Shrapit ek Prem Kahaani - 83 in Hindi Spiritual Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 83

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 83

एकांश कहता है:

 पता नही यार इस तरह के दवाई के बारे मे मुझे कोई नॉलेज नही है। ये बेहोशी की दवाई थी क्योकी अगर ये बेहोशी की दवाई क्लोरोफॉर्म या एनेस्थीसिया होती तो हम बेहोश हो जाते मगर हम बेहोश नही हूए हम सब कुछ दैख और समझ सकते थे।"

 तभी वृन्दा कहती है :

" ये एक तरह का पैरालाइसिस जैसा था । "

एकांश कहता है:

" अब ये वही जाने के ये क्या था क्योकी अगर ये पेरालिसिस था तो हमारे सारे अंग काम नही करता मगर ऐसी कुछ भी नही था । उसने कुछ ऐसी चिज का इस्तेमाल किया के हम कमजोर हो गए थे। "

तभी गुणा कहता है:

" तुम लोग अपनी डॉक्टरी बाद मे झाड़ना पहले ये सौचो के उस चेतन को कैसे पकड़े। "

चतुर कहता है:

" अभी तो वो काफी दुर निकल गया होगा । "

" दुर निकल गया तो क्या हुआ। उसके दोबारा यहां दिखने से एक बात तो तय हो गया है के वह यही कहीं आस पास ही रहता है। और वह किसी खास काम से भटक रहा है। "

आलोक कहता है।

आलोक की बात सुनकर एकांश कहता है:

" वो जिस किसी काम से भी आया हो इस बार हम उसे जरुर पकड़ लेगे।"

 वर्शाली वही पास मे बहोत ही मायूस बैठी थी। एकांश वर्शाली को दैखकर समझ जाता है । के वह चेतन के भाग जाने से मायूस है। तभी गुणा एकांश से कहता है:
." अच्छा तु ये बता के तु सुबह से कहां गायब था और हमने तुझे कितना फौन किया पर तेरा फौन है के लगता ही नही । फिर बाद मे तेरे घर पर भी फोन किया पर तु वहां पर भी नही था। गुणा बात सुनकर 
वृन्दा एकांश की और गुस्से से दैखती है और कहती है:

" तुम्हें कुछ काम धाम है की नही या ये जो हॉस्पिटल तुमने खोलने के बारे मे सौच रखा है उसे बंद करने 
की इरादा है। क्योकी ना तो तुम मरीजों के ईलाज के टाईम पर रहते हो और ना ही उसकी डिसचार्ज के समय । अगर ऐसे ही चलता रहा तो फिर हो गया तुम्हारा हॉस्पिटल खोलने का सपना ।"

 वृन्दा की बात सुनकर एकांश को बहोत बुरा फिल होता है। पर एकांश चुप रहता है क्योकी वो जानता था के उससे गलती हूई है। आलोक समझ जाता है एकांश क्या फिल कर रहा है। और आलोक मन ही मन सौचता है। 

" ये वृन्दा को ऐसी बात नही बोलनी चाहिए थी क्योकी 
ये हॉस्पिटल सिर्फ एकांश की नही बल्की उसके पापा का सपना है। वृन्दा अपनी बात आगे जारी रखते हूए कहती है:..

" अभी भी तो तुम कही जा ही रहे था ना तो जाओ। "..

एकांश वृन्दा की बात का कोई जवाब नही देता है। आलोक वृन्दां से कहता है:

ये1 क्या बोल रही हो वृन्दा तुम । तुम ऐसे एकांश से बात नही कर सकती है। माना की वो सुबह से नही 
था। पर शायद इसमे उसकी कोई मजबुरी रही होगी तुम्हें पहले एकांश से ये पूछनी चाहिए थी। और ये हॉस्पिटल । इस हॉस्पिटल को खोलने के लिए इंद्रजीत अंकल और आलोक ने एक सपना दैखा है। "

" तुम उस सपने के बारे मे कुछ नही कह सकती ।"

आलोक की बात सुनकर वृन्दा को अपनी गलती का अहसास होता है। वो समझ जाती है। के वर्शाली के गुस्सा उसने एकांश पर निकाल दिया है। एकांश आलोक से कहता है:

" जाने दे यार बोलने दे उसे । गलती मेरी ही है। मुझे वहां पर होना चाहिए था । मेरे वजह से तुम सबको बहोत परेसानी उठानी पड़ी यार । इसके लिए सॉरी।"

एकांश के सॉरी कहते ही गुणा एकांश से कहता है:

"/ये क्या बोल रहे हो यार । हम दोस्तों मे ये सॉरी कहां से आ गई।"

गुणा वृन्दा की और दैखकर कहता है:

" और ये हॉस्पिटल खोलने का मतलब ये नही है के 
तुम हॉस्पिटल बना रहे हो तो तुम्हें ही सब करना पड़ेगा । क्योकी ये हॉस्पिटल तुमने सभी गांव वालों के लिए खोला है। तो हम सबका भी कुछ फर्ज बनता है ना यार।"

 आलोक कहता है:

