रात के गहरे सन्नाटे को चीरती हुई तेज़ बारिश की गुर्राहट पूरे माहौल पर हावी थी।
आसमान मानो अपना सारा दर्द ज़मीन पर उंडेल देने की ज़िद पर अड़ा हुआ था। मूसलाधार बारिश लगातार बरस रही थी, और उसकी अनगिनत बूंदें घर की खिड़कियों से टकराकर एक बेचैन कर देने वाली धुन बना रही थीं।
बाहर हवाएँ बेकाबू होकर चीख रही थीं, लेकिन उनसे कहीं ज़्यादा भयंकर तूफ़ान उस घर के अंदर, उस बंद कमरे में उठ रहा था।
ऐसा तूफ़ान जो दीवारों को नहीं, किसी के दिल को तोड़ रहा था... किसी की उम्मीदों को चकनाचूर कर रहा था।
कमरे में फैला भारी सन्नाटा हर बीतते पल के साथ और बोझिल होता जा रहा था। हवा में तनाव इतना घुल चुका था कि मानो साँस लेना भी मुश्किल हो।
अगले ही पल उस खामोशी को चीरती हुई एक भारी, मर्दाना आवाज़ पूरे कमरे में गूँज उठी
"तुम जैसी लड़की... मेरी लाइफ का हिस्सा बन भी कैसे गई? तुम मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी मजबूरी हो!"
आरव की आवाज़ गुस्से से काँप उठी। उसकी आँखों में धधकती आग थी और हर शब्द ज़हर में डूबा हुआ था।
उसके सामने खड़ी लड़की उस वक्त सहमी हुई नज़र आ रही थी।
तन्वी...
इक्कीस साल की एक बेहद मासूम और खूबसूरत लड़की।
उसका गोल, कोमल चेहरा इस समय दर्द और भय से लाल पड़ चुका था। बड़ी-बड़ी नम आँखें लगातार आँसू बहा रही थीं, जो उसके गुलाबी गालों पर मोतियों की तरह लुढ़कते चले जा रहे थे।
उसके लंबे, रेशमी बाल बिखरकर चेहरे के आसपास फैल गए थे, मानो उसकी बिखरी हुई भावनाओं का आईना हों।
काँपते हुए हाथ उसकी चुन्नी को कसकर पकड़े हुए थे, जबकि उसका पूरा शरीर डर से हल्का-हल्का थरथरा रहा था।
लेकिन इन सबके बावजूद...
उसने अपना सिर झुकाए रखा।
उसने आरव की ओर देखने की भी हिम्मत नहीं की।
तन्वी बस चुप थी।
बेहद चुप।
जैसे उसके भीतर उठता शोर उसकी आवाज़ छीन चुका हो।
उसका दिल बेकाबू होकर सीने में धड़क रहा था।
हर धड़कन उसे अंदर तक डरा रही थी।
उसके काँपते होंठ कई बार खुले, जैसे वो कुछ कहना चाहती हो... अपना पक्ष रखना चाहती हो..
लेकिन कोई शब्द बाहर नहीं निकल पाया।
वह बस खड़ी रही...
सिर झुकाए...
आँखों से बहते आँसुओं के साथ आरव के हर जहरीले शब्द को सहती हुई।
तभी एक बार फिर आरव की गुस्से से भरी आवाज़ कमरे में गूँज उठी-
"तुम मेरी ज़िंदगी में ज़बरदस्ती आई हो... एक मजबूरी बनकर, एक गलती बनकर! ना मैं तुमसे प्यार करता हूँ, और ना ही कभी करूँगा। तुम सिर्फ एक सिम्पैथी केस हो... एक गलती, एक जबरदस्ती का रिश्ता... और एक बोझ हो तुम!"
आरव की आवाज़ कमरे की दीवारों से टकराकर गूँज उठी।
उसके मुँह से निकला हर शब्द किसी नुकीले नश्तर की तरह तन्वी के दिल को चीरता चला जा रहा था।
ऐसा लग रहा था मानो वह सिर्फ शब्द नहीं बोल रहा था, बल्कि उसके आत्मसम्मान, उसकी उम्मीदों और उसके टूटते हुए दिल पर एक-एक वार कर रहा हो।
तन्वी की उँगलियाँ अनजाने में और कस गईं।
उसकी पलकों से आँसू लगातार बह रहे थे,
लेकिन उसने उन्हें पोंछने की कोशिश तक नहीं की।
शायद इसलिए क्योंकि कुछ दर्द आँसुओं से नहीं धुलते...
और आज वह उसी दर्द के बीच खड़ी थी।
लेकिन आरव का गुस्सा अभी शांत नहीं हुआ था।
उसकी साँसें तेज़ी से चल रही थीं, जबड़े भींचे हुए थे और आँखों में भरा हुआ आक्रोश किसी ज्वालामुखी की तरह फूटने को तैयार था।
"एक दिन मैं तुमसे छुटकारा पा लूँगा...! तुम जैसे लोग सिर्फ भुला देने के लायक होते हैं, अपनाने के नहीं!"
