Tanuda ka Apharan - 1 in Hindi Drama by Dr. Suryapal Singh books and stories PDF | तनुदा का अपहरण - 1

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तनुदा का अपहरण - 1

 (तनु का कमरा। एक मेज़ और चार कुर्सियाँ। मेज़ पर एक साधारण मेज़पोश। उस पर कुछ पत्रिकाएँ एवं फाइलें, कमरे के कोने में पानी से भरा एक घड़ा है। घड़ा परई से ढका है। परई के ऊपर एक गिलास औंधा रखा है। दीवाल से सटा एक तख्ता है उस पर एक दरी बिछी है। एक तकिया रखा है। जुत्शी बनियान और पायजामा पहने तख्ते पर सोया हुआ है। उसका कुर्ता तख्ते पर किनारे रखा है। तनु कुर्ता पायजामा पहने हुए स्वयं से बात करता हुआ कमरे में ही टहलता है। उसके चेहरे पर चिन्ता की रेखाएँ स्पश्ट हैं। घड़े से गिलास में थोड़ा पानी निकाल कर पीता है और........।)
तनुदा- डायनासोर नहीं बच सके।......हड़प्पा की सभ्यता का अंत हुआ। अनेक प्रजातियाँ काल के गाल में समा गईं। क्या तुम बच सकोगे? वे कहते हैं क्या तुम बच सकोगे? जिस संस्कृति के लिए तुम लाठी लेकर खड़े हो......तुम्हारी लाठी भी टूटेगी और तुम......तुम भी। वे कहते हैं बचेगा वही जो सक्षम होगा...... अक्षम को जीने का हक़ नहीं.....तो फिर किसी देष की बहुसंख्यक आबादी को समुद्र में डुबा दो.....कह दो......तुम अक्षम हो........तुम्हें जीवित रहने का अधिकार नहीं। ओ जीने का अधिकार लेने वाले सावधान! .......(तेज स्वर में हाँफते हुए) सावधान....! (बगल में लेटा हुआ जुत्शी हड़बड़ा कर उठ जाता है) 
जुत्षी- क्या हुआ तनु?.....तुम किसको सावधान कर रहे हो?.....तुम तो किसी को आराम भी नहीं करने दोगे..... दिन रात एक ही धुन.....आज मिल गेट पर प्रदर्षन है वहाँ तो सिर खपाना ही है, सोचा था थोड़ा आराम कर लूँ पर तुम....। 
तनु- मुझे नींद नहीं आती है, सोते-सोते जग पड़ता हूँ। मुझे लगता है आदमी-आदमी को निचोड़ रहा है। गुणवत्ता का नारा देने वाले थोड़े से लोग बहुतों को अक्षम साबित कर उनके जीने का हक़ छीन रहे हैं.....क्या हम हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहें?....सामान्य जन को इतना वंचित किया जा रहा है कि वह कुछ भी सोच नहीं सकेगा। तुम क्या सोच रहे हो जुत्षी?
जुत्षी- मैं बहुत सोच-विचार करने वाला व्यक्ति नहीं हूँ। मैं एक प्यारा सा सपना देख रहा था...प्यारा सा सपना........
तनु- कैसा सपना? सामाजिक बदलाव का?.................
जुत्षी- सावन के अन्धे को हमेषा हरियाली ही दिखाई देती है...मैं सामाजिक बदलाव के लिए इतना पागल नहीं हूँ...मैं अपना हित भी देखता हूँ। मैं स्वप्न देख रहा था.....बिल्कुल निजी जीवन के बारे में...क्या तुम स्वप्न के बारे में जानना चाहते हो?
तनु- यदि बताने में तुम्हें कोई असुविधा न हो.............
