Footpathiya - 1 in Hindi Drama by Dr. Suryapal Singh books and stories PDF | फुटपाथिया - 1

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फुटपाथिया - 1

पात्र- 
  
 मुरली - फुटपाथिया
 हरी - फुटपाथिया
 अमित प्रकाश - फुटपाथिया
 अन्ना - फुटपाथिया
 बापट - सिपाही
 सावन्त - पुलिस उपनिरीक्षक
 सी.ओ. - पुलिस क्षेत्राधिकारी
 तीन अन्य फुटपाथिए।
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अंक एक  
 (मुंबई का फुटपाथ। आधीरात के बाद का समय। वाहनों का आना जाना बन्द हो गया है। तीन लोग सोए हुए हैं। तीनों की उम्र 20 से 30 वर्ष के बीच है। एक की नाक बजती है। फुटपाथ के किनारे फूलों के कुछ पौधे लगे हैं। उन्हीं के किनारे पानी से भरे प्लास्टिक डिब्बे के ऊपर मग औंधाया हुआ। सिपाही बापट प्रवेश करता है। एक को डंडे से कोंचता है। वह आँख मिलमिलाता हुआ बैठ जाता है।)
बापट- पैसे निकाल।     
फुट0- पैसे नहीं हैं हुजूर।
बापट- पैसे नहीं हैं?....................पैसे नहीं हैं तो मुर्गा बन................(फुटपाथिया धीरे-धीरे मुर्गा बनता है। बापट दूसरे को कोंचता है। बापट जोर से डाटता है। दोनों उठ पड़ते हैं। ) 
बापट- तेरे बाप की जमींदारी है यह..........पैसे निकाल.........यह सरकारी फुटपाथ है किसी सेठ का नहीं। (एक ने दो रुपये का सिक्का बापट की थैली में डाला। दूसरे को एक डंडा लगाया।)  
 पैसे निकाल.......
फुट02- मैं गोण्डा जिला का रहने वाला हूँ।..............
बापट- तो ?...............तो? (कहते हुए डन्डे से उसे ठेलता जाता है।) तू गोण्डा से आया है या चेन्नई से ....... पैसे निकाल (तब तक सीटी बज जाती है।) ऐं, सीटी क्यों? कोई आफ़त...........? जल्दी कर पैसे निकाल (डंडा उसके पेट में गड़ा देता है। सीटी दुबारा बजती है। बापट हड़बड़ा जाता है। ) 
 पैसे निकाल.................।
फुट03- नहीं है हुजूर। दिहाड़ी में जो मिला था दरोगा जी ने ले लिया।  
 (सीटी तिबारा और तेज बजती है। बापट सीटी की आवाज़ की ओर भागता है। तीनों फुटपाथिए भाग लेते हैं। सीटी फिर बजती है। मुरली एक युवक को पीठ पर लाद कर लाता है। युवक के सिर पर पट्टी बँधी है। युवक पैंट और कमीज़ पहने है, मुरली कुरता और पैंट। मुरली की उम्र 30 तथा युवक की 28 वर्श।)
मुरली- ..तू मुझको भी जेल में डलवा देगा............यहीं बैठ। (उसे उतारता है। नवयुवक खड़ा ही रहता है।) बैठ यहीं। दादा आएगा। कोई न कोई जुगाड़ कर देगा। बड़ा भला आदमी है। वह वसूली करने वाला दादा नहीं है। (युवक याचना भरी दृश्टि से मुरली को देखता है। ) यह बम्बई है। यहाँ घर सब को नसीब नहीं होता। यहाँ कोठियों में स्वर्ग बसता है। (युवक बैठने के लिए झुकता है, इधर-उधर देखकर बैठ जाता है ) ठीक है, बैठो। तुम बम्बई को स्वर्ग-नगरी समझकर आए होगे.............। पर यह नगरी हम जैसों को काम तो दे देती है पर रहने की ठौर नहीं दे पाती। तुम्हें बैठने में संकोच हो रहा है। यह बम्बई है। यहाँ फुटपाथ भी बिकता है। अपुन भी ऐसे ही तुम्हारी तरह भागकर आया था। तुमने सोचा होगा बम्बई में पहुँचते ही लोग हाथों-हाथ ले लेंगे। पर यह बम्बई है प्यारे। तुम कैसे समझोगे? तुम्हें कुछ पता ही नहीं है। फिल्मी नायक की तरह तुमने भी सपना देखा होगा...........पर यह बम्बई एड़ियाँ घिसवाती है...........एड़ियाँ। अब तो इसका नाम भी मुम्बई हो गया है न..........? लोग इसे फिल्मसिटी .........बॉलीवुड...........मायानगरी न जाने क्या-क्या कहते हैं?  
