तरकीब in Hindi Motivational Stories by Anika Ku books and stories PDF | घर चलाने की तरकीब

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घर चलाने की तरकीब

                           "कहानी शुरू करने से पहले एक सवाल। क्या आपके घर में भी कभी सास और बहू के बीच शीत युद्ध चला है? क्या आप भी उस सैंडविच की तरह महसूस करते हैं जो दो पार्टों के बीच पिस रहा है? अगर हां, तो आज की कहानी सिर्फ कहानी नहीं आपके घर का आईना है।"

"अगर आपको रिश्तों की उलझनों और मिठास से भरी क्लासिक कहानियां पढ़ना पसंद है तो अभी हमें फौलो करें। आपका एक क्लिक हमें ऐसी नायाब कहानियां आप तक लाने की ताकत देता है। तो चलिए चाय का कप थाम लीजिए और तैयार हो जाइए मेरी (अनिका कुमारी) की उस मास्टर पीस के लिए जो हर भारतीय घर की दास्तान है।"


"कहानी का नाम है,घर चलाने की तरकीब,।"

"शाम का वक्त था। दफ्तर से थका हारा बेटा रमेश घर लौटा। उसे उम्मीद थी कि घर में शांति मिलेगी, चाय मिलेगी और सुकून मिलेगा। लेकिन जैसे ही उसने घर की देहरी लांघी उसे महसूस हुआ कि माहौल में बारूद की गंध है। उसकी मां एक पुरानी ख्यालों की महिला आंगन में बैठी माला जप रही थी। लेकिन उनके होठों पर भगवान का नाम नहीं बल्कि शिकायतों का अंबार था। उनका चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था।"

"रमेश ने जूते उतारे और मां के पास जाकर बैठ गया। अम्मा पानी। मां ने पानी का लोटा तो थमाया लेकिन साथ में शिकायतों का दफ्तर भी खोल दिया।......बेटा अब मुझसे नहीं सहा जाता। यह घर अब घर नहीं धर्मशाला बन गया है। तुम्हारी बीवी महारानी जी उनका तो मिजाज ही नहीं मिलता।"

"रमेश ने सिर पकड़ लिया।....फिर शुरू हो गई अम्मा। आज क्या हुआ?"

"मां ने ताना मारा।.....हुआ क्या? वही जो रोज होता है। बहू को देखो। अभी तक कमरे से बाहर नहीं निकली। दिन चढ़ गया। शाम हो गई पर महारानी का दरबार खत्म नहीं होता। ना सास की चिंता ना घर की। मैं बूढ़ी जान खपती रहती हूं और वह मजे से किताबें पढ़ती रहती हैं।"

"रमेश दिनभर की थकान के कारण कुछ झुंझुला गया। उसने कहा.......तो आखिर तुम मुझसे क्या करने को कहती हो अम्मा? मेरा काम स्त्री को शिक्षा देना तो नहीं है। यह तो तुम्हारा काम है। तुम सास हो। तुम उसे डांटो, मारो, जो सजा चाहे दो। मेरे लिए इससे ज्यादा खुशी की और क्या बात हो सकती है कि तुम्हारे प्रयत्न से वह आदमी बन जाए, सुघ बन जाए।"

"मां ने मुंह बिचकाया और बोलीं........ वाह, मुंह से बात निकालने नहीं देती। डाटू क्या खाक? उसके सामने तो मैं अपनी आबरू बचाती फिरती हूं कि कहीं किसी के मुंह पर मुझे कोई अनुचित शब्द ना कह बैठे। वो तो शेरनी है शेरनी।"

"रमेश.......तो फिर इसमें मेरी क्या खता है? मैं तो उसे सिखा नहीं देता कि तुमसे बेअदबी करे।"


"मां........तो और कौन सिखाता है? तुम ही तो हो जड़। तुम तो अंधेर करते हो बेटा।"

"रमेश.......मैं अंधेर करता हूं।"

"मां....... हां अंधेर नहीं तो और क्या? सत्य कहती हूं। तुम्हारी ही शह पाकर उसका दिमाग सातवें आसमान पर चढ़ गया है। जब वह तुम्हारे पास जाकर टेसुए बहाने लगती है तो तुम पिघल जाते हो। कभी तुमने उसे डांटा कभी समझाया कि तुम्हें अम्मा का आदर करना चाहिए। तुम तो खुद उसके गुलाम हो गए हो। जोरू के गुलाम ।"

"रमेश को यह शब्द चुभ गया।"

" माँ आगे बोलीं........ वो भी समझती है कि मेरा पति कमाता है। फिर मैं क्यों ना रानी बनूं? क्यों किसी से दबू? मर्द जब तक शय ना दे औरत का इतना गुर्दा इतनी हिम्मत हो ही नहीं सकती।"

"रमेश ने गहरी सांस ली। वह इस रोज-रोज की बहस से तंग आ चुका था। उसने तर्क करना शुरू किया।........ तो क्या मैं उससे कह दूं कि मैं कुछ नहीं कमाता। बिल्कुल निक्खटू हूं। क्या तुम समझती हो तब वह मेरा आदर करेगी? मुझे जलील नहीं समझेगी? अम्मा हर एक पुरुष चाहता है कि उसकी स्त्री उसे कमाऊ, योग्य और तेजस्वी समझे। और सामान्यता वह जितना है उससे बढ़कर अपने को दिखाता है। मैंने कभी नादानी नहीं की। कभी स्त्री के सामने डींग नहीं मारी। लेकिन स्त्री की दृष्टि में अपना सम्मान खोना तो कोई भी पुरुष नहीं चाहेगा।"

