Kashmkash - 2 in Hindi Love Stories by Deepak Ram books and stories PDF | कशमकश - 2

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कशमकश - 2

2.1. यादों का आँगन और मौसी का दुलार

अजय जब मौसी के घर पहुँचा, तो दिल में एक अजीब-सी राहत उतर आई। दरवाज़ा खुलते ही मौसी की मुस्कान सामने थी — वही झुर्रियों भरी, सच्ची मुस्कान, जो हमेशा बिना कुछ कहे भी सब कह देती थी।
“आ गया बेटा? चल, अंदर आ… तेरे लिए चाय रखी है।”
घर में कदम रखते ही पुरानी महक ने उसे घेर लिया — आँगन में रखी तुलसी की मिट्टी, दीवारों पर टंगी पुरानी तस्वीरें, और वो घड़ी जो हमेशा थोड़ी तेज़ चलती थी।
अजय सोफ़े पर बैठा तो मौसी ने हाथ से चाय का प्याला पकड़ाया। हर घूँट के साथ बचपन की यादें लौटने लगीं — वो छुट्टियाँ जब यही घर उसका सबसे प्यारा ठिकाना होता था, और मौसी का सादा, मगर भरपूर प्यार उसका सबसे बड़ा सहारा।
मौसी ने प्यार से सिर पर हाथ फेरा,
“थक गया होगा… चल, पहले आराम कर ले। बातों का तो वक्त है ही।”

2.2. करवटें बदलती रात और अनजाने कल का डर

रात के करीब साढ़े दस बजे थे। अजय की आँखें खुली थीं, नींद का नाम नहीं था। मन में अजीब सी बेचैनी, और चेहरे पर हल्की-सी खुशी— जैसे दिल किसी अनदेखे मोड़ की आहट सुन रहा हो।
वह चुपचाप कमरे में बैठा था, ख्यालों में खोया हुआ। एक तरफ भविष्य के अनजाने रास्तों का डर, तो दूसरी तरफ किसी खास से मिलने की उम्मीद की मिठास। क्या वो लड़की वैसी ही होगी जैसी उसने सोचा है? क्या यह दिन उसकी ज़िंदगी का नया अध्याय बनेगा? सवालों की परतें उसकी साँसों तक उतर आई थीं।
खिड़की के बाहर चाँदनी खेतों पर फैली थी। ठंडी हवा चेहरे से टकराती रही, पर उसका मन भीतर ही भीतर गर्म था। अजय जानता था—यह रात, यह बेचैनी, उसकी ज़िंदगी के सबसे खास पलों में से एक है। धीरे-धीरे उसकी पलकें भारी हुईं, पर दिल की धड़कनों में वो हलचल अब भी थी। पता ही नहीं चला कब नींद ने उसे घेर लिया।

2.3. भीगी सुबह, सोंधी चाय और रोहित की दस्तक

सुबह की पहली किरण के साथ आँख खुली। बाहर बरसात की नर्म आवाज़ थी, ठंडी बूंदें खिड़की के पास आँगन को भिगो रही थीं। मौसम की ये नमी उसकी बेचैनी को गहराई दे रही थी, और अजीब तरह की शांति भी।
चाय पीते-पीते अजय खिड़की पर आ खड़ा हुआ। बूंदों को गिरते देख रहा था। खिड़की के बाहर बारिश की बूंदें धीरे-धीरे धरती पर गिर रही थीं। भीगते पत्ते चमक उठे थे, हर बूंद उनकी सतह पर जैसे एक नन्ही आभा छोड़ रही थी। अजय खिड़की के पास खड़ा था, हाथ में गरमागरम चाय का कप, जिसकी सोंधी खुशबू कमरे में घुली थी। बाहर की ठंडी हवा और अंदर की गर्म चाय—दोनों ने मिलकर एक अजीब-सी शांति भर दी थी।
बारिश की बूंदें पत्तों पर टकराकर ऐसे बज रही थीं, मानो कोई नन्ही घंटी बज उठी हो। हर बूंद गिरते ही उसकी बेचैनी को मीठा-सा संगीत दे जाती। चाय का कप थामे, अजय की निगाहें बरसाती खिड़की से बाहर टिक गईं—हर भीगा पत्ता उसकी यादों और भावनाओं का दर्पण बन गया था। बरसात की नमी और चाय की गर्माहट… जैसे प्रकृति भी उसके मन को समझ रही हो। भीगे पत्ते, झरती बूंदें और मसालेदार चाय—इन सबने मिलकर एक ऐसा पल रच दिया था, जिसने उसकी बेचैनी को भी एक मधुर एहसास में बदल दिया।
तभी उसे एक आवाज आती है, यह रोहित होता है—
“क्या बात है भाई, रात भर जागे हो क्या? कहीं शादी से पहले ही घबराहट तो नहीं आ गई?” रोहित ने मुस्कुराकर चुटकी ली।
अजय ने भी मुस्कुराने की कोशिश की, “बस… नींद नहीं आ रही थी।”
“अच्छा, तो ये बारिश में प्यार का खुमार है या घबराहट?” रोहित ने आँख दबाकर कहा।
अजय हँस पड़ा, “दोनों… थोड़ा उत्साह, थोड़ी टेंशन।”
रोहित ने सिर हिलाया, “भाई, टेंशन छोड़… ये बारिश देख, ज़िंदगी की तरह है— कभी तेज़, कभी हल्की, लेकिन ताज़गी हमेशा छोड़ जाती है।”
अजय ने चुपचाप सिर हिलाया। वह जानता था, बारिश, अजय और यह बेचैनी— तीनों मिलकर उसकी ज़िंदगी को कहीं और मोड़ने वाले हैं।

