Kaatil Aur Waaris in Hindi Fiction Stories by Deepak Singh books and stories PDF | कातिल और वारिस

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कातिल और वारिस

एपिसोड 1: सोने का पिंजरा

खामोशी की भी अपनी एक भाषा होती है, और रणजीत सिंह के इस पाँच सौ गज में फैले आलीशान महल में वह भाषा 'मौत' के समान सर्द थी। यह सन्नाटा कानों को नहीं, सीधे रूह को झकझोर देता था। महल की भारी-भरकम, सीलन भरी दीवारों के भीतर हवा इस कदर ठहरी हुई थी, जैसे समय ने यहाँ आकर अपना दम तोड़ दिया हो। ऊँची छतों से लटकते विशाल झूमर भी रोशनी से ज़्यादा परछाइयाँ उगल रहे थे।

यहाँ आधुनिकता के नाम पर कोई शोर नहीं था—न टेलीविज़न की चकाचौंध, न ही कंप्यूटर की स्क्रीन की कोई हरकत। यहाँ था तो बस भारी सागवान की नक्काशीदार लकड़ियों से उठती वह अजीब-सी पुरानी महक, ज़मीन पर बिछे वो बेशकीमती लाल ईरानी कालीन जो किसी भी इंसान की आहट को अपने मखमली रेशों में खामोशी से दफन कर लेते थे, और हॉल के एक अँधेरे कोने में लगी वह पुरानी आबनूस की पेंडुलम घड़ी।

टिक... टिक... टिक...

सन्नाटे को चीरती उस घड़ी की हर एक गूँज समय नहीं, बल्कि इस घर में घुट रहे एक इंसान की बची हुई साँसों को बेरहमी से गिन रही थी।

महल के सबसे एकांत और सीलन भरे पश्चिमी कोने में स्थित 'स्टडी रूम' की भारी, पुरानी चमड़े की कुर्सी पर दीपक बैठा था। स्टडी लैंप की पीली, मद्धम रोशनी में उसका चेहरा किसी मोम के पुतले सा पीला और भावहीन लग रहा था। पचास हज़ार करोड़ के साम्राज्य का इकलौता वारिस, जिसका अपना वजूद इस घर में उड़ते हुए धूल के एक कण से ज़्यादा नहीं था। उसके चारों ओर बंद किताबों की दमघोंटू महक और पुरानी फाइलों का एक ऊँचा अंबार था—वो फाइलें, जो उसे पल-पल याद दिलाती थीं कि वह इस सल्तनत का मालिक नहीं, बल्कि एक आलीशान कैदी है।

उसके माता-पिता का साया सालों पहले एक कथित "हादसे" में छिन गया था। उस हादसे की धुंधली, खून से सनी यादें दीपक के ज़हन में आज भी टूटे काँच के टुकड़ों की तरह चुभती थीं। पर उस हादसे के पीछे का असली मास्टरमाइंड आज उसके बिल्कुल सामने खड़ा था—उसका सगा मामा, रणजीत सिंह।

रणजीत सिंह का वजूद किसी पुराने, ज़हरीले बरगद के पेड़ जैसा था, जिसकी घनी और मनहूस छाया में कोई भी पौधा पनप नहीं सकता था। चांदी जैसे सफेद बाल, संगमरमर सा कठोर चेहरा और आँखों में एक ऐसा सर्द लालच जो कभी तृप्त नहीं होता था। उसके होंठों पर हमेशा एक ऐसी सधी हुई मुस्कान तैरती थी, जो शहद में लिपटी हुई किसी तेज़ धार वाली छुरी से कम नहीं थी।

रणजीत धीमी पर नपे-तुले कदमों से चलकर दीपक के पास आया। उसके भारी जूतों की खटक संगमरमर के ठंडे फर्श पर किसी हथौड़े की तरह गूँज रही थी, जो हर कदम के साथ दीपक के सीने पर चोट कर रही थी। उसने मेज़ पर संपत्ति हस्तांतरण (प्रॉपर्टी ट्रांसफर) के कुछ मोटे कागज़ात रखे। सन्नाटे में कागज़ों की सरसराहट और उसके साथ रखे गए उस भारी, ठंडे सोने के फाउंटेन पेन की चमक ने कमरे की पीली रोशनी में एक अजीब सी चुभन भर दी।

"हस्ताक्षर कर दो, मेरे बच्चे," रणजीत सिंह की खुरदरी आवाज़ में फिक्र का इतना महीन और सधा हुआ अभिनय था कि कोई भी अजनबी धोखा खा जाए। "तुम्हारी भलाई के लिए ही तो यह सारा बोझ मैंने अपने इन बूढ़े कंधों पर उठा रखा है। कंपनी के शेयर, ज़मीन के सौदे... सब संभालना कितना थका देने वाला काम है, तुम अभी नहीं समझोगे।"

दीपक पत्थर की तरह बुत बना बैठा रहा। उसने वह भारी पेन पकड़ा, पर उसकी उंगलियाँ उस दबे हुए गुस्से से हल्की-हल्की काँप रही थीं जो पिछले बीस सालों से किसी खौलते हुए लावे की तरह उसकी रगों में दौड़ रहा था।

वसीयत की शर्त बिल्कुल साफ़ थी—जब तक दीपक पच्चीस साल का नहीं हो जाता, वह इस अताह दौलत का एक रुपया भी नहीं छू सकता था। सारी कानूनी और आर्थिक शक्ति रणजीत सिंह की मुट्ठी में कैद थी। और दीपक आज पूरे चौबीस साल का हो चुका था।

रणजीत मेज़ पर थोड़ा और झुका। लैंप की रोशनी के आड़े आने से उसकी परछाई दीपक के कागज़ों पर किसी काले राक्षस की तरह लंबी और डरावनी होती गई। उसने दीपक के कान के पास झुककर, एक बर्फीली फुसफुसाहट में कहा, "तुम्हारे पच्चीस साल के होने में अभी पूरा एक साल बाकी है, दीपक... और तब तक, इस घर में तुम्हारी उंगलियाँ वही लिखेंगी, जो मेरा दिमाग चाहेगा। तुम इस साम्राज्य के वारिस ज़रूर हो, पर इस शतरंज की बिसात का इकलौता खिलाड़ी मैं हूँ।"

दीपक ने बिना एक शब्द कहे, काँपते हाथों से कागज़ पर हस्ताक्षर कर दिए। गुस्से में सोने के पेन की निब मोटे कागज़ पर इतनी ज़ोर से दबी कि पन्ना नीचे से थोड़ा फट गया, मानो उस सफेद कागज़ के सीने पर कोई गहरा घाव हो गया हो।

रणजीत सिंह के होंठों पर जीत की एक क्रूर, तिरछी मुस्कान आई। उसने कागज़ उठाया, उसे करीने से मोड़ा और बिना मुड़े कमरे से बाहर चला गया। उसके जाते ही हवा में घुली हुई उसके महंगे 'कस्तूरी' इत्र की तेज़ खुशबू और उस दम घोंटने वाले अहसास ने स्टडी रूम के पहले से ठहरे हुए माहौल को और भी घुटन भरा बना दिया।

उसके कदमों की आवाज़ दूर होते ही, दीपक ने अपनी मुट्ठी इतनी ज़ोर से भींची कि उसके खुद के नाखून उसकी हथेली में गहरे धँस गए। कुछ ही पलों में, खून की एक लाल, गर्म बूँद टपक कर उस कीमती लाल कालीन पर गिरी और उसी में गुम हो गई। पर दीपक की आँखों में अब डर या बेबसी का नामोनिशान नहीं था। वहाँ एक सुलगती हुई आग थी, एक ऐसी नफरत जो अब अपने इस सोने के पिंजरे को पिघलाने के लिए बेताब थी।

वह अपनी जगह से उठा और भारी कदमों से चलते हुए ऊँची, मेहराबदार खिड़की के पास गया। बाहर आसमान में काले, घने बादल उमड़ रहे थे और दूर कहीं बिजली कड़क रही थी। खिड़की के कांच पर गिरती बारिश की पहली बूँद ने सन्नाटे को तोड़ा।

'सिर्फ 365 दिन, मामा... सिर्फ 365 दिन,' खिड़की के ठंडे कांच पर माथा टिकाए दीपक ने अपने अंदर के चीखते हुए उस मासूम बच्चे को शांत किया। 'जिस दिन मैं पच्चीस का हूँगा, मैं इस पूरे महल को अपनी नफरत की आग में जलाकर राख कर दूँगा। तुम्हें लगता है मैं एक डरपोक प्यादा हूँ, पर तुम नहीं जानते कि इस भयानक अंधेरे ने मुझे अंदर से क्या बना दिया है।'

वक़्त अपनी चाल से रेंगने लगा। हर एक गुज़रता दिन उस सोने के पिंजरे में एक सदी जैसा भारी और घुटन भरा था। पर दीपक खामोश रहा, ज़हर पीकर बर्दाश्त करता रहा। वह समंदर की उस शांत लहर जैसा था, जो पीछे हटने के बाद एक खौफनाक सुनामी लाने की तैयारी कर रही थी।

पर उस वक़्त, खिड़की से बाहर देखते दीपक को यह बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था... कि उसकी उस आज़ादी की ख़ूनी मंज़िल पर एक और तूफ़ान उसका बेसब्री से इंतज़ार कर रहा है। एक ऐसी लड़की, जो उसके ठंडे पड़ चुके वजूद में इश्क़ और बगावत की ऐसी आग लगाने वाली थी, जिसे शायद वह खुद भी नहीं बुझा पाएगा।

 

एपिसोड 2: एक खामोश मौत

वक़्त की सुइयां किसी ज़हरीले साँप की तरह रेंगती रहीं और अंततः 365 दिनों का वह लंबा, घुटन भरा इंतज़ार अपनी मौत मर गया।

दीपक अब पच्चीस साल का हो चुका था। कागज़ों की स्याही चीख-चीख कर गवाही दे रही थी कि वह अब उस पचास हज़ारों करोड़ के अताह साम्राज्य का इकलौता और पूर्ण कानूनी वारिस है। रणजीत सिंह का वह काला, मनहूस साया महल की दीवारों से हट तो गया था, लेकिन वह पीछे जो एक गहरा शून्य और कब्र जैसी खामोशी छोड़ गया था, उसने दीपक के वजूद को दीमक की तरह अंदर से खोखला कर दिया था। उसका सोने का पिंजरा टूटा नहीं था, बस उसकी सलाखें अब पहले से कहीं ज़्यादा नुकीली और सर्द हो गई थीं।

