self-inflicted destruction in Hindi Motivational Stories by sukhvinder Singh Rai books and stories PDF | अपने ही हाथों लिखी बर्बादी

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अपने ही हाथों लिखी बर्बादी

सड़क के किनारे लगा इकलौता पीला बल्ब बारिश की तेज़ बौछारों के बीच किसी बीमार इंसान की तरह टिमटिमा रहा था। आसमान में घुप्प अँधेरा था, ऐसा अँधेरा जो आँखों को नहीं, सीधा रूह को अंधा कर दे। डामर की उस खुरदरी और टूटी सड़क पर पानी के गहरे गड्ढे बन चुके थे। उन्हीं गड्ढों के पास, अपनी जंग खाई, बंद पड़ी पुरानी बाइक के सहारे आर्यन बैठा था। बारिश का बर्फ जैसा ठंडा पानी उसके बालों से टपककर उसकी गर्दन के पीछे जा रहा था, लेकिन उसे उस ठंड का कोई अहसास नहीं था। आज उसके अंदर एक ऐसा ज्वालामुखी सुलग रहा था, जिसने उसकी सारी शारीरिक चेतना को सुन्न कर दिया था।सुबह ही बॉस ने पूरे ऑफिस के सामने उसे जलील करके नौकरी से निकाल दिया था। पैंट की जेबें पूरी तरह खाली थीं, कांपती उंगलियों को सिर्फ जेब के फटे हुए धागों का स्पर्श मिल रहा था। शाम को मकान मालिक ने भी दरवाज़े पर खड़े होकर उसका सारा सामान सड़क पर फेंकने की आख़िरी धमकी दे दी थी।आर्यन ने अपने दोनों हाथों से अपने बाल कसकर नोंचे। उसके सीने में उठ रही घुटन अब आंसुओं और भयंकर गुस्से का रूप ले रही थी। उसने अचानक ज़मीन पर पड़ा एक पत्थर उठाया और पूरी ताकत से पास पड़े एक लोहे के ड्रम पर दे मारा। एक तेज़ झनझनाहट ने रात के सन्नाटे को चीर दिया।उसने अपना सिर आसमान की तरफ उठाया। बारिश की मोटी बूंदें उसके चेहरे पर चाबुक की तरह पड़ रही थीं, लेकिन उसकी लाल आँखें उस काले आसमान को ऐसे घूर रही थीं मानो वो उसे फाड़ देना चाहता हो।"क्या दुश्मनी है तेरी मुझसे? हाँ!" आर्यन ने हवा में अपनी कांपती हुई उंगली उठाई। उसके गले की नसें तन गई थीं और आवाज़ में एक खौफनाक दर्द था। "अगर मुझे कुछ दे नहीं सकता था, तो पैदा ही क्यों किया इस नर्क में? सबको पैसा दिया, लंबी गाड़ियाँ दीं, ऐशो-आराम दिया! और मेरे हिस्से में... मेरे हिस्से में सिर्फ ये सड़कों की धक्के और दुखों का ये पहाड़ लिख दिया! बहुत मज़ा आता है ना तुझे ऊपर बैठकर मुझे ऐसे तड़पता हुआ देखकर? ले देख... देख मेरी बर्बादी!"आर्यन पागलों की तरह चीख रहा था। वह अपनी बेबसी, अपनी नाकामी और अपनी इस बर्बादी का इकलौता ज़िम्मेदार सिर्फ और सिर्फ उस अनदेखी ताकत को मान रहा था। उसके होंठों से भद्दी गालियां फिसल रही थीं।तभी पानी के छपछपाने की आवाज़ आई। कोई उसके पीछे खड़ा था।आर्यन ने मुड़कर देखा। रिया उस तेज़ बारिश में पूरी तरह भीग चुकी थी। उसके कपड़े शरीर से चिपके थे और बालों से पानी की धार बह रही थी। लेकिन उसकी आँखों में आर्यन के लिए कोई तरस या हमदर्दी नहीं थी। वहाँ एक बहुत ही कड़वी, नंगी सच्चाई झांक रही थी।"हो गई तेरी गालियां खत्म आर्यन?" रिया की आवाज़ बारिश के शोर को चीरती हुई आर्यन के कानों में पड़ी। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी खामोशी और चुभन थी। "या एकाध और बकनी है ऊपर वाले को? अपना गला फाड़ ले। क्या लगता है, तेरे इस तरह कोसने और रोने से भगवान अभी आसमान फाड़कर तेरे लिए पैसों से भरा कोई सूटकेस नीचे फेंक देगा?"आर्यन ने अपने घुटनों पर हाथ रखा और किसी तरह खड़ा हुआ। उसकी आँखें रोने और गुस्से से सुर्ख हो रही थीं।"तो और क्या करूँ मैं रिया?" आर्यन ने अपने दोनों खाली हाथ हवा में फैला दिए। "देख मेरी हालत! देख इस कबाड़ बाइक को! भगवान ने मुझे दिया ही क्या है इस ज़िंदगी में? सिर्फ दर-दर की ठोकरें और ज़लालत!"रिया चुपचाप दो कदम आगे बढ़ी। उसने आर्यन की उन लाल आँखों में देखा और अपना ठंडा हाथ आर्यन के कांपते हुए कंधे पर रख दिया।"