  तुम कुछ बोल ही नहीं रहे हो। अच्छा यह तो बताओ कि तुम कैसे ट्रक की चपेट में आ गए थे?............वह तो मैं पहुँच गया था। तुम्हें उठाकर अलग किया नहीं तो..............नहीं तो तुम्हारी लाश मिलती...........तुम्हारे माता-पिता को कितना कश्ट होता.........अगर कहीं कुछ हो जाता............तो वे रो-रोकर हलकान कर देते.............मैं भी औरों की तरह निकल जाता........तुम्हें न उठाता........पर दादा ने सिखाकर ऐसा बना दिया है कि तुम्हें छोड़कर बढ़ नहीं सका। यह महानगरी है, प्रेम और वैराग्य दोनों का पाठ यहाँ मिलता है। हाँ पढ़ने वाले ज़रूर अलग-अलग हैं (नवयुवक लड़खड़ाता है। ) अरे...........अरे................(युवक को सँभालता है।)
  (युवक पानी के लिए संकेत करता है। युवक को लिटा, दौड़कर पानी ला पिलाता है। पानी पीने पर युवक को खांसी आ जाती है। खांसी बढ़ने पर पुनः दौड़कर पानी ला पिलाता है। खांसी बंद हो जाती है। युवक बैठ जाता है।)
मुरली- तो तुम कौन हो? कहाँ रहते हो? कुछ तो बताओ? (युवक मुरली की ओर देखता रहता है। कुछ बोलता नहीं है। मुरली उसका चक्कर लगाकर उसकी आँखों में देखता है।) हो सकता है तुम सोचते हो कि मैंने अपना नाम-पता कुछ नहीं बताया, तो मैं बताए देता हूँ। मेरा नाम मुरली है। यू0 पी0 जिसे उत्तर प्रदेश कहा जाता है...............चिढ़ाने के लिए जिसे कुछ लोग उल्टा-प्रदेश भी कह देते हैं, में एक जिला है बहराइच। मैं वहीं का रहने वाला हूँ। बम्बई में रहते पाँच साल हो गए। अब तो बताओ भाई, कुछ तो ज़बान खोलो। (युवक अब दोनों पैर बटोरकर घुटने पर कुहनियाँ रख लेता है। दोनों हथेलियां पर अपनी दाढ़ी टिका देता है। )
  कुछ भी नहीं बोलोगे.........अजीब आदमी हो तुम.............मेरी बात सुनते तो हो?..........(युवक कातर भाव से देखता है। ) तेरी आँखों से विवशता की लौ निकल रही है। ऐसा लगता है जैसे कोई खरगोश तेंदुए के सामने आ गया हो। पर मैं तेंदुआ नहीं हूँ भाई। ...........भेड़िया भी नहीं........इन्सान हूँ ..........(युवक के हाथ पर थपकी देता है। )
हरी- कौन है जो अपने को इंसान कह रहा है यहाँ? 
