गोकुल में यमुना किनारे कुम्हारों की वह गली आज भी वैसी ही है। सुबह-सुबह जब घाट पर शंख बजता है, तो चाकों की घर्र घर्र उसी लय में मिल जाती है, जैसे नदी खुद साँस ले रही हो। उसी गली के नुक्कड़ पर इरा का आँगन था, नीम की छाँव वाला, जहाँ धूप आँगन में बिछी रहती और हवा में हमेशा गीली मिट्टी की सोंधी गंध बसी रहती।
मैं, निहार, देहरादून से आया था। उम्र चालीस के करीब, एक पुरानी पब्लिक लाइब्रेरी में पांडुलिपि संरक्षक। मेरी दुनिया फाइल नंबरों, रुई के दस्तानों और पीली पड़ गई पोथियों की थी। ब्रज के लोकगीतों की कुछ बिखरी हुई बहियों को खोजने का काम मिला, तो मैं दो हफ्ते के लिए गोकुल आ गया। मैं घड़ी देखकर चाय पीने वाला आदमी था। इरा घड़ी नहीं देखती थी। वह मिट्टी देखती थी।
पहली बार उसे यमुना घाट पर देखा था। वह सिर पर गीली मिट्टी की पिंडी रखे लौट रही थी। पाँव कीचड़ में सने थे, माथे पर पसीने की बूँदें, और होंठों पर एक अधूरा सा मल्हार। उसने मुझे देखा, अजनबी समझकर नमस्ते नहीं की, बस आँखें मिलते ही हँस दी। ऐसी हँसी जैसे कह रही हो, तुम देर से आए हो, पर आ गए हो।
मैं अगले दिन फिर उसी बेंच पर बैठ गया, बहाना था कि घाट की आवाज़ें रिकॉर्ड करनी हैं। सच यह था कि मैं उसके हाथ देखना चाहता था। जब इरा चाक पर बैठती, तो पूरी दुनिया धीमी हो जाती। उसकी उंगलियाँ मिट्टी पर ऐसे फिरतीं जैसे कोई राग लिख रही हों। मिट्टी उठती, झुकती, काँपती, और फिर एक घड़े में ढल जाती।
तीसरे दिन उसने बिना चाक रोके पूछा, "बाबूजी, तुम यहाँ रोज़ क्यों बैठते हो?"
मैं हकला गया, "तुम्हारे चाक की आवाज़ रिकॉर्ड करनी है।"
वह खिलखिलाकर हँसी, "यह आवाज़ रिकॉर्डर में नहीं आती। यह लग जाती है।"
और सच में लग गई।
वह दीवानगी किसी फिल्म की तरह धीरे-धीरे नहीं आई। एक शाम सावन की आँधी आई। यमुना का पानी आँगन तक चढ़ आया, कच्चे दिए, कुल्हड़, सब बहने लगे। इरा अकेली घुटनों तक पानी में उन्हें समेट रही थी। मैं बेंच से उठा और बिना सोचे पानी में उतर गया। कीचड़ में पाँव धँस रहे थे, हाथ में दिए फिसल रहे थे। हम दोनों भीग गए, हाँफ रहे थे।
उसने मेरा हाथ कसकर पकड़ा और लगभग डाँटते हुए कहा, "पागल हो क्या?"
