अपने कमरे में खिड़की के पास खड़ी थी।
बाहर हल्की बारिश हो रही थी… लेकिन उसके अंदर जैसे तूफान चल रहा था।
“रिश्ता…”
उसके कानों में बस यही शब्द गूंज रहा था।
पापा नीचे बैठकर बड़े उत्साह से लड़के वालों की बातें कर रहे थे। “सरकारी अफसर है… अच्छा परिवार है… और सबसे बड़ी बात, लड़के वालों ने खुद आर्या को पसंद किया है।”
मां भी खुश थीं।
लेकिन आर्या… उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसके दिल में इतनी बेचैनी क्यों हो रही है।
क्या सिर्फ इसलिए कि शादी की बात अचानक हो गई थी?
या फिर इसलिए… क्योंकि उसके दिल में कोई और जगह बना चुका था।
उसने आंखें बंद कीं।
और अगले ही पल… उसे वही गहरी आंखें याद आ गईं।
विक्रांत सिंह।
उसका दिल तेजी से धड़क उठा।
“नहीं… ऐसा नहीं हो सकता…” उसने खुद से कहा।
लेकिन दिल सच जान चुका था।
उधर…
विक्रांत अपने केबिन में अकेला बैठा था।
पूरी बिल्डिंग लगभग खाली हो चुकी थी। सिर्फ उसके केबिन की लाइट जल रही थी।
टेबल पर आर्या की इंटर्न प्रोफाइल खुली हुई थी।
उसकी छोटी-सी मुस्कुराती फोटो…
विक्रांत उसे बस देखे जा रहा था।
इतने सालों में पहली बार किसी इंसान ने उसके अंदर की खामोशी को महसूस किया था।
उसने धीरे से आंखें बंद कर लीं।
“तुम बहुत अकेले हैं ना…?”
आर्या की आवाज उसके कानों में गूंज गई।
वह हल्का सा मुस्कुराया… लेकिन अगले ही पल उसका चेहरा उतर गया।
“अगर उसे कोई और मिल गया तो…?”
उसके सीने में अचानक दर्द सा उठा।
तभी करण केबिन में आया।
“अब तक घर नहीं गया?”
विक्रांत चुप रहा।
करण उसकी हालत समझ चुका था।
वह सामने बैठ गया। “क्या हुआ?”
कुछ पल खामोशी रही।
फिर विक्रांत धीमे स्वर में बोला— “अगर वो किसी और की हो गई तो… शायद मैं दूसरी बार टूट जाऊंगा।”
करण उसे देखता रह गया।
उसने पहली बार विक्रांत की आवाज में डर महसूस किया था।
“तो बता दे उसे।”
विक्रांत हल्का सा हंसा।
“इतना आसान नहीं है करण।”
“क्यों?”
“क्योंकि मैं डरता हूं…”
“किससे?”
विक्रांत की आंखें अचानक दर्द से भर गईं।
“फिर से रिजेक्ट होने से।”
करण शांत हो गया।
वह जानता था… पहली शादी ने विक्रांत को अंदर तक तोड़ दिया था।
उसकी पत्नी ने सिर्फ इसलिए उसे छोड़ दिया था क्योंकि उस वक्त वह सफल नहीं था।
और अब… जब उसके पास सब कुछ था…
तब उसके अंदर प्यार जताने की हिम्मत नहीं बची थी।
अगले दिन…
आर्या ऑफिस पहुंची तो उसका मन बहुत बेचैन था।
वह काम पर ध्यान ही नहीं दे पा रही थी।
कभी फाइल गलत रख देती… कभी मेल अधूरा भेज देती।
नेहा ने उसे गौर से देखा। “क्या हुआ?”
“कुछ नहीं…”
“झूठ।”
आर्या ने नजरें झुका लीं।
“घर पर मेरी शादी की बात चल रही है।”
नेहा उत्साहित हो गई। “अरे वाह!”
