Part 9
डायरी का अगला पन्ना खोलते ही मैं कुछ देर तक शब्दों को देखती रह गई।
पता नहीं क्यों...
हर नया पन्ना पढ़ते समय मेरे मन में एक अजीब सी बेचैनी होने लगी थी।
जैसे मैं किसी और की कहानी नहीं...
अपनी ही कोई भूली हुई याद पढ़ रही हूँ।
मैंने कई बार खुद को समझाया कि यह सिर्फ़ एक कहानी है।
लेकिन फिर भी...
जब भी अभिन्नव का नाम सामने आता, मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो जाती।
मुझे समझ नहीं आता था कि ऐसा क्यों हो रहा है।
आख़िर मैं उन्हें जानती भी तो नहीं हूँ।
फिर भी ऐसा क्यों लगता है कि उनका नाम मेरे लिए नया नहीं है?
जैसे कहीं न कहीं...
कभी न कभी...
मैं उन्हें पहले से जानती हूँ।
यह सोचकर मैं खुद ही हँस पड़ती।
फिर खुद को समझाती—
"पागल मत बनो राधा।"
"तुम बस कहानी में ज़्यादा खो गई हो।"
लेकिन दिल मानने को तैयार ही नहीं था।
मैंने गहरी साँस ली और अगला पन्ना पलट दिया।
"अगले दिन मैं फिर उन्हें देखने गई।"
मैंने खुद को लाख समझाया था कि मैं उनसे प्यार नहीं करती।
नहीं...
यह प्यार नहीं था।
मैं बस उन्हें पसंद करती थी।
और पसंद करना कोई गलत बात नहीं होती।
शायद इसी सोच ने मुझे फिर बाहर निकलने की हिम्मत दी।
मैं हमेशा की तरह उसी रास्ते पर गई।
और हमेशा की तरह...
वह वहाँ थे।
उन्होंने एक बार मेरी तरफ़ देखा।
बस एक पल के लिए।
और फिर नज़रें फेर लीं।
वह हमेशा ऐसा ही करते थे।
लेकिन उस दिन भी मैं मुस्कुरा दी।
क्योंकि मेरे लिए उनकी एक झलक ही काफी थी।
उस दिन के बाद फिर वही सिलसिला शुरू हो गया।
कभी बेवजह बाहर निकलना।
कभी किसी काम का बहाना बनाना।
कभी कुंदन को उनके पास भेजना।
और फिर घंटों उससे उनके बारे में पूछना।
आज क्या कर रहे थे?
कहाँ गए थे?
क्या बोले?
कैसे थे?
उनकी छोटी-सी छोटी बात भी मेरे लिए बहुत बड़ी हो जाती थी।
और इसी तरह...
दिन बीतते गए।
फिर हफ्ते बीत गए।
देखते ही देखते पूरे तीन महीने गुजर गए।
डायरी में आगे लिखा था—
"अब समय आ गया है कि मैं अपनी कहानी के एक और महत्वपूर्ण किरदार से तुम्हें मिलवाऊँ।"
"आनंद मोहन।"
"मेरा सबसे छोटा भाई।"
हम चार बहनें थीं।
और मैं सबसे छोटी।
घर में सब मुझे प्यार से "छोटी" बुलाते थे।
हम चार बहनों के बाद हमारा एक भाई हुआ—
आनंद मोहन।
आनंद मुझसे तीन साल छोटा था।
उस समय मैं पंद्रह साल की थी।
दसवीं कक्षा में पढ़ती थी।
आनंद बारह साल का था।
और अभिन्नव...
वह बीस साल के थे।
मुझसे पूरे पाँच साल बड़े।
वह JEE की तैयारी कर रहे थे।
मुझे नहीं पता था कि आने वाले दिनों में मेरा यही छोटा भाई मेरी कहानी का एक बहुत बड़ा कारण बनने वाला है।
कुछ समय बाद आनंद का उपनयन संस्कार तय हुआ।
घर में खुशी का माहौल था।
रिश्तेदारों का आना-जाना शुरू हो गया था।
चारों तरफ़ तैयारियाँ चल रही थीं।
लेकिन मेरी खुशी की वजह कुछ और थी।
मुझे पता चला था कि अभिन्नव भी उपनयन में आने वाले हैं।
यह सुनकर मेरे चेहरे की मुस्कान ही नहीं रुक रही थी।
मैं बार-बार खुद को समझा रही थी—
"राधा, इतना खुश मत हो।"
"तुम उन्हें बस पसंद करती हो।"
लेकिन दिल मेरी एक भी बात सुनने को तैयार नहीं था।
उपनयन का दिन आया उस दिन रिश्तेदार कपड़े देते हैं वहां अभिनव भी देने आया में तैयार हो रही थी मुझे कुंदन बाहर से बुलाने आया लेकिन मेँ उसके इशारे समझ ना सकी जब मैंने समझा मैं दौर कर बाहर गई लेकिन अभिनव चला गया था मेरी खुशी उदासी बन गयी
सुबह से ही घर लोगों से भरा हुआ था।
हर तरफ़ शोर, हँसी और खुशी का माहौल था।
और फिर...
उस दिन मेरी खुशी उदासी सातवें आसमान पर थी।
लेकिन मुझे क्या पता था...
कि उसी दिन...
उसी दुख के बीच...
कुछ ऐसा होने वाला है...
जो मुझे इतनी खुशी देगा...और
उतना ही दर्द भी।
डायरी के आख़िरी कोने में सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी—
"उपनयन वाले दिन अभिन्नव ने जो किया..."
"उसने मेरे दिल को पहली बार इतना खुश भी किया था..."
"और पहली बार इतनी तकलीफ़ भी दी थी..."
"लेकिन असली बात तो उसके बाद हुई थी..."
"जिसकी उम्मीद वहाँ मौजूद किसी भी इंसान को नहीं थी..."
"जारी रहेगा..." 📖✨