city lights in Hindi Motivational Stories by Vijay Erry books and stories PDF | शहर की रोशनी

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शहर की रोशनी

शहर की रोशनी(भावनात्मक हिंदी कहानी)लेखक: विजय शर्मा ऐरीशहर की चमचमाती रोशनियाँ दूर से किसी सपनों की दुनिया जैसी लगती हैं। गाँव के कच्चे रास्तों पर चलने वाले लोगों को लगता है कि शहर में कदम रखते ही जिंदगी बदल जाती होगी। लेकिन हर रोशनी के पीछे कुछ अंधेरे भी छिपे होते हैं, जिन्हें हर कोई नहीं देख पाता।पंजाब के एक छोटे से गाँव में रहने वाला राहुल भी ऐसा ही सपना देखता था। उसके पिता किसान थे और माँ गृहिणी। परिवार की आर्थिक हालत बहुत अच्छी नहीं थी, लेकिन फिर भी माता-पिता ने उसे पढ़ाया-लिखाया।एक दिन राहुल ने अपने पिता से कहा, "पिताजी, मैं शहर जाकर नौकरी करना चाहता हूँ।"पिता ने गहरी साँस ली।"बेटा, शहर की रोशनी दूर से बहुत अच्छी लगती है, लेकिन वहाँ बहुत संघर्ष भी है।"राहुल मुस्कुराया।"संघर्ष से डरूँगा नहीं, पिताजी। मैं आपकी और माँ की जिंदगी बदल दूँगा।"माँ की आँखें भर आईं।"बस अपना ख्याल रखना बेटा।"कुछ दिनों बाद राहुल अपना छोटा सा बैग लेकर शहर के लिए रवाना हो गया।शहर पहुँचते ही उसकी आँखें चौंधिया गईं।ऊँची-ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कें, बड़े-बड़े मॉल और रात में जगमगाती रोशनियाँ।उसे लगा जैसे वह किसी फिल्म की दुनिया में आ गया हो।लेकिन असली कहानी अगले ही दिन शुरू हुई।राहुल नौकरी की तलाश में पूरे शहर में घूमता रहा।एक जगह गया तो अनुभव माँगा गया।दूसरी जगह गया तो सिफारिश।तीसरी जगह गया तो रिश्वत।दिन बीतते गए।उसकी जेब में रखे पैसे कम होते गए।एक रात वह बस अड्डे की बेंच पर बैठा था।चारों तरफ शहर की रंगीन रोशनियाँ थीं लेकिन उसके दिल में अंधेरा था।तभी उसके पास एक बूढ़ा आदमी आया।"बेटा, परेशान लग रहे हो?"राहुल ने सारी बात बता दी।बूढ़ा मुस्कुराया।"शहर की रोशनी सबको आकर्षित करती है, लेकिन यहाँ टिकता वही है जो अंधेरे से लड़ना जानता है।"राहुल ने पूछा, "आप कौन हैं?""मुझे लोग बाबा जी कहते हैं।"उन्होंने राहुल को अपने छोटे से ढाबे पर काम करने का प्रस्ताव दिया।राहुल ने तुरंत हाँ कर दी।अब राहुल दिन में ढाबे पर काम करता और रात को नौकरी की तलाश करता।ढाबे पर काम करते हुए उसने कई तरह के लोगों को देखा।कुछ बहुत अमीर थे।कुछ गरीब।कुछ खुश दिखाई देते थे।कुछ रोते हुए खाना खाते थे।उसे समझ आने लगा कि पैसे से सब कुछ नहीं मिलता।एक दिन ढाबे पर एक बड़ी कंपनी का मालिक आया।उसका नाम अरविंद मेहरा था।राहुल ने बहुत ईमानदारी से उसकी सेवा की।खाना खाते समय अरविंद की फाइल नीचे गिर गई।उसमें कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज थे।राहुल ने तुरंत उन्हें उठाकर लौटा दिया।अरविंद प्रभावित हुआ।"आजकल इतनी ईमानदारी कम देखने को मिलती है।"राहुल मुस्कुराया।"गरीब आदमी के पास ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूँजी होती है सर।"यह बात अरविंद के दिल को छू गई।अगले दिन अरविंद ने राहुल को अपनी कंपनी बुलाया।उसने राहुल का इंटरव्यू लिया।"तुम्हारे पास अनुभव नहीं है, लेकिन तुम्हारे पास चरित्र है।"कुछ देर बाद उसने राहुल को नौकरी दे दी।राहुल की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।उसने सबसे पहले अपने माता-पिता को फोन किया।"