Last seen at 11:11 in Hindi Love Stories by SHREYA INDUSHREE books and stories PDF | लास्ट सीन एट 11:11

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लास्ट सीन एट 11:11

जुलाई की बारिश दिल्ली को हमेशा थोड़ा उदास बना देती थी।
शाम के सात बजे थे। कनॉट प्लेस के एक कैफ़े में बैठे-बैठे कियान मल्होत्रा अपने लैपटॉप की स्क्रीन पर झुका हुआ था। सामने कॉफी कब की ठंडी हो चुकी थी। लेकिन उसकी आँखें हर दो मिनट में फोन की स्क्रीन पर चली जाती थीं।"Last seen today at 11:11 AM."

बस इतना ही,पिछले तीन दिनों से अदिति का यही आखिरी निशान था। उसके अलावा न कोई मैसेज,न कोई कॉल,न कोई नया पॉडकास्ट,न इंस्टाग्राम पर कोई स्टोरी......कुछ भी नहीं।

और यह पहली बार नहीं था।दोनों के बीच चुप्पियाँ नई नहीं थीं।
उनकी कहानी की शुरुआत भी तो किसी फिल्मी मुलाकात से नहीं हुई थी।

सात साल पहले,दिल्ली विश्वविद्यालय का आखिरी साल था।
कियान इंजीनियरिंग पढ़ रहा था और अदिति पत्रकारिता।दोनों एक-दूसरे को जानते भी नहीं थे।लेकिन एक रात ट्विटर पर किसी बेवकूफी भरे मीम को लेकर दोनों की बहस हो गई।

अदिति ने लिखा था"जिस इंसान को बारिश और पुरानी किताबें पसंद नहीं, उस पर भरोसा नहीं करना चाहिए।"

कियान ने जवाब दिया था"और जो लोग हर चीज़ को कविता बना देते हैं, उनसे तो बिल्कुल नहीं।"

अदिति ने गुस्से वाला इमोजी भेजा था।और फिर शुरू हुई थी एक ऐसी बातचीत, जो अगले सात साल तक कभी सचमुच खत्म नहीं हुई।वे दोस्त थे।कम-से-कम दुनिया के लिए।लेकिन दुनिया और रिश्तों की परिभाषाएँ कभी एक जैसी नहीं होतीं।

रात के ग्यारह बजकर ग्यारह मिनट पर दोनों एक-दूसरे को मैसेज भेजते।यह आदत अदिति ने शुरू की थी।"11:11 पर विश माँगते हैं लोग। हम एक-दूसरे की खबर माँग लिया करेंगे।"
और फिर यह उनकी दुनिया का हिस्सा बन गया।चाहे कितनी भी लड़ाई हो जाए।चाहे कितनी भी दूरी आ जाए।

11:11 पर एक मैसेज जरूर आता"जिंदा हो?"

और दूसरी तरफ से जवाब"अभी तक।"

समय के साथ जिंदगी बदलती गई।कियान बेंगलुरु चला गया।
एक स्टार्टअप में नौकरी,फिर अपनी कंपनी....फिर निवेशक.....फिर मीटिंग्स।और फिर वही बीमारी, जिससे आज की पूरी पीढ़ी पीड़ित थी......व्यस्त होने का नशा।

उधर अदिति मुंबई में थी।उसका पॉडकास्ट "सुनो, कोई है?" धीरे-धीरे लाखों लोगों तक पहुँच चुका था।वह लोगों की कहानियाँ रिकॉर्ड करती थी,टूटी हुई शादियाँ,अधूरे प्रेम,अकेले बूढ़े......घर छोड़कर चले गए बच्चे।और उन सबकी कहानियाँ सुनते-सुनते, शायद वह खुद अपनी कहानी जीना भूल गई थी।

एक दिन अदिति ने पूछा था"कियान, अगर मैं अचानक गायब हो गई तो?"

"ड्रामा मत करो।"

"नहीं, सच में।"

"तो मैं पुलिस में रिपोर्ट लिखवा दूँगा।"

अदिति हँस पड़ी थी।"बेवकूफ आदमी।"

"और क्या?"