आरव के आख़िरी शब्द लगभग दहाड़ की तरह कमरे में गूँजे।
और अगले ही पल...
आरव ने झटके से पास रखी टेबल पर हाथ मारा।
टेबल हल्का-सा हिल गई और उस पर रखा काँच का वास उसकी मुट्ठी में आ गया।
तन्वी की साँस जैसे वहीं अटक गई।
इससे पहले कि वह कुछ समझ पाती-
धड़ाम...!!!
आरव ने उसे पूरी ताकत से फेंका, वास सामने दीवार पर लगे फोटो फ्रेम से जा टकराया।
और काँच के टूटने की तीखी आवाज़ पूरे कमरे में गूँज उठी।
फोटो फ्रेम चकनाचूर होकर ज़मीन पर बिखर गया।
अनगिनत काँच के टुकड़े फर्श पर फैल गए, जिन पर कमरे की हल्की रोशनी पड़कर अजीब-सी चमक पैदा कर रही थी।
एक पल पहले तक गूँजती हुई आवाज़ें अचानक थम गईं।
कमरे में फिर से सन्नाटा छा गया...
ऐसा सन्नाटा जो कानों में शोर की तरह चुभ रहा था।
सिर्फ तन्वी की काँपती साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
डर के मारे उसका पूरा शरीर सिहर उठा।
उसकी आँखें अनायास टूटे हुए काँच पर गईं,
फिर धीरे-धीरे सामने खड़े आरव पर टिक गईं।
आरव का सीना गुस्से से ऊपर-नीचे हो रहा था।
उसकी मुट्ठियाँ अब भी कसकर भींची हुई थीं।
तन्वी ने घबराते हुए अपने सूखे में अपना सलाइवा गटक लिया।
उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
फिर बहुत हिम्मत जुटाकर...
बहुत धीरे से...
उसने अपना झुका हुआ सिर उठाया।
आँसुओं से धुंधलाई आँखों से आरव को देखते हुए उसने काँपती आवाज़ में पूछा-
"क... क्य... क्या मैं इतनी बुरी हूँ...?"
यह सवाल पूछते हुए उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मानो शब्द उसके गले में ही दम तोड़ रहे हों।
उसकी आँखों में आँसू भरे हुए थे।
वह जवाब नहीं माँग रही थी...
शायद वह सिर्फ यह उम्मीद कर रही थी कि एक बार... सिर्फ एक बार आरव कह दे कि नहीं, वह बुरी नहीं है।
लेकिन...
आरव की आँखों में कोई नरमी नहीं आई।
उसने तन्वी को घूरकर देखा।
उसकी मुट्ठियाँ और कस गईं।
जबड़े गुस्से से भिंच गए।
"मैं तुम्हें छोड़ दूँगा, तन्वी...!"
उसकी भारी आवाज़ कमरे में गूँज उठी।
"तुम कुछ भी नहीं हो मेरे लिए। समझी...? नफ़रत करता हूँ मैं तुमसे!"
आख़िरी शब्दों में इतनी कठोरता थी कि मानो किसी ने तन्वी के दिल को मुट्ठी में लेकर बेरहमी से कुचल दिया हो।
तन्वी की पलकें एक पल के लिए काँपीं।
उसके चेहरे का आख़िरी रंग भी उड़ गया।
लेकिन इससे पहले कि वह कुछ कह पाती-
आरव ने गुस्से से भरी नज़र उस पर डाली...
और फिर उल्टे कदमों से दरवाज़े की ओर बढ़ गया।
उसके जूतों की आवाज़ कमरे की खामोशी में साफ़ सुनाई दे रही थी।
एक...
दो...
तीन कदम...
और फिर—
धड़ाम...!!!
दरवाज़ा इतनी ज़ोर से बंद हुआ कि दीवारें तक हल्का-सा काँप उठीं।
आवाज़ पूरे घर में गूँज गई।
कुछ पल तक दरवाज़े की वह गूँज हवा में तैरती रही...
फिर सब शांत हो गया।
बिल्कुल शांत।
इतना शांत कि उस कमरे में अब सिर्फ तन्वी की टूटी हुई साँसों की आवाज़ ही बची थी।
वह वहीं खड़ी रही...
बिल्कुल उसी जगह...
जैसे उसके पैर चलना भूल गया हो।
उसका पूरा शरीर काँप रहा था।
आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे, लेकिन उसे इसका एहसास तक नहीं था।
ऐसा लग रहा था मानो उसके भीतर कुछ टूटकर बिखर गया हो...