मैंने हाँफते हुए कहा, "हाँ।"
उस रात के बाद मैं सच में पागल था, एक मीठे, बेचैन पागलपन में।
फिर जो दिन बीते, वे हिसाब के नहीं थे। मैं देहरादून लौटने की टिकट तीन बार रद्द कर चुका था। लाइब्रेरी से हेड साहब के फोन आते, मैं कहता, अभी एक और बही मिलनी बाकी है। असल में मैं रोज़ सुबह इरा के चाक के पास बैठकर मिट्टी गूँथना सीख रहा था। मेरे साफ-सुथरे नाखूनों में मिट्टी भर जाती, मेरी सफेद कमीज़ पर मिट्टी के छापे लग जाते। इरा कहती, "निहार, तुमसे घड़ा नहीं बनेगा। तुमसे तो बस कहानी बनेगी।"
मैं कहता, "तो वही सही।"
हमारे प्यार में बड़े-बड़े वादे नहीं थे। उसमें छोटी-छोटी ज़िदें थीं, जो अब याद आती हैं तो आँखें भीग जाती हैं। वह सावन में यमुना किनारे नंगे पाँव चलने की ज़िद करती, मैं उसकी चप्पलें हाथ में लेकर पीछे-पीछे चलता। मैं उसे देहरादून की पहाड़ी मैगी खिलाने का सपना दिखाता, वह कहती, पहले मिट्टी का स्वाद तो पहचानो। एक बार मुझे तेज़ बुखार आ गया। मैं धर्मशाला के कमरे में अकेला तप रहा था। इरा रात भर मेरे सिरहाने बैठी रही। वह मेरे माथे पर गीली मुल्तानी मिट्टी की ठंडी पट्टी रखती रही और धीरे-धीरे मल्हार गुनगुनाती रही। कहती रही, "मिट्टी सब ताप खींच लेती है।"
गली के लोग हँसते, कहते परदेसी बाबू बावला हो गया है। शायद हो गया था। मैंने अपने पूरे जीवन में कभी किसी के लिए बस नहीं छोड़ी थी, यहाँ मैं उसकी एक झलक के लिए घंटों चाक की घर्र घर्र सुनता रहता था। यह दीवानगी थकाती नहीं थी, यह जीना सिखा रही थी।
फिर वह मोड़ आया जिससे मैं डरता था। लाइब्रेरी से आखिरी चिट्ठी आई। या तो तुरंत वापस आओ, या नौकरी छोड़ दो। उसी हफ्ते इरा को जयपुर के एक बड़े शिल्प मेले से बुलावा आया। तीन महीने की रेजिडेंसी, बड़ा नाम, अच्छी रकम, वह सब कुछ जिसका वह हक रखती थी।
हम उस रात यमुना के कच्चे घाट पर बैठे थे। नदी शांत थी, ऊपर अधूरा चाँद था। मेरी छाती में एक अजीब सा डर धड़क रहा था, उसे खो देने का डर।
मैंने टूटी हुई आवाज़ में कहा, "इरा, तुम जयपुर जाओ। मैं देहरादून लौटता हूँ। हम कोशिश करेंगे, फोन पर, चिट्ठियों पर।"
उसने मिट्टी सने अपने हाथों से मेरा चेहरा थाम लिया। उसकी आँखें पानी से भरी थीं, पर उसकी आवाज़ में पत्थर जैसी सच्चाई थी।
"निहार, सुनो। मैं यह मिट्टी, यह चाक, यह घाट छोड़कर नहीं जा सकती। यही मेरी जड़ है। और तुम किताबों वाले आदमी हो, तुम्हारी जड़ पहाड़ों में है। अगर मैं तुम्हारे पीछे-पीछे चली गई, तो मैं आधी रह जाऊँगी। और आधी इरा से तुम प्यार नहीं कर पाओगे। मैं नहीं चाहती कि मेरा प्यार तुम्हें छोटा कर दे, या तुम्हारा प्यार मुझे उखाड़ दे।"
मैं चिल्लाना चाहता था कि मैं सब कुछ छोड़ दूँगा, नौकरी, शहर, सब कुछ। पर उसी पल मेरे अंदर कुछ टूटा भी और जुड़ा भी। मैं समझ गया कि दीवानगी का मतलब किसी को अपनी मुट्ठी में बाँध लेना नहीं होता। दीवानगी का असली मतलब होता है, दूसरे को पूरा होते हुए देख पाने की हिम्मत रखना, भले ही उस पूरेपन में तुम थोड़ी देर के लिए शामिल न हो।
उस रात हमने कोई बड़ा फैसला नहीं किया। हम चुपचाप आँगन में लौट आए। एक कच्ची मिट्टी की लोई ली और दोनों साथ-साथ चाक पर बैठ गए। मेरे बेढंगे, काँपते हाथ उसके सधे हुए, गर्म हाथों के ऊपर थे। चाक घूमा। मिट्टी ने आकार लेना शुरू किया। घड़ा टेढ़ा-मेढ़ा बना, कच्चा, अनगढ़। पर वह हमारा था। इरा ने अपनी छोटी सी चाँदी की अँगूठी से उस गीले घड़े पर एक निशान बना दिया, एक अधूरा चाँद।
उसने कहा, "जब तक यह पूरा न हो, इसे मत पकाना।"