"मां ने हार नहीं मानी और बोलीं...... तुम बात घुमा रहे हो। जब वह तुमसे मेरी बुराई करती है तो तुम कान लगाकर ध्यान देकर और होठों पर मीठी मुस्कुराहट के साथ उसकी बातें सुनते हो। उसे टोकते नहीं तो वह क्यों ना शेर होगी। तुम खुद चाहते हो कि स्त्री के हाथों मेरा अपमान हो। मालूम नहीं मेरे किन पापों का तुम मुझे यह दंड दे रहे हो। मां की आंखों में आंसू आ गए। यह उनका सबसे बड़ा हथियार था। इमोशनल ब्लैकमेल। किन अरमानों से कैसे-कैसे कष्ट झेलकर मैंने तुम्हें पाला। खुद नहीं पहना तुम्हें पहनाया खुद भूखी रही तुम्हें खिलाया मेरे लिए तुम उस मरने वाली तुम्हारी दादी की निशानी थे मेरी सारी अभिलाषाओं का केंद्र थे तुम्हारी शिक्षा पर मैंने अपने हजारों के आभूषण होम कर दिए बेच दिए एक विधवा के पास दूसरी कौन सी निधि थी और आज आज इसका तुम मुझे यह पुरस्कार दे रहे हो कि एक कल की आई छोकरी के लिए मां को भूल गए।"

"रमेश का दिल पसीज गया मां का बलिदान वह जानता था उसने नरम स्वर में कहा........ अम्मा मेरी समझ में नहीं आता कि आप मुझसे चाहती क्या है। आपके उपकार को मैं कब मेट सकता हूं। आपने मुझे केवल शिक्षा ही नहीं दिलाई। मुझे जीवन दान दिया। मेरी देखभाल की। अगर मैं 100 बार भी जन्म लूं तो भी इसका बदला नहीं चुका सकता। मैं अपनी जान में आपकी इच्छा के विरुद्ध कोई काम नहीं करता। यथासाध्य आपकी सेवा में कोई बात उठा नहीं रखता। जो कुछ कमाता हूं लाकर आपके हाथों पर रख देता हूं। और मुझसे क्या चाहती हैं? मैं अपना सीना चीर कर दिखा दूं। ईश्वर ने हमें और सारे संसार को पैदा किया। उसका हम उसे क्या बदला देते हैं? उसका नाम भी तो नहीं लेते। उसका यश भी तो नहीं गाते। इससे क्या उसके उपकार का भार कुछ कम हो जाता है? मां के बलिदानों का प्रतिशोध कोई बेटा नहीं कर सकता। चाहे वह भूमंडल का स्वामी ही क्यों ना हो। ज्यादा से ज्यादा मैं आपकी दिलजोई कर सकता हूं। सेवा कर सकता हूं और वह मैं करता हूं।"

"मां ने आंसू पोछे और असली मुद्दा उठाया।....... तुम करते हो मगर तुम्हारी बीवी। वह तो ऐसे रहती है जैसे कोई रानी और मैं मैं इस घर में ऐसे रहती हूं जैसे कोई  नौकरानी। तुम्हारी बीवी कभी मुझसे नहीं पूछती क अम्मा जी पानी पियोगी यह भी नहीं कहती। मैं भी कभी बहू थी बेटा। मुझे याद है रात को घंटे भर सास की देह दबाकर उनके सिर में तेल डालकर उन्हें दूध पिलाकर तब बिस्तर पर जाती थी। मजाल है कि उनके सोए बिना सो जाऊं। और तुम्हारी स्त्री 9:00 बजे अपनी किताबें। वो मोटे-मोटे उपन्यास लेकर अपनी सेज पर जा बैठती है। दोनों खिड़कियां खोल लेती है और मजे से ठंडी हवा खाती है। मैं मरूं या जियूँ उसे मतलब नहीं। क्या इसीलिए मैंने तुम्हें पाला था?"

"रमेश....... अम्मा तुमने मुझे पाला था तो यह सारी सेवा मुझसे लेनी चाहिए थी। मगर तुमने मुझसे कभी नहीं कहा कि बेटा पैर दबा दे। मेरे अन्य मित्र भी हैं। उनमें भी मैं किसी को मां की देह में मुक्कियां लगाते नहीं देखता। यह काम औरतों का माना जाता है। पर जरूरी तो नहीं। आप मेरे कर्तव्य का भार मेरी स्त्री पर डालें ं? यूं अगर वह आपकी सेवा करे तो मुझसे ज्यादा प्रसन्न और कोई ना होगा। मेरी आंखों में उसकी इज्जत दुगनी हो जाएगी। शायद उससे और ज्यादा प्रेम करने लगूं। लेकिन अगर वह आपकी सेवा नहीं करती तो आपको उससे अप्रसन्न होने का जलने का कोई अधिकार नहीं है। उसकी जगह मैं होता तो मैं भी ऐसा ही करता। अगर सास मुझे अपनी लड़की की तरह प्यार करती तो मैं उसके तलवे सहलाता। इसलिए नहीं कि वह मेरे पति की मां होती बल्कि इसलिए कि वह मुझसे मातृत स्नेह करती। प्यार का बदला प्यार है अम्मा। हक जताने से सेवा नहीं मिलती। मगर मुझे खुद यह बुरा लगता है कि बहू सास के पांव दबाए। यह गुलामी है। कुछ दिन पहले स्त्रियां पति के पांव दबाती थी। आज भी उस प्रथा का लोप नहीं हुआ है। लेकिन मेरी पत्नी मेरे पांव दबाए तो मुझे ग्लानी होगी। शर्म आएगी। मैं उससे कोई ऐसी खिदमत नहीं लेना चाहता जो मैं उसकी भी ना कर सकूं। यह रस्म उस जमाने की यादगार है जब स्त्री पति की नौकरानी समझी जाती थी। अब पत्नी और पति दोनों बराबर हैं। कम से कम मैं ऐसा ही समझता हूं।"

