काव्या की बातों ने विराज के भीतर सुलगती आत्म-ग्लाानि की आग पर जैसे ठंडे पानी के छींटे डाल दिए थे। "इस्तीफा समस्या का समाधान नहीं है, सच का सामना करना समाधान है।" काव्या के ये शब्द विराज के कानों में बार-बार गूँज रहे थे। उसने धीरे से अपना सिर उठाया। उसकी आँखों में अब वह पुराना खालीपन नहीं था, बल्कि एक अजीब सी कशमकश और काव्या के प्रति एक गहरा सम्मान था, जो शब्दों के दायरे से परे था।
"सच का सामना..." विराज की आवाज़ इस सन्नाटे में बेहद भारी सुनाई दी। उसने फर्श पर बिखरे नियति की तस्वीर के टुकड़ों को देखा, जिन्हें काव्या बड़ी शिद्दत से समेट रही थी। "काव्या, जिस सच की तुम बात कर रही हो, वो इतना भयानक है कि शायद तुम भी उसे सह न पाओ। जो इंसान अपनी पत्नी को समय न दे सका, जो उसके जाने की वजह बना, क्या वो सच में किसी माफी के काबिल है?"
काव्या ने नियति की मुस्कुराती हुई तस्वीर का आखिरी टुकड़ा उठाया और खड़ी हो गई। उसने बड़ी संजीदगी से विराज की आँखों में देखते हुए कहा, "सर, इंसान गलतियों का पुतला होता है। जो बीत गया, उसे बदला नहीं जा सकता। लेकिन जो आज है, उसे इस बंद कमरे में घुट-घुट कर मारा भी नहीं जा सकता। मामा जी ने जो चिट्ठी दिखाई... क्या आप सच में मानते हैं कि नियति जी आपसे नफरत करती थीं?"
विराज के चेहरे पर एक दर्दनाक मुस्कान तैर गई। "चिट्ठी में साफ लिखा है काव्या... कि वो मुझे छोड़ना चाहती थी। क्योंकि मेरे पास फाइलों के लिए वक्त था, उसके लिए नहीं।" कहते-कहते विराज का गला रूँध गया।
काव्या ने कुछ पल सोचा। वह एक बायोग्राफर थी, इंसानी जज्बातों और शब्दों के पीछे छिपे सच को पढ़ना उसकी खूबी थी। उसने कहा, "सर, एक औरत जब टूटती है या जब वो बहुत अकेली होती है, तो वो गुस्से में बहुत कुछ लिखती है। लेकिन वो नफरत नहीं, बल्कि ध्यान खींचने की एक आखिरी कोशिश होती है।
क्या आपने कभी उस चिट्ठी के अलावा नियति जी के उस अतीत को जानने की कोशिश की, जो उन्होंने डायरियों या अपनी किसी खास चीज़ में छुपाया हो?"
विराज कुछ कहने ही वाला था कि तभी बाहर पुलिस की गाड़ी की आवाज़ पूरी तरह शांत हो गई। इंस्पेक्टर और कुछ पुलिसकर्मी कोठी के मुख्य दरवाजे से अंदर दाखिल हुए। पड़ोसियों के हंगामे की शिकायत पर पुलिस अंदर आई थी।
इंस्पेक्टर ने कमरे का नजारा देखा—फर्श पर बिखरा कांच, शराब की गंध और सोफे पर बेबस बैठा शहर का सबसे बड़ा बिजनेसमैन। इंस्पेक्टर ने आगे बढ़कर कहा, "मिस्टर विराज? क्या सब ठीक है? हमें पड़ोसियों से खबर मिली थी कि यहाँ कोई हंगामा हुआ है।"
विराज ने खुद को संभाला और उठ खड़ा हुआ। काव्या ने तुरंत बात संभालते हुए कहा, "जी इंस्पेक्टर साहब, सब ठीक है। वो विराज सर के एक पारिवारिक रिश्तेदार आए थे, जो थोड़े मानसिक तनाव में थे। अब वो जा चुके हैं। कोई गंभीर बात नहीं है।"
काव्या की सूझबूझ देखकर इंस्पेक्टर ने सिर हिलाया और औपचारिकताएं पूरी करके पुलिस बल के साथ वापस लौट गए।
पुलिस के जाने के बाद कोठी में फिर से वही गहरा सन्नाटा पसर गया। लेकिन इस बार इस सन्नाटे में एक नया ठहराव था।
विराज काव्या की तरफ मुड़ा। उसकी आँखों में अब कोई संकोच नहीं था। उसने अपनी जेब से एक पुरानी, पीली पड़ चुकी चाबी निकाली और उसे काव्या की तरफ बढ़ा दिया।
"यह क्या है सर?" काव्या ने अचरज से पूछा।
विराज ने गहरी सांस ली और कहा, "यह इस कोठी के उस सबसे ऊपरी कमरे की चाबी है, जिसे मैंने नियति के जाने के बाद पिछले तीन सालों से कभी नहीं खोला। इस कोठी का वह पन्ना, जो अब तक पूरी दुनिया से छिपा था। अगर तुम सच में मेरी बायोग्राफी लिखना चाहती हो, और इस कहानी को मुकम्मल करना चाहती हो... तो जाओ, और खुद देख लो कि नियति के उस आखिरी खत के पीछे का पूरा सच क्या था।"
काव्या ने कांपते हाथों से वह चाबी थाम ली। उसे अहसास था कि इस चाबी के साथ ही विराज के अतीत का वो सबसे बड़ा तूफान खुलने वाला है, जो या तो विराज को हमेशा के लिए बदल देगा, या फिर उन दोनों की जिंदगी को एक बिल्कुल नए मोड़ पर ले आएगा।
काव्या सीढ़ियों की तरफ बढ़ने लगी, और पीछे खड़ा विराज उसे जाता हुआ देखता रहा—इस उम्मीद में कि शायद काव्या उसके इस अंधेरे को हमेशा के लिए मिटा सके।
क्या काव्या उस बंद कमरे में नियति का असली सच ढूंढ पाएगी? क्या नियति के अतीत का वो पन्ना विराज को उसके गिल्ट से आजाद कर पाएगा? जानने के लिए जुड़े रहें "इश्क और इस्तीफा" के अगले भाग से।
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Author name= Deepti Gurjar