wife's tantrums in Hindi Comedy stories by Virendra Devangan books and stories PDF | पत्नीजी के नखरे

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पत्नीजी के नखरे

कर्माजी की पत्नीश्री उसको ठिठुरती ठंड में झिंझोड़कर उठाई और खुद रजाई में दुबकते हुए नाराजगी जताई, ‘‘उठो भी; कब तक खर्राटे भरते रहोगे? इतना सोने के बावजूद तुम्हारी नींद कभी पूरी नहीं होती। दिनभर कौन-सा पहाड़ खोदते रहते हो, जो थककर चूर हो जाते हो। आफिस में फखत कुर्सी तो तोड़ते हो।’’

इसके बावजूद कर्माइन का मन नहीं भरा। वह पड़ोसी लाला के घर की ओर हाथ मटकाकर बोली,‘‘देखो, जरा उनकी ओर! कितने पत्नीव्रता हैं वे? मुंह अंधेरे उठ जाते हैं और झाड़ू-पोछा-बरतन निपटाकर ललाइन के लिए जलपान का इंतजाम करते हैं। पति हो, तो उनके जैसा!..और एक तुम हो कि अभी तक खराटे भरे जा रहे हो।’’

पत्नीजी की मीठी झिड़की से कर्माजी फौरन उठे। दिनचर्या निपटाए। पूरे घर को चकाचक कर लेने के बाद उनकी लक्ष्मीरूपी श्रीमतीजी इठलाते हुए उठी।

फिर अंगड़ाई लेते हुए जोर की आवाज लगाई, ‘‘कहां हो तुम! मैं कब से बेड टी का इंतजार कर रही हूं और तुम हो कि मेरा जरा भी ख्याल नहीं रखते। मैं इसी दिन के लिए तुमसे शादी करी थी? कब सुधरोगे? जिस दिन सुधरोगे; हनुमान मंदिर में जोड़ा नारियल फोड़कर आऊंगी।’’

कर्माजी बाथरूम में थे। बच्चों के कपड़े धो रहे थे। पत्नीजी की चीख-चिल्लाहट सुने, तो दौड़े-भागे से आए। फिर हाथ जोड़कर चिचोरी किए, ‘‘क्या हुआ देवीजी! कोई खता हो गई क्या? जो रामनाम के समय सूर्पनखा की तरह गुर्रा रही हो।’’

‘‘क्या कहा? सूर्पनखा! तुम्हारे साथ सूर्पनखा की तरह पेश न आऊं, तो क्या सीता-सावित्री की तरह भीगी बिल्ली बनी रहूं? मैं तंग आ चुकी हूं तुमसे। तुम आदमी हो कि पाजामा। आदमी को एक बार समझाने से समझ में आ जाता है। पर, तुम हो कि कोई बात नहीं समझते। देखो जी, सीधी तरह से काम करो; वरना मैं‘‘पति टाइप नौकर’’ रखने की कुव्वत रखती हूं।’’ वह आगबबूला होते हुए चीखी।

‘‘पति टाइप...’’ कर्माजी मन-ही-मन फुसफसाये, फिर चिचोरी किए,‘‘हे देवी! धीरे बोलो? दीवारों के भी कान होते हैं। पड़ोसी सुनेंगे, तो मुझे जोरू का गुलाम समझकर कल से ‘नमस्ते’ करना छोड़ देंगे।’’

‘‘जिनके घर सीसे के होते हैं, वे दूसरों के घर पत्थर नहीं फेंका करते। तुम ‘नमस्ते’ की चिंता छोड़ो। पड़ोसी का नस-नस मैं जानती हूं। मैं उनसे ‘नमस्ते’ क्या 'प्रणाम' करवाऊंगी? मेरे पास बिगड़े पड़ोसियों के नाक में नकेल कसने के बीसों फामूले हैं। तुम तो ये बताओ कि मेरी सलाह तुम्हें मंजूर है या नहीं?’’

कर्माजी ने एक भुलक्कड़ की भांति हैरानी से पूछा, ‘‘कौन सी सलाह मेमसाहब?’’

‘‘बड़े भुल्लकड़ हो...! वही नौकरवाली!!’’ वह अपने नाजुक हाथों से रजाई हटाते हुए बेतकल्लुफी से बोली।

‘‘अजी, आजकल नौकर मिलते कहां हैं?’’ कर्माजी ने संदेह जताया।

‘‘तुम ये चिंता मुझ पर छोड़ो। जब तुमको ढ़ूंढ़कर नौकर की तरह इस्तेमाल कर सकती हूं, तब नौकर ढ़ूढ़ना मेरे बायें हाथ का खेल है। मेरे आगे-पीछे मर्दों की लाइन लगी रहती है। तुम बोलो, तो बिन पेंदी के मर्दों की लाइन लगा दूं और नौकरों की तरह घर में रगेदूं।’’

‘‘ओह’’ कर्माजी सकते में आ गए। वे पत्नीजी का फक्क्ड़ अंदाज ‘जीवन में पहली बार’ देख रहे थे और चकित हो रहे थे। 

संभल कर बोले,‘‘आगे, क्या हुक्म है मेरी आकी।’’

‘‘ये हुई न गुलामों वाली बात। अभी मलाईदार चाय पिलाओ और नाश्ता तैयार रखो। मैं नहाने-धोने का तकलीफ उठाकर आती हूं। फिर चाय की चुस्की का आनंद उठाऊंगी। इस बीच तुम बच्चों को स्कूल भेजने की तैयारी करना....और हां, ध्यान रहे कि मेरा पसंदीदा टीवी सीरियल ‘‘पत्नी के हजार नखरे’’ देखने का समय हो रहा है। मुझे टीवी देखने के दौरान खलल पसंद नहीं। समझे कि नहीं।’’ वह शान से हुक्म फरमाई।

‘‘जी, जी, मेमसा’ब; समझ गया।’’

‘‘अभी तक नहीं समझे हो, तो अच्छी तरह समझ लो; वरना दहेज मांगने और घरेलू हिंसा करने के जुर्म में चक्की नहीं पिसवाई, तो मैं अपने बाहुबली बाप की बलशाली औलाद नहीं।’’

कर्माजी इतना ही ख्वाब देख पाये थे कि पत्नीश्री उन्हें झिंझोड़कर वाकई जगा दी,‘‘ऐजी, उठो! कब तक सोते रहोगे।’’

कर्माजी हड़बड़ाकर उठे, तो भौंचक्क रह गए। ख्वाब के बारे में सोचे, तो सोचते रह गए कि यह कैसा ख्वाब था? गर यह ख्वाब, ख्वाब नहीं, हकीकत होता, तो उसकी इज्जत धूल-धूसरित हो गई होती ।

फिर ईश्वर से विनती करने लगे कि ऐसी उल्टी गंगा बहानेवाला ख्वाब उसे ही नहीं; उसके दुश्मनों तक को न दिखाए। वरना, यह दुनिया पतियों को जीने नहीं देगी। 
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व्यंग्यात्मक रचना पढ़ने के लिए हार्दिक शुक्रिया। पढ़ने के उपरांत फॉलो व सब्सक्राइब करना, रेटिंग, फीडबैक व स्टिकर देना तथा समीक्षा लिखना तो बनता है दोस्तों।