ज़िंदगी में पहली बार दीपक को लगा था कि किसी ने उसकी तिजोरी से नहीं, बल्कि उसके छले हुए अकेलेपन से प्यार किया है। पर अफ़सोस, वह सिर्फ एक खूबसूरत, खौफनाक बहुरूपिया नाटक था। उस लड़की ने एक मीठे भ्रम की तरह उसका इस्तेमाल किया, उसके सालों के सहेजे विश्वास को तार-तार किया और उसे एक ऐसे गहरे मानसिक अँधेरे में छोड़ गई, जहाँ से रौशनी की तरफ वापस लौटना अब नामुमकिन था।

दीपक अब अंदर से काँच के उस बर्तन की तरह बिखर चुका था, जिसे जोड़ने की कोई गुंजाइश नहीं बचती। उसने इस खोखली दुनिया, इस चुभने वाली अमीरी के बोझ और उस धोखे के ज़हर से हमेशा के लिए आज़ाद होने का फ़ैसला कर लिया था।

महल का वह विशाल, ऊँची छतों वाला हॉल, जहाँ कभी उसके पिता की बुलंद और रौबदार आवाज़ें गूँजती थीं, आज रात किसी श्मशान से भी ज़्यादा खामोश था। रात का सन्नाटा इतना भारी था कि किसी रोशनदान से छनकर आती हवा का एक सर्द झोंका भी जब भारी दीवारों से टकराता, तो एक लंबी, मनहूस सिहरन पैदा कर रहा था। उसी हॉल के फर्श पर बिछे उस कीमती लाल ईरानी कालीन पर दीपक अकेला, सुन्न बैठा था।

चाँद की पीली रोशनी खिड़की से छनकर उसके काँपते हुए हाथों पर पड़ रही थी, जिनमें नीले रंग के गाढ़े तरल से भरी एक छोटी-सी कांच की शीशी दबी थी—ज़हर की शीशी। कांच की वह ठंडक उसकी उंगलियों में उतर रही थी। उसके पीले पड़ चुके चेहरे पर अब दर्द या डर की कोई शिकन नहीं थी, बस एक गहरी, अनंत थकान थी—ऐसी थकान जो सिर्फ मौत की नींद से ही मिट सकती थी।

उसने अपनी भारी पलकें मूँद लीं। वह मौत के आगोश में जाने के लिए पूरी तरह तैयार था। उसने शीशी के ढक्कन पर अंगूठा रखा। ढक्कन के खुलने की वह मामूली सी 'क्लिक' की आवाज़ उस भारी सन्नाटे को चीरने ही वाली थी कि...

सर्ररर...

हवा को चीरते हुए किसी के बहुत तेज़ी से चलने की आहट हुई। एक काली परछाईं किसी शिकारी तेंदुए की गति से मेहराबदार दीवार के पीछे से उभरी। इससे पहले कि दीपक अपनी गर्दन घुमाता या उसकी आँखें खुलतीं, उसके सिर के पिछले हिस्से पर एक भारी और सटीक वार हुआ!

धड़ाम!

एक पल के लिए दुनिया घूम गई। कानों में एक तेज़ सीटी बजने लगी। दीपक का सिर चकराया और वह चेहरे के बल उस मखमली फर्श पर आ गिरा। उसके मुँह से कालीन की धूल भरी महक टकराई। तभी, एक फुर्तीला साया जंगली बिल्ली की तरह छलाँग लगाकर उसके पीछे आकर बैठ गया।

यह कविता थी।

रात के अंधेरे में लिपटी उस पेशेवर हत्यारी ने एक झटके में अपनी 'हेड-सीज़र ग्रिप' (headscissor grip) से दीपक की गर्दन को अपनी जांघों के बीच जकड़ लिया। उसकी पकड़ में कोई दया, कोई इंसानियत नहीं थी, सिर्फ एक ठंडे लोहे जैसी जकड़ थी, जिसने दीपक की श्वास नली को इस तरह दबा दिया कि फेफड़ों तक हवा का एक कतरा पहुँचना भी नामुमकिन हो गया।

दीपक का चेहरा ज़मीन की तरफ बुरी तरह दबा हुआ था। कविता ने थोड़ा और झुककर, उसके कान के पास एक ज़हरीली और ठंडी फुसफुसाहट छोड़ी, जिसकी गर्माहट दीपक की त्वचा पर मौत के अहसास की तरह रेंग गई।

"खेल खत्म, शहज़ादे। सोचा था तुझे लूटने में थोड़ी तो मेहनत करनी पड़ेगी, पर तू तो बड़ा आसान शिकार निकला।"

कविता उम्मीद कर रही थी कि हर अमीर, मगरूर आदमी की तरह यह रईसज़ादा भी अपनी जान की भीख माँगेगा, हाथ-पैर मारेगा, कालीन को नोचेगा और छटपटाएगा। पर वह पूरी तरह शांत था। बिल्कुल शांत। दीपक ने न तो कविता का चेहरा देखने की कोशिश की, न ही अपनी गर्दन को उस फौलादी जकड़ से छुड़ाने का कोई प्रयास किया। उसके पास अब लड़ने की कोई वजह, कोई ज्वाला ही नहीं बची थी। वह तो मौत को खुद अपने दरवाज़े पर बुला रहा था; उसे क्या फर्क पड़ता कि वह किसी ज़हर की शीशी से आए या रात के अंधेरे में आई इस अनजान हत्यारी के हाथों।

कविता को इस अजीब सी, मुर्दा शांति से झुंझलाहट होने लगी। यह उसके पेशेवर उसूलों के खिलाफ था। उसने चिढ़कर अपनी पकड़ और सख्त कर दी। दीपक की सांसें पूरी तरह घुटने लगीं। उसके दिमाग की नसें सुन्न पड़ने लगीं और आँखों के सामने छाए अंधेरे में गहरे लाल रंग के धब्बे तैरने लगे। वह बेहोशी और मौत की उस गहरी खाई में गिरने ही वाला था।

जैसे ही दीपक का शरीर बेजान होकर ढीला पड़ा, उसका दाहिना हाथ बेजान होकर फर्श पर गिर गया।

खन... खन...

उसकी खुलती हुई, पसीने से भीगी मुट्ठी से वह नीले रंग की कांच की शीशी छूटकर फर्श पर लुढ़क गई। शीशी के संगमरमर के हिस्से पर लुढ़कने की वह बारीक, खनकती हुई आवाज़ उस भारी सन्नाटे में किसी बंदूक के धमाके जैसी सुनाई दी।

कविता की तेज़ नज़र अचानक उस लुढ़कती हुई चीज़ पर गई जो चाँद की रोशनी में चमक रही थी। उस छोटी सी शीशी के लेबल पर बड़े, स्पष्ट अक्षरों में लिखा था: विष (POISON)।

कविता की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसकी साँसें एक पल के लिए गले में अटक गईं और वह सख्त, कातिलाना पकड़ जो किसी की जान लेने के लिए बनी थी, अचानक झटके से ढीली पड़ गई। उसने अपने पैरों के बीच दबे हुए उस बेजान, शांत जिस्म को देखा।

कविता के ठंडे दिमाग में अचानक सवालों का एक हिंसक तूफ़ान सा उठ खड़ा हुआ।

'यह क्या है? ज़हर?' कविता का पत्थर हो चुका दिल पहली बार एक अजीब से खौफ़ और उलझन से धड़क उठा। 'इतनी बड़ी अताह दौलत का मालिक... हज़ारों करोड़ के साम्राज्य का अकेला वारिस... आखिर खुद अपनी जान क्यों देने जा रहा था? इसके पास तो वह सब कुछ है जिसके लिए दुनिया के लोग अपनी आत्मा तक बेच देते हैं... फिर यह मेरी तरह मौत क्यों माँग रहा था?'

कविता—जिसका काम सिर्फ अंधेरे में बेरहमी से खून करना, लूटना और गायब हो जाना था—आज पहली बार किसी शिकार के बेसुध जिस्म के पास आकर बर्फ की तरह सुन्न (freeze) हो गई थी। उसके कातिल हाथों में दीपक का कमज़ोर पड़ता जिस्म था, लेकिन उसके मन में एक ऐसा सवाल जन्म ले चुका था जिसने उसकी पेशेवर हत्यारी वाली सोच और इस खूनी रात के पूरे मकसद को ही चुनौती दे दी थी।

 

एपिसोड 3: हमदर्द या नया शिकारी?

महल के उस श्मशान जैसे सन्नाटे में हवा और भी भारी हो गई थी। रात की उस सर्द और दमघोंटू घुटन के बीच, कविता का शातिर दिमाग किसी शतरंज के माहिर खिलाड़ी की तरह तेज़ी से चालें चल रहा था। उसके भीतर का कातिल अभी भी यह सोचने में नाकाम था कि एक ऐसा इंसान, जिसके पास दुनिया की हर सुख-सुविधा मौजूद है, वह अपनी सांसों को इस तरह खुद मौत के हवाले क्यों कर रहा है? 

दीपक का दम घुटने लगा। धीरे-धीरे दीपक की नीली पड़ती नसों की फड़कन शांत होने लगी, उसका जिस्म पूरी तरह बेजान सा होकर फर्श पर लुढ़कने लगा और उसकी आँखें हमेशा के लिए बंद होने के कगार पर पहुँच गईं।

जैसे ही दीपक का शरीर पूरी तरह ढीला पड़ गया, कविता ने झटके से अपनी पकड़ छोड़ दी। उसके हाथ से वह नीले रंग की शीशी छूटकर कालीन पर लुढ़क गई।

खन...

