the unsaid in Hindi Drama by silent script books and stories PDF | अकथ - भाग 5

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अकथ - भाग 5

अवनि की आँखें अचानक खुल गईं। वह इतनी हैरान थी कि उसका दिमाग सुन्न पड़ गया था।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह इस बात से राहत महसूस करे कि उस मासूम बच्चे की मौत की वजह वह खुद नहीं थी, या उन दो लोगों पर गुस्सा करे जिन्होंने एक बेगुनाह की जान ले ली थी।

उसके अंदर भावनाओं का एक तूफ़ान उठ रहा था।

वह अपनी जगह से उठी और बोली, "थैंक यू डॉक्टर...

डॉक्टर ने अचरज से उसकी तरफ देखा और पूछा, "अवनि, रुको! ऐसा क्या देख लिया तुमने? 

मैंने तो तुम्हें वह हादसा सिर्फ इसलिए याद दिलाया था ताकि तुम समझ सको कि हर दुख उतना बड़ा नहीं होता जितना दिखता है, नज़र बदलोगे तो हल मिल जाएगा... हाँ, उसमें थोड़ा समय लगता है। पर तुम तो एक ही बार में... मुझे बताओ तो सही कि बात क्या है?" 

अवनि हड़बड़ाते हुए बोली, "माफ़ करना पर अभी मेरे लिए एक बहुत ज़रूरी काम करना बाकी है।"

यह बोलते ही वह बिना रुके निकल गई और तेज़ी से अपने घर की तरफ भागने लगी।

अवनि भागते हुए हाँफती हुई अपने घर पहुँची। उसने जैसे ही हड़बड़ाहट में दरवाज़ा खटखटाया, अंदर से उसकी माँ बाहर आईं।

अवनि की माँ ने तुरंत हाथ में बेलन उठा लिया और चौकन्नी होकर पूछा, "कौन... कौन हो तुम?"

अवनि ने अपनी माँ की इस हालत को देखा, तो उसने गहरी साँस ली और बोली, "अरे माँ, ये मैं हूँ, अवनि! आप ये क्या कर रही हो?"

अवनि की आवाज़ सुनते ही उसकी माँ का चेहरा शांत हो गया। उन्होंने बेलन को पीछे छुपाया और राहत की साँस लेते हुए बोलीं, "ओह मेरी बेटी... पर तुम तो अपने ऑफिस गई थीं ना?

इतनी जल्दी तो तुम कभी घर नहीं आती। तेरे उस खडूस बॉस के व्यवहार से तो कभी नहीं लगता कि वो तुझे इतनी आसानी से घर भेज देगा, बिना पूरी मज़दूरी कराए! मैं तो कहती हूँ अवनि, तू उस काम को छोड़ ही दे।"

अवनि ने अपनी घबराहट को छुपाते हुए चेहरे पर एक झूठी मुस्कान लाई और बोली, "अरे माँ, वो आज बॉस खुद किसी ज़रूरी काम से बाहर गए हुए हैं।

तो मैंने सोचा कि जब मेरा आज का सारा काम खत्म हो ही गया है, तो क्यों न आज जल्दी घर चलकर आराम कर लूँ? इतने दिन हो गए थे, वैसे भी काम से कोई छुट्टी नहीं ली थी।"

माँ ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया, लेकिन अवनि का दिल अंदर ही अंदर बैठ रहा था।

उसने अपनी माँ को यह नहीं बताया था कि वह उस नौकरी से रिज़ाइन कर चुकी है।

घर में सिर्फ वही एक कमाने वाली थी, और अगर माँ को पता चलता कि उसकी नौकरी छूट गई है, तो वह चिंता के मारे बीमार हो जातीं।

अवनि अपनी माँ को उस मानसिक तनाव से दूर रखना चाहती थी।

"अच्छा माँ, मैं ज़रा हाथ-मुँह धोकर अपने कमरे में जाती हूँ, थोड़ा सिर भारी लग रहा है," अवनि ने बहाना बनाया और अपने कमरे की तरफ बढ़ गई।

शुरुआत में उसका हाथ काँप रहा था। उसे उस हादसे की कार धुंधली दिखी थी और उन लोगों के चेहरे भी साफ़ याद नहीं थे। उसने हताश होकर पेंसिल छोड़नी चाही, 

धीरे-धीरे, धुंध छटने लगी और उसका हाथ कागज़ पर अपने आप चलने लगा।

अवनि की पेंसिल ने सबसे पहले सड़क के किनारे खड़े एक साये को उकेरा। वह एक लंबा आदमी था, जिसका चेहरा तो धुंधला था, लेकिन उसका एक हाथ बिल्कुल सीधा उठा हुआ था... उसकी उँगली सड़क पार करते हुए उस मासूम, गरीब बच्चे की तरफ इशारा कर रही थी।

अवनि स्केचबुक को मेज़ पर छोड़कर झटके से पीछे हट गई। वह सोचने लगी—उस दिन  तो मैं फोन पर बात कर रही थी।

मेरा पूरा ध्यान फोन पर था और अचानक आई उस तेज़ आवाज़ पर था। मैंने तो सिर्फ उस कार को आते देखा था... फिर मेरे हाथों ने कागज़ पर सड़क किनारे खड़े इस आदमी का स्केच कैसे बना दिया?

मैंने इस इशारे को कब देखा? क्या मेरा दिमाग मेरे साथ कोई खेल खेल रहा है? 

वह पागलों की तरह कमरे में चक्कर काटने लगी। डर और उलझन के मारे उसके माथे से पसीना टपक रहा था। वह बार-बार उस स्केच को देखती और फिर अपनी यादों को खंगालने की कोशिश करती।

उसका दिमाग झूठ नहीं बोल रहा था। उस दिन भले ही वह फोन पर बात कर रही थी और उसकी आँखें कार को देख रही थीं

लेकिन उसके दिमाग ने अनजाने में सड़क के दूसरी तरफ खड़े उस मौत के सौदागर को भी देख लिया था!

वह कोई झूठी याद नहीं थी, बल्कि सच था  उसके दिमाग की किसी अंधेरी कोठरी में बंद था, और आज हिप्नोथेरेपी ने उसे आज़ाद कर दिया था।