जुत्षी- मुझे क्या असुविधा हो सकती है तनु?.....तुम तो जानते हो मुझे......तुमसे छिपाकर मैं कोई काम नहीं करना चाहता.....यह जानते हुए कि हमारे तुम्हारे रास्ते एक नहीं हैं.......तुम दिन-रात.....सामान्य जन के बारे में सोचते हो और मैं जन के साथ अपने बारे में भी सोचता हूँ। मैं एक बहुत ही मीठा सपना देख रहा था, तुम्हारे सावधान ने मुझे चौंका दिया....।
तनु- यह कहो कि मेरे सावधान करने से ही तुम्हें सपने का यह अंष याद रहा अन्यथा............।
जुत्षी- अन्यथा मैं इतना मीठा सपना भूल जाता? मैं कभी नहीं भूलता तनु........इतना मीठा सपना.......।
तनु- पर सपना क्या है?
जुत्षी- बता रहा हूँ...........मैंने देखा कि चित लेटा हूँ और टुटु मेरा सिर अपनी गोद में लेकर बैठी है...........उसके केष कन्धे से होते हुए मेरी छाती पर लहरा रहे हैं..........मेरी ऊँगलियाँ उसके बालों से खेल रही हैं..........टुटु की ऊँगलियाँ मेरे चेहरे पर थिरक रही हैं.......वह मेरी आँखों में झांकती है उसकी निष्छल मुस्कान से हृदय का एक-एक तार झनझना उठता है............वह चुम्बन लेने के लिए मेरे चेहरे को उठाती है..............इसी बीच तुम्हारा ‘सावधान’ कानों में पड़ता है और वह मीठा सपना................वह सम्पूर्ण दृष्य हवा हो जाता है।
तनु- अच्छा! तो तुम सपने में ही रस भरे दृष्य का आनन्द....।
जुत्षी- पर तुम्हारा सावधान जो रसभंग करने के लिए आ टपका......।
तनु- रसभंग नहीं, यह कहो कि सपने की स्मृति में सहायक बना....।
जुत्षी- तुम कुछ भी मान लो तनु! तुम मेरे घनिष्ठ न होते तो मैं सावधान करने वाले को..........................।
तनु- जीवित नहीं छोड़ते.......पर यह तो सोचो सावधान कहने वाला किस पीड़ा से गुज़र रहा है। जुत्षी तुमने औशधि और पोशण के अभाव में लोगों को मरते नहीं देखा है.......पर मैंने....मैंने देखा है..........गाँव के लोग बड़े ही हँसमुख-सरल.......जब अपने-अपने काम पर निकलते तो उन्हें देखकर लगता धरती पर इससे खुषहाल गाँव कहीं नहीं होगा....पर जानते हो जुत्शी उन फूल से चेहरों का क्या हुआ?
जुत्षी- बिना बताए मैं कैसे जान सकता हूँ तनु?.........मैं कोई ज्योतिशी नहीं हूँ...........।
तनु- तो सुनो! उनका छोटा सा पुरवा नदी के टाँड़ पर बसा है। उधर उसी नदी के किनारे ओमान कम्पनी ने अपना कारखाना लगाया। पुरवे का पूरा पर्यावरण विषाक्त हो गया..........कारखाने का कचरा नदी में जाने लगा.........हवा भी विषाक्त हो उठी है.......और फिर आसपास के बच्चे-बूढ़े-जवान तिल-तिल घुटने लगे।.............कारखाने के मालिकों से बार-बार लोगों ने अपनी तकलीफें़ बयान की.........पर वे सुनकर अनसुना कर देते हैं कल उस पुरवे के तीन लोगों की मौत हुई। पूरा गाँव बीमार हो गया है...........अन्य गाँव भी उसकी पकड़ में आते जा रहे हैं।.........पर कोई नहीं सुनता। जनपद के अधिकारी भी मौन हैं।
जुत्षी- पर यह तो बताओ कि कारखाने में बनता क्या है?