लेकिन आर्या के चेहरे पर खुशी नहीं थी।
नेहा अचानक गंभीर हो गई।
“तुझे लड़का पसंद नहीं?”
आर्या कुछ पल चुप रही।
फिर बहुत धीरे से बोली— “मुझे नहीं पता…”
लेकिन वह जानती थी।
उसे कोई और पसंद आने लगा था।
उसी वक्त…
कॉरिडोर से गुजरते हुए विक्रांत की नजर आर्या पर पड़ी।
आज उसके चेहरे पर वो चमक नहीं थी।
वह तुरंत समझ गया कि कुछ गलत है।
“मिस आर्या… मेरे केबिन में आइए।”
आर्या धीरे से उसके पीछे चल दी।
केबिन में पहुंचते ही विक्रांत ने दरवाजा बंद किया।
“क्या हुआ?”
“कुछ नहीं सर।”
“तुम झूठ बोल रही हो।”
उसकी आवाज में चिंता साफ थी।
आर्या ने पहली बार उसकी आंखों में इतनी बेचैनी देखी।
और ना जाने क्यों… उसकी आंखें भर आईं।
“घर पर मेरी शादी की बात चल रही है…”
विक्रांत जैसे पत्थर का हो गया।
कुछ पल तक वह बस उसे देखता रह गया।
दिल के अंदर जैसे किसी ने सब कुछ तोड़ दिया हो।
लेकिन चेहरे पर उसने कुछ नहीं आने दिया।
“अ… अच्छा लड़का है?”
आर्या ने उसकी तरफ देखा।
ना जाने क्यों… उस सवाल में उसे दर्द महसूस हुआ।
“पता नहीं।”
“मतलब?”
“मैंने देखा नहीं अभी तक।”
विक्रांत ने नजरें फेर लीं।
उसकी मुट्ठियां कस चुकी थीं।
दिल चीख-चीख कर कह रहा था— “मत जाओ…”
लेकिन जुबान खामोश थी।
फिर उसने खुद को संभालते हुए कहा— “तुम्हें जो सही लगे वही करना।”
आर्या चौंक गई।
उसे ना जाने क्यों उम्मीद थी… कि शायद विक्रांत कुछ और कहेगा।
कुछ ऐसा… जो उसके दिल की उलझन खत्म कर दे।
लेकिन उसने सिर्फ औपचारिक जवाब दिया।
उसका दिल हल्का सा टूट गया।
“जी सर…”
वह बाहर चली गई।
और उसके जाते ही…
विक्रांत ने गुस्से में टेबल पर रखा ग्लास फेंक दिया।
कांच टूटकर बिखर गया।
उसकी सांसें भारी हो चुकी थीं।
“मैं क्यों नहीं रोक पा रहा उसे…?”
उसने दोनों हाथों से अपना चेहरा पकड़ लिया।
पहली बार… इतना ताकतवर इंसान खुद को बेहद कमजोर महसूस कर रहा था।
शाम को…
आर्या घर पहुंची तो रिश्ते वाले आए हुए थे।
लड़के का नाम आदित्य था।
अच्छा दिखने वाला… सभ्य… और सरकारी अफसर।
सब लोग खुश थे।
लेकिन आर्या…
वह बस चुप बैठी थी।
आदित्य ने मुस्कुराकर पूछा— “आपको नौकरी करना पसंद है?”
“जी।”
“शादी के बाद भी कर सकती हैं।”
“जी…”
उसके जवाब छोटे होते जा रहे थे।
तभी आदित्य ने कहा— “वैसे आप बहुत शांत रहती हैं।”
आर्या हल्का मुस्कुराई।
लेकिन उसी पल… उसे याद आया कि विक्रांत हमेशा कहता था—
“तुम्हारी आंखें बहुत कुछ बोलती हैं।”
उसका दिल फिर धड़क उठा।
रात को…
मां उसके कमरे में आईं।
“बेटा, लड़का अच्छा है। हमें रिश्ता पसंद है।”
आर्या चुप रही।
“तू खुश नहीं है?”