"कुछ नहीं।"

लेकिन उस दिन उसके "कुछ नहीं" में बहुत कुछ था।जो कियान समझ नहीं पाया।फिर जिंदगी ने वही किया, जो वह हमेशा करती है।दोनों के बीच लोग आए,रिश्ते आए,टूटे...बिखरे।लेकिन किसी के साथ भी उन्हें वह सुकून नहीं मिला, जो एक-दूसरे की चुप्पी में मिलता था।फिर भी उन्होंने कभी प्रेम का नाम नहीं लिया।

शायद डरते थे।या शायद उन्हें लगता था कि नाम मिलते ही रिश्ता छोटा हो जाएगा।और अब...तीन दिन हो चुके थे।फोन अब भी चुप था....Last seen at 11:11 AM.
कियान ने पहली बार घबराकर अदिति की छोटी बहन रिया को फोन किया।उधर से कुछ पल की खामोशी आई।

फिर धीमी आवाज"भैया... दीदी अस्पताल में हैं।"

कियान का दिल जैसे रुक गया।"क्या हुआ?"

"उन्होंने किसी को बताने से मना किया था..."

"रिया!"

"कैंसर..."

बारिश बाहर अब भी हो रही थी।लेकिन उस क्षण कियान को लगा, जैसे उसके भीतर कुछ टूटकर बिखर गया है।उसे अचानक याद आया,पिछले छह महीनों से अदिति हर बात पर कहती थी"समय बहुत तेज़ भाग रहा है, ना?"और वह हर बार हँसकर बात टाल देता था।

उसे क्या पता था...कि अदिति समय की रफ्तार नहीं, अपनी बची हुई जिंदगी की बात कर रही थी।

अस्पताल की सातवीं मंज़िल पर पहुँचते-पहुँचते रात के नौ बज चुके थे।कियान ने शायद पहली बार महसूस किया कि लिफ्ट का हर सेकंड कितना लंबा हो सकता है।
कमरा नंबर 712....दरवाज़े के बाहर रिया बैठी थी। आँखें सूजी हुई थीं, लेकिन चेहरा वैसा ही था जैसा अदिति का हुआ करता था,हँसते हुए भी थोड़ा उदास।कियान को देखते ही वह उठ खड़ी हुई।

"आपको नहीं बुलाना चाहती थीं।"

"क्यों?"

रिया हल्का-सा मुस्कुराई।"कहती थीं, 'उसे तकलीफ़ होगी। वह वैसे भी खुद का ख़याल नहीं रखता।'"

कियान कुछ नहीं बोला।सिर्फ दरवाज़ा खोलकर भीतर चला गया।अदिति खिड़की के पास वाले बेड पर थी।
कमज़ोर,बहुत कमज़ोर।उसके बाल पहले से छोटे हो गए थे।
लेकिन आँखें...वे अब भी वैसी ही थीं।

उसे देखते ही अदिति ने मुस्कुराकर कहा"अच्छा हुआ आ गए। मैं सोच रही थी कि मिस्टर बिज़ी शायद मीटिंग में होंगे।"

कियान की आँखें भर आईं।"और तुम सोच रही थीं कि यह सब मुझसे छुपा लोगी?"

"कोशिश तो अच्छी थी।"

"तुम पागल हो?"

"थोड़ी-सी।"

"अदिति..."

उसने उसका हाथ पकड़ लिया।"डर लग रहा है, कियान।"
यह शायद पहली बार था जब उसने अदिति की आवाज़ में डर सुना।वह लड़की, जो हमेशा दूसरों का साहस बनती थी, आज खुद काँप रही थी।कियान ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया।

"कुछ नहीं होगा।"

अदिति हँस पड़ी।"झूठ बोलना तुमसे कभी सीखा नहीं गया।"उस रात ग्यारह बजकर ग्यारह मिनट पर पहली बार दोनों एक ही कमरे में थे।अदिति ने मोबाइल उठाया और व्हाट्सएप खोला।

फिर कियान की तरफ देखकर बोली"मैसेज करो।"

"क्या?"

"11:11 है।"

कियान की आँखों से आँसू बह निकले,उसने काँपते हाथों से लिखा...."जिंदा हो?"

अदिति के फोन में नोटिफिकेशन आया।उसने पढ़ा।और जवाब लिखा"अभी तक।"

फिर दोनों हँस पड़े।और उसी हँसी के बीच कियान रो पड़ा।
कुछ देर बाद अदिति ने धीरे से पूछा"कियान, तुम्हें कभी लगा कि हमसे गलती हो गई?"

