Do Patiyo ki Ladli Patni in Hindi Drama by Sonam Brijwasi books and stories PDF | दो पतियों की लाडली पत्नी - 59

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दो पतियों की लाडली पत्नी - 59

तीनों घर पहुँचे…रात काफी हो चुकी थी…बाहर की चहल-पहल अब पीछे छूट चुकी थी। जैसे ही दरवाज़ा खुला…घर की शांति ने तीनों को घेर लिया। श्रेया अंदर आते ही सीधे सोफे की तरफ बढ़ी…और बिना कुछ सोचे… उस पर फैल गई।

श्रेया (थकी हुई आवाज़ में) बोली - 
मैं… बहुत थक गई…

उसने आँखें बंद कर लीं…और हाथ फैलाकर लेट गई… जैसे अब एक कदम भी चलने की ताकत नहीं बची हो।

कबीर हल्का सा मुस्कुराया—
किसने कहा था इतना घूमने को…

श्रेया (आँखें बंद किए हुए ही) बोली - 
आप दोनों ने…

करण चुपचाप खड़ा उसे देख रहा था।उसके चेहरे पर थकान थी…पर साथ में एक सुकून भी…।

करण (धीरे) बोला - 
उठो… ऐसे सोफे पर मत सोओ… कमरे में चलो…

श्रेया ने हल्का सा सिर हिलाया—
नहीं… नहीं उठना…

कबीर पास आकर सोफे के किनारे बैठ गया।

कबीर (थोड़ा छेड़ते हुए) बोला - 
ठीक है… फिर यहीं सो जाओ…

श्रेया ने धीरे से आँखें खोलीं…और दोनों को देखा…फिर अचानक…उसने अपना एक हाथ कबीर की तरफ बढ़ाया…और दूसरा करण की तरफ।

श्रेया (धीमे, नींद भरी आवाज़ में) बोली - 
आओ ना… दोनों…

दोनों एक पल के लिए चौंक गए। फिर…बिना कुछ कहे…कबीर ने उसका एक हाथ पकड़ लिया…और करण ने दूसरा।श्रेया ने दोनों के हाथ कसकर पकड़ लिए…जैसे वो उन्हें छोड़ना नहीं चाहती। उसकी आँखें फिर से बंद हो गईं…कुछ ही पल में…उसकी सांसें धीमी हो गईं…वो सो चुकी थी।कबीर उसे देखता रहा…

कबीर (धीमे, मुस्कुराकर) बोला - 
सो गई…

करण की नजरें अभी भी उसी पर थीं…

करण (बहुत धीरे) बोला - 
बहुत थक गई है…

कुछ पल… दोनों चुप रहे। फिर…

करण ने धीरे से कहा—
इसे ऐसे सोफे पर नहीं छोड़ सकते…

कबीर ने सिर हिलाया। करण ने बहुत सावधानी से…उसे उठाया…श्रेया हल्का सा हिली…पर जागी नहीं। उसका सिर करण के कंधे पर टिक गया…और हाथ अब भी करण की शर्ट को पकड़े हुए था। दोनों उसे लेकर कमरे की तरफ बढ़े। धीरे-धीरे…उसे बिस्तर पर लिटाया। श्रेया ने नींद में ही करवट ली…और जैसे ही उसने महसूस किया कि वो अकेली है उसने दोनों के कपड़े पकड़ लिए।

श्रेया (नींद में बुदबुदाते हुए) बोली - 
मत जाओ…

दोनों रुक गए। एक-दूसरे की तरफ देखा…फिर बिना कुछ कहे…दोनों उसके पास बैठ गए।करण ने उसके सिर पर हाथ फेरा…और कबीर ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया। अब तीनों फिर से साथ थे…श्रेया नींद में थी…पर उसके चेहरे पर एक सुकून था…और दोनों भाई…उसे ऐसे देख रहे थे…जैसे यही उनका घर हो…यही उनकी दुनिया…॥

सुबह की हल्की धूप परदों से छनकर कमरे में आ रही थी…एक नई शुरुआत जैसा एहसास था उस रोशनी में।
श्रेया धीरे-धीरे जागी…उसने आँखें खोलीं… और कुछ पल तक यूँ ही छत को देखती रही।फिर जैसे ही उसे एहसास हुआ कि वो अकेली नहीं है…उसने हल्का सा सिर घुमाया। एक तरफ करण था…जो बैठा-बैठा ही सो गया था… उसका हाथ अब भी श्रेया के सिर के पास था।
दूसरी तरफ कबीर…जो उसका हाथ पकड़े-पकड़े ही सो गया था। श्रेया के होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।

श्रेया (मन ही मन, बहुत धीरे) बोली - 
पागल हैं दोनों…

उसने धीरे से अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की…
पर कबीर की पकड़ हल्की सी और कस गई।

कबीर (नींद में, बुदबुदाते हुए) बोला - 
कहाँ जा रही हो…

श्रेया ठहर गई…उसका दिल हल्का सा पिघल गया।
उसी वक्त…करण भी हल्का सा हिला…और उसकी आँखें खुल गईं।जैसे ही उसने देखा कि श्रेया जाग गई है। वो तुरंत सीधा बैठ गया।

करण (हल्की घबराहट में) बोला - 
तुम… ठीक हो ना…?