कुछ ऐसा जो शायद कभी फिर जुड़ नहीं पाएगा।
कोई आवाज़ नहीं...
कोई शिकायत नहीं...
कोई उम्मीद नहीं...
सिर्फ एक खामोश दर्द...
जो धीरे-धीरे उसके पूरे अस्तित्व में फैलता जा रहा था।
आरव के कहे हुए शब्द बार-बार उसके कानों में गूँज रहे थे-
"तुम कुछ भी नहीं हो मेरे लिए..."
"नफ़रत करता हूँ मैं तुमसे..."
"तुम मेरी ज़िंदगी की मजबूरी हो..."
हर शब्द जैसे उसके दिल पर दोबारा वार कर रहा था।
तन्वी ने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं।
उसकी साँसें भारी होने लगीं।
आँखों में भरा हुआ दर्द अब समंदर बन चुका था।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह रो रही है...
या भीतर से पूरी तरह टूट चुकी है।
अगले ही पल...
बिना कुछ सोचे...
बिना किसी को बताए...
बिना यह समझे कि वह कहाँ जा रही है...
वह लड़खड़ाते कदमों से कमरे से बाहर निकल गई।
उसके पैरों ने खुद ही रास्ता पकड़ लिया।
सीढ़ियाँ...
लॉबी...
एंट्रेंस...
और फिर—
बाहर की दुनिया।
तेज़ बारिश अब भी बेरहमी से बाहर बरस रही थी।
ठंडी हवाएँ उसके भीगे बालों को चेहरे पर उड़ा रही थीं।
लेकिन तन्वी को कुछ महसूस नहीं हो रहा था।
उसके भीतर का तूफ़ान बाहर के मौसम से कहीं ज़्यादा भयानक था।
खाली निगाहों से वो सामने देखती हुई...
धीरे-धीरे वहां सड़क की ओर बढ़ गई।
बारिश अब पहले से भी ज़्यादा उग्र हो चुकी थी।
आसमान मानो अपना सारा गुस्सा धरती पर उतार देना चाहता था।
मूसलाधार बारिश लगातार बरस रही थी, और उसकी बेरहम बूंदें तन्वी के नाज़ुक शरीर पर पड़ती जा रही थीं।
कुछ ही पलों में वह सिर से पाँव तक भीग चुकी थी।
उसके आँसू और बारिश का पानी अब एक-दूसरे में इस तरह घुल चुके थे कि दोनों के बीच फर्क कर पाना नामुमकिन था।
उसके कपड़े भीगकर शरीर से चिपक गए थे।
भीगे हुए बाल बार-बार उड़कर उसके चेहरे पर आ रहे थे, लेकिन उसने उन्हें हटाने की कोशिश तक नहीं की।
उसका चेहरा बिल्कुल बेजान हो चुका था...
जैसे उसमें बची हुई सारी भावनाएँ, सारी उम्मीदें और सारी मुस्कानें किसी ने छीन ली हों।
उसकी आँखें खुली हुई थीं... मगर उनमें ज़िंदगी नहीं थी।
वह बस चल रही थी।
बिना दिशा के...
बिना मंज़िल के...
बिना यह जाने कि वह कहाँ जा रही है।
उसके दिल और दिमाग़ में सिर्फ एक ही चीज़ गूँज रही थी-
आरव के शब्द।
"तुम कुछ भी नहीं हो मेरे लिए..."
"नफ़रत करता हूँ मैं तुमसे..."
"तुम मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी मजबूरी हो..."
हर शब्द उसके कानों में बार-बार गूँज रहा था।
हर बार पहले से ज़्यादा दर्द देकर।
ऐसा लग रहा था मानो कोई अदृश्य हथौड़ा उसके टूटे हुए दिल पर लगातार वार कर रहा हो।
उसके कदम लड़खड़ा रहे थे।
सड़क पर बिखरे छोटे-छोटे पत्थर और काँच के टुकड़े उसके नंगे पैरों में चुभते जा रहे थे।
चलते-चलते उसके पैरों की कोमल त्वचा कई जगह से छिल चुकी थी।
तलवों से रिसता हुआ खून बारिश के पानी में घुलकर सड़क पर बह रहा था।
लेकिन...
तन्वी को कोई दर्द महसूस नहीं हो रहा था।
क्योंकि जब दिल टूटता हो तो शरीर के ज़ख्म बहुत छोटे लगने लगते हैं।
वह बस चलती रही।
बारिश के बीच...
अंधेरी सड़क पर...
अपने टूटे हुए दिल को सीने में लिए।
तभी-
अचानक उस भयानक बारिश और गरजती हवाओं के बीच एक आवाज़ गूँजी।
इतनी तेज़...
इतनी घबराई हुई...
कि मानो किसी का कलेजा बाहर निकल आया हो।
"TANVIIIIIIIIIIII...!!!"