"किस बात की?"

"इतने साल... और हमने कभी एक-दूसरे को बताया ही नहीं।"

कियान चुप रहा, फिर बोला"शायद हम दोस्ती खोने से डरते रहे।"

अदिति ने सिर हिलाया।"और प्रेम भी नहीं पाया।"कमरे में खामोशी फैल गई।बाहर शहर की रोशनियाँ चमक रही थीं।

कियान ने धीरे से कहा"मैं तुमसे प्रेम करता हूँ।"

अदिति की आँखें भर आईं।"इतने साल लगा दिए?"

"तुमने भी तो कुछ नहीं कहा।"

"मैं लड़की थी, मुझे भाव खाना था।"

दोनों फिर हँस पड़े।और उस रात, इतने वर्षों बाद, उन्होंने पहली बार अपने रिश्ते को कोई नाम दिया।लेकिन समय...समय हमेशा प्रेमियों के पक्ष में नहीं होता।

और शायद इस बार भी नहीं था।क्योंकि अगले ही दिन डॉक्टर ने कियान को अपने केबिन में बुलाकर धीमी आवाज़ में कहा,
"अब इलाज से ज़्यादा ज़रूरी है कि जो समय बचा है, वह अच्छे से बीते।"

कियान के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।लेकिन उसी शाम अदिति ने मुस्कुराते हुए कहा"एक काम करेंगे?"

"क्या?"

"अगर मेरे पास सच में कम समय है... तो रोना-धोना नहीं।"

"अदिति..."

"नहीं, सुनो।"

उसने धीरे से कहा"इस बार 14 अगस्त का इंतज़ार नहीं करेंगे।"

"फिर?"

"चलो, बाकी की जिंदगी जी लेते हैं।"

और कियान ने पहली बार महसूस किया,कभी-कभी प्रेम का सबसे दुखद हिस्सा बिछड़ना नहीं होता...बल्कि यह जानना होता है कि आखिरकार जब तुम सही समय पर सही इंसान तक पहुँचते हो...तो समय ही कम बचा होता है।

उस दिन के बाद अस्पताल उनके लिए किसी दुख की जगह नहीं रहा।अदिति ने मानो तय कर लिया था कि वह बीमारी को अपनी कहानी का आख़िरी अध्याय नहीं बनने देगी।

"मरने के पहले लोग यूरोप जाते हैं, पैराशूट से कूदते हैं, किताबें लिखते हैं। और मैं?" उसने एक दिन कहा था, "मैं तो बस तुम्हारे साथ दिल्ली की सर्दियाँ जीना चाहती हूँ।"

"बस इतनी-सी इच्छा?"

"इतनी-सी नहीं है, मिस्टर मल्होत्रा। दिल्ली की सर्दियाँ, इंडिया गेट की रातें और पुरानी दिल्ली की जलेबी... बहुत बड़ी चीज़ें हैं।"

दो महीने बाद,अदिति अस्पताल से घर आ चुकी थी।उसके बाल अब लगभग नहीं थे। वह कभी-कभी शीशे के सामने खड़ी होकर अपने सिर को देखती और कहती"मैं आमिर खान की 'गजनी' वाली फैन लग रही हूँ न?"

और कियान हर बार कहता"नहीं। तुम अभी भी वही लड़की लग रही हो जिसने ट्विटर पर मुझे बेवकूफ कहा था।"

"क्योंकि तुम थे।"

"और अब?"

"अब भी हो।"
दोनों हँस पड़े।हर कोई जानता था कि हंसी झूठी ही है।धीरे-धीरे कियान ने काम कम कर दिया।उसकी कंपनी के लोग हैरान थे।

"तुम अपना करियर दाँव पर लगा रहे हो।"

लेकिन पहली बार उसे लगा कि हर सफलता का कोई मतलब नहीं होता।कुछ लोग, कुछ रिश्ते और कुछ शामें... किसी भी प्रमोशन से बड़ी होती हैं।

एक रात दोनों इंडिया गेट के पास बैठे थे।दिसंबर की ठंडी हवा थी।अदिति ने हाथ में कॉफी का कप पकड़ा हुआ था।"जानते हो, मैं किस बात से सबसे ज़्यादा डरती थी?"

"मौत से?"