उसकी आंखें भर आईं।
“मां… अगर दिल किसी और को पसंद करने लगे तो?”
मां चौंक गईं।
“कोई है?”
आर्या ने धीरे से आंखें झुका लीं।
मां सब समझ गईं।
“कौन है वो?”
कुछ पल चुप रहने के बाद…
आर्या की जुबान पर वही नाम आया—
“विक्रांत सर…”
मां हैरान रह गईं।
“तुम्हारे बॉस?”
आर्या ने धीरे से सिर हिला दिया।
“लेकिन बेटा… वो तुमसे बहुत बड़े हैं ना?”
यही बात आर्या के दिल में भी डर बनकर बैठी थी।
उसकी आंखों से आंसू निकल आए।
“मुझे पता है मां… इसलिए मैं खुद को समझाने की कोशिश कर रही हूं…”
मां उसके पास बैठ गईं।
“और वो? क्या वो भी तुमसे प्यार करते हैं?”
आर्या चुप हो गई।
उसे नहीं पता था।
विक्रांत कभी खुलकर कुछ कहता ही नहीं था।
उधर…
विक्रांत रात को शराब का ग्लास हाथ में लिए बालकनी में खड़ा था।
बारिश फिर शुरू हो चुकी थी।
उसे हर बूंद के साथ डर बढ़ता महसूस हो रहा था।
तभी करण का फोन आया।
“कहां है?”
“घर पर।”
“और शराब पी रहा है?”
विक्रांत हल्का हंसा। “तुझे कैसे पता?”
“क्योंकि तू तभी पीता है जब अंदर से टूट रहा होता है।”
कुछ पल खामोशी रही।
फिर करण बोला— “तू उससे प्यार करता है ना?”
विक्रांत ने आंखें बंद कर लीं।
“बहुत।”
“तो बता क्यों नहीं देता?”
“अगर उसने मना कर दिया तो?”
करण की आवाज गंभीर हो गई।
“और अगर तूने कहा ही नहीं… तो जिंदगी भर पछताएगा।”
फोन कट गया।
विक्रांत काफी देर तक वहीं खड़ा रहा।
फिर अचानक उसने कार की चाबी उठाई।
उधर…
आर्या अपने कमरे में बैठी रो रही थी।
तभी बाहर कार रुकने की आवाज आई।
उसने खिड़की से देखा…
और उसका दिल रुक गया।
विक्रांत।
वह तुरंत नीचे भागी।
दरवाजा खुलते ही दोनों आमने-सामने थे।
बारिश में भीगा हुआ विक्रांत…
और हैरान खड़ी आर्या।
“सर… आप यहां?”
विक्रांत कुछ पल बस उसे देखता रहा।
फिर धीमे लेकिन भारी स्वर में बोला—
“मुझे तुमसे बात करनी है।”
आर्या का दिल तेजी से धड़कने लगा।
दोनों बाहर बरामदे में आ गए।
बारिश की बूंदें सामने गिर रही थीं।
विक्रांत की आंखें लाल थीं… जैसे वह बहुत देर से खुद से लड़ रहा हो।
“अगर आज नहीं कहा… तो शायद कभी नहीं कह पाऊंगा।”
आर्या की सांसें अटक गईं।
विक्रांत उसके करीब आया।
“मैं जानता हूं मैं तुमसे उम्र में बहुत बड़ा हूं…”
“जानता हूं दुनिया हमारे रिश्ते पर सवाल उठाएगी…”
“जानता हूं शायद मैं तुम्हारे लायक भी ना लगूं…”
उसकी आवाज भर्रा गई।
“लेकिन मैं हार गया आर्या…”
आर्या की आंखों में आंसू आ गए।
“मैं तुमसे प्यार करने लगा हूं।”
उस पल… जैसे समय रुक गया।
सिर्फ बारिश की आवाज थी…
और दो धड़कते हुए दिल।
विक्रांत ने नजरें झुका लीं।
“अगर तुम ना कहोगी… तो मैं कभी तुम्हें परेशान नहीं करूंगा।”
“बस एक बार सच जानना चाहता था…”
आर्या उसे देखती रह गई।
इतना मजबूत इंसान…
आज उसके सामने कितना टूटा हुआ लग रहा था।
और उसी पल… उसे समझ आया…
वह भी उससे उतना ही प्यार करती है।
उसने धीरे से पूछा— “आपको इतना डर क्यों लगता है?”