वह चीख हवा को चीरती हुई दूर तक फैल गई।
वह आवाज़ किसी और की नहीं...
आरव की थी।
बारिश को चीरता हुआ वह पूरी ताकत से तन्वी की तरफ भाग रहा था
उसके चेहरे पर घबराहट साफ़ दिखाई दे रही थी।
साँसें बुरी तरह उखड़ चुकी थीं।
आँखों में ऐसा डर था, जिसे शायद उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था।
क्योंकि अब उसे एहसास हो चुका था...
कि गुस्से में कहे गए उसके शब्द सिर्फ किसी का दिल नहीं तोड़ सकते... वे किसी की जान भी ले सकते हैं
"रुको, तन्वी...!"
आरव बारिश के बीच चीखा।
"रुक जाओ...!
Please stop, Tanvi... please stop!"
लेकिन तन्वी ने जैसे कुछ सुना ही नहीं।
वह बस आगे बढ़ती जा रही थी।
उसकी आँखें खुली थीं...
पर उनमें कोई भाव नहीं था।
कोई प्रतिक्रिया नहीं।
कोई शिकायत नहीं।
मानो उसकी आत्मा कहीं पीछे छूट गई हो और उसका शरीर सिर्फ आदत से चल रहा हो।
उसे तो यह तक एहसास नहीं था कि वह घर से बिना चप्पलों के निकल आई थी।
उसके नंगे पैर भीगी सड़क पर लगातार आगे बढ़ रहे थे।
उसे कुछ महसूस नहीं हो रहा था।
न बारिश...
न ठंडी हवा...
न दर्द...
न दुनिया...
क्योंकि उसके भीतर सब कुछ पहले ही टूट चुका था।
तभी...
कुछ दूरी पर सड़क पर एक ट्रक का तेज़ हॉर्न गूँजा।
पााँँँँऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ...!!!
तेज़ हेडलाइट्स बारिश को चीरती हुई उसकी ओर बढ़ रही थीं।
ड्राइवर लगातार हॉर्न बजा रहा था।
लेकिन तन्वी...
वहीं थी।
जैसे उसे आसपास की दुनिया से कोई मतलब ही न हो।
दूर खड़ा आरव यह देखकर बुरी तरह घबरा गया।
उसका दिल जैसे सीने से बाहर निकल आने को हुआ।
"तन्वी...??"
"तन्वी, हटो वहाँ से...!"
"Tanvi, move out of the way!"
"Please...!"
उसकी आवाज़ टूट रही थी।
लेकिन तन्वी के कदम नहीं रुके।
उसके कानों में अब भी वही शब्द गूँज रहे थे-
"नफ़रत करता हूँ मैं तुमसे..."
"तुम कुछ भी नहीं हो मेरे लिए..."
बारिश...
सड़क...
हॉर्न...
सब धुँधला पड़ चुका था।
और फिर...
आरव की आँखें फैल गईं।
उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
अगले ही पल पूरी सड़क पर उसकी दिल दहला देने वाली चीख गूँज उठी-
"NOOOOOOOOOOOOOOOO...!!!"
समय जैसे एक पल के लिए थम गया।
आरव के कदम वहीं रुक गए।
उसका दिमाग सुन्न पड़ गया।
क्योंकि तन्वी का वजूद उस ट्रक से टकराकर खून से लतपथ होकर जमीन पर गिरा हुआ था
अगले ही पल आरव पूरी ताकत से आगे दौड़ा।
बारिश उसके चेहरे पर पड़ रही थी।
लेकिन उसे कुछ महसूस नहीं हो रहा था।
"तन्वी...?? तन्वी...!"
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
वह घुटनों के बल उसके पास बैठ गया।
काँपते हाथों से उसने तन्वी को अपनी बाँहों में थाम लिया।
उसकी आँखों में ऐसा भय था जो शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।
"तन्वी... मेरी तरफ देखो..."
"Please..."
"आँखें खोलो... तन्वी"
तन्वी ने बड़ी मुश्किल से अपनी पलकों को उठाया।
धुँधली होती नज़रों के बीच उसे सिर्फ एक चेहरा दिखाई दे रहा था...
आरव का।
वही आरव...
जो कुछ देर पहले उसे ठुकरा रहा था।
अब बुरी तरह टूट चुका था।
उसकी आँखों में आँसू और बारिश का पानी एक साथ बह रहा था।
वह लगातार कुछ कह रहा था...
लेकिन तन्वी के कानों तक आवाज़ साफ़ नहीं पहुँच रही थी।
तन्वी के लिए दुनिया धीरे-धीरे धुँधली होने लगी।
रोशनियाँ फीकी पड़ने लगीं।
आवाज़ें दूर जाने लगीं।
और फिर...