तनु- कारखाने में कोई रसायन बनाते हैं वे लोग, उसका रूप और षक्ति क्या है यह तो वही लोग जानें। लेकिन गाँव वालों को लेकर मैं दौड़ता रहा। पर मैं क्या कर सका?........सिवा थोड़ी सी सहानुभूति के मैं उन्हें क्या दे सका हूँ?............जानते हो जब मैं गाँव वालों की समस्याओं को लेकर मिल-प्रबंधकों से मिलता हूँ तो वे क्या कहते हैं?
जुत्षी- क्या कहते हैं?
तनु- वे कहते हैं मिस्टर तनु हम कारखाने में आपको अच्छी सी नौकरी देने के लिए तैयार हैं................यदि नौकरी में आपकी रुचि न हो तो आपके लिए उपयुक्त राषि की व्यवस्था कर सकते हैं।
जुत्शी- तनु, इससे अच्छा अवसर कहाँ मिलेगा? तूने हाँ कहा?.......जरूर हाँ कहा होगा......ऐसा अवसर .........। (लपक कर कुर्ता उठा लेता है)
तनु- क्या कहते हो जुत्षी? मैं हाँ कैसे कह सकता हूँ? मैं इतना कृतघ्न कैसे बन सकता हूँ?................तुम भी मुझे गलत समझ रहे हो इतने दिन साथ रहने पर भी......।
जुत्शी- तो तुम्हारी जगह मैं ही नौकरी कर लेता हूँ..........तुम मेरे लिए तो कह सकते हो, मेरी टुटु कितनी खुष होगी यह सुनकर..........मेरी टुटु। (तनु यह सब सुनकर माथा ठोंक लेता है। एक कुर्सी पर बैठ जाता है...............जुत्षी उसके हाव-भाव को निहारता है पर उसकी प्रसन्नता जैसे बल्लियों उछल रही हो। वह कुर्ता पहनता रहता है।)
जुत्शी- क्यों बैठ गए तनु?........मेरी इतनी सी मदद करने में आसमान तो नहीं फट पड़ेगा............इतना तो तुम्हें करना ही पड़ेगा..........मेरी टुटु..........(प्रसन्नता से मुँह से राग रंग की ध्वनि निकालता है। कुर्ता पहनता रहता है।) घर होगा.........घरवाली होगी.........बढ़िया सा बगीचा..........उसमें टुटु..............।
तनु- यह सब कुछ भी नहीं हो सकेगा......तुम बात क्यों नहीं समझते?...............
जुत्शी- बात समझूँ या नौकरी देखूँ। तनु तुम्हें मेरी सौगन्ध........नौकरी हाथ से जानी नहीं चाहिए..........इस ज़माने में सब कुछ मिल सकता है पर नौकरी नहीं........अरे युग धर्म भी सोचो.......तनु.....नौकरी मुझे मिलनी ही चाहिए चाहे.....(कुर्त्ता पहनता रहा है।)
तनु- चाहे तनु का ज़मीर बिक जाए................।
जुत्शी- तनु ज़मीर की बात लाकर तुम मेरी नौकरी छीन रहे हो। मेरा घर......परिवार .....मेरी टुटु का सपना.........सपने छिन जाने पर दोस्त भी दुष्मन हो सकता है तनु.......सोच लो........बहुत छोटा सा प्रकरण नहीं है यह........एक दोस्त की ज़िन्दगी का प्रष्न है.....उसके भविष्य का प्रष्न है......उसकी टुटु का प्रष्न है......।
तनु- पर तुम्हारा प्रश्न एक व्यक्ति, एक परिवार का प्रश्न है और हम जिसके लिए संघर्ष कर रहे हैं वह जनहित का प्रष्न है..........इस बात को भी समझने का प्रयास करो..............।
जुत्षी- मैं कुछ भी सुनना और समझना नहीं चाहता तनु। मेरी आंखों को इस समय टुटु और नौकरी दो ही दिखाई देते हैं............यदि, तुम इनकार करोगे तो मेरी आंखों में खून भी उतर सकता है...........हाँ खून भी..........। (कुर्त्ता पहनता रहता है।)
तनु- जुत्षी पागल मत बनो.............जो कुछ हमने अब तक किया है उस पर पानी फेर देना चाहते हो। हमने उन ज़रूरतमंदों के पक्ष में खड़े होने का संकल्प लिया है.........अपना स्वार्थ तुम्हें अंधा बना रहा है। क्या इससे किसी प्रकार का बदलाव हो सकेगा? हम अंधेरे में टटोलते हुए अपना हित साधन तो कर लेंगे पर जनता जो चौराहे पर खड़ी है उसका क्या होगा? तुम्हीं बताओ.......क्या होगा?