सन्नाटे को चीरती शीशी के टकराने की वह बारीक आवाज़ उस खौफनाक माहौल में किसी ठंडे संकेत जैसी थी। कविता ने झुककर उसे उठाया। खिड़की से छनकर आती चाँद की पीली रोशनी में उस पर छपे शब्द साफ़ चमक रहे थे—विष (POISON)।

कविता की गहरी आँखों में एक खतरनाक, सर्द चमक तैर गई। वह अपने पैरों के पास पड़े दीपक के बेजान जिस्म को घूर रही थी। अब कविता का दिमाग एक आम भाड़े की हत्यारी की तरह नहीं, बल्कि एक शातिर 'मास्टरमाइंड' की तरह दौड़ने लगा।

'पचास हज़ार करोड़ का अकेला वारिस... और यह ज़हर खाकर मरना चाहता था? क्यों?' कविता के भीतर एक गहरी, लालची सोच ने जन्म लिया। 'अगर यह खुद ही मरने जा रहा था, तो मैं इसके खून के दाग अपने हाथों पर क्यों लूँ? अगर मैं इसके दुख की चाबी पा लूँ, तो इस सारी दौलत पर मेरा कब्ज़ा करना पानी पीने जितना आसान होगा। मारना तो इसे कभी भी मुमकिन है, लेकिन अभी खेल को एक नया मोड़ देना होगा।'

कविता ने बिना एक पल गँवाए अपना 'मुखौटा' तैयार किया। उसने तेज़ी से अपने बिखरे बालों को सँवारा, अपनी बेरहम आँखों में नकली फिक्र का एक गहरा समंदर भरा और पास रखे जार से पानी के कुछ ठंडे छींटे दीपक के पीले पड़ चुके चेहरे पर मार दिए।

पानी की ठंडक से दीपक की उखड़ी हुई सांसें धीरे-धीरे वापस आने लगीं। उसने बड़ी मुश्किल से अपनी भारी और सूजी हुई आँखें खोलीं। उसके सिर के भीतर जैसे कोई हथौड़े बरसा रहा था और कानों में एक अजीब सी भिनभिनाहट थी। जब उसकी धुंधली नज़रें साफ़ हुईं, तो अंधेरे हॉल में उसे सामने एक बेहद खूबसूरत, फिक्रमंद चेहरा दिखाई दिया।

"त-तुम... तुम कौन हो?" दीपक ने अपना भारी सिर पकड़ते हुए लड़खड़ाती, सूखी आवाज़ में पूछा। "यहाँ कैसे... और मेरा सिर इतना भारी क्यों है?"

कविता ने बड़ी कोमलता से उसके ठंडे हाथ पर अपना गर्म हाथ रखा—उस स्पर्श में एक ऐसी सधी हुई नरमी थी, जो किसी भी टूटे हुए मर्द के गार्ड को पल भर में नीचे गिरा दे। उसकी आवाज़ शहद सी मीठी, पर अंदर से ज़हर जैसी थी, "शशश... आराम से। सब ठीक है। मैं कविता हूँ। मैं आपके महल के बाहर से गुज़र रही थी, तभी मैंने किसी आदमी को हड़बड़ाहट में यहाँ से भागते हुए देखा। मुझे कुछ गड़बड़ लगी तो मैं अंदर भागी और आपको इस हालत में पाया..."

उसने ज़मीन से वह ज़हर की नीली शीशी उठाई और दीपक की आँखों के ठीक सामने रख दी। उसकी आँखों में एक ऐसी गहरी मायूसी थी कि दीपक को उसकी इस मनगढ़ंत कहानी और ईमानदारी पर शक करने का कोई मौका ही न मिले। "और यह... यह मुझे आपके पास मिला। मैं हैरान हूँ। इस शहर का सबसे अमीर वारिस अपनी ज़िंदगी क्यों खत्म करना चाहता है?"

दीपक ने उस नीली शीशी को देखा और फिर कविता की उन छल से भरी आँखों में झाँका। उस नकली हमदर्दी की गर्माहट ने दीपक के अंदर सालों से जमे हुए दर्द का बाँध एक झटके में तोड़ दिया। खामोश हॉल में पागलों की तरह, उसके काँपते होंठों से एक खोखली, दर्द भरी हँसी निकल पड़ी। वह हँस रहा था, पर उसकी आँखों से आंसू किसी उफनते झरने की तरह गालों पर बहने लगे।

"ज़िंदगी से नफरत?" दीपक की चीखती हुई आवाज़ में पिछले पच्चीस सालों का जमा हुआ सारा ज़हर छलक आया। उसकी आवाज़ खाली दीवारों से टकराकर गूँज उठी। "क्योंकि इस ज़िंदगी ने मुझे सिवाय नर्क के कुछ नहीं दिया! माँ-बाप के गुज़रने के बाद मेरे मामा रणजीत ने मेरी परवरिश की—इस आलीशान महल में मुझे एक नौकर से भी बदतर रखा गया। हर दिन अपनों के बीच रहकर भी मैं बिल्कुल अकेला था!"

दीपक की मुट्ठी गुस्से से कस गई, नसों में खून तेज़ी से दौड़ने लगा। "और जब मैं बड़ा हुआ, तो मुझे लगा मेरी अंधेरी ज़िंदगी में एक रोशनी आई है। पूजा... पर वह भी बस इस दौलत के लिए आई थी। सब बिके हुए हैं, कविता। सब नकली हैं!"

दीपक ने अपने दोनों हाथों से अपना आंसुओं से भीगा चेहरा छिपा लिया और बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोने लगा। "अब नहीं बची मुझमें जीने की ताक़त। क्यों बचाया तुमने मुझे?"

कविता वहाँ बिल्कुल चुपचाप बैठी रही, उसके कंधे पर हाथ रखे हुए। पर उस सन्नाटे में, वह शातिर हत्यारी अंदर ही अंदर क्रूरता से मुस्कुरा रही थी। दीपक पूरी तरह उसके रचे हुए इस भावनात्मक जाल में फँस चुका था। उसने अपनी पहली चाल जीत ली थी, और अब उसे बस इस रेशमी जाल को उसकी गर्दन के गिर्द और कसना था।

 

एपिसोड 4: अंधेरे से दोस्ती

दीपक की काँपती हुई, टूटी आवाज़ और उसकी लाल आँखों में तैरते आंसुओं ने एक पल के लिए कविता के भीतर की उस पत्थर जैसी ठंडी आत्मा को झकझोर कर रख दिया था। कविता उस दर्द से कोई अनजान नहीं थी। उसने स्वयं भी तो ज़िन्दगी के उसी खौफनाक हिस्से को भुगता था—सड़कों की वह अंतड़ियाँ चीर देने वाली तीखी भूख, कड़कड़ाती सर्दियों में ठिठुरती हुई वो खौफनाक रातें, और दुनिया की वो घृणा भरी, चुभती निगाहें जो किसी भी मासूम को अंदर ही अंदर रोज़ मार देती हैं। पंद्रह साल की कच्ची उम्र में, जब वह खून और पसीने से सनी भूमिगत अखाड़ों की धूल में अपनी जान की बाज़ी लगाकर खूंखार लोगों से लड़ती थी, तभी तो उसने अपने इस फौलादी शरीर और उस 'पत्थर दिल' को तराशा था।

एक पल के लिए ही सही, उसे दीपक का वह छटपटाता दर्द अपना सा लगा, जैसे वह किसी टूटे हुए आईने में अपने ही अतीत को रोते हुए देख रही हो। लेकिन एक पल के उस मानवीय पछतावे के बाद, उसके शातिर, कातिल दिमाग ने तुरंत अपनी दिशा बदल ली। उस श्मशान जैसे सन्नाटे में, उसके दिमाग में एक अधिक खौफनाक और जटिल बिसात बिछने लगी थी।

'इसे अभी इसी वक़्त मार देने से मुझे चंद सिक्के मिलेंगे, बस एक मामूली सा इनाम,' कविता ने मन ही मन सोचा। अँधेरे में उसकी आँखों की पुतलियाँ किसी भूखे, खूंखार शिकारी की तरह फैल गईं। 'लेकिन... इसे जीना सिखाओ, इसका अटूट विश्वास जीतो, और जब यह पूरी तरह से मेरी बाहों में खुद को सुरक्षित महसूस करने लगे, तब इसकी यह अताह दौलत, इसकी सत्ता और इसकी ज़िंदगी... सब कुछ मेरी मुट्ठी में होगा। तब इस रईसज़ादे को मारना मेरे लिए किसी दिलचस्प खेल से कम नहीं होगा।'

दीपक ने अपना भारी सिर ऊपर उठाया। चाँद की पीली रोशनी में उसकी आँखों में अब भी उस पुराने धोखे का गहरा खौफ साफ पढ़ा जा सकता था। "नहीं... नहीं! मुझे अब 'प्यार' जैसे लफ्ज़ से ही सख्त नफरत है। उस पूजा ने मुझे अंदर से खोखला कर दिया है। अब भरोसा? अब तो मुझे अपनी परछाईं पर भी शक होने लगा है, कविता।"

कविता ने एक बेहद धीमी, सधी हुई और मधुर मुस्कान के साथ दीपक का पीला, आंसुओं से भीगा चेहरा अपने दोनों हाथों के बीच थाम लिया। उसकी हथेलियों की वह जानबूझकर दी गई गर्माहट दीपक की ठंडी, सुन्न होती नसों में एक अजीब सी झुरझुरी और बिजली दौड़ा गई।

"दीपक," कविता ने कांपते हुए लबों से कहा। हॉल के उस भारी सन्नाटे में उसकी आवाज़ किसी रेशमी चादर की तरह गूँजी, जिसमें एक अजीब सा गहरा ठहराव था, जैसे वह रात के उस भयानक अँधेरे में कोई सदियों पुराना, रूहानी राज़ खोल रही हो, "काले और डरावने रास्तों के बाद ही तो उजाले का असली मोल पता चलता है। तुम्हें बस थोड़ा और धैर्य रखना है... अंधेरों से दोस्ती कर लो।"

उसने अपनी आँखों की गहराई से दीपक को पूरी तरह बांधते हुए, लफ़्ज़ों को किसी नशीली धुन की तरह पिरोया, "वही अंधेरा जो तुम्हें अंदर से खा रहा है, उसे अपनी ढाल बना लो। क्योंकि यही अंधेरा तुम्हें उजाले की तरफ ले जाने का इकलौता रास्ता है।"

दीपक बिल्कुल खामोश था। वह जैसे किसी गहरे सम्मोहन (hypnosis) के अधीन हो चुका था। कविता ने उसके चेहरे पर अपनी पकड़ थोड़ी और मज़बूत की। उसने अपने अंदर पल रही उस शैतानी, खूनी मुस्कान को अपनी आँखों की नमी में पूरी तरह छिपाते हुए कहा, "मैं तुम्हारी दोस्त बनूंगी। क्या तुम मुझे अपना दोस्त मानोगे, दीपक?"