सुबह मैं चला गया। ट्रेन की खिड़की से गोकुल पीछे छूटता रहा। मेरे बैग में कोई पांडुलिपि नहीं थी, मेरे हाथों में मिट्टी की गंध थी, जो कई दिनों तक नहीं गई।
देहरादून लौटकर ज़िंदगी फिर अपनी पुरानी लय में आ गई। किताबें, फाइलें, घड़ी देखकर चाय। पर अंदर सब कुछ बदल चुका था। अब खामोशी में भी मुझे चाक की घर्र घर्र सुनाई देती थी। रात को कभी-कभी हाथ अपने आप मिट्टी गूँथने की मुद्रा में चलने लगते। एक साल बीत गया। न कोई खत, न कोई फोन। मैंने उसे बाँधना नहीं चाहा था, इसलिए मैंने उसे पुकारा भी नहीं। बस एक बार गोकुल के एक दोस्त ने बताया कि इरा का काम अब दिल्ली तक जाने लगा है, पर वह अब भी उसी नीम वाले आँगन में है, उसी चाक पर।
उस एक साल में मैंने अकेलेपन कोसा नहीं। मैंने उसे काम में बदला। मैंने लाइब्रेरी के हेड साहब को मनाया, और ब्रज लोककला का एक छोटा सा कोना खुलवाया। मैंने अपने हाथों से मिट्टी के नमूने, घाट के फोटो, लोकगीतों की रिकॉर्डिंग वहाँ सजाई। मैं अब सिर्फ किताबों का रखवाला नहीं था, मैं एक पुल बन रहा था।
अगले सावन में मैं छुट्टी लेकर फिर गोकुल गया। दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि लगा बाहर सुनाई दे जाएगा। डरते-डरते उसी गली में पहुँचा। नीम वैसा ही था, आँगन वैसा ही था, चाक घूम रहा था। इरा घड़ा गढ़ रही थी। उसने सिर उठाकर देखा। वह चौंकी नहीं। उसकी आँखें भर आईं, पर होंठों पर वही पहली वाली हँसी थी।
"तुम आ गए।"
मैंने कहा, "हाँ।"
मैंने उसे बताया कि मैंने नौकरी नहीं छोड़ी, मैंने नौकरी को बड़ा कर लिया है। देहरादून में अब ब्रज कला का एक घर है। मैं आधा महीना वहाँ काम करूँगा, आधा महीना यहाँ, अगर तुम मुझे अपने आँगन की एक बेंच दे दो तो।
वह कुछ नहीं बोली। वह उठी और कोने में रखी एक लकड़ी की अलमारी खोली। अंदर सूती कपड़े में लिपटा हुआ वही हमारा टेढ़ा-मेढ़ा कच्चा घड़ा रखा था। एक साल से उसने उसे पकाया तक नहीं था। मिट्टी अब भी कच्ची थी। उस पर वही अधूरा चाँद चमक रहा था।
उसने मेरे हाथ में गीली मिट्टी का एक लौंदा रख दिया। उसकी आँखों में आँसू थे और हँसी भी।
"तो फिर इसे पूरा करो, निहार।"
हम फिर चाक पर बैठ गए। बाहर यमुना चढ़ रही थी, आँगन में सावन की बूँदें गिर रही थीं। मेरे हाथ अब पहले से कम काँप रहे थे। मिट्टी घूम रही थी। इस बार घड़ा पहले से सीधा बन रहा था, पर अब यह ज़रूरी भी नहीं था। ज़रूरी यह था कि हम दोनों के हाथ उस पर थे, साथ-साथ।
दीवानगी वाला प्यार वह नहीं होता जो तुम्हें जला दे, तोड़ दे, या किसी को कैद कर ले। असली दीवानगी वह होती है जो तुम्हें थाम लेती है। जो तुम्हें तुम्हारी जड़ से उखाड़ती नहीं, बल्कि तुम्हें तुम्हारी मिट्टी तक वापस ले आती है। इरा मेरी कभी नहीं हुई, मैं उसका हो गया था, और उसी में मैं पहली बार पूरा हुआ था।
और यही मेरे पाठकों के लिए मेरा छोटा सा संदेश है। प्यार को कभी पिंजरा मत बनाना। अगर तुम्हें किसी से दीवानों की तरह मोहब्बत हो जाए, तो उसे उड़ने देना। उसकी जड़ को पानी देना, उसके आसमान को बड़ा होने देना। सच्चा प्यार छीनता नहीं, वह दो अधूरे लोगों को पूरा करता है, अपने-अपने आँगन में रहते हुए भी। इंतज़ार करना सीखो, मेहनत करना सीखो, और जब लौटो तो खाली हाथ मत लौटो, कुछ बनकर लौटो। क्योंकि जो रिश्ता तुम्हें तुमसे बेहतर बनाता है, वही दीवानगी असल में इबादत होती है। अगर आज तुम्हारे दिल में किसी के लिए ऐसी ही धड़कन है, तो उसे डराओ मत, उसे सँवारो। मिट्टी की तरह धीरज रखो, घड़ा ज़रूर पूरा होगा।