"मां गुस्से से खड़ी हो गई और बोलीं.......  मैं कहती हूं कि तुम ही ने उसे ऐसी ऐसी बातें पढ़ाकर शेर कर दिया है। बराबरी का पाठ पढ़ा रहे हो। तुम ही मुझसे बैर साध रहे हो। ऐसी निर्लज, ऐसी बदजबान, ऐसी टर और फुअर छोकरी संसार में ना होगी। सुनो तो सही। घर में अक्सर मोहल्ले की बहनें बिरादरी की औरतें मिलने आती रहती हैं। यह राजा की बेटी न जाने किन गवारों में पली है कि किसी का भी आदर सत्कार नहीं करती। कमरे से निकलती तक नहीं। कभी-कभी जब वे खुद उसके कमरे में चली जाती है तो भी यह गधी चारपाई से नहीं उठती। लेटी रहती है। प्रणाम तक नहीं करती। चरण छूना तो दूर की बात है। मेरी नाक कट जाती है।"


"रमेश ने सोचा यह तो सच में गलत है। उसने कहा............ अम्मा वो देवियां तुमसे मिलने आती होंगी। तुम्हारे और उनके बीच में न जाने क्या बातें होती हो। निंदा, चुगली, अगर तुम्हारी बहू बीच में आ कूदे तो मैं उसे बदतमीज कहूंगा। बड़ों के बीच में बोलना ठीक नहीं। कम से कम मैं तो कभी पसंद ना करूंगा कि जब मैं अपने मित्रों से बातें कर रहा हूं तो तुम या तुम्हारी बहू वहां जाकर खड़ी हो जाए। यह प्राइवेसी की बात है। अगर स्त्री भी अपनी सहेलियों के साथ बैठी हो तो मैं वहां बिना बुलाए ना जाऊंगा। यह तो आजकल का शिष्टाचार है। मैनर है।"

"मां....... तुम तो हर बात में उसी का पक्ष करते हो बेटा। न जाने उसने कौन सी जड़ी सुंघा दी है तुम्हें। यह कौन कहता है कि वह हम लोगों के बीच में आ कूदे और बातें करें। लेकिन बड़ों का उसे कुछ तो आदर सत्कार करना चाहिए। शिष्टाचार भी कोई चीज है।"

*रमेश....... किस तरह का क्या करें वो?"

" माँ....... अरे कम से कम आकर आंचल से घूंघट करके उनके चरण छुए, प्रणाम करें, पान बनाकर खिलाए, पंखा झले। इन्हीं बातों से बहू का आदर होता है। लोग उसकी प्रशंसा करते हैं। फलाने की बहू कितनी संस्कारी है। नहीं तो सब की सब यही कहती होंगी कि बहू को घमंड हो गया है। किसी से सीधे मुंह बात नहीं करती।"

"रमेश ने सोचा यह बात सही थी। बड़ों का सम्मान तो होना चाहिए। उसने कहा...... हां यह अवश्य उसका दोष है। मैं उसे समझा दूंगा। यह ठीक नहीं है।"

"मां प्रसन्न हो गई। जीत की पहली किरण दिखी। माँ........ तुमसे सच कहती हूं बेटा। चारपाई से उठती तक नहीं। सब औरतें थोड़ी-थोड़ी बुराई करती हैं। मगर उसे तो शर्म जैसे छू ही नहीं गई। और मैं हूं कि मारे शर्म के मरी जाती हूं।"

"रमेश ने फिर अपना तर्क रखा। रमेश....... यही मेरी समझ में नहीं आता अम्मा कि तुम हर बात में अपने को उसके कामों की जिम्मेदार क्यों समझ लेती हो। वह अलग इंसान है। तुम अलग। मुझ पर दफ्तर में न जाने कितनी घुड़कियां पड़ती हैं। रोज ही तो जवाब तलब होता है। साहब डांटते हैं। लेकिन तुम्हें उल्टे मेरे साथ सहानुभूति होती है। तुम कहती हो साहब बुरा है। क्या तुम समझती हो अफसरों को मुझसे कोई बैर है? नहीं। इसका कारण यही है कि मैं अपने काम में चौकस नहीं हूं। गलतियां करता हूं। सुस्ती करता हूं। लेकिन तुम मुझे दोषी समझकर भी मेरा पक्ष लेती हो और तुम्हारा बस चले तो हमारे बड़े बाबू को जो मुझे डांटते हैं काले पानी भेज दो। क्यों? क्योंकि मैं तुम्हारा बेटा हूं।"

"मां....... मेरे बेटे को कोई सजा देगा तो क्या मैं पान फूल से उसकी पूजा करूंगी? मेरा दिल नहीं दुखता।"

"रमेश....... वही तो हर बेटा अपनी माता से इसी तरह की कृपा की आशा रखता है। और सभी माताएं अपने बेटों की कमियों पर पर्दा डालती हैं। फिर बहुओं की ओर से क्यों उनका हृदय इतना कठोर हो जाता है? यह दोहरी नीति क्यों? जब तुम्हारी बहू पर दूसरी स्त्रियां चोट करें, ताने मारे तो तुम्हारे मातृ स्नेह का यह धर्म है कि तुम उसकी ओर से क्षमा मांगो। कोई बहाना कर दो। आज उसकी तबीयत ठीक नहीं है। उनकी नजरों में उसे उठाने की चेष्टा करो। इस तिरस्कार में तुम क्यों उनसे सहयोग करती हो? तुम्हें क्यों उसके अपमान में मजा आता है। और रही बात सम्मान की तो मैं भी तो हर ब्राह्मण या बड़े बूढ़े का आदर सत्कार नहीं करता। मैं किसी ऐसे व्यक्ति के सामने सिर झुका ही नहीं सकता जिससे मुझे हार्दिक श्रद्धा ना हो। केवल सफेद बाल, सिकुड़ी हुई खाल और पोपला मुंह सम्मान के पात्र नहीं होते। सम्मान चरित्र का होता है। जिसे मैं जानता हूं कि वह मक्कार है, स्वार्थी है। निंदा के सिवा और कुछ नहीं करता। जिसे मैं जानता हूं कि रिश्वत और सूद की कमाई खाता है। वह अगर ब्रह्मा की आयु लेकर भी मेरे सामने आए तो भी मैं उसे सलाम ना करूं। इसे तुम मेरा अहंकार कह सकती हो लेकिन मैं मजबूर हूं। मुमकिन है तुम्हारी बहू के मन में भी उन देवियों की ओर से अश्रद्धा का भाव हो। उनमें से दो चार को मैं भी जानता हूं। वे सब बड़े घर की हैं। लेकिन सबके दिल छोटे हैं। कोई निंदा की पुतली है तो कोई ईर्ष्या की देवी। अगर तुम्हारी बहू ऐसी औरतों के सामने सिर नहीं झुकाती तो मैं उसे दोषी नहीं समझता। वह ढोंग नहीं करती।"

