Nasha - 2 in Hindi Drama by Dr. Suryapal Singh books and stories PDF | नशा - 2

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नशा - 2

नागरिक- पंडित जी मैं लोटा तो नहीं खरीदता मगर आप मार नहीं सकते । लोटा आपको ले जाना चाहिए। इसके छू लेने से लोटा नापाक नहीं हो गया। दर्शक बन्धु ठीक कह रहा हूँ।
त्रिवेणीनाथ- दर्शकों से पूछते हो न, तो लोटा दर्शक ही ले जायँ मुझे पैसा चाहिए।
नागरिक- दर्शक पैसा देंगे या नहीं यह तो मैं नहीं कह सकता, लेकिन..।
पंडित- लेकिन-वेकिन कुछ नहीं। ठीक है.....मैं पैसा लेकर रहूँगा।
 (ऐंठते हुए चला जाता है
 (नागरिक लोटा उठाता है, लड़के को देता है)
नागरिक- (बच्चे से) इसे ले जाकर रख दो। इस देश में न जाने कितने तरह के लोग हैं और उन पर तरह-तरह का नशा है। कहाँ गयी वह युवा पीढ़ी जिसे हर तरह के नशे से लड़ना है?
 (नेपथ्य में ‘कल से.....करेगा’ कहते हुए डुग डुगी वाले का आगमन) 
नागरिक- कहो भाई ऐलान कर चुके।
डुगडुगीवाला- हाँ कर रहा हूँ।
नागरिक- लोग क्या कहते हैं?
डुगडुगीवाला- फिर वही बात, मैं कहता हूँ मुझे लोगों के कहने से कोई मतलब नहीं। मैं केवल ऐलान करता हूँ।
 मेरा ऐलान एक सरकारी बाजा है जो हमेशा किसी न किसी रूप में बजता रहता है। उसका पालन तो जनता को करना है।
नागरिक- ठीक कहते हो हम नागरिक ही तो......।
डुगडुगीवाला- तो क्या?
नागरिक- यही कि नागरिकों को लोग भेड़ बकरी समझते हैं। लोग चाहते हैं कि वे सरकारी ऐलान होते ही दुम दबाकर अपने दरबों में घुस जायँ।
डुगडुगीवाला- हाँ यही, भाई साहब मेरा ऐलान सुनते ही कानाफूसी षुरू हो गयी। ब्लैक करने वाले तेजी से दौड़ धूप करने लगे। ठीक है न .........
नागरिक- ठीक है या नहीं। यह तो कह पाना मुश्किल है लेकिन दौड़- धूप षुरू हो गयी, यह सच है। तुम्हें एक बात बताऊँ?
 (कान में कुछ कहता है, दोनों एक दूसरे के कान में कुछ कहते हैं और एक ओर संकेत करके दोनों एक तरफ तेजी से निकल जाते हैं।)
 दूसरी ओर से बनवारी चार पाँच टोपियाँ छिपाए आता है। दर्शकों के सामने खड़ा हो जाता है। पहले पीली टोपी सिर पर देता है। दर्शकों से अभिवादन करता है और भाशण करते हुए कहता है-)
बनवारी- देश की अखण्डता खतरे में है। इस देश को अखण्ड बनाना है। आप लोग मेरा सहयोग कीजिए। भारत की अखण्डता अक्षुण्ण रखनी है।
नागरिक- (प्रवेश कर) अरे तुम पीली टोपी में?
 (बनवारी पीली टोपी उतारकर सफेद टोपी रख लेता है)
बनवारी- क्षमा करें गलती हो गयी। ये टोपी ही कुछ ऐसीं है।
 (और भाशण प्रारम्भ कर देता है) साथियो। इस देश को समाज वादी जनतंत्र में बदलना है। सद्भावना और धर्मनिरपेक्षता हमारा मूलमंत्र है। इस देश में विभित्र संस्कृतियों के लोग रहते हैं। देश सबका है।
 (नागरिक से) क्यों भाई ठीक है न? 
