।
जगरूप- मेरी!
कटियार- हाँ तेरी। सरकार का कार्यक्रम बदला नहीं जा सकता....हाँ तेरी सख्त जरूरत है। आदमी सरकार के काम आ जाये इससे बड़ी बात क्या हो सकती है?....सरकार ने तुझे इनाम दिया है न.....तू भी सरकार के काम आ जा तेरा यह फर्ज़ होता है. ...होता है न?
जगरूप- कुछ समझा नहीं सरकार।
कटियार- सरकार को सरकार ही समझ सकती है....तुम्हारे जैसे जगरूप कैसे समझ सकतें है? सरकार गधे के सींग उगा सकती है। आदमी को बन्दर बना सकती है.....मुर्दा को ज़िन्दा और ज़िन्दा को मुर्दा कर सकती है.....समझे!
जगरूप- नहीं सरकार।
कटियार- बहुत ठीक। सोचना-समझना खतरनाक है...बिल्कुल कुछ न समझो....मैं जो कहूँ नहीं....नहीं....सरकार जो कहें फटाफट करो।....हाँ समझ लो। सरकार मुर्दा को ज़िन्दा और ज़िन्दा को मुर्दा बना देती है इसी से ....हाँ इसी से.....
जगरूप- सरकार?
कटियार- तू सरकार के काम आ जा...सरकार को कन्धा देना है..।
जगरूप- सरकार!
कटियार- हाँ, सरकार जनता का भला चाहती है। उसके दुःखदर्द में षामिल होती है।(घड़ी देखता है।) अब समय नहीं है....समय बिल्कुल नहीं है.....तू?
जगरूप- क्या सरकार?
कटियार- मैं कहता हूँ समय बिल्कुल नहीं है। तू सरकार के काम आ जा....।
जगरूप- सरकार!
कटियार- तू समझता क्यों नहीं जगरूप?....तू क्यों नहीं समझता?.. ..सरकार अर्थी में कन्धा देने के लिए तैयार हो रहे हैं।.... बहुत कम लोग इतने भाग्यवान होते हैं। (घड़ी देखता है।) जिनकी अर्थी में सरकार स्वयं कन्धा देते हैं....तू?
जगरूप- सरकार!
कटियार- अब देर न कर। फटाफट यह भौतिक जगत छोड़ दे.... सरकार अर्थी में कन्धा देने की तैयारी कर रहे हैं.....।
जगरूप- सरकार!सरकार! मुझे बचा लो सरकार.....मैं......।
कटियार- सरकार का कार्यक्रम बदला नहीं जा सकता। जनता को यह दिखाना ही है कि सरकार उनका कितना ध्यान रखते हैं....।
जगरूप- सरकार मेरे बच्चे.....।
कटियार- कुछ नहीं जगरूप....लावारिस के बच्चों को कौन पालता है?
जगरूप- सरकार....सरकार....मुझे....।
कटियार- कुछ नहीं....समय बिल्कुल नहीं है(झपटकर जगरूप को पकड़ता है। एक हाथ से जगरूप को पकड़े हुए है एक हाथ से फोन करता है। जगरूप थर-थर काँपता है) हल्लो....सर.... सर एक डाक्टर के साथ....हाँ....जल्दी....समय बिल्कुल नहीं है....हाँ....फटाफट....एक मिनट में.....हाँ (जगरूप से) तुम्हें साक्षात् स्वर्ग मिलेगा। धर्मराज तुम्हारा स्वागत करेंगे।
जगरूप- (थरथराता हुआ) सरकार.....
कटियार- कभी-कभी ऐसा हो ही जाता है जगरूप....।
जगरूप- सरकार!
कटियार- सरकार बड़ी ताकतवर होती है, खासकर तब जब हम जैसे लोग उसके साथ हों। इसीलिए.....इसीलिए....जगरूप तू मोलई बन जा....तू....अभी फटाफट....सरकार अर्थी में... .।
जगरूप- सरकार!
कटियार- इधर-उधर कुछ नहीं।
जगरूप- सर...का....र....