उसकी पलकों ने धीरे-धीरे हार मान ली।
अँधेरा छा गया।
"तन्वी...!"
आरव लगभग चीख पड़ा।
उसने उसके गाल थपथपाए।
"तन्वी... आँखें खोलो!"
"Please...!"
उसने घबराकर चारों तरफ देखा।
सड़क सुनसान थी।
बारिश लगातार बरस रही थी।
तभी उसकी नज़र ट्रक ड्राइवर पर पड़ी।
वह भय से काँप रहा था।
जैसे ही उसकी नज़र आरव की लाल, गुस्से और दर्द से भरी आँखों से मिली...
उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
वह घबराकर पीछे हट कर भागने लगा।
आरव उसे भागता देख गुस्सा में चींख पढ़ा।
उसने ड्राइवर की ओर देखते हुए दहाड़कर कहा
"I will hunt you down! You can't escape this! I'll find you and kill you-"
"you bastard!"
उसकी आवाज़ बारिश की गर्जना से भी ज़्यादा भयानक लग रही थी।
अगले ही पल आरव की नज़र अपनी बाँहों में पड़ी तन्वी पर गई।
उसका दिल जैसे सीने में रुक गया।
तन्वी की साँसें अब बेहद धीमी हो चुकी थीं...
इतनी धीमी कि हर गुजरते सेकंड के साथ आरव का डर और बढ़ता जा रहा था।
उसके चेहरे का रंग उड़ चुका था।
बारिश का पानी और खून उसके कपड़ों पर एक साथ फैला हुआ था।
उसकी बंद पलकों और बेजान पड़े चेहरे को देखकर आरव के भीतर घबराहट का एक भयानक तूफ़ान उठ रहा था।
"नहीं... नहीं नहीं तन्वी... प्लीज़ आँखें खोलो, I'm sorry तन्वी please open your eyes!"
आरव की आवाज़ काँप गई।
उसने तन्वी को अपनी बाँहों में और कसकर उठा लिया।
जैसे डर हो कि अगर उसने उसे ज़रा भी ढीला छोड़ा तो वह हमेशा के लिए उससे दूर हो जाएगी।
फिर वह पूरी ताकत से अस्पताल की ओर दौड़ पड़ा।
रात अब काफी गहरी हो चुकी थी।
सड़कें लगभग सुनसान थीं।
बारिश अभी भी बेरहमी से बरस रही थी।
ठंडी हवाएँ लगातार चल रही थीं।
लेकिन आरव को न बारिश महसूस हो रही थी...
न ठंड..
न थकान...
उसे सिर्फ अपनी बाँहों में पड़ी तन्वी दिखाई दे रही थी।
उसकी हर धड़कन बस एक ही दुआ कर रही थी—
"कुछ नहीं होगा उसे..."
"कुछ भी नहीं होगा..."
किसी तरह...
जैसे-तैसे...
वह तन्वी को लेकर अस्पताल पहुँच गया।
अस्पताल के मेन गेट के अंदर घुसते ही उसकी घबराई हुई आवाज़ पूरे रिसेप्शन एरिया में गूँज उठी-
"डॉक्टर...!!"
"डॉक्टरररररर...!!!"
लोग अचानक उसकी तरफ देखने लगे।
नर्सें चौंक गईं।
रिसेप्शन पर बैठे एम्प्लॉय अपनी जगह से खड़े हो गए।
आरव लगभग चीख रहा था-
"Please, call a doctor!"
"This is an emergency!"
"Somebody call a doctor, please!"
उसकी आवाज़ में ऐसा डर था कि सुनने वालों का दिल काँप जाए।
कुछ ही सेकंड बाद दो-तीन डॉक्टर और कई नर्सें तेजी से वहाँ पहुँचीं।
जैसे ही उनकी नज़र आरव की बाँहों में पड़ी खून से लथपथ तन्वी पर गई-
उनके चेहरे गंभीर हो गए।
एक डॉक्टर तुरंत आगे बढ़ा।
उसने तन्वी की हालत का एक नज़र में जायज़ा लिया और तेज़ आवाज़ में आदेश दिया-
"Quick!"
"Trauma ICU तैयार करो!"
"Patient को तुरंत अंदर ले जाओ!"
अगले ही पल वार्ड बॉय स्ट्रेचर लेकर दौड़ते हुए आए।
आरव ने काँपते हाथों से तन्वी को स्ट्रेचर पर लिटाया।
उसका हाथ अभी भी तन्वी की उँगलियों को पकड़े हुए था...
मानो वह छोड़ना ही नहीं चाहता हो।
नर्सें और डॉक्टर स्ट्रेचर को तेजी से ICU की ओर ले जाने लगे।
आरव भी उनके पीछे भागने लगा।
लेकिन तभी...
एक डॉक्टर उसके सामने आकर रुक गए।
उसने जल्दी से आरव को रोक कर कहां।
"Mr. Singhania..."