माँ, मुझे नौकरी मिल गई!"उधर से माँ की रोती हुई आवाज आई।"भगवान तेरा भला करे बेटा।"पिता भी खुश थे।उस रात राहुल ने आसमान की ओर देखा।शहर की रोशनियाँ पहले जैसी ही थीं, लेकिन अब उसे वे अलग लग रही थीं।समय बीतता गया।राहुल मेहनत करता रहा।उसकी लगन और ईमानदारी ने उसे जल्दी ही कंपनी का महत्वपूर्ण कर्मचारी बना दिया।एक दिन कंपनी में एक बड़ा घोटाला सामने आया।कुछ लोग कंपनी के पैसे चुरा रहे थे।राहुल को इस बात का पता चल गया।उसके सामने दो रास्ते थे।चुप रहकर फायदा उठाना।या सच बोलकर खतरा मोल लेना।उसने दूसरा रास्ता चुना।उसने सारे सबूत अरविंद मेहरा को दे दिए।जाँच हुई।दोषी लोग पकड़े गए।लेकिन उनमें से एक व्यक्ति बहुत प्रभावशाली था।उसने राहुल को धमकी दी।"अगर ज्यादा ईमानदार बनने की कोशिश की तो पछताओगे।"राहुल डर गया, लेकिन पीछे नहीं हटा।उसे अपने पिता की बात याद आई।"सच्चाई का रास्ता कठिन होता है, लेकिन मंजिल सबसे सुंदर होती है।"कुछ महीनों बाद राहुल को प्रमोशन मिला।अब उसकी तनख्वाह भी अच्छी हो गई थी।उसने अपने गाँव में नया घर बनवाया।माता-पिता को शहर घुमाने लाया।रात को वह उन्हें शहर की सबसे ऊँची इमारत के पास ले गया।पूरा शहर रोशनी से जगमगा रहा था।माँ ने आश्चर्य से पूछा,"बेटा, क्या यही वो शहर की रोशनी है जिसके बारे में लोग बातें करते हैं?"राहुल मुस्कुराया।"हाँ माँ, लेकिन अब मुझे पता है कि असली रोशनी इन बल्बों में नहीं है।""फिर कहाँ है?" पिता ने पूछा।राहुल ने उनका हाथ पकड़ लिया।"असली रोशनी इंसान की मेहनत, ईमानदारी और अच्छे कर्मों में होती है।"पिता की आँखें भर आईं।उसी समय राहुल की नजर सड़क किनारे बैठे एक छोटे बच्चे पर पड़ी।वह फटे कपड़ों में था और भूखा लग रहा था।राहुल तुरंत उसके पास गया।"बेटा, खाना खाया?"बच्चे ने सिर हिला दिया।राहुल उसे पास के रेस्तराँ में ले गया और भरपेट खाना खिलाया।बच्चे की आँखों में चमक आ गई।राहुल को अपना संघर्ष याद आ गया।जब वह पहली बार शहर आया था और भूखा घूमता था।उसने उसी समय फैसला किया कि वह जरूरतमंद बच्चों की मदद करेगा।धीरे-धीरे राहुल ने एक संस्था शुरू की।वह गरीब बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने लगा।कई बच्चे स्कूल जाने लगे।कई युवाओं को नौकरी मिली।लोग उसे सम्मान की नजर से देखने लगे।एक दिन वही बूढ़े बाबा जी उससे मिलने आए।राहुल उनके चरणों में झुक गया।"अगर उस दिन आपने मदद न की होती तो मैं शायद हार मान लेता।"बाबा जी मुस्कुराए।"मैंने सिर्फ रास्ता दिखाया था बेटा, चलना तुम्हें खुद पड़ा।"राहुल की आँखें नम हो गईं।उस रात राहुल अपनी इमारत की छत पर खड़ा पूरे शहर को देख रहा था।हजारों रोशनियाँ चमक रही थीं।लेकिन अब उसे हर रोशनी के पीछे छिपा संघर्ष दिखाई दे रहा था।किसी ने गरीबी से लड़कर सफलता पाई थी।किसी ने अपनों को खोकर मंजिल हासिल की थी।किसी ने रातों की नींद त्यागकर अपने सपने पूरे किए थे।उसे एहसास हुआ कि शहर की असली रोशनी बिजली से नहीं जलती।वह जलती है इंसान के हौसले से।उसकी मेहनत से।उसके संघर्ष से।और उसके अच्छे कर्मों से।राहुल मुस्कुराया और आसमान की ओर देखा।मानो सितारे भी उससे कह रहे हों—"जो अंधेरे से डरते नहीं, वही रोशनी तक पहुँचते हैं।"शहर की रोशनियाँ आज भी चमक रही थीं, लेकिन राहुल जान चुका था कि दुनिया की सबसे बड़ी रोशनी बाहर नहीं, इंसान के भीतर होती है।समाप्त।लेखक: विजय शर्मा ऐरी