(जगरूप गिर पड़ता है। कटियार झपटकर कफ़न लपेटना षुरू कर देता है। जगरूप एक दो बार सिर हिलाता है फिर षान्त हो जाता है। कमाण्डर एक डाक्टर के साथ प्रवेश करता है।)
कमाण्डर- मि.कटियार तुम कितने अच्छे आदमी हो? कितना बड़ा काम कर लिया तूने? क्या कभी इसका मूल्य चुकाया जा सकता है?......।
कटियार- समय बिल्कुल नहीं है कमाण्डर साहब
(घड़ी देखता है।) यह सब बाद में.....।
कमाण्डर- डॉ0साहब भी साथ आ गए हैं।
कटियार- यद्यपि बहुत जरूरी नहीं है फिर भी सावधानी के लिए...।
डाक्टर- सावधानी के लिए!
कटियार- हाँ सावधानी के लिए एक.....(डाक्टर जगरूप का निरीक्षण करता है।)
डाक्टर- कोई आवश्यकता नहीं है। आपका काम वैसे ही पूरा हो गया।
कटियार- (उछल पड़ता है।) ठीक.....बिल्कुल ठीक....।
ं (कफ़न को भली प्रकार बाँधता है।)
कमाण्डर- अब?
कटियार- समय बिल्कुल नहीं है।
नायकम- (प्रवेश कर ) अर्थी तैयार है मि.कटियार? सरकार प्रतीक्षा कर रहे हैं।
कमाण्डर- बिल्कुल तैयार है मि. नायकम।
कटियार- अब कोई देर नहीं....बिल्कुल नहीं ..... बस.....
(चारों मिलकर कफ़न में लिपटे जगरूप को उठाकर ले जाते हैं बातुल तेजी से आता है। इधर-उधर झाँककर देखता है। फिर तेज गति से दूसरी ओर निकल जाता है। एक क्षण में ही दूसरी ओर से भाग कर आता है तथा सामने आते किश्नू से टकरा जाता है।)
बातुल- क्यों किश्नू बहुत जल्दी में हो?
किश्नू- हाँ भैया, सुना है सरकार हम जैसे मामूली आदमी की अर्थी मे कन्धा दे रहे हैं। वही देखना चाहता हूँ। इसीलिए....सरकार पूरे भगवान हैं नहीं तो मामूली आदमी की अर्थी में कौन
कन्धा देता है?
(एक तरफ से मटरू तेजी से आता है। कन्धे पर फावड़ा। वस्त्र सामान्य।)
मटरू- हम भी देखना चाहते हैं किश्नू भैया। सरकार पूरे देवता हैं ऐसे देवता का दर्शन....।
बातुल- यह क्या कर रहे हो मटरू?
मटरू- हाँ भैया, सरकार के दर्शन....।
बातुल- पर तुम तो कुछ समय पहले नारा लगा रहे थे कि‘यह सरकार निकम्मी है’ जो सरकार निकम्मी है, वह सरकार बदलनी है।’
मटरू- पर बातुल भैया यह भी तो देखो कि सरकार कन्धा दे रहे हैं। किश्नू जल्दी चलो कहीं देर हो गई तो.....।
किश्नू- चलो मटरू हम तो अब तक पहुँच गए होते.....।
(किश्नू और मटरू तेजी से निकलते हैं। इसी बीच बातुल पुकार लेता है।)
बातुल- रुको मटरू। रुको । तुम तो मेरी बात समझ सकते हो।
मटरू- समय बिल्कुल नहीं है भैया। सरकार को कन्धा देने का समय हो गया है न...फिर मिलेंगे जो कहोगे नारा लगा देंगे।
(तेजी से निकल जाता है।)
बातुल- मँहगाई और बेरोजगारी सरकार के कन्धा देने से दब गई। कौन सोचता है यहाँ? लेकिन मोलई की लाश इन्हें कैसे मिली? मोलई की लाश ही न हो तो कन्धा कैसे दिया जा सकता है?
(मिस राव एक ओर से तेज डग भरते हुए प्रवेश करतीं हैं।)
मिस राव- बातुल जी आप कुछ चिन्तामग्न दिखाई देते है।
बातुल- और आप?
मिस राव- हम तो इस खोज में है कि सरकार जिस व्यक्ति की षवयात्रा में सम्मिलित हो रहे हैं, वह व्यक्ति कौन है?
बातुल- हाँ वह व्यक्ति कौन है?(आवाज़ बदल जाती है) वह व्यक्ति कौन है?.....कौन है वह?
मिस राव- क्या मैं यह मान लूँ कि आप को भी पता नहीं।
बातुल- मिस राव, पता था किन्तु अब नहीं....