नागरिक- ठीक ही है। तुम्हारे जैसे लोग इस देश को कहाँ ले जायेंगे कह नहीं सकता ? मौका देखते ही टोपी बदल लेते हैं।
बनवारी- (गद्गद् होकर) तुमने मेरे मन की बात कह दी। मैं तो टोपियाँ छिपाकर रखता हूँ दिखाऊँ (और कई टोपियाँ दिखाता है।) अपुन से क्या लेना देना। अपुन तो यह समझता है कि जिधर भी कुछ खाने पीने का मौका मिले टोपी बदल कर पहुँच जाओ। अपुन कुछ छिपाता नहीं। अपुन का तो धंधा ही यही है। बस एक चाय पक्की करो अपुन को चाय पीना है। यह देख लो जो टोपी कहो मैं पहन लूँ। बोलो पिला सकोगे?
नागरिक- टोपियाँ देखकर मैं चाय नहीं पिलाता।
बनवारी- (नाराज़ होकर) हुँह नहीं पिलाते......हुँह नहीं पिलाते तो टोपियों का मज़ाक क्यों उड़ाते हो? तुमसे मतलब? बनने को बड़े आदमी बनते हैं एक कप चाय नहीं पिला सकते। तुम्हारे सामने कोई भी टोपी पहनकर जाऊँगा और लोग मेरा स्वागत करेंगे। हुँह जब मैं सच कहता हूँ कि मेरे लिए टोपी बदलना कोई खास बात नहीं है। काली,पीली,लाल,सफेद जो टोपी कहो मुझे तो पेट भरना है(दर्शकों की तरफ देखकर) क्यों भाई तुम सबके भी पेट है न, कोई धंधा करते ही होगे। अगर मैं पेट भरने के लिए टोपियाँ बदलता हूँ टोपियाँ बदल कर नेतागीरी करता हूँ तो तुम्हें क्यों परेशानी होती है? आखिर इस देश में नेतागीरी भी तो एक कमाऊ धंधा है और हमारे ये नागरिक हैं कि इतनी बकझक करने के बाद भी एक कप चाय के लिए हाँ नहीं करते।(इसी बीच दंगा हो जाता है। नेपथ्य में भागो-भागो। पूरे षहर में दंगा हो गया है की बार बार आवाज़। सभी भागो-भागो कहते हुए मंच पर आते हैं और दूसरी ओर निकल जाते हैं। डुगडुगी वाला आता है।)
डुगडुगीवाला- इस पूरे षहर में अफ़वाह फैलाना मना है। आठ बजने के बाद कोई भी आदमी घर से बाहर नहीं निकलेगा। पूरे षहर में कर्फ्यू लग गया है।
 (नागरिक का प्रवेश, हड़बड़ी में आता है और षीघ््राता से जाना चाहता है)
डुगडुगीवाला- क्यों भाई बहुत जल्दी में हो? इस पूरे षहर में अफवाह फैलाना मना है। .............
नागरिक- जानते नहीं दंगा हो गया है।
डुगडुगीवाला- जानता हूँ तभी तो ऐलान कर रहा हूँ।
नागरिक- लेकिन तुम्हें कोई हड़बडी़ नहीं है।
डुगडुगीवाला- मैं तो कह चुका हूँ भाई। मैं एक नौकर हूँ। केवल आदेश पालन । कुछ भी हो जाय, आग लग जाय, वज्रपात हो जाय हम को तो ऐलान करना ही है। और इस पूरे षहर में अफवाह फैलाना मना है। आठ बजने के बाद पूरे षहर में कर्फ्यू.... ।(दोहराता हुआ चला जाता है।)
 (रश्मि और अजय का प्रवेश)
अजय- ताऊ जी।
नाग- हाँ अजय
अजय- हम लोगों को कुछ करना चाहिए।
नाग- क्या करना चाहिए?
रश्मि- ताऊ जी ऐसे समय में ही तो युवा पीढ़ी को आगे आना चाहिए।
नाग- कैसी युवा पीढ़ी रश्मि? वही जो नशे में धुत है। जो सही रास्ते की पहचान नहीं करना चाहती।
अजय- नहीं ताऊ जी युवा पीढ़ी को भी बहुत अधिक दिन तक
 बहकाया नहीं जा सकता। मैंने गलतियाँ की हैं इससे इन्कार नहीं किया जा सकता।लेकिन गलतियाँ ही हमारा लक्ष्य नहीं है। ताउ जी आपने मुझे नशे में धुत देखा है और अब आप यह भी देखेंगे कि मैं क्या कर सकता हूँ? मैनें रश्मि को बहुत कश्ट दिया। मेरे परिवार की धुरी यही तो थी। अलग-अलग भागने वाले सूत्रों को यही न जाने कैसे जोड़ती रही।
रश्मि- अजय भावुक होने का समय नहीं है। षहर में आग लग गयी है। लोग एक दूसरे पर विश्वास नहीं करते। ताऊजी ऐसे में हम लोगों को कुछ करना चाहिए। केवल यह कहने से कि लोग बरबाद हो चुके हैं, आदमी ठीक नहीं रह गया है, क्या हम आगे बढ़ सकेंगे?