कविता हल्की सी हंसी—उसकी हंसी में कोई दिखावा नहीं लग रहा था, बल्कि एक ऐसा सुकून था जो दीपक के भटके हुए, उफनते दिमाग को एक पल के लिए जैसे ठहरा गया।

"मरने की इतनी भी क्या जल्दी है?" उसने मज़ाक के एक हल्के अंदाज़ में उसे सीधे चुनौती दी, "कुछ दिनों बाद मर लेना। अगर तुम्हें फिर से धोखा मिले, तो मैं खुद तुम्हें मौत के उस रास्ते पर छोड़ने आऊंगी। पर अभी... अभी मुझ पर एक आखिरी बार भरोसा करके तो देखो। क्या तुम हार मानने वालों में से हो?"

दीपक ने कविता की गहराती, रहस्यमयी आँखों में झाँका। उसे लगा कि इस पूरी बेरहम, मतलबी दुनिया में शायद कोई तो है, जो बिना कुछ मांगे उसके दर्द की असली भाषा समझ रहा है। उसकी मौत की उस ठंडी चाहत पर, ज़हर की उस नीली शीशी के ठीक सामने, इस अनजान लड़की ने उसे एक 'जीने की चुनौती' दे दी थी।

"तुम... तुम क्यों कर रही हो यह सब?" दीपक की आवाज़ एक काँपती हुई फुसफुसाहट में बदल गई।

कविता ने अपनी नज़रें नीचे झुका लीं, और एक झूठा, चमकता हुआ आंसू बड़ी कारीगरी से अपनी आँख के कोने में लाकर बोली, "क्योंकि मैंने भी ज़िंदगी में वही भयानक अंधेरा देखा है जो तुमने देखा है। हम दोनों एक ही खोटे सिक्के के दो पहलू हैं, दीपक। मैं भी उस नर्क से लड़कर, लहूलुहान होकर यहाँ तक आई हूँ।"

दीपक ने एक गहरी, कांपती हुई सांस ली। उसका दिल अब भी उस पुराने धोखे से डरा हुआ था, पर उसके अंदर की उस सालों पुरानी घुटन ने उसे 'हाँ' कहने पर मजबूर कर दिया। "ठीक है... सिर्फ कुछ दिन। मैं तुम्हारी बात मानता हूँ।"

कविता ने तुरंत उसे अपनी बाहों में भर लिया। दीपक का सिर उसके कंधे पर टिका था, उसके आंसुओं से कविता के कपड़े भीग रहे थे। वह अब पच्चीस सालों में पहली बार खुद को सुरक्षित महसूस कर रहा था। लेकिन... उस कंधे के पीछे, मेहराबदार दीवारों पर पड़ती परछाइयों के बीच, कविता की आँखें अंधेरे में अंगारों की तरह जल रही थीं।

उन आँखों में हमदर्दी या प्यार का एक कतरा भी नहीं था, बल्कि एक खूंखार शिकारी की जीत की वह भयानक और सर्द चमक थी, जो अपने शिकार को पूरी तरह अपने बुने हुए रेशमी जाल में फंसा चुकी थी।

दीपक का कमज़ोर विश्वास पूरी तरह जीत लिया गया था। अब उस 'सोने के पिंजरे' के खामोश अँधेरे में, एक नई, सबसे खौफनाक और बड़ी साज़िश की नींव रखी जा चुकी थी।

 

एपिसोड 5: अंधेरे में खोई रोशनी

दीपक ने अपना काँपता हुआ, सर्द हाथ बहुत ही धीरे से कविता की ओर बढ़ाया—एक ऐसा कमज़ोर हाथ, जो पिछले पच्चीस सालों तक सिर्फ नफरत, खौफ और एक कब्र जैसे अकेलेपन की भारी जंजीरों में जकड़ा रहा था। कविता ने जैसे ही उस हाथ को अपनी हथेलियों में थामा, उसे अपनी उंगलियों की पोरों में दीपक की नसों की धड़कती हुई एक अजीब सी गर्माहट महसूस हुई। उस वक़्त कविता की गहरी आँखों में बसी वह शातिर, कातिलाना चमक, जो रात के अंधेरे में किसी भी शिकार की धड़कनें रोकने के लिए काफी हुआ करती थी, जैसे किसी गहरे, अथाह समंदर में हमेशा के लिए ओझल हो गई।

"यह हुई न बात, दीपक," कविता की आवाज़ में एक ऐसी अनजानी नरमी और ठहराव था, जो उसने खुद के लिए भी पहले कभी महसूस नहीं किया था। "अब देखना, हम दोनों मिलकर इस नर्क से, इस अंधेरी दुनिया से कैसे बाहर निकलते हैं।"

एक दोपहर, महल की उस वीरान और विशाल रसोई में, कविता ने पहली बार दीपक के लिए कुछ पकाने की कोशिश की थी। वो हाथ जो हमेशा खंजर और बंदूकों के ठंडे लोहे के आदी थे, आज मसालों और बर्तनों की गर्माहट से जूझ रहे थे। अचानक उबलते हुए तेल की कुछ तेज़ बूँदें छिटककर उसकी कलाई पर जा गिरीं। कविता के मुँह से बस एक हल्की सी 'सीस' निकली। उसके शरीर पर अनगिनत गहरे और खौफनाक घाव थे; यह मामूली सी जलन उसके लिए कुछ भी नहीं थी।

लेकिन तभी दीपक की नज़र उस पर पड़ गई। कविता की कलाई पर उस छोटे से लाल, जलते हुए निशान को देखकर दीपक का चेहरा ऐसे पीला पड़ गया, मानो किसी ने उसके ही जिस्म को आग लगा दी हो। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। उसने बदहवासी में दौड़कर फर्स्ट-एड बॉक्स निकाला। जब दीपक अपने काँपते हाथों से, बेहद एहतियात के साथ कविता की कलाई पर ठंडी मरहम लगा रहा था, तो कविता बिल्कुल बुत बनकर खड़ी रह गई। उसने देखा कि दीपक की आँखों में एक अजीब सी तड़प थी; जैसे जल कविता रही थी, पर दर्द दीपक की रूह में हो रहा था।

'इतना दर्द तो मुझे तब भी नहीं हुआ था, जब अखाड़े में पहली बार मेरी पसलियाँ टूटी थीं,' कविता ने उसे एकटक देखते हुए मन ही मन सोचा। 'और यह शख्स... मेरे एक मामूली से छाले के लिए ऐसे तड़प रहा है, जैसे इसकी खुद की जान निकल रही हो।' उस दिन, दीपक के उस काँपते, फिक्रमंद स्पर्श ने कविता के अंदर के उस बेरहम कातिल को पहली बार कमज़ोर कर दिया था।

पर यह बदलाव किसी जादू की तरह रातों-रात नहीं हुआ था। इसके बीज उन छोटी-छोटी, अनकही घटनाओं में बोए गए थे, जिन्होंने कविता के फौलादी जिरहबख्तर (armor) को धीरे-धीरे पिघला दिया था।

अगले कुछ महीने किसी बेहद खूबसूरत, अवास्तविक सपने की तरह बीत गए। कविता अब उस सीलन भरे महल का एक धड़कता हुआ हिस्सा बन चुकी थी। दीपक के लिए, जिसने कभी उस महल की भारी, नक्काशीदार खिड़कियों के बाहर की दुनिया नहीं देखी थी, कविता इस घने अंधेरे में उसका 'ध्रुव तारा' बन गई थी। वह उसे शहर की शोर-शराबे वाली तंग गलियों में ले जाती, जहाँ मिट्टी और मसालों की महक हवा में घुली रहती। वह उसे स्ट्रीट फूड के तीखे स्वाद चखाती, और अचानक आई मूसलाधार बारिश में उसे बेपरवाह होकर भीगना सिखाती। बारिश की उन ठंडी बूँदों को अपने चेहरे पर महसूस करते हुए, दीपक किसी छोटे बच्चे की तरह हर उस साधारण एहसास को हैरत से देखता, जिसे उसने पच्चीस सालों में कभी महसूस ही नहीं किया था।

कविता के लिए ये सब चीज़ें कभी उसके शातिर 'मिशन' का एक नपा-तुला हिस्सा रही होंगी, पर आज, दीपक की आँखों में चमकती वह सच्ची खुशी उसके अपने अंदर के किसी सूखे, वीरान कुएं को मीठे पानी से भर रही थी। वह अपनी बचपन की बिसरी हुई खुशियां, दीपक की उस मासूम हंसी में ढूंढ रही थी।

पर अंदर का यह युद्ध इतना आसान नहीं था। हर रात, जब दीपक गहरी नींद में होता, कविता की आँखों से नींद कोसों दूर रहती। वह महल की सर्द छत पर नंगे पैर टहलते हुए खुद की परछाई से लड़ती थी। रात के उस भारी सन्नाटे में एक तरफ उसका वह खौफनाक 'प्रशिक्षण' था—जहाँ उसने सीखा था कि 'इंसान सिर्फ एक इस्तेमाल करने वाला औज़ार है, काम निकालो और फेंक दो'। और दूसरी तरफ दीपक का वह निश्छल भोलापन था, जिसने उसकी नफरत की उस ऊंची, निर्दयी दीवार को जड़ से ढहा दिया था।

कविता धीरे-धीरे अपने उस काले 'मिशन' को भूलती जा रही थी, जिसे लेकर वह एक कातिल के रूप में इस महल में दाखिल हुई थी। अब वह रात के अंधेरे में दीपक को लूटने का नहीं, बल्कि दुनिया की हर मुसीबत से उसे एक ढाल बनकर बचाने का सपना देखती थी। अगर कभी दीपक के चेहरे पर हल्की सी उदासी की लकीर भी खिंच जाती, तो कविता का पत्थर हो चुका दिल किसी पुराने नासूर की तरह टीस उठता था।

वह दीपक को अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा, इकलौता सहारा मान बैठी थी। दीपक को भनक तक नहीं थी कि जो नाज़ुक हाथ आज प्यार से उसकी ज़ुल्फें संवार रहे हैं, वही हाथ चंद महीनों पहले उसके गले पर मौत का फंदा डालने आए थे। कविता के लिए दीपक का यह बेपनाह प्यार अब अफ़ीम का एक ऐसा नशा बन चुका था—एक ऐसा गहरा नशा जिससे उबरने की उसने कभी कोशिश ही नहीं की, क्योंकि अब उसे 'कविता' (एक खूंखार हत्यारी) के रूप में नहीं, बल्कि 'दीपक की महबूबा' के रूप में सांस लेना अच्छा लगने लगा था।

पहले दिनों की वह अविश्वास की दीवारें, वह अनजान दूरियां, अब धुंधली पड़कर पूरी तरह मिट चुकी थीं।

