Part 4
उस रात मैं अपने कमरे में बैठी थी, लेकिन मेरा ध्यान कहीं और ही था। मेरे सामने फोन रखा था और दिमाग में सिर्फ वही कोड वर्ड घूम रहा था। आखिरकार मैंने उसका मतलब निकाल ही लिया।
कोड वर्ड था — "N.S."
जिसका मतलब था — "नज़र से"
मैं कुछ पल तक स्क्रीन को देखती रह गई।
इतना छोटा सा शब्द, लेकिन उसके पीछे कितनी बड़ी कहानी छिपी हुई थी।
मैंने तुरंत डायरी का अगला पन्ना खोला।
वहाँ राधा रानी ने लिखा था—
"शायद मैं पागल हूँ। मैंने उस लड़के को केवल दो बार देखा है, फिर भी उसके बारे में लिख रही हूँ।"
मैं मुस्कुरा दी।
राधा की लिखावट में एक अजीब सी सच्चाई थी।
आगे लिखा था—
"पहली बार मैंने उसे स्कूल में देखा था। उस दिन मुझे कुछ अलग महसूस हुआ था, लेकिन मैं उसे समझ नहीं पाई। फिर मैंने खुद को समझाया कि यह कुछ नहीं है।"
"लेकिन आज नौटंकी में उसे दूसरी बार देखकर वही एहसास फिर वापस आ गया।"
मैं ध्यान से पढ़ने लगी।
"मुझे नहीं लगता कि मैं अभिनव से प्यार करती हूँ। प्यार इतना आसान नहीं होता। मैंने उससे कभी बात तक नहीं की।"
"मुझे बस उसे देखना अच्छा लगता है।"
"जब वह सामने होता है तो पता नहीं क्यों मेरी नज़र उसी पर जाकर रुक जाती है।"
मैंने अगला पन्ना पलटा।
"आज नौटंकी में बहुत भीड़ थी। सब लोग नाटक देख रहे थे, लेकिन मेरा ध्यान बार-बार उसकी तरफ जा रहा था।"
"वह अपने दोस्तों के साथ हँस रहा था। शायद उसे यह भी नहीं पता कि मैं कौन हूँ।"
"और सच कहूँ तो यह बात मुझे बुरी भी नहीं लगती।"
उसके नीचे एक छोटी सी लाइन लिखी थी—
"क्योंकि अगर वह मुझे देख लेगा, तो शायद मैं उससे नज़रें नहीं मिला पाऊँगी।"
मैं हँस पड़ी।
राधा सच में बहुत अलग थी।
आगे उसने लिखा था—
"आज मैंने गिनने की कोशिश की कि उसने मेरी तरफ कितनी बार देखा।"
"लेकिन जवाब शून्य निकला।"
"उसने एक बार भी नहीं देखा।"
"एक बार भी नहीं।"
इन शब्दों में शिकायत कम थी, मज़ाक ज्यादा था।
जैसे वह खुद अपनी हालत पर हँस रही हो।
मैं आगे पढ़ती गई।
"मेरी सहेली कहती है कि शायद मुझे अभिनव पसंद है। लेकिन मुझे नहीं लगता कि यह सच है।"
"अगर किसी को पसंद करना ही प्यार है, तो फिर दुनिया में आधे लोग प्यार में होंगे।"
"मुझे बस उसकी मुस्कान अच्छी लगती है।"
"उसका हँसना अच्छा लगता है।"
"और पता नहीं क्यों, उसे देखकर मन खुश हो जाता है।"
कुछ देर के लिए मैं सोच में पड़ गई।
शायद राधा सचमुच अपने दिल की बात समझ नहीं पा रही थी।
डायरी के आखिर में उसने लिखा था—
"आज मैंने तय किया है कि मैं अब उसके बारे में नहीं सोचूँगी।"
"आखिर कोई इंसान किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में कितने दिन सोच सकता है जिससे उसकी कभी बात ही न हुई हो?"
लेकिन उसके नीचे ही एक और लाइन लिखी थी—
"शायद कल भी मैं यही लिखूँगी कि मैं उसके बारे में नहीं सोचूँगी।"
मैं हँसते-हँसते रुक गई।
क्योंकि अब मुझे समझ आने लगा था कि राधा रानी खुद से कितना झूठ बोल रही थी।
वह बार-बार कह रही थी कि उसे अभिनव से प्यार नहीं है।
लेकिन उसकी डायरी का हर पन्ना अभिनव के नाम था।
फिर मेरी नज़र पन्ने के सबसे नीचे गई।
वहाँ राधा ने एक सवाल लिखा था—
"अगर यह प्यार नहीं है, तो फिर मैं उसके बारे में इतना क्यों लिख रही हूँ?"
उस सवाल का कोई जवाब नहीं था।
लेकिन मुझे लग रहा था कि शायद आने वाले पन्नों में राधा को खुद अपने सवाल का जवाब मिलने वाला था...
**(जारी रहेगा...