डॉक्टर की गंभीर आवाज़ सुनकर आरव के कदम रुक गए।
"Please wait outside."
आरव की आँखें गुस्से और डर से लाल हो चुकी थीं।
उसका पूरा शरीर तनाव से काँप रहा था।
डॉक्टर के "Please wait outside" कहते ही उसका सब्र टूट गया।
वह एक झटके में डॉक्टर के पास पहुँचा और उसकी कॉलर पकड़ ली।
"Wait outside...?"
उसकी भारी आवाज़ पूरे कॉरिडोर में गूँज उठी।
"You want me to wait outside?"
"Can't you see her condition?"
"वो मर रही है...!"
"मुझे बस इतना बताओ कि मैं क्या करूँ?"
डॉक्टर के चेहरे का रंग उड़ गया।
उसने कुछ बोलने के लिए होंठ खोले, लेकिन शब्द बाहर नहीं निकल पाए।
आरव की आँखों में इस समय सिर्फ डर था...
ऐसा डर जो इंसान को खुद से भी अनजान बना देता है।
"बस उसका इलाज शुरू करो..."
आरव ने दाँत भींचते हुए कहा।
"जो भी करना पड़े करो..."
"मुझे मेरी तन्वी सही-सलामत चाहिए..."
इतना कहकर उसने डॉक्टर की कॉलर छोड़ दी।
डॉक्टर ने एक पल भी बर्बाद नहीं किया और तुरंत ICU के अंदर चले गए।
कुछ मिनट बाद एक दूसरा डॉक्टर जल्दी-जल्दी बाहर आया।
उसके चेहरे पर गंभीरता साफ़ दिखाई दे रही थी।
"सर..."
"Patient की body से काफी blood loss हो चुका है..."
"हमें तुरंत surgery करनी होगी।"
यह सुनते ही आरव की साँस अटक गई।
उसका दिल और ज़ोर से धड़कने लगा।
"तो फिर देर किस बात की है?"
वह लगभग चिल्ला पड़ा।
"Go and do it!"
"जो भी ज़रूरी है करो..."
"बस उसे बचा लो..."
"और अगर तुम उसे बचा नहीं पाए तो दुबारा तुम्हे किसी का ऑपरेशन करने लायक़ नहीं छोड़ूंगा... Go it?"
डॉक्टर ने गंभीरता से सिर हिलाया और जल्दी से वापस ऑपरेशन थिएटर की ओर बढ़ गया।
तभी एक वार्डबॉय हाथ में कुछ कागज़ लेकर आरव के पास आया।
"सर... प्लीज़ ये consent form sign कर दीजिए..."
आरव ने बिना कुछ पूछे कागज़ पकड़ लिया।
उसके हाथ काँप रहे थे।
वह तुरंत साइन करने के लिए झुका।
तभी वार्डबॉय धीरे से बोला-
"सर... एक बार पढ़ लीजिए..."
लेकिन आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसकी नज़रें कागज़ पर भी नहीं थीं।
वह फिर साइन करने लगा।
वार्डबॉय ने हिचकिचाते हुए दोबारा कहा-
"सर... please, एक बार पढ़ लीजिए..."
आरव उसे कोई जवाब नहीं देता और पैन पेपर पर ले जाकर फिर से साइन करने लगता है।
ये देख फिर से वार्डबॉय बोलता है हल्के डर के साथ।
"Mr सिंघानिया एक बार please पेपर पढ़ लीजिए"
वार्डबॉय के इस तरह बार बार बोलने से आरव के चेहरे पर गुस्से की लकीरें उभर आती है।
आरव इरिटेटेड होकर गुस्से में उसकी कॉलर पड़कता है और दांत पिसते हुऐ बोला।
"मैं साइन कर रहा हूं! क्योंकि मैं सब जानता हूं...इस मै क्या लिखा है और क्या नहीं।
इस मै लिखा है अगर पेशेंट मर गई तो किसी भी डॉक्टर की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी!"
इतना बोल आरव ऑपरेशन थिएटर के बंद दरवाज़े की ओर देख बोला।
"मैं सब जानत हूं... फिर भी साइन करूंगा...
क्योंकि मुझे मेरी तन्वी सही सलामत चाहिए।
As long as I am here, nothing can happen to him."
इतना बोल आरव नीचे झुक कर पेपर पर जोर से साइन करता है और उस वार्डबॉय के मुंह पर फेंक देता है।
वार्डबॉय चुपचाप सिर झुकाकर वहाँ से चला गया।
कुछ देर बाद...