फिर एक गहरी, तूफानी और मूसलाधार बारिश वाली रात आई। आसमान में चमकती बिजली की भयानक कड़कड़ाहट से महल की भारी पत्थर की दीवारें जैसे थरथरा रही थीं। हवाओं के चीखने की आवाज़ ने दीपक की आँखें अचानक एक पुराने खौफ के साथ खोल दीं—वही बचपन का दमघोंटू सन्नाटा, वही अकेलेपन का पुराना डर जो उसे हर रात नींद में डराता था।

वह पसीने से तर-बतर होकर उठा और लड़खड़ाते कदमों से हॉल पार कर कविता के कमरे की ओर गया। कविता भी जागी हुई थी; वह ऊँची खिड़की के पास खड़ी, बाहर की उस गरजती तबाही को देख रही थी। बिजली की एक तेज़, सफेद कौंध कमरे में आई और उसी रोशनी में दोनों की नज़रें मिलीं। बिना एक शब्द कहे, जैसे दो भटकी हुई आत्माओं के बीच कोई रूहानी खिंचाव था, वे एक ही बिस्तर के करीब आ गए।

दीपक ने कविता को इतने ज़ोर से अपनी बाहों में भर लिया, जैसे वह उसे इस गरजते तूफ़ान और दुनिया की हर नफरत से बचा लेना चाहता हो। कविता, जो कभी अंधेरी रातों में मौत बाँटने की माहिर थी, अब एक नाज़ुक कली की तरह दीपक की तेज़ धड़कनों में सिमट कर रह गई थी। दीपक के शरीर की गर्माहट उसके सारे डरों को पिघला रही थी।

'मेरा मकसद क्या था?' कविता ने अंधेरे में दीवार पर उभरती अपनी परछाई को देखते हुए खुद से सवाल किया। उसके दिमाग में उन पुराने दिनों की खून से सनी यादें आ गईं, जब उसने बेदर्दी से जाने लेकर पैसे गिने थे। 'लूट? धोखे का साम्राज्य? मैं तो खुद को ही इस प्यार की वेदी पर बलि चढ़ा बैठी हूँ। क्या मैं वाकई वह 'कविता' हूँ जो पलक झपकते किसी को भी खत्म कर सकती थी? या फिर दीपक के इन आंसुओं ने मुझे एक नया जन्म दे दिया है?'

उसने महसूस किया कि उसकी आँखों से एक गर्म आँसू छलक कर दीपक के कंधे पर गिरा और उसके कपड़ों में जज़्ब हो गया।

'अगर आज मुझे मेरे उस खूनी मिशन और दीपक में से किसी एक को चुनना पड़े, तो मैं इस मिशन को हँसते हुए जहन्नुम की आग में झोंक दूँगी। मुझे यह शापित दौलत नहीं, सिर्फ इसका साथ चाहिए। पर मुझे डर है... बहुत डर है कि जिस दिन दीपक को मेरी उस काली सच्चाई का पता चला, वह मुझे घृणा की नज़रों से देखेगा। मैं वो नफरत बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगी।'

दीपक ने धीरे से झुककर उसके ठंडे माथे को चूमा; उसके उस स्पर्श में एक ऐसी इबादत और पवित्रता थी जो कविता की रूह पर लगे तमाम पुराने पापों को धो रही थी।

"शुक्रिया कविता..." दीपक की आवाज़ उस तूफ़ान के शोर में भी बिल्कुल साफ़ थी, "मेरे अंधेरों को रोशन करने के लिए।"

उस रात, बाहर गरजते तूफ़ान के बीच, कविता इस खौफनाक सच्चाई से कोसों दूर, सिर्फ और सिर्फ दीपक की हो जाना चाहती थी। उसने अपने दिल की गहराई में तय कर लिया था—चाहे आसमान टूट पड़े, चाहे दुनिया इधर की उधर हो जाए, वह अपने इस नए, प्यार भरे 'अस्तित्व' को किसी भी कीमत पर बिखरने नहीं देगी।

 

एपिसोड 6: खामोश राज़

महल के उस विशाल और वीरान बेडरूम में, ऊँची खिड़कियों के कांच से छनकर आती चाँदनी की एक धुंधली, सर्द रोशनी ने मखमली फर्श पर एक उदास सी लकीर खींच दी थी। कमरा एक गहरे सन्नाटे में डूबा था, लेकिन वहाँ की ठहरी हुई हवा में एक अजीब सा दमघोंटू भारीपन था—बिल्कुल वही घुटन, जो दीपक के पिछले पच्चीस सालों के खौफनाक अकेलेपन की कड़वी पहचान रही थी। दीपक, जो कभी इसी मनहूस कमरे में मौत का बेसब्री से इंतज़ार करते हुए उस नीले रंग की ज़हर की शीशी को अपनी इकलौती हमसफर मान चुका था, आज ठीक उसी जगह, उसी फर्श पर कविता के सामने घुटनों के बल बैठा था।

उसने अपने काँपते हाथों से कविता का नरम हाथ अपने हाथों में लिया, उसकी उंगलियों के पोरों को धीरे-धीरे, एक इबादत की तरह चूमा और फिर अचानक... वह किसी छोटे बच्चे की तरह फूट-फूट कर रो पड़ा। उस सन्नाटे में गूंजती उसकी सिसकियों में कोई दिखावा नहीं था। उन गर्म आँसुओं में उसका वह बचपन का गहरा, कब्र जैसा अकेलापन पिघल रहा था, जो सालों से उसके सीने में एक पत्थर की तरह दबा हुआ था। उसमें पच्चीस साल की वह लंबी और घुटन भरी कैद बह रही थी, और साथ ही एक ऐसा नया, सिहरन पैदा करने वाला खौफ था जो उसे अब रात-दिन डराता था—कहीं कविता भी उसे इस अंधेरे में अकेला छोड़कर न चली जाए।

"कविता," दीपक की सूखी, फटी हुई आवाज़ दर्द के मारे बुरी तरह कांप रही थी। उसने अपना भारी सिर कविता के घुटनों पर टिका दिया। "जब तुम मेरी ज़िंदगी में नहीं थी, तो यह महल मेरे लिए एक कब्र जैसा था। हर दिन यहाँ सांस लेना एक सज़ा थी। पर तुमने मुझे सही मायनों में जीना सिखाया। तुमने मुझे इस अंधेरे से बाहर निकाला है। अब मुझे डर लगता है कि कहीं तुम भी मुझे छोड़कर न चली जाओ... जैसे मेरे जीवन के बाकी लोग चले गए। मुझसे शादी कर लो... क्या तुम मुझसे शादी करोगी?"

चाँदनी की पीली रोशनी में यह दृश्य देखकर कविता की आँखें पूरी तरह भर आईं। वही फौलादी लड़की, जिसने बचपन से खून, नफरत और सड़क के संघर्ष के अलावा कुछ नहीं देखा था, जिसने पूरी इंसानियत पर से अपना भरोसा हमेशा के लिए उठा लिया था, आज दीपक के इस बेहद मासूम, निहत्थे और सच्चे प्यार को निहार रही थी। उसने अपनी भीगती आँखों से देख लिया था कि दीपक के लिए वह सिर्फ एक लड़की नहीं, बल्कि उसके सीने में चलने वाली सांसें बन चुकी है। दीपक का हर एक काँपता हुआ शब्द उसके दिल के उस हिस्से पर किसी भारी हथौड़े की तरह प्रहार कर रहा था, जिसे उसने सालों पहले पत्थर का बना लिया था।

कविता ने खुद को संभाला, वह भी बिना कुछ सोचे घुटनों के बल उस ठंडे फर्श पर नीचे बैठ गई और दीपक को कस कर अपने गले से लगा लिया। उसने दीपक की काँपती पीठ पर अपने हाथ रखे और उसकी सिसकियों के बीच अपनी दबी हुई, भारी आवाज़ में बोली, "दीपक, मैं तुम्हारे बिना जीने का सोच भी नहीं सकती। तुम मेरे लिए क्या हो, यह तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं है। मैं... मैं तुमसे शादी करूँगी। मैं हमेशा के लिए तुम्हारी हूँ।"

दोनों एक-दूसरे की बाहों में बुरी तरह जकड़े हुए थे—दो टूटे और अधूरे इंसान जो एक-दूसरे से मिलकर अब पूरे हो गए थे। दीपक ने उसे अपने सीने से इस तरह लगा रखा था, जैसे उसे खौफ हो कि पलक झपकते ही वह धुएं की तरह कहीं गायब न हो जाए। कविता ने अपनी आँखें बंद कीं और दीपक के मजबूत कंधे पर अपना सिर रख दिया।

उसका दिल इस वक्त पसलियों से टकराकर ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था—पर प्यार से ज़्यादा उस खौफ और एक जानलेवा अपराधबोध के मारे। दीपक को लग रहा था कि वह अपनी सबसे बड़ी खुशी को गले लगा रहा है, पर कविता का अंदरूनी संसार पूरी तरह तहस-नहस हो रहा था। उसे अपनी रगों में महसूस हो रहा था कि वह एक ऐसे भयानक, काले झूठ को गले लगा रही है, जो किसी भी पल ज्वालामुखी की तरह फटकर उनकी इस छोटी सी, खूबसूरत दुनिया को राख में बदल सकता है।

उसने दीपक को और कस कर पकड़ लिया, जैसे वह अपनी उस हताश पकड़ के सहारे अपने उस अतीत की खून से सनी काली सच्चाई को छिपाने की नाकाम कोशिश कर रही हो।

'मैं तुम्हें कैसे बताऊं दीपक कि मैं असल में कौन थी?' कविता ने अंधेरे में अपनी पलकें मजबूती से भींचीं, जिससे कुछ गर्म आंसू छलक कर दीपक की शर्ट में जज़्ब हो गए। 'मैं तुम्हें कैसे बताऊं कि मैं तुम्हारे घर सिर्फ तुम्हारी जान लेने के खूनी इरादे से आई थी? मेरी हर मुस्कान... मेरा हर स्पर्श... मेरा हर सांत्वना भरा शब्द... सब एक शातिर चाल थी। अगर मैंने यह सच आज बोल दिया, तो तुम मुझे घृणा की उस आग से देखोगे जो मुझे ज़िंदा जला देगी। तुम मुझे हमेशा के लिए खो दोगे। और मैं... मैं तुम्हें खोने के डर से अब अपनी ज़िंदगी नहीं देख सकती।'