"मां का चेहरा लाल हो गया। माँ....... अच्छा अब चुप रहो। बहुत वकालत कर ली। देख लेना। तुम्हारी यह रानी एक दिन तुमसे चूल्हा ना जलवाए और झाड़ू ना लगवाए तो कहना। औरतों को बहुत सिर चढ़ाना अच्छा नहीं होता। इस निर्लज्जा की भी कोई हद है कि बूढ़ी सास खाना पकाए और जवान बहू बैठी उपन्यास पढ़ती रहे। यह कौन सा शास्त्र है?"

"रमेश........ बेशक यह बुरी बात है। और मैं हरगिज़ नहीं चाहता कि तुम खाना पकाओ और वह उपन्यास पढ़े। चाहे वह उपन्यास अनिका जी का ही क्यों ना हो। लेकिन यह भी तो देखना होगा कि उसने अपने घर अपने मायके में कभी खाना नहीं पकाया। वहां रसोइया महाराज है और जब यहां धुएं वाले चूल्हे के सामने जाने से उसके सिर में दर्द होने लगता है तो उसे खाना पकाने के लिए मजबूर करना उस पर अत्याचार करना है। यह उसके घर वालों की गलती है कि उन्होंने उसकी शादी किसी धनी घर में नहीं की और हमने भी हमने भी यह शरारत की कि अपनी असली हालत उनसे छिपाई। यह प्रकट किया कि हम पुराने रईस हैं। अब हम किस मुंह से यह कह सकते हैं कि तूं खाना पका, बर्तन मांझ या झाड़ू लगा। हमने उन लोगों से छल किया है अम्मा और इसका फल हमें चखना पड़ेगा। अब तो हमारी कुशल इसी में है कि अपनी दुर्दशा को नव्रता, विनय और सहानुभूति से ढक लें। उसे प्यार दें ताकि वह सोचे बला से धन नहीं मिला। घर के आदमी तो अच्छे मिले। अगर यह तसल्ली भी हमने उससे छीन ली तो तुम सोचो उसे कितनी विदारक वेदना होगी। शायद वह हम लोगों की सूरत से भी घृणा करने लगे।"

"मां......... उसके घर वालों को 100 दफे गरज थी तब हमारे यहां ब्याह किया। हम उनसे भीख मांगने नहीं गए थे।"

"रमेश........ उनको अगर लड़के की गरज थी तो हमें धन और कन्या दोनों की गरज थी। बराबरी का सौदा था।"

"मां....... यहां के बड़े-बड़े रईस हमसे नाता करने को मुंह फैलाए हुए थे। हम ही ने नहीं किया।"

"रमेश....... वो इसीलिए कियोंकि हमने रईसों का स्वांग बना रखा है। घर की असली हालत खुल जाए तो कोई बात भी ना पूछे।"

"मां चिढ़ गई। माँ...... तो तुम्हारे ससुराल वाले ऐसे कहां के रईस हैं। इधर जरा वकालत चल गई तो रईस हो गए। नहीं तो तुम्हारे ससुर के बाप मेरे सामने चपरासगिरी करते थे और लड़की का यह दिमाग कि खाना पकाने से सिर में दर्द होता है। अच्छे-अच्छे घरों की लड़कियां गरीबों के घर आती हैं और घर की हालत देखकर वैसा ही बर्ताव करती हैं। यह नहीं कि बैठी अपने भाग्य को कोसे। इस छोकरी ने हमारे घर को अपना समझा ही नहीं।"

"रमेश....... जब तुम समझने दो। जिस घर में घुड़कियों, गालियों और कटुताओं के सिवा और कुछ ना मिले उसे अपना घर कौन समझेगा? घर तो वह है जहां स्नेह और प्यार मिले। कोई लड़की डोली से उतरते ही सास को अपनी मां नहीं समझ सकती। यह नामुमकिन है। मां तभी समझेगी जब सास पहले उसके साथ मां जैसा बर्ताव करें।"

"..वाह मतलब गलती मेरी है। मां चिल्लाई।.... अच्छा अब चुप रहो। जी ना जलाओ। यह जमाना ही ऐसा है कि लड़कों ने स्त्री का मुंह देखा और उसके गुलाम हो गए। यह सब न जाने कौन सा मंत्र सीख कर आती हैं। यह बहू बेटी के लक्षण हैं कि पहर दिन चढ़े सोकर उठे। ऐसी कुलक्षणी बहू का तो मुंह ना देखो।"

"रमेश हंस पड़ा...... मैं भी तो देर से सोकर उठता हूं। अम्मा 9:00 बजे उठता हूं। मुझे तो तुमने कभी नहीं कोसा। कभी कुलक्षणा नहीं कहा।"

"मां..... तुम हर बात में अपनी बराबरी करते हो। तुम मर्द हो। वह औरत है।"

"रमेश...... यह उसके साथ घोर अन्याय है। क्योंकि जब तक वह इस घर को अपना नहीं समझती तब तक उसकी हैसियत मेहमान की है। और मेहमान की हम खातिर करते हैं। उसके ऐब नहीं देखते।"

"मां ने सिर पकड़ लिया। माँ...... ईश्वर ना करे कि किसी को ऐसी बहू मिले।"

रमेश...... अब तो आपको मिल चुकी है। अब क्या हो सकता है?"