"नहीं।"

"फिर?"

"इस बात से कि मेरे बाद कोई मुझे याद नहीं करेगा।"

कियान ने उसकी ओर देखा।"तुम्हें पता है, इंटरनेट पर तुम्हारे पॉडकास्ट के लाखों श्रोता हैं?"

"वो सब भूल जाएँगे।"

"मैं नहीं भूलूँगा।"

अदिति मुस्कुराई।"हाँ, तुम तो बहुत फालतू आदमी हो।"

"और तुम?"

"मैं भी।"फिर अचानक वह चुप हो गई।

कुछ देर बाद बोली"अगर अगले जन्म जैसा कुछ हुआ, तो मुझे फिर से ढूँढ़ लेना।"

"और अगर इस बार भी ट्विटर पर लड़ाई हो गई तो?"

"तो शादी जल्दी कर लेना, बेवकूफ।"

उस रात 11:11 पर मैसेज नहीं आया।क्योंकि दोनों साथ थे।
अदिति ने कहा"अब इसकी ज़रूरत नहीं।"

"क्यों?"

"क्योंकि अब तुम सामने बैठे हो।"

लेकिन समय...समय अपने वादे नहीं बदलता।जनवरी की एक सुबह अदिति को अचानक साँस लेने में तकलीफ़ हुई,अस्पताल.....आईसीयू....मशीनों की आवाज़.....और दरवाज़े के बाहर बैठा कियान।

पहली बार उसे लगा कि दुनिया कितनी निर्दयी होती है।
उस लड़की के साथ भी, जिसने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा था।शाम को थोड़ी देर के लिए अदिति को होश आया।उसने बड़ी मुश्किल से आँखें खोलीं।

"कियान..."

"हाँ, मैं यहीं हूँ।"

"समय क्या हुआ है?"

कियान ने घड़ी देखी।11 बजकर 10 मिनट।

अदिति के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।"एक मिनट बाकी है।"
फिर उसने धीमे से कहा"फोन..."

कियान ने उसका फोन उसके हाथ में दिया.....11:11.....फोन पर नोटिफिकेशन आया।कियान मल्होत्रा"जिंदा हो?"कमज़ोर उँगलियों से अदिति ने जवाब टाइप किया।बहुत धीरे और बहुत मुश्किल से।लेकिन उसके चेहरे पर वही पुरानी शरारती मुस्कान थी।

"अभी तक..."और फिर...उसने कियान का हाथ पकड़ लिया।"सुनो..."

"हाँ?"

"इस बार लेट मत करना..."

"किस बात में?"

"जीने में..."और उसकी आँखें धीरे-धीरे बंद हो गईं।उस रात दिल्ली में बारिश हुई थी,जनवरी में....बिना मौसम की बारिश.....जिसे मावठ कहते हैं।
और कियान को पहली बार समझ आया,कुछ लोग हमारे जीवन से चले नहीं जाते।वे हमारी आदतों में बस जाते हैं।कॉफी के कप में...पुराने गानों में।

11:11 के उस एक मिनट में,और उन तमाम बातों में...जो कभी कही नहीं गईं, लेकिन हमेशा महसूस की जाती रहीं।

अदिति के जाने के बाद समय चलता रहा।जैसे चलता है,बड़ी बेरहमी से,बिना रुके।बिना किसी के लिए ठहरे।

लोग कहते थे"समय सब ठीक कर देता है।"लेकिन कियान को लगता था, समय कुछ भी ठीक नहीं करता।वह बस हमें दर्द के साथ जीना सिखा देता है।पहले कुछ महीने उसने काम में खुद को डुबो देने की कोशिश की।फिर उसे एहसास हुआ कि खालीपन को व्यस्तता से नहीं भरा जा सकता।

अदिति की किताबें अब भी उसकी अलमारी में थीं।उसका कॉफी मग अब भी रसोई में रखा था।और रात के 11:11 बजते ही उसकी उँगलियाँ अनायास फोन की ओर बढ़ जाती थीं।
लेकिन स्क्रीन पर अब कोई "Last Seen" नहीं आता था।
कोई "Typing..." नहीं दिखता था।वहां सिर्फ सन्नाटा सिर्फ सन्नाटा पसरा रहता था।

दो साल बीत गए,कियान ने दिल्ली छोड़ दी।वह पुणे में रहने लगा।अपनी कंपनी बेच दी।और एक छोटे-से घर में रहने लगा, जहाँ बालकनी से शाम का आसमान दिखाई देता था।

लोग कहते"इतनी छोटी उम्र में रिटायर हो गए?"