जुत्षी- मैंने कब कहा था अपना हित साधन नहीं करुँगा? अपना हित साधने के लिए ही तो मैं इस मैदान में उतरा हूँ..........मैं बताऊँ........जब तुम कहते थे ‘षीष उतारै भुँइ धरै सो पइठै घर माँहि’ तब मैं गुनगुनाता था ‘माथ नवा थैली भरै सो पइठे घर माँहि’। यह कोई विद्रूप नहीं है........यह हृदय का सच है.........मैं छद्म नहीं पालता तनु..........सेवा करूँगा तो दाम वसूलूँगा...........अपना घर फूँक कर मैं सेवा नहीं कर सकता...........मैं अपने सपने को साकार करने के लिए ही इस धन्धे में आया हूँ........मुझे समर्थ होते देखकर टुटु कितनी खुश होगी..........मेरी टुटु...........(कुर्त्ता पहन लेता है।)
तनु- तुम्हारे स्पष्ट कथन के लिए मैं तुम्हें साधुवाद देता हूँ.....।
जुत्षी- तनु मैंने राजनीति दूसरों का पेट भरने के लिए नहीं.............अपना पेट भरने के लिए...........हाँ अपना पेट भरने के लिए षुरू की है.........तुम्हारी तरह मैं आधा पेट खाकर ज़िन्दा नहीं रहना चाहता............मुझे तुम्हारी तरह फटेहाल देखकर मेरी टुटु क्या सोचेगी?........मैं उसके सपनों में खरा उतरना चाहता हूँ.......सत्ता और सम्पत्ति बिना जनसेवा कैसे हो सकेगी तनु?.....जनसत्ता के पहरेदारों को कैसे खरीदा जा सकेगा?.......विरोधियों का दमन कैसे हो सकेगा? सत्ता और सम्पत्ति बिना क्या कोई रम्भा या उर्वषी तुम्हारी ओर मुँह करेगी? तुम तो किसी मेनका के लिए एक कंगन भी नहीं ख़रीद सकोगे? क्यों? क्या मैं झूठ कहता हूँ?
तनु- ठीक कहते हो जुत्षी। जो तुम करने जा रहे हो वह मैं नहीं कर सकूँगा किन्तु तुम्हारा रास्ता ही सही है ऐसा मैं कैसे मान लूँ। जनता के दुःख-दर्द में हाथ बंटाने की अपेक्षा तुम उसका सौदा कर लेना चाहते हो? एक बार भी जन प्रदर्षन में भाग लो तो उसका दाम वसूलना चाहते हो?
जत्षी- तनु मुझे बहकाओ नहीं......स्पष्ट कहो कि नौकरी दिला रहे हो या नेतृत्व सौंप रहे हो.......तुम्हारे सामने दो ही विकल्प है तनु या तो मुझे नौकरी दिलाओ या जनता का नेतृत्व मुझे सौंप दो। तीसरा कोई विकल्प नहीं है........यदि तुमने आनाकानी की तो........।
तनु- पर मैं दोनों विकल्पों पर विचार भी नहीं कर सकता...........नेतृत्व सौंपने की बात मैं सोच सकता था पर आज जब तुम्हारा चेहरा साफ हो गया है मैं............(इतना सुनते ही जुत्शी उछलकर तनु को अपने हाथों से जकड़ कर झकझोरता है कुछ देर झकझोरने के बाद गले पर हाथ रखकर पूछता है)
जुत्शी- अब भी इनकार करोगे?
