हाथ में थमी वह पुरानी, पीली पड़ चुकी चाबी काव्या को बेहद भारी महसूस हो रही थी। यह सिर्फ एक लोहे का टुकड़ा नहीं था, बल्कि विराज के उस अतीत का द्वार था जिसे उसने पिछले तीन सालों से दुनिया की नजरों से, और शायद खुद से भी छिपाकर रखा था।
कोठी की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए काव्या के दिल की धड़कनें तेज हो रही थीं। कोठी का सबसे ऊपरी हिस्सा बेहद शांत था, जहाँ धूल की एक महीन परत जमी हुई थी। जैसे-जैसे वह उस बंद कमरे के करीब पहुँच रही थी, हवा में एक अजीब सी उदासी और भारीपन साफ महसूस किया जा सकता था।
काव्या ने दरवाजे के सामने रुककर एक गहरी सांस ली। उसने कांपते हाथों से चाबी को ताले में डाला। एक भारी 'क्लिक' की आवाज़ के साथ ताला खुल गया। काव्या ने धीरे से दरवाजे को धक्का दिया।
कमरा खुलते ही एक पुरानी बंद गंध और अंधेरा काव्या के सामने था। उसने दीवार पर हाथ फेरकर लाइट का स्विच ऑन किया। जैसे ही रोशनी फैली, काव्या की आँखें फटी की फटी रह गईं।
यह कोई साधारण कमरा नहीं था। यह एक बेहद खूबसूरत आर्ट स्टूडियो था। कमरे की दीवारों पर अनगिनत कैनवास टंगे हुए थे, जिन पर बेहतरीन पेंटिंग्स बनी हुई थीं। लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि उन सभी पेंटिंग्स में केवल एक ही शख्स था—विराज!
कहीं विराज ऑफिस की फाइलों में खोया हुआ था, कहीं वह खिड़की के पास खड़ा दूर आसमान को देख रहा था, तो कहीं उसके चेहरे पर एक हल्की सी, दुर्लभ मुस्कान थी। हर एक पेंटिंग विराज के अलग-अलग मूड को बयां कर रही थी। कैनवास के नीचे छोटे अक्षरों में दस्तखत थे—'नियति'।
काव्या मंत्रमुग्ध सी कमरे के बीचों-बीच आ गई। नियति की लिखी उस आखिरी चिट्ठी में जो नफरत और शिकायत दिख रही थी, इस कमरे की एक-एक दीवार उसके बिल्कुल उलट गवाही दे रही थी। यहाँ नफरत नहीं, बल्कि विराज के लिए असीम, बेइंतहा प्यार बिखरा पड़ा था।
तभी काव्या की नजर कमरे के कोने में रखी एक छोटी सी मेज पर पड़ी, जहाँ एक खुली हुई डायरी रखी थी। धूल से ढकी उस डायरी के पन्ने पलटने पर काव्या को नियति की आखिरी एंट्री मिली, जिसकी तारीख नियति के एक्सीडेंट से ठीक एक दिन पहले की थी।
काव्या ने धड़कते दिल से पढ़ना शुरू किया:
"विराज... मुझे पता है कि आप मुझसे बहुत प्यार करते हैं, लेकिन आपका यह काम, यह बिजनेस साम्राज्य... यह हमारे बीच एक ऐसी दीवार बन गया है जिसे मैं चाहकर भी गिरा नहीं पा रही हूँ। कल हमारा एनिवर्सरी है। मैंने आपके लिए एक सरप्राइज प्लान किया है। मैं जानबूझकर आपको एक ऐसी चिट्ठी भेज रही हूँ जिसमें लिखा है कि मैं आपको छोड़ रही हूँ। मुझे पता है, इस गुस्से वाले खत को पढ़कर आप सब कुछ छोड़कर दौड़े चले आएंगे। मैं बस एक बार देखना चाहती हूँ कि क्या आज भी आपकी फाइलों से ज्यादा जरूरी मैं हूँ? अगर कल आप आ गए, तो मैं आपको इस कमरे में लेकर आऊंगी और अपना यह सरप्राइज दूंगी... आई लव यू, विराज।"
डायरी की उन लाइनों को पढ़कर काव्या के हाथ कांपने लगे। उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े।
तो यह था असली सच! नियति कभी विराज को छोड़ना नहीं चाहती थी। वह आखिरी चिट्ठी कोई नफरत का खत नहीं था, बल्कि विराज को अपने पास बुलाने का एक मासूम सा बहाना था। और विराज... विराज पिछले तीन सालों से उसी बहाने को सच मानकर खुद को गुनहगार समझ रहा था, अंदर ही अंदर घुट रहा था।
"काव्या..."
अचानक पीछे से एक बेहद कमजोर और डरी हुई आवाज़ आई। काव्या ने मुड़कर देखा। विराज दरवाजे पर खड़ा था। उसकी नजरें काव्या के हाथ में मौजूद डायरी और दीवारों पर टंगी अपनी ही तस्वीरों पर थीं। उसकी आँखों में वह भयानक सच जानने का खौफ था, जिससे वह भाग रहा था।
"क्या... क्या लिखा है उसमें?" विराज ने लड़खड़ाती आवाज़ में पूछा।
काव्या ने आगे बढ़कर डायरी विराज के हाथों में थमा दी। "सर... आपको इस सच का सामना करना ही होगा। नियति जी आपसे नफरत नहीं करती थीं।"
विराज ने कांपते हाथों से डायरी पकड़ी और जैसे ही उसकी नजरें नियति के उन आखिरी शब्दों पर पड़ीं, उसके पैरों तले की जमीन खिसक गई। वह वहीं फर्श पर घुटनों के बल बैठ गया। तीन साल से दबा हुआ उसका सारा दर्द, उसका सारा गिल्ट, आँखों से आंसुओं के सैलाब के रूप में बह निकला। वह बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोने लगा।
काव्या चुपचाप खड़ी रही। वह जानती थी कि विराज के इस दर्द का बह जाना ही उसके ठीक होने की पहली सीढ़ी थी।
नियति का यह अधूरा सच आखिरकार विराज के सामने आ ही गया। क्या इस सच को जानने के बाद विराज खुद को माफ कर पाएगा? और काव्या, जिसने विराज को इस अंधेरे से निकाला है, अब विराज की जिंदगी में क्या मायने रखेगी?
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Author name= Deepti Gurjar