"मां...... नौकरानी जैसी औरत सोने लगती है तो बच्चा चाहे रोते-रोते बेदम हो जाए। हिलती तक नहीं। कुंभकरण की नींद सोती है। फूल सा बच्चा लेकर मायके गई थी। तीन महीने में लौटी तो बच्चा आधा भी नहीं रहा। सूख गया। कैसी मां है यह?"

" रमेश....... तो क्या मैं यह मान लूं कि तुम्हें उसके लड़के से जितना प्रेम है उतना उसे नहीं है? यह तो प्रकृति के नियम के विरुद्ध है। मां से ज्यादा बच्चे को कोई नहीं चाहता और मान लो वह निर्मोही ही है तो यह उसका दोष है। तुम क्यों उसकी जिम्मेदारी अपने सिर लेती हो। उसे पूरी स्वतंत्रता है। जैसे चाहे अपने बच्चे को पाले। अगर वह तुमसे कोई सलाह पूछे तो प्रसन्न मुख से दे दो। ना पूछे तो समझ लो उसे तुम्हारी मदद की जरूरत नहीं है।"

"माँ...... तो मैं सब कुछ देखूं, मुंह ना खोलूं। घर आग लगते देखूं और चुपचाप मुंह में कालिख लगाए खड़ी रहूं। यह मुझसे नहीं होगा।"

" रमेश...... तुम इस घर को जल्द छोड़ने वाली हो अम्मा। तुम्हारी उम्र हो गई है। उसे बहुत दिन रहना है। घर की हानि लाभ की जितनी चिंता उसे हो सकती है, तुम्हें नहीं हो सकती। फिर मैं कर ही क्या सकता हूं? ज्यादा से ज्यादा उसे डांट सकता हूं। लेकिन अगर वह डांट की परवाह ना करे और तुर्की बतुर्की बराबर का जवाब दे तो मैं अपनी और तुम्हारी हंसी कराने के सिवा और क्या कर सकूंगा?"

"मां ने एक आखिरी ब्रह्मास्त्र चलाया। माँ....... तुम दो दिन उससे बोलो मत। बात करना बंद कर दो। देखो देवता सीधे हो जाएंगे। सामने नाक रगड़ेगी।"

" रमेश....... मुझे इसका विश्वास नहीं है। मैं उससे ना बोलूंगा। वो भी मुझसे ना बोलेगी। ज्यादा पीछे पडूंगा तो अपने घर चली जाएगी। मायके। फिर क्या करेंगे?"

" माँ...... ईश्वर यह दिन लाए तो। मैं तुम्हारे लिए नई बहू लाऊंगी। इससे भी सुंदर। संभव है इसकी भी यही इच्छा हो कि दूसरा पति मिले।"

"सहसा पर्दा हटा। बहू प्रभा वहां आकर खड़ी हो गई। उसने शायद सारी बातें सुन ली थी। मां और बेटा दोनों स्तब्ध हो गए जैसे कोई बम गिरा हो। रमेश का चेहरा पीला पड़ गया।"

"प्रभा रूपवती नाजुक मिजाज गर्बीली रमणी जो मानो शासन करने के लिए ही बनी है। उसके कपोल गुस्से से तमतमा रहे हैं। पर अधरों पर विष भरी व्यंग्ञात्मक मुस्कान है और आंखों में आंखों में अंगारे हैं।"

"मां ने अपनी झिझक छिपाकर थोड़ा सहम कर कहा...... तुम्हें कौन बुलाने गया था बहू? यहां बड़ों की बात हो रही है।"

"प्रभा ने तपाक से कहा....... क्यों? यहां जो तमाशा हो रहा है, मेरे ही नाम का तो रोना रोया जा रहा है। उसका आनंद मैं ना उठाऊं।"

"रमेश....... मां बेटे के बीच में तुम्हें दखल देने का कोई हक नहीं। जाओ यहां से।"

"बहू की मुद्रा सहसा कठोर हो गई। उसने पति को उंगली दिखाई और कहा....... अच्छा ! आप अपनी जबान बंद रखिए। जो पति अपनी पत्नी की निंदा सुनता रहे और ऊपर से उसमें सुर मिलाए वह पति बनने के योग्य नहीं। वो पति धर्म का ,क ख ग, भी नहीं जानता। मुझसे अगर कोई तुम्हारी बुराई करता चाहे वह मेरी प्यारी मां ही क्यों ना हो तो मैं उसकी जबान पकड़ लेती। केंचुआ नहीं बन जाती। तुम मेरे घर जाते हो तो वहां तो जिसे देखती हूं तुम्हारी प्रशंसा ही करता है। दामाद जी ऐसे हैं वैसे हैं। छोटे से बड़े तक गुलामों की तरह दौड़ते फिरते हैं। अगर उनके बस में हो तो तुम्हारे लिए स्वर्ग से तारे तोड़ लाएं। तुम्हारी इतनी खातिर होती है और यहां यहां मुझे बात बातबात पर ताने अपमान और तिरस्कार मिलते हैं। उसकी आवाज ऊंची हो गई। मेरे घर में कोई भी मुझे नहीं कहता कि तुम देर में क्यों उठी? तुमने अमुक महोदय को सलाम क्यों नहीं किया। अमुक के चरणों पर सिर क्यों नहीं पटका? मेरे बाबूजी कभी गवारा ना करेंगे कि तुम उनकी देह पर मुक्कियां लगाओ या उनकी धोती धो या उन्हें खाना पका कर खिलाओ। वे तुम्हें बेटा मानते हैं नौकर नहीं। फिर मेरे साथ यहां ऐसा बर्ताव क्यों? मैं यहां नौकरानी बनकर नहीं आई हूं। तुम्हारी जीवन संगिनी बनकर आई हूं। मगर जीवन संगिनी का यह अर्थ तो नहीं कि तुम मेरे ऊपर सवार होकर मुझे जलाओ। मुझे पीसो। यह मेरा काम है कि जिस तरह चाहूं तुम्हारे साथ अपने कर्तव्य का पालन करूं। उसकी प्रेरणा मेरी आत्मा से होनी चाहिए। ताड़ना या तिरस्कार से नहीं डंडे से नहीं। अगर कोई मुझे कुछ सिखाना चाहता है तो मां की तरह प्रेम से सिखाए। मैं सीखूंगी, झुकूंगी भी। लेकिन कोई जबरदस्ती मेरी छाती पर चढ़कर मूंग दलकर अमृत भी मेरे कंठ में ठूसना चाहे तो मैं ओठ बंद कर लूंगी। जहर समझकर थूक दूंगी। मैं अब कब की इस घर को अपना समझ चुकी होती। अपनी सेवा और कर्तव्य का निश्चय कर चुकी होती। मगर यहां तो हर घड़ी हर पल मेरी देह में सुई चुभाकर मुझे याद दिलाया जाता है कि तू इस घर की नौकरानी है। तेरा इस घर से कोई नाता नहीं। तू सिर्फ गुलामी करने के लिए यहां लाई गई है और मेरा खून खोल कर रह जाता है। अगर यही हाल रहा तो एक दिन तुम दोनों मेरी जान लेकर रहोगे या मैं खुद कुछ कर बैठूंगी।"

