माॉतक की बात सुनकर वेटर गुस्सा से कहता है :
"लगता है तुम ऐसे नही मानोगे रुको तुम ।"
इतना बोलकर वो वेटर जौर जौर से हल्ला करने लगता है जिसे सुनकर सभी का ध्यान उनपर जाता है।तभी वहां पर होटल के सभी स्टाफ और मालिक भी आ जाता है।
होटल के मालिक आकर वेटर से पूछता है:
"क्या बात है ऐसे सौर क्यो मचा रहे हो।"
वेटर सारी बात होटल के मालिक को बोल कर सुनाता है जिसे सुनकर होटल के मालिक गुस्से से मांतक से कहता है:
" क्या बात है भई खाना खा के पैसा क्यो नही दे रहे हो...? कितनी बिल हुआ इसका गोपु ..? "
होटल का मालिक वेटर गोपु से पूछता है:
" 16250 !"
वेटर होटल मालिक से कहता है। होटल के मालिक ये सुनकर हैरानी से कहता है:
" क्या....? 16250 ...! और इन्होने कितना बिल दिया है?"
वेटर कहता है:
" एक पैसा भी नही दिया है सर और उपर से कहता है के ये पैसा क्या वस्तु है और अजिब सा भाषा बोल रहे है जैसे ये किसी पुराने जमाने के हो..! "
होटल का मालिक ये सब सुनकर मांतक से कहता है :
" ये क्या मजाक है भाई । जब खाना खाये हो तो पैसा क्यो नही देते ..? "
मांतक फिर नम्रता से कहता है।
:
" मैं सत्य कह रहा हूँ मानव ....! मुझे वास्तव मे नही ज्ञान है के ये पैसा कौन सी वस्तु है।"
"मेरा विश्वास करो अगर मेरे पास ऐसे कोई वस्तु होती तो मैं अवश्य ही तुम्हें दे देता ।"
मातंक की बात सुनकर होटल मालिक भी गुस्से से लाल हो जाता है और फिर मांतक के उपर चिल्लाते हुए कहता है:
" ये बकवास लगा रखा है तुममे तबसे ! पैसा क्या वस्तु नही पता ना तुम्हें तो फिर भिखारी के तरह खाने क्यो चले आए।"
" खाना क्या वस्तु है पता है पर पैसा नही पता वाह रे नौटंकी बाज चुप चाप या तो पैसे निकालो या एक दौ हफ्ते तक सारी प्लेटो को साफ करो । "
" सुनो इसे जाने मत देना दौनो को पकड़ कर रखो और अगर पैसा देता है तो ठिक है वरना दोनो से सबकी प्लेट उठवाओ टेबल साफ कराओ और सारी प्लेटो और होटल तो साफ कराओ।"
होटल का मालिक गुस्से से और मांतक को धक्का दैकर कहता है :
चल बे नौटंकी क्या करना है बोल पैसा देता है या दौ हफ्ते तक यही काम करना है। मांतक को धक्का लगने और इस तरह से होटल मालिक के बरताव से मातंक और त्रिजला दौनो ही गुस्से लाल हो जाता है। दोनो की ही आंखे गुस्से से लाल हो जाता है।
मांतक गरजते हुए कहता है:
" हे मानव अपनी सिमा को लांघ कर तुमने अपनी मृत्यु को आमंत्रीत किया है । मैं तबसे इसिलिए शांत था क्योकी तुमने हमे भोजन कराया जिससे मेरा मन बहोत प्रसन्न हो गया परतुं दुसरे ही क्षण तुमने अपनी मर्यादा को भंग भी किया।"
" हे मानव मुर्खता ना करो और हमे शांति से जाने दो ये अंतीम अवसर दे रहा हूँ मैं तुम्हें मेरे क्रोध को ना ललकारे अन्यथा अनर्थ हो जाएगा।"