(बातुल पास से एक फूल तोड़ता है उसकी एक-एक पंखुड़ी ज़मीन पर फेंकता है फिर उसे पैर से मसलता है।) अब तो आप सम्पादक भी नहीं रहीं मिस राव?
मिस राव- सम्पादक न रहकर भी पत्रकारिता की जा सकती है। अब तो हमारा दायित्व बढ़ गया है। पर इस फूल ने आपका क्या बिगाड़ा है?
बातुल- यह आप नहीं समझोगी मिस राव.....नहीं समझोगी। मेरे अन्दर की आग को नहीं समझोगी। भोक्ता और द्रश्टा का अनुभव बोध भिन्न होता है मिस राव। मधुकर का क्या हुआ? आप कुछ जानती हैं?
मिस राव- हाँ बहुत थोड़ा.....।
(नेपथ्य में ‘सरकार की जय’ ‘रामनाम सत्य है’ का उद्घोश)
बातुल-(व्ंयग्यपूर्वक) सरकार की जय।
मिस राव- बातुल?
बातुल- हाँ मिस राव।
(नेपथ्य मे ‘सरकार की जय’‘महानुभाव मोलई की जय’‘राम नाम सत्य है।’)
‘महानुभाव मोलई की जय’ यह क्या हो रहा है मिस राव? यह क्या हो रहा है?
(मिस राव को झकझोर देता है।)
मिस राव- बातुल....तुम्हें क्या हो गया है?
बातुल- हाँ मुझे कुछ हो गया है मिस राव.....कुछ जरूर हो गया है । जो में अनुभव कर रहा हूँ वही और लोग अनुभव क्यों नहीं करते? अनुभव करना भी एक भयानक पीड़ा से गुजरना है। अनुभूति जब जत्यन्त तीव्र हो मिस राव....
मिस राव- बातुल?....बातुल....?
बातुल- कहो?
मिस राव- यह महानुभाव मोलई की ही अर्थी है न? नहीं तो महानुभाव मोलई की जय बोलने का कोई औचित्य नहीं था।
बातुल- यह मुझसे मत पूछो मिस राव। एक-एक षब्द जैसे मुझे चीरते हुए निकल रहे हैं।
(नेपथ्य मे‘महानुभाव मोलई की जय’ ‘सरकार की जय’। मिस राव और बातुल एक-एक कुर्सी पर खड़े होकर जुलूस की ओर झाँकते हैं।)
देखा, सरकार को कन्धा देते हुए मैंने भी देखा....इन्हीं आँखों से...इन आँखों पर विश्वास करूँ या इन्हें अविश्वसनीय मान लूँ.....मिस राव झूठ और सच में फ़र्क क्या है?
(मिस राव को पुनःझकझोरता है।)
हाँ क्या है फर्क?
मिस राव- यही जानने के लिए मैं घूम रही हूँ।
बातुल- खूब घूमिये, चक्कर लगाइये, हूँ दौड़िये पर झूठ को सच और सच को झूठ बनाने से रोक सकेंगी आप? लोगों ने जब चाहा झूठ को सच मे बदल लिया और हम जैसे लोग देखते रह गए। द्रश्टा होना भी भोक्ता होना होता है क्या? द्रश्टा की भी कसमसाहट होती है। झूठ को सच में बदलते देखकर भी हम चुप हैं? यह चुप्पी तटस्थता का पर्याय नहीं है मिस राव।
मिस राव- बातुल। आवेश में नहीं षान्त होकर विचार करें....हमें दिशा मिलेगी....हमारे कदम लक्ष्य तक पहुँचेगे।
बातुल- मिस राव! हमारे आसपास घिरे जाल को काटने का कोई उपाय है?
(इसी बीच किश्नू और मटरू बातें करते हुए लौटते हैं।)
मटरू- देखा बातुल भैया....सरकार अवतारी पुरुश हैं न। मामूली आदमी की अर्थी में कन्धा देते मैंने देखा उन्हें। आँखें सुफल हो गई, क्यों किश्नू?
किश्नू- हाँ भैया....बहुत दिनों के पुण्य प्रताप से यह देखने को मिला। बातुल भैया आप चुप है; कुछ बात है क्या?
मटरू- हाँ, बातुल भैया....सुना सरकार को नींद नहीं आ रही थी। ऐसे अवतारी पुरुश को नींद आनी चाहिए थी न?