"मां ने रमेश की तरफ देखा और कहा...... सुन रहे हो अपनी चहेती रानी की बातें। कैसी फर्राटेदार जुबान चलती है। वह यहां नौकरानी बनकर नहीं रानी बनकर आई है। हम दोनों उसकी सेवा करने के लिए हैं। उसका काम हमारे ऊपर शासन करना है। उसे कोई काम करने को कहे तो मैं खुद मरा करूं और तुम उसकी बातें कान लगाकर सुनते हो। तुम्हारा मुंह कभी नहीं खुलता कि उसे डांटो या समझाओ। थरथर कांपते रहते हो।"

"रमेश अब धर्म संकट में था। उसने शांत स्वर में कहा....... अच्छा अम्मा ठंडे दिल से सोचो। मैं इसकी बातें ना सुनूं तो कौन सुने? इसका यहां और है कौन? क्या तुम इसके साथ इतनी हमदर्दी भी नहीं देखना चाहती? आखिर बाबूजी पिताजी जीते थे तब वह तुम्हारी बातें सुनते थे या नहीं? तुम्हें प्यार करते थे या नहीं? जब तुम दादी की शिकायत करती थी तो वह चुप रहते थे। फिर मैं अपनी बीवी की बातें सुनता हूं तो कौन सी नई बात करता हूं। इसमें तुम्हारे बुरा मानने की कौन बात है?"

"माँ ने छाती पीटी।....... हाय बेटा, तुम अपनी पत्नी के सामने मेरा अपमान कर रहे हो। इसी दिन के लिए मैंने तुम्हें पालपोस कर बड़ा किया था। क्यों मेरी छाती नहीं फट जाती? वह आंसू पोछती है और आपे से बाहर होकर पैर पटकती हुई कमरे से निकल जाती है।"

"पति और पत्नी दोनों कौतुक भरी आंखों से उसे जाते हुए देखते हैं जो बहुत जल्द हमदर्दी में बदल जाती है।"

"रात हो गई थी। रमेश और प्रभा अपने कमरे में थे। रमेश...... मां का हृदय भी अजीब होता है। कितना जल्दी दुखी हो जाती हैं।"

"प्रभा...... मां का हृदय नहीं स्त्री का हृदय कहो। मतलब अर्थात स्त्री जो अंत तक पुरुष का सहारा चाहती है, स्नेह चाहती है और किसी दूसरी स्त्री का असर देखकर चाहे वह बहू ही क्यों ना हो ईर्ष्या से जल उठती है। उसे लगता है उसका बेटा छिन गया।"

" रमेश...... क्या पगली किसी बातें करती हो? मां बेटे से ईर्ष्या करेगी। तुम्हारा दृष्टिकोण बिल्कुल गलत है। इसका तजुर्बा तुम्हें तब होगा जब तुम खुद सास बनोगी। तब देखना तुम कैसी सास बनती हो।"

" प्रभा......... मुझे सास बनना ही नहीं है। मैं यह पाप नहीं करूंगी। हैं। मतलब लड़का अपने हाथ-पांव का हो जाए। ब्याह करे और अपना घर संभाले। अलग रहे। मुझे बहू से क्या सरोकार? मैं दूर रहूंगी, सुखी रहूंगी।"

" रमेश...... तुम्हें यह अरमान बिल्कुल नहीं है कि तुम्हारा लड़का योग्य हो। तुम्हारी बहू लक्ष्मी हो और दोनों का जीवन सुख से कटे। तुम तो उसे आशीष भी ना दो।"

" प्रभा....... क्या में मां नहीं हूं? आशीष तो दूंगी पर दखल नहीं दूंगी।"

" रमेश....... मां और सास में क्या कोई अंतर है?"

" प्रभा...... उतना ही जितना जमीन और आसमान में है। मां प्यार करती है, सास शासन करती है। मां देती है, सास मांगती है। कितनी ही दयालु सहनशील स्त्री हो, सास बनते ही मानो ब्याही हुई गाय हो जाती है, मारने दौड़ती है। जिसे पुत्र से जितना ही ज्यादा प्रेम है, वह बहू पर उतनी ही निर्दयता से शासन करती है। मुझे भी अपने ऊपर विश्वास नहीं है। अधिकार पाकर किसे मद नहीं हो जाता। मैंने तय कर लिया है सास बनूंगी ही नहीं। औरत की गुलामी सांसों के बल पर कायम है। जिस दिन सासे ना रहेंगी या सुधर जाएंगी औरत की गुलामी का अंत हो जाएगा।"

"रमेश मुस्कुराया और बोला.......मेरा ख्याल है तुम जरा भी सहज बुद्धि से गृह नीति से काम लो तो तुम अम्मा पर भी शासन कर सकती हो। उनका दिल जीत सकती हो।"