 (प्रकाश-वृत्त हरी पर पड़ता है। खसखसी दाढ़ी, कुर्ता और जींस पहने हुए। उम्र 25वर्श कुर्ते की बांह मुड़ी हुई एक झोला कन्धे से लटक रहा है।) 
  हैवानों की बस्ती में इंसान! कौन है?.....मुरली? किसको फांस लाया है रे?................(चलकर मुरली तक आता है, प्रकाश तेज हो उठता है, वह युवक को देखता है, दाहिने हाथ से उसे टटोलता है। चेहरे पर अपनी दृश्टि टिका देता है।) अरे! मुरली.............तू भी गूंगा हो गया रे...............बोलता क्यों नहीं? (मुरली चुप रहता है। हरी युवक के चारों ओर एक चक्कर लगाकर खड़ा हो जाता है।) हूँ माल तो ठीक है। इसी तरह के गावदुम की मैं तलाश कर रहा था। ठीक ऐसा ही गावदुम मुरली अब तू इसे मेरे हवाले कर।
मुरली- (हाथ जोड़ते हुए। ) हरी भाई.............।
हरी- मुरली! चीं-चुपड़ मत कर। मैंने एक कोठी वाले से वादा किया है। घरेलू काम के लिए ऐसा ही गावदुम चाहिए अपुन को भी कुछ मिल जाएगा। बोल कितने में.......।
मुरली- हरी भाई..............................।
हरी- कहो! संकोच न करो...........तुमने बहुत ठीक माल पकड़ा है ........अगर तू इसे कहीं बेच भी आया होगा तो भी मैं इसे जाने नहीं दूँगा।..............(युवक के चारों ओर चक्कर लगाकर उसके सामने खड़ा हो आंखों में झाँकते हुए) ऐसा षुतुरमुर्ग............।
मुरली- हरी............तुम इसे षुतुरमुर्ग कहते हो? क्या हम सब षुतुरमुर्ग नहीं हैं? संकट का भान किसे है? हम जैसे न जाने कितने नौजवान रोटी की तलाश में मारे-मारे षुतुरमुर्ग बन गए हैं। कोई पूछता है उन्हें? कल को यही बच्चे.....................।
हरी- तू कहाँ का पचड़ा लेकर बैठ गया? इस षुतुरमुर्ग की बात कर ............(पुनः युवक के चारों ओर चक्कर लगा उसके चेहरे पर दृश्टि टिका कर) इसको देखकर मुझे मुस्कराने को मन करता है। ऐसा अजीब चेहरा है यह! अब बोल क्या चाहिए तुझे?.........(हरी युवक की बात आते ही चुप हो जाता हैै। ) तू फिर चुप हो गया। अभी देश-दुनिया की बात छेड़ दूँ तो तू चहकने लगेगा। पर इस युवक की बात आते ही तुझे जैसे लकवा मार जाता है? (मुरली के कंधे पर हाथ रखकर) बोल? (झकझोर देता है) बोलता क्यों नहीं?.............
मुरली- (उत्तेजित होकर) तू इसकी बात न कर..............तू आदमी नहीं है। इसको बेचकर तू चार पैसा कमाना चाहता है, पर यह नहीं देखता कि..................।
हरी- देखने दिखाने की बात मुझे क्यों सूझेगी? मुझे अपनी रोटी दिखाई पड़ती है। तू भी रोटी खाता है कि नहीं......................।
मुरली- खाता हूँ...................पर हैवान बनकर नहीं।
हरी- और मैं हैवान बनकर खाता हूँ रोटी?...............।
मुरली- क्या समझूँ मैं? तुमने इसकी कठिनाइयों को जानने की कोशिश नहीं की। बस अपने धन्धे पर आ गए।
हरी- मैं कामगारों की आपूर्ति करता हूँ............किसी व्यक्ति को देखते ही मुझे अपना धन्धा याद आ जाता है तब हर आदमी मुझे अपना ग्राहक ही दिखाई पड़ता है। बात टनाटन करता हूँ तो दाम भी टनाटन.............मैं लचर-पचर बात नहीं करता।
मुरली- भैया हरी, जाओ। तुम्हारे पास धन्धे की कमी है क्या? इसे छोड़ जाओ..............।
हरी- क्या तू इसका कीमा बनाएगा? जा रहा हूँ पर तू अच्छा काम नहीं कर रहा.............(हरी चला जाता हैै।) 
मुरली- तू कुछ बता भाई............नहीं तो बम्बई सचमुच तेरा कीमा बना देगी। तू घर से भाग कर आया है। बाप ने डाटा था या पत्नी से झगड़कर आया है कुछ तो बता ?.......(युवक की आँखें गहरी संवेदना को व्यक्त करती हुई फैल जाती हैं। ओठ फरफराते हें पर आवाज़ नहीं निकलती। मुरली उसकी आँखों में झांकता है, फरफराते ओंठ को देखता है ) तू जो कहना चाहता है कह नहीं पा रहा......क्यों?..........क्या हो गया तुझे?............मैं हाथ जोड़ रहा हूँ कुछ तो अपनी बात बता। मुझसे कोई पूछेगा कि यह कौन है तो मैं क्या बताऊँगा?