वह हँसकर कहता"नहीं, बस जीना शुरू किया है।"

अदिति की आखिरी बात उसे याद थी"इस बार लेट मत करना... जीने में।"एक दिन रिया उससे मिलने आई।उसके हाथ में एक छोटा-सा पैकेट था।"दीदी ने आपके लिए छोड़ा था।"
कियान ने हैरानी से पूछा,"दो साल बाद?"

रिया मुस्कुराई।"उन्होंने कहा था, दो साल तक मत देना। वह पहले बहुत रोएगा।"

कियान की आँखें भर आईं।"और अब?"

"अब शायद थोड़ा कम रोता होगा।"

पैकेट में एक पेन ड्राइव थी।और एक छोटा-सा नोट।जिस पर अदिति की लिखावट थी"अगर तुम यह सुन रहे हो, तो इसका मतलब है कि तुम अब भी बहुत जिद्दी हो।" कियान ने काँपते हाथों से लैपटॉप खोला।

फोल्डर का नाम था,Episode #111 ......Last Seen at 11:11

और फिर...हेडफोन में अदिति की आवाज़ गूँजी।वही हँसती हुई आवाज़,वही हल्की शरारत।जैसे कुछ बदला ही न हो।

"हाय, मिस्टर मल्होत्रा।""अगर तुम यह सुन रहे हो, तो इसका मतलब है कि मैं तुम्हें छोड़कर नहीं गई हूँ।""बस थोड़ा-सा आगे चली गई हूँ।"

कियान की आँखों से आँसू बह निकले।आवाज़ आगे बोली,"तुम जानते हो, मुझे हमेशा लगता था कि प्रेम का मतलब साथ रहना नहीं है।"

"प्रेम का मतलब है..."किसी के चले जाने के बाद भी उसका तुम्हारे भीतर बचा रहना।"

"तो प्लीज...""मुझे याद करके उदास मत होना।""मुझे याद करके मुस्कुराना।""और हाँ...""अगर कोई लड़की तुम्हें पसंद आ जाए, तो उसके साथ खुश रहना।""मुझे जलन नहीं होगी।"

फिर कुछ सेकंड की खामोशी थी।और उसके बाद...धीमी हँसी।
"झूठ बोल रही हूँ।""थोड़ी-सी होगी।"

कियान हँसते-हँसते रो पड़ा।रिकॉर्डिंग के आखिरी हिस्से में अदिति की आवाज़ बहुत धीमी हो गई थी।

"एक बात और...""तुमने कभी गौर किया?""हमने सात साल तक 11:11 पर एक-दूसरे से सिर्फ एक सवाल पूछा।"

'जिंदा हो?'"लेकिन असली सवाल तो यह था ही नहीं।"असली सवाल था..."क्या तुम अब भी मुझसे प्रेम करते हो?"

"और हर बार तुम्हारा जवाब था..."अभी तक..."

रिकॉर्डिंग खत्म हो गई।कमरे में फिर सन्नाटा था।लेकिन इस बार वह सन्नाटा खाली नहीं था।उसमें अदिति की हँसी थी।उसकी आवाज़ थी।उसका प्रेम था।उस रात बहुत दिनों बाद कियान बालकनी में बैठा।आसमान साफ था।घड़ी में 11:11 हुए।

आदत से मजबूर उसने अपना फोन खोला।व्हाट्सएप खोला।
अदिति की चैट अब भी सबसे ऊपर पिन थी।उसने एक मैसेज टाइप किया,"जिंदा हो?"और फिर खुद ही मुस्कुरा दिया।

कुछ देर बाद उसने दूसरा मैसेज लिखा"मैं हूँ।""अभी तक..."

और पहली बार...दो सालों में...कियान रोया नहीं,वह मुस्कुराया।क्योंकि उसे आखिरकार समझ आ गया था।कुछ प्रेम कहानियों का सुखद अंत नहीं होता।लेकिन उनका अंत दुखद भी नहीं होता।

वे बस...हमारे भीतर हमेशा के लिए रह जाती हैं।




"समाप्त।"