अध्याय 1: कलाई पर ठहरती कशमकश
1.1 धुंध और धड़कनें
सुबह के ठीक पाँच बजे थे। उत्तर भारत की सड़कों पर तैरती सर्द सुबह की वो ठंडी, नम हवा ट्रेन की लोहे की खिड़की से छनकर सीधे अजय के चेहरे पर थपेड़े मार रही थी। ऐसा लगता था मानो वो हवा महज़ एक झोंका नहीं, बल्कि कोई बीता हुआ कल था—जो चेहरे पर जमी थकान को धोना चाहता था, और एक आने वाला कल भी—जो भीतर की बेचैनी को और हवा दे रहा था।
अजय ने खिड़की के शीशे से अपना माथा टिका दिया। बाहर आसमान का रंग अजीब था; रात की काली स्याही अभी पूरी तरह धुली नहीं थी, लेकिन पूरब के एक कोने से लाली फूटने लगी थी—एक नई शुरुआत का वादा। खेतों पर धुंध की एक मोटी, रहस्यमयी चादर पसरी थी, जिसने हरी-भरी फ़सलों को अपने आगोश में छिपा रखा था। बाहर का नज़ारा जितना शांत था, अजय के भीतर का तूफ़ान उतना ही शोर मचा रहा था।
उसने अपने दाहिने हाथ की आस्तीन को थोड़ा पीछे खिसकाया और कलाई घड़ी पर नज़र डाली। 5:03 ए.एम.। यह समय उसके लिए सिर्फ एक संख्या नहीं थी, एक टाइमर था जो तेज़ी से घट रहा था।
"बस तीस मिनट... तीस मिनट और... और फिर स्टेशन आ जाएगा," उसकी आवाज़ इतनी मद्धम थी कि ट्रेन के पहियों की गड़गड़ाहट में खुद उसे भी बमुश्किल सुनाई दी। उसने एक लंबी साँस ली और हवा में छोड़ दी, जो भाप बनकर उड़ गई। "और उसके ठीक दो दिन बाद..." यह सोचते ही उसकी साँसें कुछ पलों के लिए जैसे सीने में ही अटक गईं। लड़की देखने जाना है।
1.2 खुद से गुफ़्तगू
सन्नाटे को चीरते हुए अचानक अजय के होंठों पर एक अजीब, शरारती मुस्कान उभर आई। उसने अपना सिर झटका और खुद को ही डांटते हुए बुदबुदाया, "अरे अजय! क्या तू कोई जॉब का इंटरव्यू देने जा रहा है? इतना डर किस बात का है, भाई? कोई कठिन गणित का सवाल थोड़ी है यह, जो हल नहीं होगा!"
पर यह बनावटी हँसी उसके चेहरे पर ज़्यादा देर टिक नहीं पाई। चंद सेकंडों में ही उसकी भौंहों पर फिर से सिकन आ गई और माथे पर चिंता की लकीरें गहरी हो गईं। मन के भीतर के संशयों ने फिर सिर उठा लिया: 'पर अगर लड़की पसंद नहीं आई तो? घर वाले क्या सोचेंगे? कितने अरमानों और उम्मीदों से सब जा रहे हैं... और अगर पसंद आ गई... तो? क्या सच में मेरी आज़ादी, मेरी ये बेफ़िक्री, सब कुछ हमेशा के लिए बदल जाएगा? यह सब इतनी जल्दी क्यों हो रहा है?'
तभी बगल की सीट पर सोए यात्री ने एक गहरी करवट ली और मुँह से 'उफ़' की आवाज़ निकाली। अजय सहम गया। उसने अपने विचारों की रफ़्तार को थोड़ा धीमा किया, पर उसका दिमाग़ अब भी बुलेट ट्रेन की तरह दौड़ रहा था। उसने सोचा—सब लोग कहते हैं कि शादी जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला होता है... पर यह तो बिल्कुल किसी बोर्ड एग्जाम जैसा लग रहा है! जहाँ अगर आप पास भी हो जाओ, तो भी ये गारंटी नहीं होती कि आगे की कॉलेज लाइफ़ कैसी होगी।
"चाय... चाय गरमा-गरम चाय बाबूजी!"
ट्रेन एक छोटे, गुमनाम और अंधेरे स्टेशन पर आकर रुकी थी। बाहर से कुल्हड़ की सोंधी खुशबू हवा में तैरती हुई आई। अजय ने जेब से पैसे निकाले और खिड़की से हाथ बढ़ाकर एक कप चाय ले ली। गर्म मिटटी के कुल्हड़ को दोनों हथेलियों के बीच भींचते हुए उसने पहला घूँट लिया। चाय गले से नीचे उतरी, पर मन का स्वाद नहीं बदला। उसने हँसते हुए खुद से कहा, "वाह! चाय भी आज इतनी फीकी लग रही है, जितनी मेरी हिम्मत।"
उसी पल सूरज की पहली सुनहरी किरण ने कोहरे की दीवार को चीर दिया। दूर-दूर तक फैले खेत सोने की तरह चमक उठे। अजय ने अपनी सीट के नीचे रखे पिट्ठू बैग को कसकर पकड़ लिया। उस बैग में सिर्फ तीन जोड़ी कपड़े नहीं थे, उसमें उसके माता-पिता की उम्मीदें और उसका अपना अनजाना डर भी ठसाठस भरा था। उसने एक आखिरी गहरी साँस ली, "चल भाई अजय, स्टेशन आने वाला है। जिंदगी का अगला पड़ाव भी शायद इसी प्लेटफॉर्म पर उतरने वाला है।"
1.3 बचपन का राज़दार
ट्रेन की रफ़्तार धीरे-धीरे कम होने लगी। लोहे के पहिए पटरियों को जकड़ते हुए चीखने लगे। प्लेटफॉर्म की पीली बत्तियाँ और नाम का बोर्ड धुंध के पार साफ़ दिखने लगा था। अजय ने अपनी कशमकश को सीने में दबाया, सावधानी से सीढ़ियों से नीचे उतरा और प्लेटफॉर्म की ठंडी ज़मीन पर पैर रख दिया।
उसने चारों तरफ़ नज़रें दौड़ाईं। वह रोहित को ढूँढ रहा था। "कहाँ रह गया यह रोहित... खुद ही फोन करके कहता है कि भाई मैं टाइम पर आऊँगा, और अब खुद ही गायब है।" उसने चिढ़कर जेब से मोबाइल निकाला और नंबर डायल करने ही वाला था कि पीछे से एक जानी-पहचानी, बुलंद आवाज़ गूँजी: "अरे अजय!"