  तू चुप है पर मेरा हृदय बल्लियों उछल रहा है। कुछ मेरा कश्ट भी समझ। कहीं ऐसा न हो जाए कि मुझे ही जेल की हवा खानी पडे़। पर अब मैं क्या कर सकता हूँ? ठीक है..........मैं ही थोड़ा हट जाता हूँ (थोड़ा हटता है। कुछ क्षण बाद) नहीं...........नहीं हट जाना तो भाग जाना हुआ।.............देखा जाएगा...............जो कुछ पडे़गा............उसे भोगना ही होगा। भोग लूँगा.............(कुछ दूर तक जाकर लौट आता है) घर छोड़कर बम्बई आ गया...............गाँव के लोग यही कहते होंगे .........मुरलिया भाग गया.......पर मुरली यहाँ भी तो नाक ही रगड़ रहा है........रहने को बित्ता भर ठौर नहीं.......कहीं चार दिन के लिए बीमार पड़ जाओ तो रोटियों के भी लाले पड़ जाते हैं। ..........वह तो कहो दादा का एक सहारा है............आफ़त-विपत्ति में वही तो...........पर मैंने इस जवान को बचाकर क्या विपत्ति मोल ले लिया?...........नहीं..........आदमी ही आदमी के काम आता है। कोई किसी को सहारा नहीं देगा तो दुनिया कैसे चलेगी?
हरी- (आकर) तेरे सहारे ही दुनिया नहीं चलेगी। कितनी अजीब बात है यह...........लोग यह समझने लगते हैं कि उन्हीं के सहारे दुनिया टिकी है...........यदि वे हाथ खींच लेंगे तो दुनिया भरभरा कर गिर पड़ेगी..........वाह.........मुरली...........वाह, एक को पकड़कर किनारे क्या कर लिया सोचने लगे कि दुनिया को अपनी गदोरी पर रख लिया है..........क्यों मुरली? अनपढ़, गंवारों को तो बहका सकते हो पर जो थोड़ा भी समझदार है, तुम्हारी इस लन्तरानी में कैसे आएगा?
मुरली- लन्तरानी की बात मैंने कब की, हरी भैया? मैंने इसको खींच न लिया होता तो अब तक यह यमराज के दरवाजे खोली ढूँढ रहा होता।
हरी- धत् तेरे की.........यमराज के यहाँ भी खोली............।
मुरली- तो क्या सिंहासन मिलेगा हरी भैया..........? हम जैसों को पेड़ की छाया मिल जाय यही बहुत है।
हरी- सपने देख मुरली.............सपने...........कोठी का सपना देख ............खोली-खोली चिल्ला रहा है।
मुरली- सत्तर रूपये की दिहाड़ी में कोठी का सपना तुम्हीं देखो हरी भैया। इस समय जो आफ़त मैंने मोल ली उससे छुट्टी मिले.........अभी कोई पुलिस-दरोगा आ जाए तो लेने के देने पड़ जाएंगे.......।
हरी- इसी इन्सानियत का दम्भ भरता है तू। मदद करता है औेर पछताता भी है। कैसा इन्सान है तू मुरली?
