बेगूसराय का वो काला दिन
स्थान: गर्ल्स इंटर स्कूल एंड कॉलेज, मोहनपुरा (बेगूसराय, उत्तर प्रदेश)
समय: शाम के 4:00 बजे
सीन 1: सुनसान रास्ता और वो खामोशी
मोहनपुरा की सड़क पर सन्नाटा पसरा था। सर्दियों की ठंडी हवा चल रही थी और सूरज ढलने की तैयारी में था। सड़क के किनारे एक पुरानी, बिना नंबर प्लेट की मिनी-वैन खड़ी थी। वैन के शीशे काले थे और इंजन धीमे-धीमे चालू था।
वैन के अंदर चार लोग बैठे थे। उन सभी ने काले कपड़े पहने थे और चेहरे पर नकाब (Mask) था ताकि कोई उन्हें पहचान न सके। उनके हाथों में आधुनिक हथियार थे जो किसी बड़ी वारदात की तरफ इशारा कर रहे थे। उनका सरगना घड़ी देखता है—जैसे ही सुई 4 पर पहुँचती है, वह अपने साथियों को इशारा करता है।
स्कूल की घंटी और हमला
टन-टन-टन... स्कूल की छुट्टी की घंटी बजती है। कॉलेज के गेट खुलते ही करीब 3000 लड़कियों का हुजूम बाहर निकलने लगता है। ये लड़कियां गरीब तबके की थीं, जिनके सपनों का बोझ उनके फटे हुए बस्तों में था। हंसी-मजाक और शोर के बीच 10 लड़कियों का एक ग्रुप जैसे ही सड़क के मोड़ पर पहुँचता है, वैन का दरवाज़ा झटके से खुलता है।
बिना एक पल गंवाए, नकाबपोश लोग बाहर निकलते हैं। उनके हाथों में बंदूकें देख लोग सहम जाते हैं। हमलावर उन 10 लड़कियों पर टूट पड़ते हैं। लड़कियों के मुँह दबा दिए जाते हैं और उन्हें घसीटते हुए वैन के अंदर फेंका जाने लगता है।
"बचाओ! कोई बचाओ!" एक लड़की चिल्लाने की कोशिश करती है, लेकिन एक हमलावर उसकी गर्दन पर वार कर उसे बेहोश कर देता है। स्कूल के टीचर और प्रिंसिपल गेट पर खड़े होकर ये खौफनाक मंजर देखते हैं, लेकिन हथियारों के डर से कोई आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। चंद सेकंडों में वैन धूल उड़ाती हुई आँखों से ओझल हो जाती है।
पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच जाती है। चारों तरफ रोने-बिलखने की आवाजें आने लगती हैं। तभी सायरन की गूंज सुनाई देती है। तीन पुलिस की गाड़ियाँ तेजी से आकर रुकती हैं।
सबसे आगे वाली गाड़ी से सीनियर IPS संध्या सिंह उतरती हैं। उनकी आँखों में गुस्सा और चेहरे पर सख्त अनुशासन है। उनके ठीक पीछे इंस्पेक्टर अभिमन्यु खुराना उतरते हैं, जिनकी हाथ की मुट्ठियाँ गुस्से से भिंची हुई हैं।
संध्या: (प्रिंसिपल की तरफ मुड़ते हुए) "कितनी लड़कियां थीं? और वैन किस तरफ गई है?"
प्रिंसिपल: (कांपते हुए) "मैडम... 10 लड़कियां! सब गरीब घरों की थीं। उन लोगों ने नकाब पहने थे, हम कुछ नहीं कर पाए।"
अभिमन्यु: "मैडम, ये कोई मामूली अपहरण नहीं है। मोहनपुरा की ये सड़क हमेशा व्यस्त रहती है, लेकिन आज ये सुनसान क्यों थी? इसका मतलब है कि रास्ता पहले से साफ किया गया था।"
संध्या: (जमीन पर गिरी एक लड़की की टूटी हुई चप्पल उठाते हुए) "अभिमन्यु, ये शहर का सबसे सुरक्षित इलाका माना जाता है और यहाँ से दिन-दहाड़े 10 लड़कियां उठा ली गईं? ये सिस्टम के मुँह पर तमाचा है। पूरे जिले की नाकाबंदी करो। हमें वो लड़कियां हर हाल में चाहिए, इससे पहले कि उन्हें शहर से बाहर ले जाया जाए।"
मीडिया का जमावड़ा और आक्रोश
स्कूल के बाहर का नज़ारा अब पूरी तरह बदल चुका था। जहाँ कुछ देर पहले सन्नाटा था, अब वहाँ हज़ारों की भीड़ और मीडिया की गाड़ियों का तांता लगा था। पुलिस ने बैरिकेड्स लगा दिए थे, लेकिन गुस्से से भरी भीड़ उन्हें तोड़ देना चाहती थी।
गरीब मां-बाप अपनी छाती पीट-पीट कर रो रहे थे। कोई अपनी बेटी की किताब पकड़े खड़ा था, तो कोई पुलिस की वर्दी खींचकर अपनी बच्ची वापस मांग रहा था। "साहब, हम गरीब हैं इसीलिए हमारी कोई सुनवाई नहीं है क्या?"—ये चीखें आसमान चीर रही थीं।
