My Dear Professor - Part 23 in Hindi Love Stories by Vartika reena books and stories PDF | माई डियर प्रोफेसर - भाग 23

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माई डियर प्रोफेसर - भाग 23












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लिबर्टि...बहुत जटिल शब्द और विषय है ये। सबका मानना है कि हर किसी को स्वाधीनता का अधिकार है। लेकिन जब असल मे कोई अपनी स्वाधीनता चाहता है तो सबको बडी मिर्ची लगती है। 

हमारे स ज मे तो सवाल पूछना ही बहुत बडा अपराध समझ लिया जाता है। बडो से सवाल करना बद्तमीजी बता दी जाती है। धर्म पर कुछ सवाल पुछ लिए तो व्यक्ति को तो पापी कह देते है। 

और कई लोग तो अपनी बात ही नही कह पाते । डर से , झिझक से..! 


उनमे से ही एक मै हूं। मै नही कह पाई और ना ही बता पाई कि जंगल मैने तस्करी करने वालो को देखा था। 



लिखते लिखते चारू ने एक नजर खिडकी से बाहर शांत मगर रहस्य से भरे जंगल पर डाली ।  चारो तरफ हरीश चादर बिछी थी मानो जंगल अपना पूर्णरूप दिखा रहा हो। उसकी सुंदरता मन मोहने वाली किंतु चारू की आंखे कुछ सोच भर आई। 


वो खडी हुई और खिडकी के पास आकर खडी हो गई । उसने अपने हाथ जोड़कर जंगल को प्रणाम किया।


" जो जंगल बिना कुछ कहे हमे इतना कुछ देते है उनके लिए हम किसी से कुछ बोल भा नही पा रहे। तुम दाता हो और आज ये दाता खतरे मे है। ", उसने असहाय भाव से जंगल से कहा। 

तभी हवा चली और पेड आपस मे लहराने लगे। उनकी सरसराहट भी मधुर संगीत की भांती चारू के कर्ण मे घुल रही थी। मानो वो चारू को ढाढस बांध रहे हो। मानो कह रहे हो ' तुमने इतना सोचा..वो भी बहुत है। मन छोटा ना करो । '


चारू की आंखे नम पड गई। 


" मै ऐसे ही नही बैठुंगी। कुछ तो करूंगी। " , चारू ने स्वंय से या जंगल से कहा।


जंगल शांत , शिवलिंग सा खडा चारू को निहार रहा था। मानो कहना चाहता हो..' क्यो स्वंय के पतन को बुलाती हो। जैसे बाकी आगे बड चले तुम भी चली जाओ । ' 



चारू मानो सब समझ रही हो । उसने ना मे सर हिला दिया। फिर खिडकी से सिर टिका गहरी सांस भरने लगी।




चारू वही खिडकी के पास ही बैठी सो रही थी जब उसका फोन बजा। वो ऊंघते हुए उठी और बेड कि तरफ चली गई।  फोन नव्या का था। चारू की भंवे सिकुड गई।


उसने फोन कान से लगाया और अगले ही पल उसकी सांसे  मानो उसके गले मे अटक गई हो। 


वो भाग कर कमरे से बाहर निकली और होस्टल से बाहर आ गई।  एक पुलिस जीप उसके होस्टल के दरवाजे पर खडी थी। नव्या पुलिस से बात कर रही थी। उसने नीले बंद गले का स्वेटर , काली जिन्स और काले बुट्स पहन रखे थे। गर्दन तक कटें बाल उसके आज बिखरे बिखरे से थे। 


चारू का गला सुनने लगा था। ये क्या हो रहा है ? 


" नव्या !! ", उसने नव्या को आवाज लगाई। 

नव्या उसकी तरफ पलट गई।  वो शांत भाव से उसे देख रही थी। उसने पुलिस ऑफिसर से कुछ कहा फिर चारू कि तरफ बड गई। 




एक बार चारू के पास पहुंचने पर नव्या ने गहरी नजरो से उसे देखा।


" ये..क्या..", चारू बोलने ही लगी थी कि नव्या बोल पडी।


" डिड यू विजिट फॉरेस्ट यस्टर डे ? ", नव्या ने सवाल किया।


चारू को महसूस हुआ की उसका खून जम गया है। वो सांसे रोके खडी थी। बोलना मुश्किल था तो बस हां मे सर हिला दी।


नव्या ने गहरी सांस छोडी फिर अपने बालो मे हाथ घुमाकर उन्हे और बिखेर दिया।


" वाई ? " नव्या ने परेशानी से पुछा।


" कुछ हुआ है क्या ? ", चारू ने सवाल किया।


" कल जंगल मे तीन तीन लाशे और एक अधमरा आदमी मिला है। और उस जिंदा बचे आदमी ने बताया है कि उसने तुम्हे देख था । " , नव्या ने सर्द आवाज मे कहा।



" मैने..कुछ..न..ही किया ! ", चारू लरजती आवाज मे बोली। उसके आंखे नम हो चली थी। ऐसा कुछ तो उसने सोचा ही नही था।


वो आगे बडी और नव्या के गले लग गई। 


" नव्या आई डिड नथिंग। दोज पिपल वर कटिंग ट्रीज। आई सो दैम। " 


चारू ने जैसे ही कहा नव्या के चेहरे की हवाईया ही उड गई। 


" यू वॉट ! " 


नव्या ने आंखे बंद करी। फिर चारू को देखा।


" ये बात पुलिस के आगे मत कहना । " 

नव्या ने कहा और चली गई।  चारू हल्की बक्की उसे देखता रही ।





क्रमशः 


आप लोग कमेंट और रेटिंग नही दे रहे । ये सही नही है। इस तरह बेकद्री ना करो मेरी कहानी की। थोडी तो रिस्पेक्ट करो मेरे समय की और कहानी की ।