मुरली- पर यह बोलता ही नहीं कुछ।
हरी- बोलेगा............बोलेगा...........फड़फड़ाकर बोलेगा......। सुन तो............(मुरली को किनारे ले जाकर कान में कुछ कहता है। मुरली चौंकता है.............। )
मुरली- नहीं हरी भैया,............नहीं।
हरी- तो फिर सिर पटक। मैं चला............(चलने को होता है कि मुरली उसका हाथ पकड़ लेता है।)
मुरली- अच्छा देख ले...............तू भी...........।
 (हरी लौटकर नवयुवक के चारों ओर चक्कर लगाता है। उसके चेहरे पर अपनी दृश्टि टिका देता है।)
हरी- तो तू.........चोर है। सेठ जी के घर से चोरी करके भागा है। चोर है तू..............पक्का चोर। तेरे बाप-दादे भी चोरी करते रहे...........और तू..................(युवक एक पक्षी की भाँति फड़फड़ा उठता है और पूरी ताकत से चिल्ला उठता है।)
युवक- चोर नहीं हूँ मैं.............। (किसी बच्चे को जैसे कोई थप्पड़ मार दे और वह रोकर चिल्लाने लगे उसी तरह युवक फफक-फफक कर रो पड़ता है। )
हरी- (तेज आवाज़ में ) तू चोर है पक्का चोर........(चोर षब्द सुनकर गश्ती सिपाही बापट तेजी से आ जाता है।)
बापट- कहाँ है चोर?................कौन है चोर?.........
 (युवक रोते-रोते कहता है-‘मैं चोर नहीं हूँ..........। बापट भड़क उठता है।)
बापट- तू चोर है...........ठीक कहता है यह आदमी...........महानगर में चोरियों की बाढ़ सी आ गई है (हरी औेर मुरली आश्चर्य और असमंजस में। बोली नहीं फूटती है। बापट अपना मोबाइल निकालकर बात करता है।)
बापट- सर, एक चोर पकड़ में आ गया है.............बहुत षातिर चोर है..........बहुत षातिर। सैकड़ों चोरियाँ की होंगी इसने। हो सकता है सेठ जी के यहाँ भी इसी ने चोरी की हो। क्या? मुख्यमंत्री जी का का हुक्म है कि चौबीस घण्टे में चोर पकड़ लिया जाए।..........आप कितने भाग्यवान हैं सर............जी सर...........जी..........जी सर......अच्छा जी..............(बापट अपना मोबाइल बन्द कर जेब में रखता है। इतने में जीप की घरघराहट पुलिस उप निरीक्षक सावन्त तेजी से कदम रखते हुए आ जाते हैं।) 
सावन्त- कहाँ है चोर बापट? (युवक का रोना तेज हो जाता है। ‘मैं चोर नहीं हूँ’ कहते हुए रोता रहता है।) तो यह है। इसके सिर पर पट्टी बंधी हुई है। यही है वह चोर जिसने सेंठ जी के यहाँ चोरी की।(अपनी डायरी निकालकर देखता है।) चोर के सिर पर पट्टी। बापट मिल गया चोर..........चोरी करते सिर में चोट लग गई होगी। मुख्यमंत्री के हुक्म का पालन चार ही घंटे में...........एक रिकॉर्ड है यह..................बापट इसे गाड़ी में बिठा।  
मुरली- (हाथ जोड़कर) सर, यह चोर नहीं है.............सर, इसे छोड़ दें।............(सावन्त के पाँव पकड़ लेता है।) 
सावन्त- क्या नाम है इसका?..........................
