Bayaan - Part 7 in Hindi Love Stories by Radha rani Jha books and stories PDF | Bayaan - Part 7

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Bayaan - Part 7

Part 7 

 के अगले पन्ने पर राधा ने लिखा था—

"उस रात जानकी पूजा से लौटने के बाद मेरे मन में सिर्फ़ एक ही सवाल था।"

"आख़िर अभिन्नव ने कुंदन से ऐसा क्या कहा था?"

मैंने अगले दिन कुंदन से फिर पूछा।

पहले तो वह टालता रहा।

लेकिन जब मैंने ज़िद की, तो वह हँस पड़ा और बोला—

"इतना सोचने की ज़रूरत नहीं है।"

"उसने बस इतना पूछा था कि... 'क्या बात है, ये राधा रानी भी आई है?'"

मैं कुछ पल के लिए बिल्कुल चुप रह गई।

मेरे कानों में बस वही शब्द गूँज रहे थे—

"ये राधा रानी भी आई है?"

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मुझे पहले हैरान होना चाहिए या खुश।

हैरान इसलिए...

क्योंकि उसे मेरा नाम कैसे पता था?

और खुश इसलिए...

क्योंकि उसने मेरे बारे में पूछा था।

उस लड़के ने...

जिसे मैं इतने दिनों से दूर से देखती आ रही थी।

जिसकी एक झलक देखने के लिए मैं न जाने कितने बहाने ढूँढ़ती थी।

उसने मेरे बारे में पूछा था।

उस रात मैं बहुत देर तक सो नहीं पाई।

बार-बार वही बात सोचती रही।

"अगर वह मुझे नहीं जानता..."

"तो उसे मेरा नाम कैसे पता चला?"

धीरे-धीरे मुझे एक और बात याद आने लगी।

सच तो यह था कि मैं भी उसके बारे में यही सवाल खुद से पूछती थी।

क्योंकि मुझे भी उसका नाम पहले दिन से पता था।

जब मैंने उसे पहली बार देखा था...

उसी दिन मेरे मन में उसका नाम आया था।

अभिन्नव।

लेकिन कैसे?

मैं तो उसे जानती भी नहीं थी।

हमारी कभी बात नहीं हुई थी।

किसी ने मुझे उसका परिचय भी नहीं दिया था।

फिर उसका नाम मेरे मन तक पहुँचा कैसे?

जितना मैं सोचती, उतनी ही उलझ जाती।

कभी लगता शायद किसी से सुना होगा और याद नहीं रहा।

कभी लगता शायद यह सिर्फ़ एक संयोग है।

लेकिन दिल इन जवाबों को मानने के लिए तैयार ही नहीं था।

एक अजीब सी बेचैनी मेरे भीतर रहने लगी थी।

और फिर एक दिन...

मैंने अपनी माँ से पूछ लिया।

शाम का समय था।

माँ आँगन में बैठी थीं।

मैं उनके पास जाकर बैठ गई।

कुछ देर इधर-उधर की बातें करने के बाद मैंने अचानक पूछा—

"माँ... एक बात पूछूँ?"

उन्होंने मुस्कुराकर कहा—

"हाँ, पूछो।"

मैंने धीरे से अभिन्नव का नाम लिया।

और फिर पूछा—

"क्या हमारे और उनके परिवार के बीच कोई रिश्ता है?"

माँ ने पहले मुझे ध्यान से देखा।

फिर कुछ पल तक चुप रहीं।

उनकी आँखों में जैसे अचानक कोई पुरानी याद उतर आई हो।

मैंने फिर पूछा—

"माँ, बताइए ना।"

उन्होंने एक लंबी साँस ली।

और फिर जो बताया...

उसे सुनकर मेरे पैरों तले जैसे ज़मीन खिसक गई।

मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे भीतर छिपी हुई दुनिया को एक ही पल में बदल दिया हो।

वह सच...

जिसे मैं कभी जानना नहीं चाहती थी।

वह बात...

जिसकी मैंने कल्पना तक नहीं की थी।

माँ बोलती रहीं।

और मेरी आँखों से आँसू बहने लगे।

मैं कुछ कह भी नहीं पा रही थी।

बस रो रही थी।

बहुत रो रही थी।

इतना कि शायद पहली बार मुझे महसूस हुआ कि कुछ सच दिल को कितना भारी बना सकते हैं।

उस रात मैंने अपनी डायरी खोली।

लेकिन शब्द मेरा साथ नहीं दे रहे थे।

पन्ने पर आँसुओं के निशान बनते जा रहे थे।

बहुत देर बाद मैंने काँपते हाथों से सिर्फ़ इतना लिखा—

"कभी-कभी जिन सवालों के जवाब हम सबसे ज़्यादा जानना चाहते हैं..."

"वही जवाब हमारी दुनिया बदल देते हैं।"

"आज मुझे मेरे सवाल का जवाब मिल गया।"

"लेकिन काश..."

"मैंने वह सवाल कभी पूछा ही न होता।"

पन्ने के सबसे नीचे सिर्फ़ एक अधूरी लाइन लिखी थी—

"माँ ने उस दिन जो सच बताया था..."

"वह सिर्फ़ मेरे और अभिन्नव के बारे में नहीं था..."

"बल्कि दो परिवारों की ऐसी कहानी थी, जिसे सुनकर मेरी आँखों से आँसू रुक ही नहीं पाए..."

"और शायद... उसी दिन मेरी कहानी ने एक ऐसा मोड़ लिया, जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।"

"जारी रहेगा..." 📖✨