पूरा कॉरिडोर फिर से शांत हो गया।
ऑपरेशन थिएटर के ऊपर लगी लाल बत्ती लगातार जल रही थी।
आरव बाहर लगी ठंडी धातु की कुर्सी पर बैठा था।
उसके कपड़े अब भी खून और बारिश से भीगे हुए थे।
हाथों पर सूखता हुआ खून लगा था।
लेकिन उसकी नज़रें सिर्फ एक जगह टिकी थीं
Operation Theatre के बंद दरवाज़े पर।
पहली बार...
उसे अपने कहे हुए हर शब्द पर पछतावा हो रहा था।
और शायद पहली बार...
उसे यह एहसास हो रहा था कि तन्वी उसके लिए क्या मायने रखती है।
तन्वी का इलाज़ अब भी ICU के अंदर चल रहा था।
ऑपरेशन थिएटर के ऊपर लगी लाल बत्ती लगातार जल रही थी।
हर गुजरता सेकंड आरव के लिए किसी सज़ा से कम नहीं था।
वह बाहर पड़ी ठंडी धातु की कुर्सी पर बैठा था।
उसकी सफेद कमीज़ अब खून और बारिश के पानी से पूरी तरह भीग चुकी थी।
कई जगहों पर सूखता हुआ खून गहरे लाल धब्बों की तरह जम गया था।
उसके हाथ अब भी काँप रहे थे।
उँगलियों के बीच तन्वी का खून लगा हुआ था।
वही खून...
जिसे देखकर उसके सीने में बार-बार एक अजीब-सी घुटन उठ रही थी।
उसकी आँखें लाल हो चुकी थीं।
नींद... सुकून... चैन...
सब कुछ उससे कोसों दूर जा चुका था।
वह लगातार ICU के बंद दरवाज़े को देख रहा था।
मानो अगले ही पल वह दरवाज़ा खुलेगा...
और तन्वी मुस्कुराते हुए बाहर आ जाएगी।
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।
चारों तरफ बस सन्नाटा था।
उस सन्नाटे के बीच उसके अपने ही शब्द बार-बार उसके कानों में गूँज रहे थे-
"तुम कुछ भी नहीं हो मेरे लिए..."
"नफ़रत करता हूँ मैं तुमसे..."
"तुम मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी मजबूरी हो..."
हर शब्द उसके दिल पर हथौड़े की तरह पड़ रहा था।
उसने दोनों हाथों से अपना चेहरा पकड़ लिया।
उसकी साँसें भारी होने लगीं।
और अगले ही पल उसके काँपते होंठों से एक टूटी हुई फुसफुसाहट निकली-
"मैं ही उसका कातिल हूँ..."
उसकी आँखों से आँसू टपककर हथेलियों पर गिर पड़े।
"मैं ही हूँ..."
"अगर मैंने वो सब नहीं कहा होता..."
"अगर मैंने उसे नहीं तोड़ा होता..."
"तो वो आज वहाँ नहीं होती..."
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
पहली बार...
पूरी ज़िंदगी में आरव सिंघानिया खुद से नज़रें नहीं मिला पा रहा था।
तभी-
अचानक कॉरिडोर में किसी के दौड़ते हुए कदमों की आवाज़ गूँजी।
"भाई!"
यह आवाज़ सुनकर आरव ने धीरे से सिर उठाया।
उसकी धुँधली आँखें सामने खड़े लड़के पर जाकर ठहर गईं।
समीर।
उसका छोटा भाई।
जिसके चेहरे पर चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी।
समीर ने एक नज़र आरव की हालत पर डाली-
खून से सने कपड़े...
लाल आँखें...
टूटा हुआ चेहरा...
और वह सब कुछ समझ गया।
उसका दिल कसकर सिकुड़ गया।
वह बिना कुछ कहे तेज़ी से आगे बढ़ा।
और अगले ही पल उसने आरव को कसकर गले लगा लिया।
कुछ सेकंड तक दोनों भाई वैसे ही खड़े रहे।
समीर की आँखें भी नम हो चुकी थीं।
उसने धीरे से आरव की पीठ थपथपाई।
"भाभी को कुछ नहीं होगा, भाई..."
उसकी आवाज़ में भरोसा था।
"कुछ भी नहीं होगा..."
"वो जल्दी ठीक हो जाएँगी..."
"आप देखना..."
बस इतना सुनना था कि आरव की बची हुई हिम्मत भी टूट गई।
उसने समीर को और कसकर पकड़ लिया।
जैसे डूबता हुआ इंसान किसी सहारे को पकड़ता है।
उसकी बंद आँखों से आँसू लगातार बहने लगे।
वह पहली बार बच्चे की तरह रो रहा था।
बिना किसी परवाह के...
बिना किसी अहंकार के...
सिर्फ एक डरे हुए इंसान की तरह।
एक ऐसे इंसान की तरह...