नाग- ठीक कहती हो बेटी। एक हैवान के अंदर भी एक इन्सान होता है जिसको हवा पानी देकर जगाया जा सकता है। लेकिन हमारी दिशा स्पश्ट होनी चाहिए।
रश्मि- ताऊ जी हम इन्सान के रूप में रहना चाहते हैं और इन्सान के रूप में दिखना चाहते हैं। ये भागते हुए लोग, परस्पर अविश्वास से काँपते हुए इन्सान......हमसे कुछ अपेक्षा करते हैं। हम प्रबुद्ध हैं, ये तो आपने ही कहा हैं।
नाग- लेकिन प्रबुद्ध ही तो बड़ा......।
अजय- क्या कहते हो ताऊ जी? यही तो कहोगे कि प्रबुद्ध वर्ग धूर्त होता जा रहा है। लेकिन हम हैवान में भी इन्सान खोजते हैं, ये तो आपने ही कहा है।
नाग- अजय सच कड़वा होता है और ख़तरनाक भी। अभी षाम होते ही कहोगे मुझे एक पुड़िया चाहिए और तब.....
अजय- यह सच है कि मैं अभी नशे से मुक्त नहीं हो सका लेकिन रश्मि मुझे एक डाक्टर के पास ले गयी थी...........
रश्मि- और हाँ ताऊ जी, उस डाक्टर ने कहा है कि अजय को इस नशे से मुक्ति मिल सकती है।
नाग- बहुत अच्छी बात है, यह बहुत अच्छी बात है
 इस देश की युवा पीढ़ी.....इस देशकी युवा पीढ़ी यदि सही करवट ले ले तो फिर देश को बदलने में.......
रश्मि- (जल्दी में) ताऊ जी युवापीढ़ी को सही दिशा ग्रहण करनी है। मैं वादा करती हूँ अजय तो एक प्रतीक मात्र है। इसी युवा पीढ़ी में इतना दम है इतनी षक्ति है कि वह...... 
नाग- मैंने कब कहा कि इसमें षक्ति नहीं है लेकिन रश्मि इस अजय को मैंने उस अवस्था में भी देखा है जब यह केवल माध्यम बन सकता था षैतान का भी इन्सान का भी। इसीलिए....वह देखो...देखो किसी को कोई घसीट रहा है। वह देखो.....
 (दौड़कर जाता है त्रिवेणीनाथ को नागरिक पकड़ लेता है और रश्मि विभा को)
विभा- मैं इसे ज़िन्दा नहीं छोडूँगी। मैं इसे ज़िन्दा नहीं छोडूँगी । ये मेरा पर्स छीन रहा था । दंगा होते ही आदमी इन्सान से हैवान हो जाता है। 
त्रिवेणी- और मैं भी इसे नहीं छोडूँगा। यह अपने को समझती क्या है। मैं पण्डित आदमी इसका पर्स छीन रहा था!
विभा- और क्या कर रहे थे? इस दंगे का तुम भी लाभ लेना चाहते थे।(रश्मि विभा को और अजय त्रिवेणी को सांकेतिक भाशा में बात करते हुए नेपथ्य में ले जाता है।)
 (नेपथ्य में ‘बचाओ, मुझे बचाओ की आवाज़।’ रहीम बदहवास सा भागता हुआ आता है।)
रहीम- मुझे बचाओ-मुझे बचाओ।
 (सुकुल नेपथ्य में ही ‘कहाँ भाग गया बदमाश? हम लोग उसे ज़िन्दा नहीं छोडेंगे। रहीम काँपने लगता है)
रहीम- बचा लो, मुझे बचालो। (रश्मि पुनः आ जाती है।)
सुकुल- (प्रवेश करते हुए) कहाँ गया वह बदमाश। दाढ़ी वाला बदमाश कहाँ गया? (रहीम रश्मि के पीछे छिप जाता है। नागरिक आगे बढ़कर सुकुल से बात करता है।)
नाग- कौन सा बदमाश सुकुल जी? कहाँ गया?