कविता ने अपने आंसुओं और अपने खौफ को दीपक के कंधे के पीछे उस घने अंधेरे में छिपा लिया। वह बहुत अच्छे से जानती थी कि यह खामोशी अब उनके रिश्ते का सबसे बड़ा, सबसे भारी और सबसे खतरनाक हिस्सा बन चुकी है। दीपक को लग रहा था कि उसकी शर्ट को भिगोने वाले ये उनकी खुशी के आँसू हैं, पर असलियत में, वह उस 'राज़' का एक ऐसा दमघोंटू बोझ था जिसे कविता अब हर पल एक सज़ा की तरह ढोएगी। वह जानती थी कि उसने जिस खूनी खेल को शुरू किया था, वह अब खुद उसी के लिए एक अंतहीन, दर्दनाक सज़ा बन चुका है।

 

एपिसोड 7: राज़ का बोझ

शादी की तारीख अब कागज़ पर तय हो चुकी थी। उस मनहूस और वीरान रहे महल में अब अजीब सी चहल-पहल और खुशियों का शोर गूँजने लगा था। हवा में सीलन की जगह अब ताज़े गेंदे और गुलाब के फूलों की मीठी महक तैर रही थी, और आने वाले समारोह की तैयारियां ज़ोरों पर थीं। दीपक की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था; वह जैसे पच्चीस सालों की किसी काली, घुटन भरी कैद से छूटकर पहली बार आज़ाद हवा में सांस ले रहा था।

लेकिन कविता के लिए... वह दिन जितना करीब आ रहा था, उसके सीने पर रखा बोझ उतना ही भारी और उसकी सांसें उतनी ही मुश्किल होती जा रही थीं। उसका दिल अब उस खौफज़दा कैदी की तरह था, जो अपनी ही बेड़ियों की खनकती आवाज़ से डर रहा था, यह जानते हुए कि उसकी आज़ादी सिर्फ एक भ्रम है।

इस जानलेवा घुटन से पीछा छुड़ाने और अपना ज़हर से भरा मन हल्का करने के लिए, उसने अपने पुराने गुरु, भैरव से मिलने का फैसला किया। भैरव—वही शख्स जिसने कविता को तब संभाला था जब वह अंडरग्राउंड फाइटिंग रिंग की खून से सनी धूल में एक बेजान, खूंखार मशीन की तरह लड़ रही थी, जिसने उसके हाथों को 'कातिल' बनने की कला सिखाई थी।

शहर के बाहरी छोर पर मौजूद एक पुराने, सीलन भरे और सुनसान गोदाम के अंधेरे कोने में जब कविता ने अपना सच बयां किया, तो भैरव ने उसे गौर से देखा। गोदाम में टिमटिमाते हुए पीले बल्ब की रोशनी में उनकी अनुभवी, तेज़ आँखों ने कविता का उतरा हुआ चेहरा एक खुली किताब की तरह पढ़ लिया था।

"शादी कर रही हो?" भैरव ने अपनी गहरी, भारी और किसी पुरानी इमारत के ढहने जैसी आवाज़ में पूछा। "तुम्हारी आँखों में वह पहले वाली ठंडी चमक नहीं है, कविता। वो शातिरपन, वो बेपरवाही... सब खो गया है। तुम्हें क्या सच में लग रहा है कि तुम अपने अतीत के इस काले सच को शादी के पवित्र बंधन के बाद भी आसानी से छिपा लोगी? दीपक तुमसे सच्चा प्यार करता है। शायद... शायद वह तुम्हारा खूनी अतीत अपना भी ले... पर तुम्हारा उसे इस तरह एक खौफनाक धोखे की बुनियाद पर खड़ा रखना, उसके उस निश्छल प्यार का सबसे बड़ा अपमान है।"

कविता ने अपनी नज़रें ज़मीन पर झुका लीं, उसके होंठ बुरी तरह कांप रहे थे। "मुझे डर लगता है, भैरव। अगर उसे पता चला कि मैं असल में कौन थी, मैंने पैसों के लिए क्या-क्या किया है... तो वह मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा। उसे लगेगा कि उसके प्यार का बस एक मोहरे की तरह इस्तेमाल किया गया। मैं उसके बिना अब एक पल भी नहीं जी सकती, मेरी ज़िंदगी, मेरी सांसें अब सिर्फ दीपक हैं।"

भैरव ने एक ठंडी और गहरी सांस भरी, जैसे वे इस दर्दनाक अंत का पहले से ही अंदाज़ा लगा चुके थे। "डर का मतलब यह नहीं कि तुम सच को हमेशा के लिए ज़मीन में ज़िंदा दफ़न कर दो। जब वह शादी के मंडप में अग्नि के सामने तुम्हारे लिए अपना हाथ बढ़ाएगा, तो क्या तुम्हारा हाथ उस सच के भारी बोझ से नहीं कांपेगा? सच बोलो, कविता... इससे पहले कि बहुत देर हो जाए। झूठ की नींव पर खड़ी इमारत कभी किसी की खुशी का घर नहीं बन सकती।"

जब कविता भारी कदमों से वापस महल लौटी, तो उसने देखा कि दीपक कमरे में शादी के लिए कुछ नए कपड़े और अपनी पुरानी यादें समेट रहा था। कविता को दरवाज़े पर देखते ही दीपक ने तुरंत अपना काम छोड़ दिया और एक बेहद सुकून भरी मुस्कान के साथ आगे बढ़कर उसका हाथ थाम लिया।

"पता है कविता," दीपक ने बड़े सुकून से कहा, उसकी आवाज़ में एक ऐसी गहरी सादगी थी जो कविता के दिल को किसी तेज़ खंजर की तरह चीर रही थी, "लोग कहते हैं कि नसीब में जो लिखा होता है वही मिलता है। मुझे लगता है मेरे काले नसीब में तुम्हारा साथ ही लिखा था। पूजा के जाने के बाद मुझे लगा था कि मैं ज़िंदगी में कभी किसी पर दोबारा भरोसा नहीं कर पाऊंगा, पर तुमने मेरा पूरा नज़रिया ही बदल दिया। तुमने मुझे वह सब दिया, जो मैंने कभी भगवान से भी नहीं मांगा था।"

दीपक की आँखों में वही पुराना और अटूट भरोसा किसी साफ आईने की तरह चमक रहा था। कविता ने उसे देखा और अंदर ही अंदर कांच की तरह पूरी तरह टूट गई। वह दीपक की नज़रों में एक 'देवी' जैसी थी, जबकि वह खुद को अपने अंदर के आईने में सिर्फ एक 'कातिल' देख रही थी। उसका मन कर रहा था कि वह अभी, इसी वक्त दीपक के पैरों में गिर जाए और खून से सना सारा सच उगल दे... पर उसका वह खौफ उसे हर बार बेड़ियों की तरह रोक देता था। वह सोचती, 'क्या यह एक सच हमारे इस खूबसूरत रिश्ते को हमेशा के लिए ज़मीन में दफ़न कर देगा?'

शादी में अब बस चंद दिन ही बचे थे। कविता अब अपनी ही डरावनी परछाई से भाग रही थी। वह रोज़ रात को सोते वक्त दीपक के शांत, बेफिक्र और मासूम चेहरे को देखती और सोचती—'क्या मैं कल सुबह उठकर इसे सब सच बताने की हिम्मत जुटा पाऊंगी?'

वह अच्छे से जानती थी कि शादी के मंडप में बैठने से पहले उसे यह भारी बोझ अपने सीने से उतारना ही होगा। उसका राज़ अब उसके गले की हड्डी बन गया था, जिसे न वह उगल पा रही थी, न ही निगल पा रही थी।

दीपक इस आने वाले खौफनाक तूफ़ान से पूरी तरह बेखबर था। वह आने वाली ज़िंदगी के हसीन और रंगीन सपने बुन रहा था, जबकि कविता उन्हीं सपनों की नींव में छिपा हुआ ज़हर हर पल अपनी रगों में महसूस कर रही थी। उसे इस बात का अहसास था कि अगर उसने शादी से पहले यह सच नहीं बताया, तो वह ज़िंदगी भर खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाएगी, और शायद यह अधूरा सच उनके पूरे भविष्य को ही राख में बदल देगा।

 

एपिसोड 8: सच्चाई का गुलाम

आज वह बहुप्रतीक्षित दिन आ ही गया था। सूर्य की पहली, तीखी किरणें महल की ऊँची, नक्काशीदार खिड़कियों के कांच से छनकर अंदर आ रही थीं। हवा में तैरते धूल के बारीक कण उस सुनहरी रोशनी में साफ़ चमक रहे थे। आज की इस रोशनी में महल की वह पुरानी, सर्द उदासी नहीं, बल्कि एक अजीब सी, धड़कती हुई उम्मीद थी। पूरे महल में ताज़े गुलाबों और मोगरे की मीठी महक घुली हुई थी। दीपक आबनूस के उस बड़े आईने के सामने खड़ा था। अपने खास कपड़ों को ठीक करते हुए उसके चेहरे पर वह अनोखी, बेफिक्र चमक थी, जो पिछले पच्चीस सालों के उस दमघोंटू सन्नाटे में कभी नहीं देखी गई थी। आज उसे सुकून था कि इस आलीशान, डरावने महल में वह फिर कभी 'अकेला' नहीं कहलाएगा।

तभी, कमरे के भारी लकड़ी के दरवाज़े ने एक हल्की सी 'चर्राहट' के साथ उस खुशनुमा सन्नाटे को तोड़ा। दरवाज़ा धीरे से खुला।

कविता अंदर आई। उसकी आँखों में शादी की वह चमक नहीं, बल्कि एक खौफनाक सैलाब था—अश्रुओं से डबडबाई लाल आँखें और बेहद भारी, काँपती हुई सांसें। दीपक ने मुड़कर देखा, उसके चेहरे पर एक मीठी, सुकून भरी मुस्कान थी। उसे लगा ये खुशी के आँसू हैं, एक नई और खूबसूरत शुरुआत का नशा है। उसने आगे बढ़कर कविता का बर्फ सा ठंडा हाथ अपने गर्म हाथों में थाम लिया।

लेकिन दीपक के उस गर्माहट भरे स्पर्श के साथ ही कविता के सब्र का बांध बुरी तरह टूट गया। उसने अचानक दीपक को इतने ज़ोर से गले लगाया, मानो वह उसे अपनी बाहों में हमेशा के लिए कैद कर लेना चाहती हो। यह कोई आम आलिंगन नहीं था; इसमें एक आखिरी विदाई का खौफनाक डर, एक बेपनाह तड़प और एक न बुझने वाली पीड़ा थी।