जो अपनी सबसे कीमती चीज़ को खोने के डर से बिखर चुका था।
तभी कॉरिडोर में तेज़ कदमों की आवाज़ गूँजी।
आरव ने अनमनी नज़रों से सिर उठाया।
सामने उसकी पूरी फैमिली खड़ी थी।
उसकी माँ...
पिता...
और छोटी बहन काव्या।
तीनों के चेहरे पर चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी।
आँखें रो-रोकर लाल हो चुकी थीं।
दिलों में सिर्फ एक ही दुआ थी-
"तन्वी ठीक हो जाए..."
"बस एक बार आँखें खोल दे..."
जैसे ही आरव की माँ की नज़र अपने बेटे पर पड़ी...
उनकी आँखों में जमा दर्द अचानक आँसुओं बनकर बह निकला।
लेकिन इस बार उन आँसुओं में सिर्फ दुःख नहीं था...
गुस्सा भी था। निराशा भी थी।
और एक माँ का टूटा हुआ विश्वास भी।
वह काँपते कदमों से आरव के सामने आकर रुक गईं।
कुछ पल तक उसे देखती रहीं।
फिर उनकी भरी हुई आवाज़ पूरे कॉरिडोर में गूँज उठी-
"ये सब तुम्हारी वजह से हुआ है, आरव..."
उनकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।
"सिर्फ तुम्हारी वजह से..."
"तुमने उसे मजबूर कर दिया"
"कितना दुख, दर्द दिया"
"कितना जहर उगलते थे तुम उस मासूम बच्ची के सामने।"
"कितनी बार उसकी आँखों में आँसू लाए..."
लेकिन फिर भी उन्होंने खुद को संभाला।
"और आज... आज वो मौत और ज़िंदगी के बीच लड़ रही है... सिर्फ तुम्हारी वजह से"
आरव ने एक शब्द नहीं कहा।
उसने बस अपना सिर और झुका लिया।
क्योंकि आज...
पहली बार...
उसे किसी सफाई की ज़रूरत नहीं थी।
उसे पता था कि उसकी माँ झूठ नहीं बोल रही थीं।
उसने सचमुच तन्वी को बहुत दर्द दिया था।
तभी उसके पिता आगे बढ़े।
उनकी आँखों में गुस्सा कम...
और निराशा ज़्यादा थी।
उन्होंने आरव को लंबे समय तक देखा।
फिर भारी आवाज़ में बोले-
"बेटा..."
"शादी सिर्फ एक रिश्ता नहीं होती..."
"वो भरोसे, ज़िम्मेदारी और प्यार का संगम होती है..."
उन्होंने ICU के बंद दरवाज़े की ओर देखा।
फिर वापस अपने बेटे की तरफ।
"जिस रिश्ते को तुम बोझ समझते रहे..."
"जिस इंसान की भावनाओं को तुमने कभी समझने की कोशिश नहीं की..."
"आज उसी रिश्ते का दर्द तुम्हें अंदर से तोड़ रहा है..."
आरव की उँगलियाँ धीरे-धीरे मुट्ठियों में बदल गईं।
उसकी आँखें फिर भर आईं।
लेकिन उसके पिता अभी रुके नहीं।
"दर्द कैसा लगता है..."
"शायद आज तुम पहली बार महसूस कर रहे हो..."
"ठीक वैसा ही दर्द..."
"जैसा तुम हर रोज़ तन्वी को दिया करते थे..."
कॉरिडोर में फिर सन्नाटा छा गया।
किसी के पास कहने के लिए कुछ नहीं था।
क्योंकि सच...
कभी-कभी सबसे ज़्यादा चोट पहुँचाता है।
कुछ पल बाद...
आरव की माँ ने अपनी भीगी आँखें पोंछीं।
फिर बिना कुछ कहे ICU की ओर मुड़ गईं।
उसके पिता भी उनके पीछे चल पड़े।
काव्या ने एक बार अपने भाई की ओर देखा।
उसकी आँखों में शिकायत भी थी...
और दुःख भी।
लेकिन उसने भी कुछ नहीं कहा।
वह चुपचाप अपने माता-पिता के पीछे चली गई।
कुछ ही वक़्त में...
आरव फिर अकेला रह गया।
पहले से भी ज़्यादा अकेला।
उसने धीरे-धीरे अपनी आँखें बंद कर लीं।
उसकी साँसें भारी हो चुकी थीं।
वह कॉरिडोर के एक कोने में जाकर दीवार से टिक गया।
और उसका सिर झुक गया।
हाथ ढीले होकर बगल में लटक गए।
और फिर...
उसका मन उन पुरानी यादों में भटकने लगा...
उन कड़वी यादों में...
जिन्हें कड़वा किसी और ने नहीं...
बल्कि खुद उसी ने बनाया था।
यादों के बंद दरवाज़े धीरे-धीरे खुलने लगे...
और आरव अतीत में खो गया...
फ्लैशबैक - शादी का दिन