माॉतक की बात और उसकी गर्जना सुनकर सभी डर जाता है एक वेटर अपने मालिक के कान मे धिरे से कहता है:
" मालिक कही ये कोई असुर तो नही आ गया यहां इसकी बात सुनकर तो यही लगता है जैसे ये कोई विर योध्दा हो।"
" और हमारे सामने कोई धारमिक धारावाहिक चालु हो गया हो। "
होटल मालिक वेटर को धमकाते हुए कहता है :
चुप रहो तुम अपना बकवास बंद करो और इन दौनो को पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दो । "
होटल मालिक मांतक की और दैखकर कहता है:
" बहोत हो गया तेरा नौटंकी अब तु जेल जा और वहां पर जाकर अपना ये फालतु का बकवास करना। "
एकांश और वर्शाली दोनो ही ये सब दैख रहा था । मांतक और होटल के सभी से काफी दैर तक बहस चलता रहता है पर बात जब पुलिस तक पहूँच जाती है तब एकांश वर्शाली से कहता है:
" वर्शाली इसकी भाषा भी बिल्कुल तुम्हारी जैसी ही है। क्या तुम इन्हे पहचानती हो ..? "
वर्शाली उन दोनो को गौर से दैखती है और फिर कहती है :
" नही एकांश जी मैं इन्हें नही जानती ।"
एकांश कहता है:
" पर इसकी भाषा और जिस तरह से बोल रहा है के इसे ये नही पता के पैसा क्या है मुझे तो ये तुम्हारे ही लोक से आए हुए कोई लग रहा है। बेचारे को यहां के बारे नही पता के यहां खाने के बाद पैसा देना पड़ता है। हमे इनकी मदत करनी चाहिए ।"
इतना बोलकर एकांश उठकर जाने की कोशिश करता है के वर्शाली एकांश को रोकती हूई कहती है:
" रुकिये एकांश जी.....! मैं बोल रही हूँ ना के ये हमारे लोक के नही है । क्योकी अगर ये वास्तव मे परी लोक के होते तो मांस कभी नही खाते । मुझे ऐसा प्रतित होता है के ये अवश्य ही कोई देत्य है जो यहां पर आए है क्योकी आपको पता है ना के कुंम्भन यही इसी लोक पर है ।"
एकांश कहता है:
" पर वर्शाली वो जंगल के अंदर कैद है ना?"
एकांश की बात सुनकर वर्शाली कहती है:
" हां परतुं ये भी हो सकता है के ये कुंम्भन को बंधन ये मुक्त करने रो लिए आए हो ...! "
वर्शाली की बात को सुनकर एकांश कहता है:
" हां तुम ठिक कह रही हो वर्शाली ये हो सकता है। पर अभी ये दौनो बेचारे मुश्किल मे है ये हमारे लोक को नियम को नही जानते है। अगर वो देत्य ही है तो पर भी ये अभी तक शांत है और होटल मालिक को अच्छे से समझा रहे है पर अगर ये गुस्से मे कुछ कर बैठे तो इन सब बेचारे की जान आफत मे आ जाएगी।"
" और अगर ये देत्य है भी तो पर भी इन्होने शांत रहकर अपने अच्छे होने का परिचय दिया है वर्शाली हमे इनकी मदत करनी चाहिए ।"
इतना बोलकर एकांश और वर्शाली दौनो ही उठकर वहां सो उन सब के पास जाता है और होटल के मालिक से कहता है:
" क्या बात है आप इन्हे ऐसे धक्का क्यो रहे हो?"