अजय ने मुड़कर देखा। हल्के नीले रंग की शर्ट और जींस पहने रोहित, भीड़ को कुहनियों से हटाता हुआ, चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान लिए उसी की तरफ़ बढ़ रहा था। अजय के चेहरे पर छाई धुंध छँट गई। उसने राहत की साँस ली।
"वाह बेटा! टाइम पे पहुँच गया तू। मुझे तो लगा था कुंभकर्ण की तरह अभी तक सो रहा होगा," अजय ने उसका कंधा थपथपाते हुए कहा। रोहित ने तुरंत अजय के हाथ से बैग लेने के लिए हाथ बढ़ाया, "अरे ला, दे ना, मैं ले लेता हूँ।"
अजय ने बैग को थोड़ा पीछे खींचते हुए सिर हिलाया, "रहने दे भाई, इतना भी भारी नहीं है। वैसे भी, इस वक़्त आदमी को अपना बोझ खुद ही उठाना चाहिए।" उसकी इस बात में एक गहरा छिपा हुआ इशारा था, जिसे रोहित बखूबी समझ गया।
रोहित सिर्फ अजय की मौसी का लड़का नहीं था; वे दोनों बचपन के लंगोटिया यार थे, एक-दूसरे के सबसे बड़े राज़दार। जब दोनों प्लेटफॉर्म से बाहर की तरफ़ बढ़े, तो रोहित ने अजय के कंधे पर हाथ रखा, उसकी आँखों में देखा और हँसते हुए बोला, "अरे, क्या हुआ भाई? इतना सीरियस क्यों है? लड़की देखने जा रहा है, कोई सरहद पर युद्ध लड़ने नहीं!"
अजय ने थोड़ा मुस्कुराने की कोशिश की, पर वो मुस्कान अधूरी रही। "पता नहीं यार... बस अजीब लग रहा है। समझ नहीं आ रहा कि ये सब इतना अचानक कैसे हो रहा है?" रोहित ने अपनी स्प्लेंडर बाइक में चाबी लगाई। इंजन की चिर-परिचित आवाज़ से सुबह का सन्नाटा टूटा। उसने अजय को पीछे बैठने का इशारा करते हुए कहा, "चल, बैठ अब। ये दो दिन मैं हूँ ना तेरे साथ, सब ठीक कर देंगे। तेरा बड़ा भाई हूँ, टेंशन मत ले।"
1.4 बदला हुआ गाँव, पुरानी छत
बाइक शहर की सोई हुई सड़कों को पीछे छोड़ती हुई ग्रामीण रास्तों पर दौड़ने लगी। कुछ देर की खामोशी के बाद, रोहित ने एक तीखा मोड़ लिया और बाइक को कुछ तंग गलियों में मोड़ दिया। अजय की नज़रें जैसे ही आस-पास की चीज़ों पर पड़ीं, उसने अचानक रोहित का कंधा ज़ोर से भींच लिया।
"यह... यह रास्ता? रोहित, हम कहाँ जा रहे हैं?" उसकी आवाज़ में हैरानी थी। रोहित ने मुस्कुराया, "हाँ भाई, अपना ही गाँव है।"
"पर... पर सब कुछ इतना अलग क्यों लग रहा है?" अजय ने हैरान होकर चारों तरफ़ देखा।
तीन साल में वक़्त की लहर ने सब बदल दिया था। वो पुरानी चाय की टपरी, वो पीपल का पेड़, सब गायब था। सीमेंट और कंक्रीट के मकान खड़े हो गए थे। अजय के सीने में टीस उठी, "तीन साल... और सब कुछ इतना बदल गया? जैसे मैं किसी दूसरे देश में आ गया हूँ।"
तभी, गलियों के आखिरी मोड़ पर अजय की नज़रें रोहित के घर की पुरानी छत पर टिकीं। वह आज भी वैसी ही थी—वही जंग लगा टैंक और पुराना ऐंटेना। उस पल, अजय के चेहरे पर एक सच्ची मुस्कान आ गई। बदलते हुए रास्तों और अजनबी कंक्रीट के बीच, वो पुरानी छत एक सुरक्षित किनारे जैसी दिख रही थी।
अजय के मन का सारा बोझ—वो लड़की देखने का डर, वो शादी की उलझन—सब कुछ एक पल में हवा हो गया। रोहित ने घर के सामने बाइक रोकी, "क्या बात है? अचानक इतना खुश क्यों हो गया?"
अजय ने कुछ नहीं कहा, बस मुस्कुराते हुए बाइक से नीचे उतरा। वह अपने भारी बैग को संभाले, उस पुरानी छत की छाँव तले अपने सुरक्षित ठिकाने की ओर बढ़ गया, जहाँ अगले दो दिन उसकी तक़दीर का फैसला होने वाला था।