बातुल- (व्यंग्पूर्वक) अवश्य आनी चाए, क्यो मिस राव?
(मिस राव कोई उत्तर नहीं देती।)
(मटरू से) तुम तो.....
मटरू- हाँ, हम कहते थे खाली पेट कब तक चलेंगे?....लेकिन अवतारी पुरुश का दर्शन भी कोई चीज है न!
मिस राव- लेकिन मटरू वह अर्थी किसकी थी?
मटरू- होगी किसी हम जैसे लोगों की ही....
मिस राव- नाम नहीं है उसका?
मटरू- नाम से क्या काम है, क्यों किश्नू?
किश्नू- हमें नाम से क्या मतलब?
मिस राव- आपने जिस अर्थी को देखा वह आदमी की ही थी?
मटरू- तो क्या जानवर के मरने पर सरकार कन्धा देंगे? आप भी ऐसा मज़ाक करतीं हैं...चलो किश्नू...बातुल भैया राम-राम।
बातुल- राम-राम मटरू।
(मटरू और किश्नू जाते हैं।)
मिस राव प्रकाश की एक हल्की सी किरण भी कहीं दिखती है आपको?
मिस राव- दिखती है....भयानक अन्धेरे को बेधती हुई...तभी तो कहीं आस्था की नींव में कोई कम्पन नहीं हो रहा है..... प्रकाश की हल्की सी एक आभा हमें दिशा दे रही है......।
बातुल- धुन्ध छँटती नहीं दिखाई देती मिस राव!
हम सब का अन्धेरे में हाथ-पाँव मारना....।
मिस राव- हमारे चलते हाथ-पाँव अपना लक्ष्य ढूँढ लेंगे।
यह मटरू भी योद्धा बनेगा....।
बातुल- कब बनेगा मिस राव? कब?......
चिन्तन और क्रिया की दरारें हमें कहाँ ला पटकेंगी?
मिस राव- चिन्तन भी कहाँ हो रहा बातुल जी?
बातुल- यही तो मुझे साल रहा है मिस राव, लगता है मेरे मस्तिश्क पर आरी चल रही हो....डिब्बों में बन्द चिन्तन आज की त्रासदी है।सार्थक चिन्तन की दिशाएँ स्वयं दिशाहीन हो गई हैं।
सुविधाभोगी नेतृत्व, स्वार्थलिप्त बुद्धिजीवी से आप षहीद होने की अपेक्षा कैसे कर सकती हैं?
मिस राव- सभी ऐसे नहीं होंगे बातुल जी।
बातुल- फिर से कहो इसे....मैं फिर इसे सुनना चाहता हूँ....क्या कह रही थीं आप?....सभी ऐसे नहीं होंगे.....यही न......।
मिसराव- हाँ...सभी ऐसे नहीं होंगे......।
बातुल- सच मिस राव! आप को ऐसा लगता है.....!
मिस राव- हाँ लगता है। प्रारम्भ में संख्या कम हो सकती है पर सामाजिक बदलाव के लिए मर- मिटने वालों की भी टोली बनेगी। धुन्ध कटेगी।
बातुल- पर कब? मिस राव कब? मैं पूछता हूँ कब?
मिस राव- दिन तो नहीं बताया जा सकता। पर यह धुन्ध हमारे प्रयासों से ही कटेगी। आकाश से कोई तीर अचानक नहीं छूटेगा कि यह धुन्ध हट जाय। धुन्ध का निदान हमारे अपने प्रयासों से इसी धरती पर उगेगा। हमें उगाना ही होगा। नई स्थितियों से जूझते हुए अपना रास्ता साफ करना पड़ेगा।
बातुल- मुझे भी साथ रखना मिस राव....मैं इस समय।
मिस राव- आवेश नहीं....स्वस्थ चिन्तन और सार्थक कदम.....
बातुल- आप की बात कुछ ठीक लगती हैं पर मैं इस समय अपने चारो ओर का परिवेश देखकर.....।
मिसराव- परिवेश की जकड़न किसे बाँधने का प्रयास नहीं करती.... पर....उससे उबरने का साधन भी वही देती है।
(बातुल दौड़कर एक ओर झाँकता है राव को चुप रहने का संकेत करता है।)
बातुल- कुछ लोग इसी ओर आ रहे हैं।
(दोनों तेजी से निकल जाते हैं।)