" हां यार गुणा ठिक कह रहा है। गांव के प्रति हमारा भी तो कुछ फर्ज बनता है। "

वृन्दा अपनी गलती मानते हूए एकांश से कहती है:

" मुझे माफ कर दो एकांश मुझे तुमसे ऐसे बात नही करनी चाहिए थी। "

वृन्दा की बात का एकांश जवाब देते हूए कहता है। 

" सॉरी बोलने की कोई जरुरत नही है वृन्दा। तुमने जो कहा वो ठीक था । दरसल गलती मेरा ही है। मुझे तुम सबको बताकर जाना चाहिए था। पर बात ही कुछ ऐसी थी के मुझे तुम सबको बिना ही जाना पड़ा। अच्छा ठीक है छौड़ो अब हमलोग तबसे आपस मे ही बात किये जा रहा हूँ और वर्शाली तब से अकेली चुप चाप है। "

गुणा सबका ध्यान भटकाते हूए कहता है। 

सभी वर्शाली की और दैखता है। 

चतुर वर्शाली के पास जाकर कहता है। 

" माफ करना वर्शाली हम सब किसी और बात पर चर्चा कर रहा था । पर तुम तबसे बिल्कुल चुप हो और सांत खड़ी हो ? "

वर्शाली कहती है।

 मैं क्या बोलु बस आप सब की बातें सुन रही थी । 


वर्शाली चतुर ले पूछती है। 

" क्या आप उस मानव को जानते हो जो अभी यहां से भाग गया है। "

वर्शाली के मुह से मानव शब्द सुनकर सभी वर्शाली की और हैरानी से दैख रहा था। चतुर हिचकिचाते हुए जवाब देता है।


" न..... न.... नही ...! पर क्यों ? तुम जानती हो क्या उसे ?"

 वर्शाली ना मे अपना सर हिलाते हूए कहती है। 


" नही ....! नही.......! मैं तो उस मानव को आज पहली बार दैख रही हूँ। इसिलिए तो मैं आप सब से ये प्रश्न कर रही हूँ के वास्तव मे वो मानव कौन था और आप सब को दैखकर वो भय से भागा क्यों ? "

चतुर और बाकी सभी वर्शाली के भाषा से हैरान था। एकाश समझ जाता है के सभी वर्शाली के भाषा से हैरान है। तभी गुणा कहता है। 

" वर्शाली ये तुम कैसे बात कर रही हो। ऐसा लग रहा है। जैसे तुम पृथ्वी की नही किसी और जगह से आई हो। "

गुणा की बात का समर्थन करते हूए चतुर और आलोक भी कहता है। 

" हां वर्शाली तुम्हारी भाषा अजीब है । ऐसा लग रहा है के तुम इस युग के नही बल्की किसी और युग से आई हो ।"

 सबके ऐसा कहने से वर्शाली घबरा जाती है। वो कुछ समझ नही पा रही थी के वो क्या बोले। तभी एकांश कहता है। 

" क्या यार तुम सब भी ना। अब वर्शाली को ऐसे ही बोलने की आदत है और उसे अच्छा लगता है। तो उसे बोलने दो इसमे उसे इस तरह से परेसान मत करो। "

एकांश गुणा की और दैखकर कहता है :

" और तुम्हें क्या लगता है के वर्शाली किसी और समय से आई है या दुसरे लोक की है?"


गुणा ना मे अपना सर हिलाते हूए कहता है:

" ना .....! ना ......! ऐसी बात नही है। वो हम सब ऐसे ही बोल रहे थे ।"

 आलोक कहता है।

 हम्मम! अब ये बताओ के हमे आगे क्या करना है? इस चेतन को कहां ढुडना है?"

तभी चतुर कहता है। 

" क्यों ना हम सब अभी आलोक के घर चल कर दैखते है शायद इस बार वो वहीं गया हो और हम उसे पकड़ ले।"

चतुर की बात पर आलोक कहता है।

" वो सब तो ठीक है पर हम सब का वहां पर जाना ठिक नही होगा इतने सारे लोग को एक साथ वहां पर दैख कर बड़े पापा को हम पर शक हो जाएगा । "

कुछ दैर सौचते हूए कहता है :

" इसिलिए एक काम करता हूँ । मैं और चतुर अभी जाकर दैखता हूँ । अगर चेतन हमे वहां पर मिला तो तुम सब को खबर कर दुगां। और अगर नही मिला तो आज शाम को यही मिलकर डिस्कसन करुगां के आगे क्या किया जाए। "

आलोक की बात पर सभी राजी हो जाता है। आलोक गुणा से कहता है।

" गुणा तु वृन्दां को घर तक छौड़कर आओ , क्योंकी पता नही कौन कब क्या दे , हमे लड़कियों को अकोला नही छोड़ना चाहिए । फिर सभी शाम को यही मिलते है।" 

 आलोक की बात को सुनकर वृन्दा गुस्से से एकांश की और दैखकर कहती है। 

" कोई जरुरत नही है। मैं खुद चली जाऊगीं। "


To be continue....1305