विक्रांत हल्का सा हंसा… लेकिन उसकी आंखें नम थीं।
“क्योंकि एक बार मैं खुद को किसी के सामने छोटा महसूस कर चुका हूं।”
आर्या का दिल भर आया।
वह धीरे से उसके पास आई।
और पहली बार…
उसने विक्रांत का हाथ पकड़ लिया।
विक्रांत चौंक गया।
“हर इंसान एक जैसा नहीं होता सर…”
उसकी आवाज कांप रही थी।
“और… मुझे आपकी उम्र से फर्क नहीं पड़ता।”
विक्रांत जैसे उसकी बात पर यकीन ही नहीं कर पा रहा था।
“आर्या…”
आर्या की आंखों से आंसू निकल पड़े।
“मुझे नहीं पता ये कब हुआ… लेकिन जब भी आप उदास होते हैं… मुझे दर्द होता है।”
“जब आप मुस्कुराते हैं… मुझे अच्छा लगता है।”
“और जब घर पर मेरी शादी की बात हुई… तब पहली बार मुझे डर लगा…”
विक्रांत की आंखें भर आईं।
इतने सालों बाद… किसी ने उसे इस तरह अपनाया था।
उसने धीरे से आर्या का चेहरा अपने हाथों में लिया।
“तुम्हें अंदाजा भी नहीं है… तुमने मुझे कितना बदल दिया है।”
दोनों बस एक-दूसरे को देखते रहे।
लेकिन उनकी खुशी ज्यादा देर टिक नहीं पाई।
क्योंकि उसी वक्त…
दरवाजे पर खड़े आर्या के पापा ने सब सुन लिया था।
उनके चेहरे पर गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था।
“आर्या!”
दोनों चौंक गए।
आर्या तुरंत पीछे हट गई।
“पापा…”
उन्होंने गुस्से से विक्रांत की तरफ देखा।
“आपकी हिम्मत कैसे हुई मेरी बेटी के करीब आने की?”
“पापा प्लीज—”
“चुप!”
विक्रांत शांत खड़ा था।
“मैं आपकी बेटी से प्यार करता हूं।”
“प्यार?” उनके पापा हंसे। “आपकी उम्र क्या है और मेरी बेटी की उम्र क्या है!”
“दुनिया हंसेगी हम पर!”
आर्या रो पड़ी। “पापा प्लीज…”
लेकिन उनके पापा बहुत गुस्से में थे।
“आज के बाद तुम इस आदमी से नहीं मिलोगी।”
विक्रांत की आंखों में दर्द उतर आया।
वह जानता था… तूफान शुरू हो चुका है।
उसने आखिरी बार आर्या को देखा।
उसकी आंखों में डर था… आंसू थे… और प्यार भी।
विक्रांत ने खुद को संभाला।
फिर धीरे से बोला— “मैं आर्या पर कोई दबाव नहीं डालूंगा।”
“फैसला हमेशा उसका होगा।”
इतना कहकर वह वहां से चला गया।
आर्या बस उसे जाते हुए देखती रह गई।
और उस रात…
पहली बार दोनों को एहसास हुआ—
प्यार करना आसान है…
लेकिन उसे दुनिया के सामने निभाना… सबसे मुश्किल।