श्रेया ने मुस्कुराकर सिर हिलाया।

श्रेया बोली - 
हाँ… बिल्कुल…

कबीर भी अब जाग गया था…उसने आँखें मलते हुए श्रेया को देखा।

कबीर (आधी नींद में) बोला - 
गुड मॉर्निंग…

श्रेया हँस दी—
सुप्रभात पति परमेश्वरों…

कुछ पल…तीनों बस एक-दूसरे को देखते रहे। अब वो झिझक नहीं थी…जो पहले हर सुबह में होती थी।

करण ने धीरे से पूछा—
आज… कैसा लग रहा है…?

श्रेया ने थोड़ा सोचा…

फिर मुस्कुराकर बोली—
शांत…

कबीर ने मज़ाक में कहा—
मतलब… हम दोनों ने आज कोई गड़बड़ नहीं की…

तीनों हल्का सा हँस पड़े। फिर श्रेया धीरे से उठकर बैठ गई।

श्रेया बोली - 
चलो… मैं नाश्ता बनाती हूँ…

करण तुरंत बोला—
नहीं… आज तुम आराम करो…

कबीर भी साथ में बोला—
हाँ… आज हम बनाएंगे…

श्रेया ने दोनों को देखा…थोड़ा हैरान… थोड़ा खुश।

श्रेया (शरारत से) बोली - 
आप दोनों…? किचन में…?

कबीर मुस्कुराया—
हाँ… देखना आज क्या बनाते हैं…

करण ने धीरे से कहा—
बस… तुम्हारे लिए अच्छा बनाने की कोशिश करेंगे…

श्रेया का दिल भर आया…पर इस बार उसने आँसू नहीं आने दिए। वो बस मुस्कुरा दी।

श्रेया बोली - 
ठीक है… मैं देखती हूँ…

तीनों कमरे से बाहर निकले…एक नई सुबह थी…जहाँ सब कुछ परफेक्ट नहीं था…पर फिर भी…सब कुछ ठीक लग रहा था…॥

शाम का वक्त था…आसमान में काले बादल छा गए थे…और कुछ ही देर में…तेज़ बारिश शुरू हो गई।खिड़की के शीशों पर गिरती बारिश की बूंदें…और ठंडी हवा पूरे घर में फैल रही थी। श्रेया खिड़की के पास खड़ी थी…बारिश को देखते हुए…उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी। तभी…

पीछे से कबीर की आवाज़ आई—
श्रेया… बारिश हो रही है…!

करण भी वहीं आ गया—
तो…?

कबीर ने तुरंत कहा—
तो क्या…? पकौड़े बनाओ!

श्रेया ने पलटकर दोनों को देखा…और हल्का सा हँस दी।

श्रेया बोली - 
आप दोनों भी ना… बस मौका चाहिए…

करण भी अब साथ दे रहा था—
बारिश + पकौड़े = परफेक्ट कॉम्बिनेशन…

कबीर ने नाटक करते हुए हाथ जोड़ लिए—
प्लीज श्रेया… बना दो ना…

श्रेया ने आँखें घुमाईं—
नहीं… आज नहीं… मैं थकी हूँ…

बस… इतना सुनना था कि दोनों उसके पीछे पड़ गए।

कबीर (पीछे-पीछे चलते हुए) बोला - 
बस थोड़े से… प्लीज…

करण (धीमे पर प्यार से) बोला - 
हम हेल्प करेंगे…

श्रेया किचन की तरफ जा रही थी…और दोनों उसके पीछे-पीछे…

श्रेया (हँसते हुए) बोली - 
आप लोग मुझे किचन में भेज ही दोगे…

कबीर बोला - 
हाँ… क्योंकि हमें पकौड़े चाहिए…

करण बोला - 
और तुम्हारे हाथ के…

श्रेया ने हार मान ली। वो किचन में चली गई…

श्रेया बोली - 
ठीक है… पर आप दोनों हेल्प करोगे…

कबीर और करण एक साथ—
Done!

कुछ ही देर में…किचन फिर से एक्टिव हो गया।तेल गरम हो रहा था…बेसन घोला जा रहा था…कबीर आलू काट रहा था…और करण गैस संभाल रहा था। बारिश की आवाज़…और किचन की हलचल…सब मिलकर एक खूबसूरत माहौल बना रहे थे। तभी…कबीर ने एक कच्चा पकौड़ा उठाया…और सीधे श्रेया की तरफ बढ़ा दिया—

कबीर (शरारत से) बोला - 
पहले taste…

श्रेया चौंक गई—
अरे! ये कच्चा है…

करण हँस पड़ा—
इसे कुछ नहीं पता…

तीनों हँसने लगे। कुछ ही देर में…गरमा-गरम पकौड़े तैयार हो गए। तीनों प्लेट लेकर खिड़की के पास आकर बैठ गए। बाहर बारिश…अंदर गरम पकौड़े…श्रेया बीच में…दोनों उसके पास…

कबीर (खाते हुए) बोला - 
वाह… मज़ा आ गया…

करण (धीरे) बोला - 
सच में…

श्रेया उन्हें देख रही थी…उसका दिल भर आया…

श्रेया (धीमे) बोली - 
इतनी सी चीज़ में इतनी खुशी…

कबीर मुस्कुराया—
क्योंकि हम साथ हैं…

करण ने भी उसकी तरफ देखा—
और यही सबसे बड़ी बात है…

श्रेया ने दोनों के हाथ पकड़ लिए…बाहर बारिश और तेज़ हो गई…और अंदर…तीनों के बीच प्यार और भी गहरा हो गया…॥