तनु- बिल्कुल। (तभी एक नवयुवक दौड़कर आता है और तनु के पैर छूता है। जुत्षी चकित होकर नवयुवक को देखता है उसके हाथ तनु से हट जाते हैं। नवयुवक कत्ती पैंट और कुर्त्ता पहने है। एक अँगोछे को कमर में बाँधे हुए है उसी में दलभरी भी बँधी है।)
जत्षी- तो तनु तुमसे नहीं हो सकेगा न.............?
तनु- (विश्वास पूर्वक) कतई नहीं।
जुत्शी- मैं जा रहा हूँ पर मेरी बात सुन लो मैं नेतृत्व भी करूँगा और नौकरी भी। और तुम.......हाँ तुम ही टुकुर-टुकुर देखोगे.....।
तनु- मेरी एक बात मानोगे?
जुत्शी- (लौटकर) क्या?
तनु- इन दोनों विकल्पों पर टुटु से विचार-विमर्ष अवष्य कर लेना।
जुत्षी- अब मुझे तुम्हारे परामर्ष की आवष्यकता नहीं पड़ेगी पर मैं टुटु से विमर्ष करूँगा..........(चला जाता है।)
तनु- कैसे यहाँ आ गए कत्ती? गाँव के लोग तैयारी कर रहे हैं?  
कत्ती- तैयारी क्या करना है तनु दा? गाँव के लोग आपकी आवाज पर आग में भी कूद सकते हैं। आपने प्रदर्शन के लिए बुलाया है, सब पहुँच ही रहे हैं। पर तनु दा आपको अकेले नहीं रहना चाहिए। पता नहीं कब कौन सी विपत्ति आ जाए? हम लोगों को पता ही न चल सके।  
तनु- क्यों इतना कातर हो रहे हो कत्ती? तनु के मर जाने से क्या काम बन्द हो जाएगा?..........एक तनु मरेगा कई तनु पैदा होंगे......मौत से कैसा भय............? (कत्ती एक गिलास पानी देता है।)
कत्ती- पर जुत्षी भैया क्यों बहकी-बहकी बातें कर रहे थे?..............वे आपके गले पर हाथ क्यों रखे थे तनुदा?
तनु- (पानी का गिलास हाथ में लेकर एक घूँट पीता है) पागल है जुत्षी...........कभी-कभी अपना आपा खो बैठता है। सोचता हूँ उसकी षादी टुटु से करा दी जाए तो व्यवस्थित हो जाएगा......।
कत्ती- छोटा मुँह बड़ी बात होगी तनु दा, पर जुत्षी भैया का मन साफ नहीं है। वे अब खुद ही नेतृत्व सँभालना चाहते हैं। गाँव के लोगों से उन्होंने कहा है। अगर कोई भितरघात हो गया तनुदा...........तो सारा गाँव डूब जाएगा..........आप हम लोगों से अलग मत होइएगा तनुदा.........।
तनु- (पानी का गिलास हाथ में लिए हुए) तुम क्यों भयभीत हो रहे हो कत्ती? मैं कहीं जा नहीं रहा हूँ................तुम लोगों का स्नेह ही तो मेरा सम्बल है...............।
कत्ती- नहीं तनुदा.............न जाने क्यों मेरा मन बार-बार कहता है कहीं आपको कुछ हो गया तो?.........