मुरली- सर, नाम तो मुझे नहीं मालूम।
सावन्त- नाम तक जानते नहीं, कहते हो कि चोर नहीं है। चोर है या नहीं, यह फैसला अदालतें करती हैं। मुख्यमंत्री का हुक्म है कि...............(युवक रोता रहता है। बापट युवक को पकड़कर ले चलता है। युवक का रोना और तेज हो उठता है। सावन्त धमकदार डग धरते हुए जाता है मुरली धड़ाम से गिर पड़ता है। हरी बैठकर पूछता है।) 
हरी- क्या हुआ मुरली?..................क्या हुआ?
मुरली- (अपनी रौ में कह उठता है।)
 मीरा के सैंया सुनो,
 सूर के कन्हैया सुनो,
 सुनो कबिरा के राम।
 क्यहि बिधि बचिहैं चाम?
अख0- (अख़बारवाला-चिल्लाते हुए अख़बार बेच रहा है)............
 सेठ के यहाँ एक करोड़ नक़दी की चोरी। मुख्यमंत्री द्वारा चौबीस घण्टे में चोरी के पर्दाफाश का आदेश। देश में बीस करोड़ नौजवान बेकार। काम देना हमारी ज़िम्मेदारी नहीं, सरकार का बयान। सरकारी उद्यमों को बेचने की तैयारी, मंत्री ने लिया घूस।  
 (साइकिल की घण्टी बजाते हुए निकल जाता है। उसके जाते ही अन्ना का प्रवेश, उम्र- 45वर्श, कुर्त्ता, पाजामा पहने है।)
अन्ना- कौन मुरली? क्या हुआ तुझे? क्यों बहुत दुःखी हो रहा है?  
मुरली- दादा.................एक बेक़सूर नवजवान को पुलिस पकड़ ले गई है। दादा कुछ करो................।
अन्ना- कौन है वह? पुलिस क्यों पकड़ ले गई?
मुरली- दादा नाम ही तो नहीं जान पाए हम लोग.........पर उसकी पट्टी तो हमीं ने कराई थी।
अन्ना- पट्टी?
मुरली- हाँ! एक ट्रक की चपेट में आते ही मैंने उसे खींच लिया था। बच गया था वह, पर उसके सिर में चोट लग गई थी। पट्टी कराकर मैं उसे यहीं ले आया था।.............उसे कुछ हो गया था दादा..............वह कुछ बोल नहीं रहा था...............इसी हरी ने उसे चोर कह दिया था। इसी पर पुलिस उसे पकड़ ले गई।  
हरी- दादा, दरोगा कहता है कि चोर के सिर पर पट्टी बंधी है। यह ज़रूर चोर है।  
अन्ना- पुलिस को चौबीस घण्टे के अन्दर चोर को हाज़िर करना था। उसने कर दिया।
मुरली- दादा.....वह चोर नहीं था..........उसकी आँखें.......।
अन्ना- हमारा मुरली आँखें देखकर पहचान लेता है कि आदमी चोर है या नहीं।
मुरली- नहीं दादा.........वैसी निश्कलुश आँखें चोरी नहीं कर सकतीं।
हरी- मुरली ठीक कह रहा है दादा............मैं भी यही सोचता हूँ कि वह नवयुवक..।
अन्ना- तो मैं कहाँ कह रहा हूँ कि वह चोर है? तुम्हारा दादा तो निर्दोश लोगों को बचाने में ही अपना घर द्वार कुछ भी नहीं बना पाया। पर.............जब चोर ही सत्ता में बैठे हों तो कितना मुश्किल होता है, निर्दोशों को बचा पाना।.................तू ठीक कहता है हरी, हमें हर सम्भव प्रयास करना चाहिए। हम सब के देखते ही देखते अबोध, निर्दोश दंडित किए जाएँ.........यह उचित नहीं है........पर डगर कठिन है........मुरली तूने ठीक किया, उसे बचाया। हम सब लड़ेगे अन्तिम सांस तक..........।
मुरली- दादा.............।  
        (मुरली खुश हो उठता है।)
 मीरा के सैंया सुनौ...
सूर के कन्हैया सुनौ
 सुनौ कबिरा के राम।
    क्यहि विधि बचिहैं चाम?