"दीपक..." कविता की आवाज़ कमरे की उस शांत हवा को किसी खंजर की तरह चीर गई। वह आवाज़ फटी हुई थी, रुँधी हुई थी। उसके गर्म आंसू दीपक के सीने पर गिरकर उसकी शर्ट को भिगो रहे थे, जैसे उसकी आत्मा से सालों का जमा हुआ कोई ज़हरीला बोझ पिघल कर बह रहा हो। "इससे पहले कि हम हमेशा के लिए एक हो जाएं... इससे पहले कि यह पवित्र बंधन हमें बांधे, मुझे तुम्हें अपनी पूरी हकीकत बतानी ही होगी। मेरा हर सच, मेरा हर गुनाह... वरना यह रिश्ता एक भयानक झूठ की नींव पर खड़ा रहेगा।"

और उस एक खौफनाक पल में, कविता ने अपनी चुप्पी का वह भारी पहाड़ ढहा दिया जिसे वह इतने दिनों से अपने सीने में दफन किए हुए थी। उसने दीपक को अपनी ज़िंदगी की कड़वी, खून से सनी सच्चाई सुनाई। उसने बताया कि वह एक अंडरग्राउंड रिंग की बेरहम फाइटर थी, और सबसे भयानक सच यह था कि वह यहाँ उसे प्यार करने नहीं, बल्कि एक शातिर 'असासिन' के रूप में उसकी जान लेने और उसकी अताह दौलत लूटने आई थी।

उसने ज़हर की उस नीली शीशी वाले पहले दिन से लेकर, अपने शातिर मन में पलती हर खूनी साजिश तक का पूरा का पूरा सच एक ही सांस में बयान कर दिया। उसकी आवाज़ पत्ते की तरह कांप रही थी, पर उस कुबूलनामे में एक अजीब सी खौफनाक शांति थी।

"पर दीपक..." कविता बुरी तरह सिसकते हुए बोली, "तुम्हारे इस बे-इंतहा प्यार ने... उस पत्थर दिल कातिल कविता को मेरे अंदर हमेशा के लिए मार दिया है।"

कमरे में मौत जैसा सन्नाटा पसर गया। एक ऐसी भारी खामोशी जो किसी भी चीख से ज़्यादा डरावनी और गहरी थी। दीपक के दिमाग में जैसे कोई तेज़ बम फट गया हो; कानों में एक सीटी बजने लगी। उसका पूरा वजूद जड़ से हिल गया था। एक पल के लिए उसे लगा कि उसकी किस्मत का वही पुराना, स्याह और धोखेबाज़ पन्ना दोबारा पलट गया है—एक और झूठ, एक और छलावा!

उसने झटके से अपना हाथ कविता की पकड़ से छुड़ा लिया। वह दो कदम पीछे हटा; उसके चेहरे पर सदमे की एक ठंडी लहर दौड़ गई थी। कविता वहीं फर्श पर नज़रें झुकाए, 'धम्म' से घुटनों के बल गिर पड़ी। वह डर के मारे दीपक को देख भी नहीं पा रही थी। उसके गर्म आंसू संगमरमर के फर्श पर गिरकर बिखर रहे थे। उसे लगा कि उसने अपनी ज़िंदगी, अपनी इकलौती मोहब्बत को आज हमेशा के लिए खो दिया है।

दीपक बुत बनकर स्तब्ध खड़ा था। हज़ारों चुभते हुए सवाल उसकी आँखों में तैर रहे थे। पर जैसे ही उसने कविता को इस तरह पूरी तरह टूटते हुए, अपने सामने निहत्थे आत्मसमर्पण करते हुए देखा, तो उसे अपना वही पुराना डर याद आया—कि कविता के बिना उसकी ज़िंदगी का अंत फिर से उसी ज़हर की नीली शीशी पर होगा। वह इस कड़वे सच से आगे बढ़ सकता था, पर कविता के बिना वह अब एक पल भी सांस नहीं ले सकता था।

अचानक, दीपक तेज़ी से आगे बढ़ा और उसने फर्श पर बैठी कविता को पहले से भी ज़्यादा कसकर, अपनी जान से ज़्यादा मजबूती से अपने सीने से लगा लिया।

कविता की सांसें हलक में अटक गईं। उसने हैरानी और अविश्वास से अपनी भीगी आँखें ऊपर उठाईं।

"मुझे नहीं मालूम था, कविता..." दीपक की आवाज़ में कोई नफरत या गुस्सा नहीं था, बल्कि एक गहरा, करुणा भरा दर्द था। "मुझे नहीं मालूम था कि तुम भी बचपन से सड़कों पर वही ज़ख्म सह रही थी... जो मैं इन महलों की चार दीवारी में अकेले झेल रहा था।"

दीपक ने अपने कांपते हुए हाथों से कविता का रोता हुआ चेहरा ऊपर किया, अपने अँगूठे से उसकी आँखों से बहते आंसू पोंछे और भर्राई हुई आवाज़ में बोला, "तुमने ज़िंदगी की इस कड़वी सच्चाई को बचपन से महसूस किया है, बिल्कुल मेरी तरह। और आज... आज जब तुमने अपनी यह खतरनाक सच्चाई बिना किसी डर के, खुद मेरे सामने रख दी, तो मैं तुम्हारी इस सच्चाई का गुलाम बन गया हूँ, कविता।"

दीपक ने उसकी गहरी आँखों में झाँका, जहाँ अब खून या चालाकी नहीं, केवल एक सच्चा पछतावा था। "शादी से ठीक पहले तुमने मुझे अंधेरे में नहीं रखा... यह खुद इस बात का सबूत है कि तुम्हारी वह पुरानी, नफरत भरी ज़िंदगी कबकी खत्म हो चुकी है। मैं सिर्फ उस कविता को जानता हूँ जिसने मुझे उस ज़हर की शीशी से दूर किया, जिसने मुझे जीना सिखाया... और मैं उस कविता को कभी अपने से अलग नहीं होने दूंगा।"

दोनों फिर से एक-दूसरे की बाहों में बंधे थे। पर इस बार का आलिंगन बिल्कुल अलग था। इसमें कोई राज़ नहीं थे, कोई दमघोंटू अपराधबोध नहीं था, और कोई खौफनाक झूठ नहीं था। उनका अंधेरा अब सच में रोशनी में बदल चुका था। एक-दूसरे का सबसे स्याह सच जान लेने के बाद, उनका रिश्ता अब किसी फौलादी पत्थर की तरह मजबूत हो चुका था।

 

एपिसोड 9: नई सुबह और एक नया सफ़र

सच्चाई की उस भयानक, आँसुओं से भरी बाढ़ के बाद, जिसने उनके भीतर के तमाम खौफनाक राज़ और अतीत के कीचड़ को एक झटके में बहा दिया था, अब दोनों के बीच का आखिरी डर भी हमेशा के लिए ओझल हो चुका था। अगले दिन की सुबह कुछ अलग थी। शादी की वह रस्में किसी आलीशान भव्यता, शोर-शराबे या झूठे मेहमानों की मोहताज नहीं थीं। बिना किसी दिखावटी दुनिया की चकाचौंध के, कागज़ों पर अपनी किस्मत एक करने (कोर्ट मैरिज) के बाद वे शहर के बाहरी छोर पर मौजूद एक पुराने, शांत मंदिर की ठंडी पत्थर की सीढ़ियों पर जा बैठे।

हवा में कपूर और चंदन की एक पवित्र, मीठी महक तैर रही थी। वहाँ न तो तालियाँ बजाने वाला कोई गवाह था, न ही कोई खोखला दिखावा—सिर्फ दूर कहीं बजती एक धीमी घंटी की आवाज़, उनकी तेज़ धड़कनें, एक-दूसरे का कसकर थामे हुए हाथ और उनका निश्छल प्यार ही उस रूहानी मिलन का एकमात्र गवाह था। सीढ़ियों की उस ठंडक के बीच, कविता और दीपक ने वहाँ बिना एक शब्द कहे एक-दूसरे को अपनी पूरी रूह और अपने स्याह अतीत के साथ हमेशा के लिए स्वीकार कर लिया।

उनका हनीमून महल की उन आलीशान, ठंडी और उदास दीवारों की घुटन से बहुत दूर, वादियों और पहाड़ों की खामोश गोद में बीता। यह एक ऐसी खुली, बर्फ से ढकी और आज़ाद जगह थी, जहाँ की सर्द हवाओं में किसी साज़िश की कोई घुटन नहीं थी; चीड़ के पेड़ों की महक और दूर घाटियों में गूँजती हवा की सरसराहट थी। वहाँ, उस बेफिक्र माहौल में कविता ने दीपक के सामने अपना वह मासूम चेहरा रखा, जिसे आज तक इस जालिम दुनिया में किसी ने नहीं देखा था—एक ऐसी लड़की, जो किसी बेरहम भाड़े की हत्यारी या अखाड़े की फाइटर के सख्त, फौलादी खोल से बाहर आकर अब सिर्फ एक बेपरवाह और खुशमिजाज इंसान थी। बर्फ से खेलते हुए जब कविता की आज़ाद हंसी वादियों में गूँजती, तो दीपक को पहली बार उस गहरे सुकून का अहसास होता, जो महज़ दौलत से नहीं, बल्कि एक-दूसरे की मौजूदगी से रूह में घुलता है।

जब वे उन बर्फीली वादियों से अपना सफ़र खत्म करके वापस लौटे, तो महल के भारी सागवान के दरवाज़े खुलते ही दीपक ने महसूस किया कि उस जगह की वह पुरानी घुटन, सीलन भरी महक और कब्र जैसा सन्नाटा जैसे हमेशा के लिए बदल चुका था। खिड़कियों से अब सिर्फ परछाइयां नहीं, धूप छनकर आती थी। वह जगह अब एक 'कब्र' नहीं, बल्कि उनका धड़कता हुआ आशियाना बन चुकी थी। दीपक अब भली-भाँति जानता था कि कविता सिर्फ उसकी नाज़ुक जीवनसंगिनी नहीं है; उसके पास सड़कों और मौत का वह खौफनाक तजुर्बा था जो किताबों में नहीं मिलता, और एक शिकारी की वह तेज़, शातिर बुद्धि थी जो किसी भी दुश्मन को पलक झपकते खाक कर सकती थी और उसे हर मोड़ पर सुरक्षित रखेगी।