तनु- कुछ नहीं होगा कत्ती (पानी एक घूँट और पीकर गिलास कत्ती को दे देता है) चलो चलकर तैयारी करें।
कत्ती- (प्रसन्न मुद्रा में) तनु दा आज माँ ने दलभरी बनाई थी। अँगोछे में बाँध दिया, कहा ‘अपने तनुदा को जरूर खिलाना.................वे हमारे तारनहार हैं’.........।
तनु- (विह्नल होकर) मैं कुछ भी नहीं हूँ कत्ती...........माँ-बहनों का आषीश मिलता रहे .............लोगों के आँसू देखकर मेरा मन तड़प उठता है कत्ती..........मैं क्या कर दूँ जिससे इन चेहरों पर हँसी लौट आए.........पर ..........पर.........यह सब(नेपथ्प से ‘तनु साहब हैं? की आवाज़ आती है। तनु कत्ती को संकेत करता है। वह गिलास रखकर बाहर जा डेविड और उदीप को साथ लेकर आता है। डेविड और उदीप दोनों पैंट और कमीज़ पहने हैं। डेविड के हाथ में एक ब्रीफकेस है।)
डेविड- हैलो, गुड मॉर्निंग।
तनु- नमस्कार आप मजे़ में तो हैं?
डेविड- इनसे मिलिए, यह हैं मि0 उदीप
उदीप- आपका यह ग्यारहवाँ प्रदर्शन है फिर भी आप पूछते हैं मजे़ में हैं?
डेविड- मैं आया है.......बात करने.........अकेले...........में (तनु कत्ती का संकेत करता है, वह हट जाता है।) 
उदीप- डेविड साहब, बडी़ आषा लेकर आए हैं। वह चाहते हैं आप जन-आन्दोलन की अगुवाई न करें.......जो भी पान-फूल.......।
तनु- यह कैसे हो सकता है? गाँव के गाँव आपके कारखाने की चपेट में आ गए हैं और मैं पीछे हट जाऊँ?
डेविड- हम उनको देखेगा.....आंदोलन बन्द न हुआ...तो कारखाना बंद .......करना.......पड़ेगा।
तनु- कारखाना बंद करना हमारा उद्देष्य नहीं है। जो प्रदूशण फैल रहा है वह बंद हो.....आस-पास के लोग भी जी सकें....।
उदीप- तनु साहब कारखाना चलेगा तो कचरा निकलेगा ही। अरबों की पूंजी कारखाने में लगी हुई है प्रदूषण नियंत्रण के लिए काम करें तो यही करते रह जाएंगे.........सारा लाभ चौपट हो जाएगा। अभी वह पचास करोड़ का लाभ देता है..........निदेषक-मण्डल गर्व के साथ वार्शिक लाभ का एलान करता है............कर्मचारियों को भी बोनस मिलता है........।
तनु- पर जनता का जीवन भी बहुमूल्य है डेविड साहब।...........आपके कारखाने ने हवा और पानी को इतना विशाक्त कर दिया है कि हँसते-खेलते लोग काल के गाल में चले जा रहे हैं। लाभ आपको मिले और कचरे की मार आस-पास की जनता झेले?.....नदी का पानी पीकर जानवर मर रहे हैं...........आप जनता की पीड़ा को भी समझें।
डेविड- इसीलिए तो डिरेक्टर साहब ने भेजा है।
उदीप- इतना बड़ा कारखाना भारत में दूसरा नहीं है। हमारा प्रबंध-तंत्र इतना ताकतवर है कि उसके इषारे पर देषों की सरकारें बनती और गिरती हैं। सरकारों की नकेल हमारे प्रबंधकों के हाथ में होती है..........हमारे ही प्रबंधकों की कई चीनी मिलें भी हैं...........किसानों की आधी देनदारी बाकी रह जाती है...........प्रबंध-तंत्र साल दो साल में धीरे-धीरे देता है, कभी-कभी तो कई सालों में देता है, सरकारें क्या कर लेती हैं तनु बाबू? सरकार के तंत्र हमारे प्रबंधकों के हाथ बिके हुए हैं। गन्ने की घटतौली करके मिलें करोड़ों कमा लेती हैं पर क्या मजाल कि कोई बोल सके?...........दो चार दस की मौत कौन कहे सैकड़ों की मौत से कारखानों के स्वास्थ्य पर कोई असर नहीं पड़ता तनु बाबू............आप अभी इस खेल में नए हैं.........आप भी धीरे-धीरे सही रास्ते में ढल जाएँगे......इसीलिए मैं आपको सचेत करने चला आया.........ये राज काज है चलने दीजिए.............जनता के दुःख-दर्द के चक्कर में ज़्यादा न पड़िए..........।