होटल मालिक एकांश से कहता है:
" क्यों आप इन्हें जानते हो..? "
एकांश कहता है:
" नही मैं इन्हें नही जानता पर मैं ये पूछ तो सकता हूँ के इनका दोष क्या है।"
होटल मालिक कहता है:
" इन्होने खाना खा के उसका पैसा देने से इनकार कर रहा है।"
एकांश बड़े प्यार से मांतक से कहता है:
" क्या बात है अंकल आप लोग इन्हे पैसा क्यों नही दे देते ..? "
एकांश के पूछने पर मांतक कहता है:
" हे भले मानव मुझे ये ज्ञात नही है के पैसा किस वस्तु को कहते है। मैं सत्य कह रहा हूँ मेरा विश्वास करो।"
एकांश मांतक की बात का जवाब देते हूए कहता है:
" मैं आपकी बात को समझ रहा हूँ ।"
तभी एकांश अपने जैब से कुछ नोट निकलता है और उसे मांतक को दिखाकर कर कहता है:
" ये दैखीए इसे पैसा कहते है। यहां पर कुछ भी खाने या खरीदने पर ये देना पड़ता है वो क्या कहते है ....! हां मुल्य चुकाना पड़ता है ।"
एकांश की बात को मांतक ठीक से समझ जाता है और कहता है:
" हे मानव तुमने कितनी सरलता से और प्रेम से हमे ये बात समझा दी परतुं इस दुष्ट मानव को तो बात करने का तरिका भी नही पता । "
मांतक होटल मालिक की और दैखकर कहता है:
"त्रिजला एकांश से कहता है:
" हे भले मानुष जो पैसा तुमने अभी हमे दिखाया वो तो हमारे पास नही है। परतुं हम इन्हे कुछ और मुल्य दे सकते है।"
त्रिजला अपमी मुठ्टी बंद करती है और पिछे से लाकर अपनी हथेली खोलती है तो उसमे कुछ सोने की सिक्के आ जाते है। त्रिजला अपनी हाथ को आगे बड़ा तो हुए कहती है:
" इनमे से जितनी चाहिए ले लो।"
होटल मालिक और बाकी स्टाफ सोने की सिक्के को दैखकर हैरान हो जाता है। होटल मालिक मन ही मन सोचता है:
" ये कितना बेवकुफ है इतने सारे सिक्को को ऐसे ही दे रहा है आज ये सारी सिक्के ले लेता हूँ तो मैं बहुत बड़ा आदमी बन जाऊगां एक सिक्के का वेल्यु कम से कम 10 लाख तो होगी ही।"
त्रिजला हाथ मे रखे सोने के सिक्को को दैखकर होटल मालिक के मन मे लालच जाग जाता है जिसे एकांश भांप लेता है। होटल मालिक जैसे ही सारी सिक्को को लेने के लिए अपनी हाथ को बड़ाता है के एकांश होटल मालिक के हाथ को पकड़कर रौक देता है और त्रिजला से कहता है:
" रुकीए ये क्या कर रही हो आप ...? आप जानती हो ना के ये सिक्के सोने के है और एक सिक्के का दाम कमसे कम 8 से 10 लाख की है आपको इतना महगां चिज देने की कोई जरुरत नही ।"
होटल मालिक एकांश के उपर चिड़कर कर कहता है:
" जब वो ये सब मुझे दे रहे है तो तुम्हें क्या प्रॉब्लेम हो रही है ये उनके सिक्के है और ये उनकी मर्जी के ये सिक्के वो किन्हे दे और वैसे भी इन्होनें यहां पर खाना खाया है जिसका भुगतान वे कर रहे है।"
एकांश भी झट से होटल मालिक को जवाब देकर कहता है:
" हां मुझे प्रॉब्लेम है । क्योकी आप ऐसे किसी सिधे साधे को इस तरह से ठग नही सकते हो । कितना बिल हुआ है इनका ...?"
होटल मालिक कहता है:
" तुमसे मतलब ....! तुम अपने काम से काम रखो और जाओ यहां से वरना अच्छा नही होगा ।"
होटल मालिक के इस तरह से कहने पर एकांश को गुस्सा आ जाता है एकांश गुस्से से होटल मालिक से कहता है:
" वरना क्या ...! क्या कर लोगे ।"
To be continue......1415