" प्रभा..... कैसे? उनकी गालियां सुनकर।"

" रमेश...... तुमने हमारी बातें कुछ सुनी आज जब तुम नहीं आई थी।"

"प्रभा...... बिना सुने ही मैंने समझ लिया कि क्या बातें हो रही होंगी। वही पुरानी कैसेट। "

" रमेश....... नहीं तुमने बिल्कुल गलत समझा अम्मा के मिजाज में आज मैंने विस्मयकारी अंतर देखा बिल्कुल अभूतपूर्व आज वो जैसे अपनी कटुताओं पर लज्जित हो रही थी । "

"प्रभा...... क्या अम्मा लज्जित हो रही थी। सूरज पश्चिम से निकला क्या । "

"रमेश....... हां प्रत्यक्ष रूप से नहीं संकेत रूप से अब तक वह तुमसे इसलिए नाराज रहती थी कि तुम देर में उठती हो अब शायद उन्हें यह चिंता हो रही है कि कहीं सवेरे उठने से तुम्हें ठंड ना लग जाए तुम्हारे लिए पानी गर्म करने को कह रही थी। कह रही थी बहू नाजुक है।"

"प्रभा ........ प्रसन्न होकर बिस्तर से उठ बैठी। सच मेरी अम्मा जी ऐसी कह रही थी।"

" रमेश....... हां मुझे तो सुनकर आश्चर्य हुआ। मुझे लगा मैं सपना देख रहा हूं। "

" प्रभा...... तो अब मैं मुंह अंधेरे उठूंगी 4:00 बजे। ऐसी ठंड क्या लग जाए? लेकिन तुम मुझे चकमा तो नहीं दे रहे हो। उल्लू बना रहे हो। "

" रमेश........ अब इस बदगुमानी का क्या इलाज? मैं अपनी मां की कसम खाकर कहता हूं। आदमी को कभी-कभी अपने अन्याय पर खेद तो होता ही है।"

"प्रभा......... तुम्हारे मुंह में घी शक्कर। अब मैं गजरदम यानी सुबह जल्दी उठूंगी। वो बेचारी मेरे लिए क्यों पानी गर्म करेंगी? मैं खुद गर्म कर लूंगी। मैं उनकी सेवा करूंगी।"

" रमेश....... मुझे उनकी बात सुनसुनकर ऐसा लगता था जैसे किसी दैवीय आदेश ने उनकी आत्मा को जगा दिया हो। कह रही थी बहू बच्ची है। उसे प्यार से समझाना चाहिए। चाहती थी कि घर में कोई बड़ी बूढ़ी आ जाए तो तुम उसके चरण छुओ। लेकिन शायद अब उन्हें मालूम होने लगा है कि इस उम्र में सभी थोड़े बहुत अल्हड़ होते हैं। शायद उन्हें अपनी जवानी याद आ रही है। कहती थी यही तो शौक श्रृंगार पहनने ओढ़ने खाने खेलने के दिन थे। बुढ़ियों का तो दिन भर तांता लगा रहता है। कोई कहां तक उनके चरण छुए और क्यों छुएं? मुझे तो हर्षो उन्माद हुआ चाहता है। मैं नाचूं क्या? मुझे तो विश्वास ही नहीं आता था। स्वप्न देखने का संदेह हो रहा था। अब आई है राह पर देर आए दुरुस्त आए। कोई दैवी प्रेरणा समझो।"

"प्रभा........ मैं कल से ठेट आदर्श बहू बन जाऊंगी। किसी को खबर भी नहीं होगी कि कब अपना मेकअप करती हूं। सब काम निपटा लूंगी। सिनेमा के लिए भी सप्ताह में एक दिन काफी है। रोज नहीं जाऊंगी। बूढ़ियों के पांव छू लेने में ही क्या हर्ज है। वे देवियां ना सही चुड़ैल ही सही हंसते हुए मुझे आशीर्वाद तो देंगी। मेरा गुण तो गाएंगी।"

" रमेश....... सिनेमा का तो उन्होंने नाम भी नहीं लिया। कहा बच्ची है शौक है तो जाने दो।"

"प्रभा........ तुमको जो इसका शौक है, अब तुम्हें भी ना जाने दूंगी, पैसे बचाऊंगी।"

" रमेश........ लेकिन सोचो तुमने कितनी ऊंची शिक्षा पाई है। किस कुल की हो? इन खूसट बुढ़ियाओं के पांव पर सिर रखना तुम्हें बिल्कुल शोभा ना देगा। तुम्हारी डिग्री क्या कहेगी?"

"प्रभा....... तो क्या ऊंची शिक्षा के यह मानी है कि हम दूसरों को नीचा समझें, घमंडी बने, बूढ़े कितने ही मूर्ख हो लेकिन दुनिया का तजुर्बा तो रखते हैं। कुल की प्रतिष्ठा भी नम्रता और सदव्यवहार से होती है। हेकड़ी और रुखाई से नहीं। मुझे तो यही ताज्जुब होता है कि इतनी जल्दी इनकी काया पलट कैसे हो गई? अब इन्हें बहुओं का सास के पांव दबाना या उनकी साड़ी धोना या उनकी देह में मुक्कियां लगाना बुरा लगने लगा है।"

" रमेश........ कहती थी बहू कोई लौंडी थोड़ी ही है कि बैठी सास का पांव दबाए। जमाना बदल गया है। और तो और अब वह तुम्हें खाना भी ना पकाने देंगी। कहती थी जब बहू के सिर में दर्द होता है, धुएं से परेशानी होती है तो क्यों उसे सताया जाए? कोई महाराज रख लो पैसे मैं दूंगी।"

"प्रभा फूली ना समाई। प्रभा.......मैं तो आकाश में उड़ती जा रही हूं। ऐसी सास के तो चरण धोधो कर पीने चाहिए। मगर तुमने पूछा नहीं। अब तक तुम उसे मार मार कर हकीम बनाने पर तुली रहती थी।"