पत्रकार जितेंद्र परमार की एंट्री
तभी एक बड़ी ओबी वैन (OB Van) आकर रुकती है। उस पर बड़े अक्षरों में लिखा था— 'सत्य न्यूज़'। गाड़ी से उतरता है जितेंद्र परमार। सफेद कड़क शर्ट, आंखों पर महंगा चश्मा और हाथ में माइक। जितेंद्र शहर का सबसे शातिर और वरिष्ठ पत्रकार माना जाता था, लेकिन उसकी सच्चाई ये थी कि वह ख़बरें दिखाता नहीं, ख़बरें 'बनाता' था।
वह सीधे कैमरे के सामने खड़ा होता है और अपना सिग्नेचर अंदाज़ शुरू करता है:
जितेंद्र परमार: (कैमरे की ओर देखते हुए) "नमस्कार, मैं हूँ जितेंद्र परमार और मेरे पीछे जो आप ये खंडहर जैसा गेट देख रहे हैं, ये बेगूसराय का वो सरकारी स्कूल है जहाँ से आज कानून की धज्जियां उड़ा दी गईं। 10 लड़कियां! जी हाँ, एक या दो नहीं, पूरी 10 लड़कियां दिन-दहाड़े उठा ली गईं और हमारी पुलिस? हमारी 'निडर' IPS संध्या सिंह अभी भी सुराग ढूंढ रही हैं।"
वह भीड़ की तरफ माइक घुमाता है और भड़काऊ सवाल पूछता है:
"क्या सरकार सो रही है? क्या मोहनपुरा की ये सुनसान सड़कें लड़कियों की कब्रगाह बन चुकी हैं? प्रशासन की नाकामी का इससे बड़ा सबूत और क्या होगा कि गुंडे आते हैं, तांडव करते हैं और गायब हो जाते हैं।"
IPS संध्या सिंह स्कूल के अंदर से बाहर निकल रही थीं। जितेंद्र परमार अपनी टीम के साथ उन्हें घेर लेता है।
जितेंद्र: "मैडम संध्या, शहर की जनता जवाब मांग रही है। क्या आप इस्तीफा देंगी या फिर हमेशा की तरह ये कहेंगी कि 'जांच चल रही है'?"
संध्या सिंह: (रुककर, जितेंद्र की आंखों में देखते हुए) "परमार साहब, आपके शोर मचाने से जांच की रफ्तार नहीं बढ़ेगी। पुलिस अपना काम कर रही है।"
जितेंद्र: (तंज कसते हुए) "काम तो दिख रहा है मैडम! वो वैन अब तक जिले की सीमा पार कर चुकी होगी और आप यहाँ चप्पलें गिन रही हैं। सुना है ये लड़कियां बहुत गरीब घरों की हैं, शायद इसीलिए पुलिस की फाइल में इनका वज़न कम है?"
संध्या का हाथ अपनी पिस्टल की बेल्ट पर कस गया, लेकिन उसने खुद को काबू किया। उसने अभिमन्यु की तरफ देखा और धीमी आवाज़ में कहा— "अभिमन्यु, इस परमार पर नज़र रखो। ये जितना प्रशासन को कोस रहा है, मुझे शक है कि इसके पास कोई ऐसी जानकारी है जो इसने हमें नहीं दी।"
कंट्रोल रूम में हड़कंप
IPS संध्या सिंह और अभिमन्यु अभी जितेंद्र परमार के सवालों का जवाब दे ही रहे थे कि संध्या के वायरलेस सेट पर एक कर्कश आवाज़ गूँजती है।
वायरलेस ऑपरेटर: "मैडम! कंट्रोल रूम से मेसेज है। मोहनपुरा से 15 किलोमीटर दूर 'रामपुर कस्बे' के पास से एक और वारदात की खबर आई है। तीन महिलाएं, जो ईंट-भट्टे पर मजदूरी करके घर लौट रही थीं, उन्हें एक सफेद रंग की बड़ी गाड़ी में आए बदमाशों ने उठा लिया है।"
यह खबर सुनते ही संध्या के चेहरे पर शिकन गहरी हो जाती है। अभिमन्यु अपनी जीप की तरफ दौड़ता है।
घटनास्थल का मंजर और नया सुराग
संध्या और अभिमन्यु रामपुर कस्बे के उस सुनसान रास्ते पर पहुँचते हैं जहाँ से उन महिलाओं का अपहरण हुआ था। वहाँ सड़क पर उनके खाने के टिफिन बिखरे पड़े थे और ताज़ा टायरों के निशान मिट्टी पर गहरे छपे थे।
अभिमन्यु: "मैडम, इन महिलाओं की उम्र 20 से 25 साल के बीच है। ये सब तंदुरुस्त और मेहनती थीं। स्कूल की लड़कियों के बाद अब इन औरतों का अपहरण... ये सिर्फ इत्तेफाक नहीं है।"
संध्या सिंह: "बिलकुल नहीं, अभिमन्यु। पैटर्न देखो। स्कूल की लड़कियां छोटी और डरी हुई हैं, उन्हें आसानी से 'ट्रेन' किया जा सकता है। लेकिन इन जवान औरतों को शायद 'लेबर' या किसी और घिनौने मकसद के लिए उठाया गया है। ये एक ही सिंडिकेट का काम है जो बेगूसराय को अपनी जागीर समझ बैठा है।"