2.4. गाँव की सैर, चौराहे की रौनक और यादों का स्वाद

बारिश थम चुकी थी। गाँव की गलियों में पानी के छोटे-छोटे आईने बन गए थे, जिनमें आसमान के टूटे-फूटे बादल झाँक रहे थे। मिट्टी की भीगी खुशबू हवा में घुली थी, जैसे किसी ने पूरे गाँव को सोंधे इत्र से नहा दिया हो।
अजय ने खिड़की से बाहर झाँका, फिर मुस्कराकर बोला, “भाई, मन कर रहा है, ज़रा घूम आएं… बारिश के बाद गाँव कुछ और ही लगता है।”
रोहित ने बिना एक पल गंवाए बाइक निकाल ली। हवा अब भी ठंडी थी और सड़कों पर टपकती बूँदें चमक रही थीं। अजय पीछे बैठ गया — हवा के झोंके उसके चेहरे को छूते हुए जैसे बचपन की यादें वापस ला रहे थे।
कुछ ही देर में दोनों गाँव के चौराहे पर पहुँचे। लोग टोलियों में खड़े थे — कोई हँसते हुए बतिया रहा था, तो कोई गरमा-गरम पकौड़े और चाय का मज़ा ले रहा था। चाय की भाप और तली हुई मिर्ची की खुशबू ने पूरे माहौल को और भी जिंदा कर दिया।
अजय और रोहित भी एक ठेले पर रुक गए।
“भाई, ये तो वही स्वाद है जो बचपन में मिलता था,” अजय ने पकौड़े का पहला कौर लेते हुए कहा।
रोहित हँस पड़ा, “और तू हमेशा चार खाता था, पैसे मैं देता था!”
दिन ढलते-ढलते चौराहे की रौनक धीरे-धीरे पीली लैंप-लाइट में घुल गई। बाइक वापस मोड़ते वक्त अजय के मन में बस यही खयाल था — कभी-कभी सुकून तलाशने के लिए शहर छोड़कर गाँव की गलियों में लौटना ही पड़ता है।

2.5. तारों की छाँव में अरेंज्ड मैरिज का फलसफा

अजय और रोहित का दिन गाँव की गलियों में घूमते हुए बीता। रास्ते में वे कई रिश्तेदारों और परिचितों से मिले, जिनसे उनकी हल्की-फुल्की बातें हुईं। गाँव की शाम धीरे-धीरे रात में बदलने लगी।
रात को खाना खाकर अजय घर के आँगन में रखी खाट पर लेट गया। ऊपर खुला आसमान नजर आ रहा था — तारे इतने साफ और चमकीले थे, जैसे पूरे आकाश पर हीरे बिखरे हों। गाँव की रात की ये ख़ामोशी शहर की आवाज़ों से बिलकुल अलग थी, जैसे हर सांस में शांति घुली हो।
अजय ने गहरी सांस लेकर सोचा, "उस लड़की की तस्वीर तो मैं पहले ही देख चुका हूँ। कल जब आमने-सामने मुलाकात होगी, तो कैसा माहौल होगा? क्या वह मुझे पसंद करेगी? मैं उससे क्या बातें करूँगा? अभी हम दोनों एक-दूसरे के लिए अनजान हैं। शायद वह भी मेरी तरह बेचैन होगी, शायद वह भी मेरे बारे में सोच रही होगी।"
उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। वह तारे देखते हुए यही दुआ करने लगा कि कल की मुलाक़ात अच्छी हो।
"शादी… अरेंज्ड हो या लव, क्या सच में फर्क पड़ता है?" अजय तारों को देखते हुए सोचने लगा।
"किसी फिल्म की तरह पहले से मोहब्बत नहीं होती… बल्कि ये तो एक ख़ाली कैनवास जैसा रिश्ता होता है। दो लोग धीरे-धीरे एक-दूसरे को जानने लगते हैं, समझने लगते हैं… और फिर उसी खाली कैनवास पर अपनी ज़िंदगी के रंग भरते हैं।"
"शुरुआत में झिझक रहती है, थोड़ी दूरी भी। मगर वक्त के साथ… जब साथ में हँसी आती है, छोटी-छोटी नोक-झोंक होती है, और जब हम एक-दूसरे की पसंद-नापसंद को समझने लगते हैं… तो वही अनजानपन दोस्ती में बदल जाता है।"
"और शायद… वहीं से असली प्यार जन्म लेता है। ऐसा प्यार जो भरोसे और सम्मान की बुनियाद पर खड़ा हो। जब दो लोग एक-दूसरे की कमियों को भी अपना लें, मुश्किल समय में एक-दूसरे का सहारा बन जाएँ… तभी तो समझ आता है कि ये रिश्ता कितना ख़ास है।"
यही सब सोचते-सोचते अजय को नींद आ गई।