तनु- उदीप बाबू सचेत करने के लिए आपके प्रति कृतज्ञ हूँ पर मिल-मालिकों के लाभ के लिए मैं जनता के जीवन से खिलवाड़ नहीं कर सकता।
उदीप- हम बहस में उलझें यह उचित नहीं है। हम अपनी मूल बात पर आ जाएँ। आप मैदान से हटने के लिए कितना लेंगे.........................लाख-दो लाख।
तनु- एक पैसा भी नहीं....................................।
उदीप- अरे वाह........आप बिना कुछ लिए ही मैदान से हट जाएंगे........हमें ऐसी उम्मीद नहीं थी।................(वह खुषी से तनु को अपनी बाहों में भरकर उठा लेता है।) आप महान हैं।
डेविड- ए नोबुल सोल........................।
तनु- आप मुझे गलत समझ रहे हैं................मुझे मैदान से हटना नहीं है.............।
उदीप- नहीं, तनु बाबू नहीं...............आपको हटना ही चाहिए। आप जैसे सरल............महान व्यक्ति को इस दलदल में पड़ना षोभा नहीं देता। (नेपथ्य से ‘जुत्षी दा की जय’ का नारा सुनाई देता है। तनु चौंकता है)
कत्ती- (प्रवेश कर) दादा गज़ब हो गया.........।
तनु- क्या हो गया कत्ती?
कत्ती- दादा, जुत्शीदा आन्दोलन के कार्यकर्त्ताओं को बीच में ही रोककर बता रहे हैं कि तनुदा मुझे नेतृत्व सौंप गए हैं। भ्रम की स्थिति बन रही है...............।
तनु- क्षमा करें। ऐसी स्थिति बन गई है कि (तनु तेजी से उठकर चल देता है, कत्ती भी पीछे-पीछे जाता है। डेविड औेर उदीप कमरें में ही कुछ देर रुक जाते हैं। वे उसकी पत्रिकाएँ व फाइलें उलट-पलट कर देखते हैं।)
डेविड- कितना इरादे का पक्का है तनु?
उदीप- और कितना उपयोगी है जुत्षी। हमारा प्रबंध-तंत्र कितना षक्तिषाली है इसका अनुमान इस बेचारे तनु को कैसे लग सकता है?
डेविड- पर उदीप तनु जैसा लोग धरती का लोग होता है..........अपने लिए कुछ भी नहीं चाहता।
उदीप- ठीक कहते हैं आप.........ऐसे लोगों के पीछे ही जनता भागती है ..........हमारे लिए सिरदर्द बन जाते हैं यही लोग.............।
डेविड- कभी-कभी मैं भी सोचता उदीप...............क्या मैं तनु जैसा बन सकता।
उदीप- डेविड साहब आप इस तरह सोचने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं.....हमारे लिए इस तरह सोचना गुनाह है.............जनता विद्रोह न कर दे यही तो हमें देखना है............हम इसी की रोटी खा रहे हैं...........हमारे हित बिल्कुल अलग हैं। हम दो भिन्न ध्रुव हैं डेविड साहब।
डेविड- पर यही सभी झगड़ों की जड़ है उदीप..............इसीलिए हमारी रोटियाँ कसैली हो रही है। उदीप चलो.................। (एक ओर से दोनों जाते हैं दूसरी ओर से दौड़ता हुआ कत्ती आता है, वह हड़बड़ाया हुआ अत्यन्त व्याकुल है।)
कत्ती- तो ये लोग भी चले गए...............अब किससे पूछूँ?..........तनुदा को कौन ले गया? किसी ने तनुदा का अपहरण कर लिया है........दौड़ो.........तनुदा ..........तनुदा को बचाओ........कोई नहीं आता.............कोई नहीं..............तनुदा.........तनुदा..........गाँववासियों सुनो...........गाँववासियो सुनो........तनुदा का अपहरण हो गया है ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ...........कोई नहीं सुनता.........सभी जुत्षी के भाशण पर तालियाँ बजा रहे हैं..............गाँववासियों सुनो............जुत्षी अपने लिए तुम्हारा बलिदान कर देगा। गाँव वालो सुनो ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ .............तनुदा का अपहरण हो गया है ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ । (डेविड और उदीप तेजी से आते हैं उदीप के हाथ में एक रूमाल तथा डेविड के हाथ में एक रोल है। )
उदीप- तुम क्यों तनु के लिए गला फाड़ रहे हो?