सुकुल- (ऐंठते हुए) अभी अभी इसी तरफ आया है वह बदमाश । हम लोग उसे ज़िन्दा नहीं छोड़ेगे। आखिर तुम चौराहे पर क्या करते हो? दंगा होने वाला था तब भी मैं आया था और अब भी तुम यहीं.....।
नाग- सुकुल जी चौराहे भी अपनी दास्तान कहते हैं। मैं एक नागरिक हूँ। इन्हीं चौराहों पर मुझे भारत का भविश्य दीखता है इसीलिए।
सुकुल- इसीलिए बदमाश को छिपाते फिरते हो......इसीलिए।
 (रहीम को देखकर झपटता है।)
रहीम- (चिल्लाकर) मैं बदमाश नहीं हूँ। मैं एक इन्सान हूँ। मेरा 
 अपराध यही है कि मैं एक मुसलमान हूँ। मुसलमान होकर एक हिन्दू की गली से गुजर जाना यदि एक जुर्म है तो मैं इसे कुबूल करता हूँ।
सुकुल- यह अपराध नहीं हैं, लेकिन मुसलमानों की गली में एक भी हिन्दू साबुत क्यों नहीं बच रहा है? मैं इसका जवाब चाहता हूँ। मैंने हिन्दुओं की कटी हुई लाशें देखी हैं। मुझ पर खून सवार हो गया है। इसीलिए तुम्हारा मुसलमान होना जुर्म है,
  अपराध है।
नाग- इसलिए तुम चाहते हो कि हर मुसलमान का क़त्ल कर दिया जाय क्यों? किसी कौम के दस पाँच लोग गुमराह हो जायँ तो कौम का हर बच्चा अपराधी हो जाता है न। सुकुल जी 
 अपराधी मैं हूँ क्योंकि मेरी कौम के लोगों ने भी गुनाह किया है। आओ पहले मेरा क़त्ल करो।
रश्मि- तुम लोग मुझे गलत समझ रहे हो। मेरे भीतर जो प्रतिहिंसा की अग्नि भभक रही है, उसे भी देखो। तुमने हिन्दुओं को कटते हुए नहीं देखा है। इसीलिए षायद इसीलिए लेकिन मैं उसे देखकर आया हूँ।
रश्मि- क्या ही अच्छा होता कि आप हिन्दुओं की रक्षा में वहीं बलिदान हो जाते । लेकिन आपने वैसा नहीं किया और अब अकेला पाकर एक मुसलमान की हत्या करना चाहते हो।
नाग- सुकुल जी, अब प्रतिहिंसा का समय नहीं है। देश को प्रतिहिंसा में जला देना कोई बुद्धिमानी नहीं है। देश को राख कर देना और उस पर आँसू बहाना क्या यही है तुम्हारा दायित्व? रहीम, हम सब उलझे हुए हैं जरूरत इस बात की है कि हम सही दिशा में सोचें। प्रतिहिंसा की ज्वाला भी एक नशा है। इस देश में राजनीति भी एक नशे के रूप में आ चुकी है। जाति, क्षेत्रीयता और धर्म का उन्माद किस नशे के कम है? रश्मि अजय को बुलाओ।
 (रश्मि दौड़कर अजय को पुकारती है)
अजय- ताऊ जी.....
नाग- हाँ अजय यही चौराहे पर खड़े-खड़े मैंने बहुत कुछ देखा है, अनुभव किया है। अब लगता है कि यहाँ से भागना कायरता होगी और तुम कायर नहीं बनना चाहोगे।
अजय- नहीं, बिल्कुल नहीं।
नाग- और रश्मि तुम भी।
रश्मि- मैं तो कायर बिल्कुल नहीं बनना चाहती।
 (इसी बीच‘या अली’ और ‘जय बजंरग बली’ का तेज स्वर सुनाई पड़ता है और सभी उसी ओर भागते हैं।)