भगवान ने तुझे क्या दिया है?" रिया की आवाज़ में अब कोई ताना नहीं, बल्कि एक बहुत गहरी पीड़ा थी। "आर्यन, उसने तुझे एक पूरा, सही-सलामत शरीर दिया। सोचने-समझने के लिए एक शानदार दिमाग दिया। तू आज रात जिन दुखों का रोना रोकर आसमान की तरफ उंगली उठा रहा है ना, वो दुख उस परमात्मा के बनाए हुए नहीं हैं।"आर्यन कुछ बोलने ही वाला था, पर रिया ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।"ये कागज़ का पैसा, ये अमीरी और गरीबी का फासला, ये सर पर चढ़ा हुआ कर्ज़, और तेरे मकान मालिक का वो किराया... ये सब उस ऊपर वाले ने नहीं, हम इंसानों ने अपनी लालच से बनाए हैं!" रिया की आँखें अब चमक रही थीं। "इंसान ही दूसरे इंसान की मजबूरी का फायदा उठाता है, उसका खून चूसता है, और जब तुम लोग हार जाते हो, तो अपनी नाकामी छुपाने के लिए गालियां उस भगवान को देते हो।"आर्यन बुत बनकर खड़ा था। रिया का हर एक लफ़्ज़ किसी भारी हथौड़े की तरह उसके सीने पर पड़ रहा था।"हाँ, मैं मानती हूँ," रिया ने अपनी पलकें झपकाईं, जिससे पानी की कुछ बूंदें आर्यन के चेहरे पर गिरीं। "मैं मानती हूँ कि जो दुख किस्मत के पन्नों पर लिखे हैं, वो इंसान पर आएंगे ही। जैसे किसी अपने का हमेशा के लिए दुनिया से चले जाना, कोई अचानक आई लाइलाज बीमारी, या कुदरत का कोई कहर... वो कुदरत का चक्र है आर्यन। उसे दुनिया की कोई ताकत टाल नहीं सकती। किस्मत के लिखे वो दुख तो हर इंसान को चुपचाप सहने ही पड़ते हैं। लेकिन आर्यन... जो दुख तू आज इस सड़क पर खड़ा होकर झेल रहा है, वो किस्मत का लिखा हुआ नहीं है। वो तेरे अपने हाथों का लिखा हुआ है।"आर्यन का सीना जो गुस्से से तना हुआ था, अब सिकुड़ने लगा। उसका सिर शर्म से झुकने लगा।रिया ने उसकी आँखों में सीधा झांकते हुए आख़िरी और सबसे गहरी चोट की।"तुझे याद है आर्यन? दो साल पहले... जब तेरे पास पैसा था? अच्छी नौकरी थी? तब तूने क्या किया था? उन पैसों को झूठे दिखावे में उड़ाया, दोस्तों पर लुटाया, फुकरापंती की। क्या तब भगवान ने नीचे आकर तेरे कान में कहा था कि तू अपनी सारी सेविंग्स उस दिखावे में फूंक दे? नहीं ना! जब कामयाबी मिलती है तो इंसान अपना कॉलर खड़ा करके कहता है 'मेरी मेहनत, मेरा टैलेंट', और जब अपनी ही अकल के दिवालियेपन से सड़क पर आ जाता है, तो आसमान की तरफ देखकर कहता है 'भगवान की मर्ज़ी'। अपने निकम्मेपन और अपनी गलतियों का ठीकरा उस ऊपर वाले पर फोड़ना दुनिया का सबसे आसान काम है आर्यन। अब उस आसमान को गालियां देना बंद कर, और घर जाकर आईने में उस इंसान की शक्ल देख जो असल में तेरे इन इंसानी दुखों का असली ज़िम्मेदार है।"आर्यन के होंठ सिल चुके थे। उसके गले में एक भारी गोला सा अटक गया था। आसमान से गिरती बारिश की बूंदों के साथ अब उसके गालों पर पछतावे के गर्म आँसू बह रहे थे। उसे आज समझ आ गया था कि कुदरत की मार और किस्मत के दुख तो सबको मिलते हैं, पर उसने अब तक जो कुछ भी झेला है, वो किसी और की साज़िश नहीं, बल्कि उसके खुद के बोए हुए बबूल के कांटे थे।सुखविंदर की कलम से**विशेष संदेश:** हम इंसानों की फितरत भी कितनी दोगली और कमज़ोर है। हम उन दुखों के लिए उस परमात्मा को गालियां देते हैं, जो असल में हम इंसानों के ही अपने लालच और व्यवस्थाओं के बनाए हुए हैं। कागज़ का पैसा, रुतबा, झूठा दिखावा, कर्ज़... ये सब इंसानी दुनिया के जाल हैं, परमात्मा के नहीं। हाँ, यह सच है कि किस्मत में जो दुख लिखे हैं—जैसे जन्म, मरण या कोई कुदरती मार—वो तो इंसान पर आएंगे ही और उन्हें सहने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता। लेकिन अपनी खुद की बेवकूफियों, अपने लालच, और दिखावे से जो दुखों का भारी पहाड़ हम खुद अपने ही सिर पर गिरा लेते हैं, उसके लिए ऊपर वाले को कोसना हमारा सबसे बड़ा पाखंड है। अपनी गलतियों की ज़िम्मेदारी लेना सीखिए, क्योंकि हर बर्बादी किस्मत का खेल नहीं होती, कुछ बर्बादियां हमारे अपने ही हाथों का मुकम्मल इंतज़ाम होती हैं।