कत्ती- मेरे तनुदा का अपहरण हो गया है...............आप कुछ मदद कीजिए बाबूजी...........आप जानते हैं तनुदा को कौन ले गया है?...............कौन ले गया है उन्हें?.........................उनकी ज़बान बंद करने के लिए उन्हें........................।
डेविड- तुम..................................।
उदीप- नौकरी करोगे? कारखाने में चौकीदार की ज़रूरत है तुम जैसे वफ़ादार को काम देकर हमें खुषी होगी........बोलो.......बोलो?
कत्ती- नहीं बाबू जी.............हमें हमारे तनुदा को वापस कर दो.....हम भूखे रह लेंगे ...........बिना कपड़े मकान के रह लेंगे..........पर हमारे तनुदा को लौटा दो बाबू...........हमारे तनुदा का अपहरण हो गया है.........तनुदा का अपहरण हो गया है ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ..........(इसी बीच उदीप कत्ती के दोनों हाथों को पीछे रूमाल से बांध देता है) यह क्या कर रहे हैं बाबू जी?...............क्या कर रहे हैं?........आप तो हमें नौकरी दे रहे थे बाबू जी.............।
उदीप- पर नौकरी तुम कहाँ चाहते हो?
कत्ती- बाबू जी यह कौन सा खेल-खेल रहे हैं आप.......बाबू जी हमें तनुदा के पास ले चलना चाहते हो ना.............चलो...................माई ने चने की दाल पीस कर दलभरी बनाई थी.................तनुदा को खिलाना है...........वे भूखे होंगे बाबू जी मैंने भी इसीलिए नहीं खाया है बाबू जी..............मेरा हाथ आपने बाँध दिया है न..............मैं तनुदा को कैसे खिलाऊँगा?..........तनुदा के हाथ तो खुले होंगे न.............वही मुझे खिला देंगे बाबू जी......तनुदा से भेंट करा देना बाबू जी............तनुदा.........तनुदा..........तनुदा का अपहरण हो गया है ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ .............जुत्षी लोगों को भाशण में भरमा रहा है........वह गांव को बेच लेगा............दौड़ो ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ............गाँववालों चेतो ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ.........तनुदा का अपरहण हो गया है। ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ...।
 (कत्ती की आवाज सुनकर डेविड और उदीप का चेहरा सख्त होता जाता है। जैसे ही कत्ती ‘है ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ’ की हाँक लगाता है डेविड अपना बायाँ हाथ कत्ती के मुँह पर चिपका कर दबा लेता है उसके दोनों ओठ चिपक जाते हैं जिससे वह अब बोल नहीं पाता पर उसकी आवाज़ को कुछ प्रदर्शनकारियों ने सुन लिया है। इधर-उधर चिल्लाते हुए वे दौड़ पडते हैं। नेपथ्य से उनकी आवाजें़ दौड़ो ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ..........गाँव वालों चेतो ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ................तनुदा का अपरहण हो गया है ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ .................देर तक प्रतिध्वनित होती रहती हैं। डेविड और उदीप कत्ती को टाँगते हुए ले जाते हैं।)