" रमेश........ पूछा क्यों नहीं? भला मैं छोड़ने वाला था। बोली, मैं अच्छी हो गई थी। मेरी मति मारी गई थी। मैंने हमेशा खाना पकाया है। फिर वह क्यों ना पकाए यह सोचती थी। लेकिन अब उनकी समझ में आया है कि वो यानी सास निर्धन बाप की बेटी थी। तुम संपन्न कुल की कन्या हो। परवरिश का फर्क है। अम्मा जी दिल की साफ है। उन्हें बस थोड़ा प्यार चाहिए। इन्हें मैं क्षमा के योग्य समझती हूं। जिस जलवायु में हम पलते हैं, उसे एक बार भी नहीं बदल सकते। जिन रूढ़ियों और परंपराओं में उनका जीवन बीता है उन्हें तुरंत त्याग देना उनके लिए कठिन है। वह तो फिर भी बहुत उदार हैं।"

" प्रभा...... तुम अभी महाराज मत रखो। खामखा जेर बार क्यों होंगे? जब तरक्की हो जाए तो महाराज रख लेना। अभी मैं खुद पका लिया करूंगी। तीन-चार प्राणियों का खाना ही क्या? मेरी जात से कुछ अम्मा को आराम मिले। मैं जानती हूं सब कुछ। लेकिन कोई रब जमाना चाहे तो मुझसे बुरा कोई नहीं। प्यार से तो मैं जान दे दूं।"

" रमेश....... मगर यह तो मुझे बुरा लगेगा कि तुम रात को अम्मा के पांव दबाने बैठो।"

"प्रभा....... बुरा लगने की कौन बात है? जब उन्हें मेरा इतना ख्याल है तो मुझे भी उनका लिहाज करना ही चाहिए। जिस दिन मैं उनके पांव दबाने बैठूंगी, वह मुझ पर प्राण देने लगेंगी। आखिर बहू बेटे का कुछ सुख उन्हें भी तो हो। बड़ों की सेवा करने में हेठ ही नहीं होती। बुरा तब लगता है जब वो शासन करते हैं। हुकुम देते हैं। और अम्मा मुझसे पांव दबवाएंगी थोड़ी ही। वो तो मुझे गले लगा लेंगी और तुम्हें मातृभक्ति का यश मिलेगा। "

" रमेश....... अब तो अम्मा को तुम्हारी फजूल खर्ची भी बुरी नहीं लगती। कहती थी रुपए पैसे बहू के हाथ में दे दिया करो। घर की मालकिन वही है। उन्हें अब भय हो रहा है कि उनके हाथ में पैसे रहने से तुम्हें असुविधा होती होगी। तुम बार-बार उनसे मांगती भी होगी और डरती भी होगी। तुम्हें अपनी जरूरतों को रोकना पड़ता होगा।"

"प्रभा........ ना भैया मैं यह जंजाल अभी अपने सिर ना लूंगी। तुम्हारी थोड़ी सी आमदनी है। कहीं जल्दी से खर्च हो जाए तो महीना काटना मुश्किल हो जाए। थोड़े में निर्वाह करने की विद्या उन्हीं को आती है। मेरी ऐसी जरूरतें ही क्या हैं? मैं तो केवल अम्मा जी को चिढ़ाने के लिए उनसे बार-बार रुपए मांगती थी। मेरे पास तो खुद ₹150 पड़े रहते हैं। बाबूजी का पत्र आता है तो उसमें 10 20 के नोट जरूर होते हैं। लेकिन अब मुझे हाथ रोकना पड़ेगा। आखिर बाबूजी कब तक देते चलेंगे। और यह कौन सी अच्छी बात है कि मैं हमेशा उन पर टैक्स फहराती रहूं। देख लेना अम्मा अब तुम्हें कितना प्यार करती है। तुम भी देख लेना मैं उनकी कितनी सेवा करती हूं। मैं उन्हें पलकों पर बिठा लूंगी।"

" रमेश....... मगर शुरू तो उन्होंने किया। "

"प्रभा...... केवल विचार में व्यवहार में आरंभ मेरी ही ओर से होगा भोजन पकाने का समय आ गया चलती हूं आज कोई खास चीज तो नहीं खाओगे हलवा बनाऊं। "

"रमेश ...... तुम्हारे हाथों की रूखी रोटियां भी पकवान का मजा देंगी। "

"प्रभा...... अब तुम नटखटी करने लगे हटो। "

"और इस तरह रमेश की एक छोटी सी समझदारी भरी गृह नीति ने एक झूठ ने जो असल में झूठ नहीं कूटनीति थी घर का नक्शा बदल दिया। उसने मां से बहू की तारीफ की और बहू से मां की। दोनों के दिलों में जो कड़वाहट थी वह मिठास में बदल गई। सास ने सोचा बहू सुधर रही है। बहू ने सोचा सास सुधर रही है और असल में दोनों सुधर गई। घर स्वर्ग बन गया। तो कहानी  घर चलाने की तरकीब हमें पारिवारिक संबंधों और सास बहू के रिश्ते की जटिलताओं पर गहरा विचार प्रदान करती है। यह कहानी सिखाती है कि घर अधिकार से नहीं त्याग और समझ से चलता है। कभी-कभी एक छोटा सा मीठा झूठ 100 कड़वे सच से बेहतर होता है। तो दोस्तों, रमेश की यह तरकीब आपको कैसी लगी? क्या आप भी अपने घर में ऐसी गृह नीति अपनाएंगे? हमें कमेंट में जरूर बताएं और अगर यह कहानी आपके दिल को छू गई है तो लाइक करें, शेयर करें और हाँ फौलो करना बिल्कुल ना भूलें।"

"  मिलते हैं अगली बार एक और बेहतरीन कहानी के साथ। तब तक के लिए खुश रहें और अपने परिवार को जोड़कर रखें। शुक्रिया।"