2.6. नए सफ़र की सुबह और रोहित का 'सीक्रेट नंबर' प्लान

सुबह होते ही घर में चहल-पहल शुरू हो गई। आँगन में लोग इधर-उधर घूम रहे थे, तैयारियाँ चल रही थीं। दरवाज़े के बाहर मारुति खड़ी थी—पापा, मौसी और बाकी रिश्तेदार निकलने को तैयार थे।
अजय भी तैयार होकर बाहर आया। तय हुआ कि बाकी सब मारुति से जाएंगे, जबकि अजय और रोहित बाइक से पीछे-पीछे चलेंगे। इंजन स्टार्ट होते ही अजय का दिल अजीब तरह से धड़कने लगा—जैसे डर और खुशी दोनों एक साथ जगह माँग रहे हों।
रोहित ने मुस्कुराकर कहा, “भाई, ज़्यादा टेंशन मत लो, लड़की को इम्प्रेस करने से पहले हेलमेट उतार लेना—वरना फोटो में सिर्फ़ शीशा दिखेगा!”
अजय ने हँसते हुए जवाब दिया, “तू चल बाइक ठीक से, तेरे मज़ाक से ही मैं ज़्यादा डर रहा हूँ।”
रास्ते में ही पापा का फ़ोन आया— “अजय, फल ले लिए हैं। तुम रास्ते में एक किलो मिठाई ले लेना।”
फ़ोन रखते ही अजय मुस्कुराया। यह छोटी-सी बात उसके मन की बेचैनी को जैसे हल्का कर गई—सोचा, “लगता है ये सफ़र वाकई मीठा होने वाला है।”
रोहित ने फिर चुटकी ली, “वाह, अभी से मिठाई… मतलब भाई की शादी पक्की समझूँ?”
अजय ने बस मुस्कुराकर उसे घूरा—दोनों की हँसी के बीच बाइक तेज़ी से आगे बढ़ गई।
तभी रोहित मुस्कराते हुए बोला, “भाई, एक काम ज़रूर करना… भाभी का नंबर ले लेना।”
अजय ने हँसते हुए सिर हिलाया, “यार, ये इतना आसान थोड़ी है। वहाँ सब लोग होंगे, कोई ना कोई तो देख ही लेगा। और अगर माँ-पापा को पता चला तो?”
“अरे, देखे तो देखे! शादी की बात चल रही है, चोरी थोड़ी कर रहे हो,” रोहित ने आँख मारते हुए कहा।
अजय थोड़ा सोचकर बोला, “फिर भी… इतना तो चाहिए कि हम थोड़ी देर अकेले बात कर सकें। पाँच मिनट मिल भी गए तो क्या? हम एक-दूसरे को जान थोड़ी लेंगे इतने में। नंबर होगा तो बात होगी, तभी तो जान पहचान बनेगी…”
रोहित ने मुस्कान दबाते हुए मिठाई का डिब्बा उठाया और उसके एक side पर पेन से कुछ लिख दिया।
“लो भाई, आधा काम मैंने कर दिया। तेरा नंबर लिख दिया है। अब बस उसको बोल देना—अगर उसका मन हो और अगर तू उसके घर में सबको पसंद आए तो बात कर ले।”
अजय हैरान, “तू भी ना… कोई देख लेगा तो?”
रोहित ने कंधे उचकाए, “देखने दे! और अगर भाभी ने call किया, तो समझ लेना बात सही दिशा में जा रही है। और किसी को क्या पता कि मिठाई के डिब्बे पर तेरा नंबर है, बस तू जब भाभी से बात कर रहा होगा तो उनको बता देना,” और वह मुस्कुराने लगता है।