फिर एक सुनहरी सुबह आई, जब सूरज की तेज़ किरणें महल के ठंडे संगमरमर पर अपनी सुनहरी चमक बिखेर रही थीं। दीपक ने अपना शानदार सूट पहना, कविता का हाथ थामा और उसे अपनी काले रंग की कार में सीधे अपने हज़ारों करोड़ के साम्राज्य के 'हेड ऑफिस' ले गया।

कांच और फौलाद से बनी उस विशाल कॉर्पोरेट इमारत में जैसे ही उन दोनों ने कदम रखा, पूरे ऑफिस में एक भारी सन्नाटा छा गया। कीबोर्ड्स की खटखटाहट रुक गई और सबकी नज़रें उस नए जोड़े पर टिक गईं। दीपक ने हज़ारों कर्मचारियों की उन हैरान निगाहों के बीच, बिना किसी हिचकिचाहट के, अपनी भारी चमड़े की कुर्सी के ठीक बराबर वाली आलीशान कुर्सी पर कविता को बिठाया। पूरे बोर्डरूम में महँगी कॉफी और ताज़ी स्याही की महक के बीच सिर्फ दीपक की भारी आवाज़ गूँजी।

"यह साम्राज्य अब सिर्फ मेरा नहीं, हमारा है," दीपक ने कविता की गहरी आँखों में देखते हुए बेहद दृढ़ता और रौब से कहा। "मुझे तुम्हारे नज़रिए की ज़रूरत है। मैं चाहता हूँ तुम इस व्यवसाय को सीखो, इसकी नब्ज़ पहचानो। ताकि कल को जब मैं काम के सिलसिले में शहर से बाहर रहूँ, तो इस पूरे साम्राज्य की बागडोर संभालने वाली तुम्हारी सशक्त आवाज़ ही मेरा प्रतिनिधित्व करे।"

बोर्ड रूम की उस तेज़ सफेद रोशनी में, कविता की आँखों में अपने लिए इतने बड़े सम्मान और दीपक के उस अटूट भरोसे की एक अनूठी चमक तैर गई। जिस लड़की ने कभी चंद सिक्कों और अपना पेट पालने के लिए, अंधेरी और सीलन भरी अंडरग्राउंड रिंग के खून-खराबे में हर रात अपनी जान दांव पर लगाई थी, आज उसे चौड़े दिन के उजाले में एक पूरे साम्राज्य की बागडोर सौंप दी गई थी। उसे वह 'सम्मान' मिल गया था जो अक्सर अमीरों की शराब से भरी महफ़िलों में नहीं, बल्कि टूट कर प्यार करने वालों के दिल में मिलता है।

वक़्त अब किसी डरावनी घड़ी की टिक-टिक की तरह नहीं, बल्कि एक मीठी लय के साथ आगे बढ़ने लगा। कविता ने अपने उस शातिर और तेज़ दिमाग की दिशा अब मौत बांटने और खंजर चलाने की जगह, दीपक के इस अताह साम्राज्य को नए आसमान पर ले जाने में लगा दी। अब उनका वक़्त खून से सनी रातों में नहीं, बल्कि फाइलों के भारी ढेर, कॉर्पोरेट बैठकों के तनाव और दिन ढलने पर एक-दूसरे की सुकून भरी मुस्कुराहटों के बीच गुज़रने लगा।

दीपक का वह सदियों पुराना, श्मशान जैसा अकेलापन अब महज़ एक धुंधली सी याद बन गया था। उसके ज़हरीले मामा रणजीत सिंह की दी हुई वह भयानक घुटन एक गुज़रे हुए ज़माने की धूल की तरह काली आंधी में कहीं पीछे छूट गई थी। वहीं, कविता के लिए वह खौफनाक अतीत, सड़कों की वह अंतड़ियां चीर देने वाली भूख और दीपक के सीने में दबे उस 'पूजा' के दिए हुए धोखे के नासूर घाव... सब कुछ अब एक जली हुई, बंद किताब की तरह हमेशा के लिए दफ़न हो चुके थे।

उन्होंने अपने अतीत की उस जलती हुई राख पर एक ऐसा नया महल खड़ा किया था, जिसकी गहरी नींव में सिर्फ और सिर्फ वफ़ादारी और विश्वास का फौलाद भरा था। वे अब अपने आज की सुनहरी धूप में जी रहे थे, और अपने आने वाले कल को अपने ही हाथों से एक बेहद खूबसूरत, सुरक्षित आशियाने का रूप दे रहे थे।

महल के फर्श पर जब भी दीपक की नज़र पड़ती, उसे वह पहला दिन याद आ जाता। वह दिन, जब वह नीले रंग की ज़हर की शीशी उसकी मुट्ठी से छूटकर उस कीमती लाल कालीन पर गिरी थी। उसके 'खन' से टकराने की उस बारीक आवाज़ ने तब मौत को आमंत्रित किया था... लेकिन आज, वही ज़हर और वही खौफ उनकी ज़िंदगी से हमेशा के लिए भाप बनकर उड़ चुका था। उस नीली शीशी ने दीपक की जान लेने के बजाय, उन दोनों को एक-दूसरे की ज़िंदगी और मोहब्बत का असली मतलब सिखा दिया था।

 

एपिसोड 10: पहली जुदाई

वक़्त मानो पच्चीस सालों के उस स्याह सन्नाटे को चीरकर अपने सबसे सुनहरे दौर से गुज़र रहा था। दीपक और कविता का जीवन अब एक ऐसी मखमली लय में ढल चुका था, जो महल के बाहर की दुनिया के किसी भी ज़हरीले शोर से पूरी तरह अछूती थी। हर धुंधली सुबह की शुरुआत भारी, नक्काशीदार बालकनी में एक साथ पी गई ब्लैक कॉफ़ी की तेज़, कड़वी गर्माहट और उसकी उठती हुई भाप से होती। जिसके बाद वे हज़ारों करोड़ के उस अताह साम्राज्य के जटिल, कांच और फौलाद से बने बोर्डरूम के कड़े फैसलों में अपना वक़्त बिताते।

और रातें? रातें उस विशाल, सीलन भरे महल के उन खामोश, मेहराबदार गलियारों में सिमट जाती थीं, जहाँ दुनिया की परवाह और किसी भी खौफनाक साज़िश को भूलकर वे सिर्फ एक-दूसरे की सांसों की गर्माहट और वजूद को महसूस करते थे।

कविता ने बहुत ही कम समय में व्यापार की उन बारीक, शातिर चालों को सीख लिया था, जिन्हें समझने में तजुर्बेकार लोगों को भी बरसों लग जाते हैं। उसका वही 'फाइटर' वाला अटूट, शिकारी फ़ोकस और अंडरग्राउंड रिंग का वह शातिर दिमाग अब खून बहाने की जगह, बैलेंस शीट की गहरी उलझनों और बड़ी कॉर्पोरेट डील्स को किसी दुश्मन की तरह क्रैक करने में लग चुका था। दीपक को अपनी भारी चमड़े की कुर्सी के ठीक बराबर में उसे बैठ कर, अपनी तेज़ आँखों से फाइलों को घूरते और बड़ी शांति से चर्चा करते देख एक अगाध, सुकून भरा गर्व महसूस होता था।

सब कुछ किसी खूबसूरत, स्वप्निल संसार जैसा चल रहा था, तभी बिज़नेस जगत के एक बेहद पेचीदा और बड़े प्रोजेक्ट ने उनके दरवाज़े पर दस्तक दी। इस प्रोजेक्ट के लिए दीपक का शहर से बाहर जाना बिल्कुल अनिवार्य था। साम्राज्य के भविष्य के लिए वह डील जीवन-मरण का प्रश्न थी। लेकिन इस प्रोजेक्ट ने अनजाने में उनके सामने एक ऐसी नई चुनौती खड़ी कर दी थी, जिसका उन्होंने एक होने के बाद से अब तक सामना नहीं किया था—पहली जुदाई।

काफी रातों के मंथन और फाइलों के पन्नों की सरसराहट के बीच यह तय हुआ कि दीपक अकेले जाएगा। और पिछले कुछ महीनों की गहन, सख्त कॉर्पोरेट ट्रेनिंग के बाद, कविता अब अकेले ही उस विशाल महल और पूरे बिज़नेस हेडक्वार्टर की कमान एक संरक्षक की तरह संभालेगी।

जुदाई की वह सुबह थोड़ी भारी, धुंधली और उदास थी। हवा में एक अजीब सी ठंडक थी जो हड्डियों तक उतर रही थी। हालाँकि सफ़र सिर्फ कुछ ही दिनों का था, पर उन दो रूहों के लिए, जिन्होंने एक खौफनाक अतीत से लड़कर एक-दूसरे की बाहों में अपना पूरा संसार बसा लिया था, एक पल की दूरी भी किसी सदियों लंबे युग के बीत जाने जैसी चुभ रही थी।

महल के विशाल, पत्थरों से जड़े आँगन में सुबह की धुंध के बीच एक काली, चमचमाती गाड़ी किसी शांत जानवर की तरह इंजन चालू किए तैयार खड़ी थी। गाड़ी के इंजन की धीमी घुरघुराहट सन्नाटे को तोड़ रही थी। दीपक ने मुड़कर कविता को देखा, जो उसके महंगे कोट का कॉलर अपने काँपते हाथों से ठीक कर रही थी। कविता के हाथ एक पल के लिए ठिठके। वह अंदर ही अंदर समझ रही थी कि जिस सुरक्षा का फौलादी आवरण दीपक उसे अपनी मौजूदगी से देता था, वह आवरण अगले कुछ दिनों के लिए यहाँ से हटने वाला था।

दीपक ने कविता की ठंडी कलाई थामी और उसे झटके से खींचकर अपनी बाहों के महफूज़ दायरे में ले लिया। दीपक के महंगे 'कस्तूरी' इत्र की महक कविता की सांसों में भर गई। वह आलिंगन सिर्फ शारीरिक नहीं था; उसमें एक-दूसरे की तेज़ धड़कनों का वह गहरा संवाद था जिसे कोई भी शब्द बयान नहीं कर सकते थे। वह एक ऐसा सुकून था जो बाहर मँडरा रहे किसी भी आने वाले कॉर्पोरेट या असल तूफ़ान को रोकने की ताकत रखता था।

"सिर्फ कुछ दिनों की बात है," दीपक ने कविता के रेशमी बालों के बीच अपना चेहरा छिपाते हुए, एक बेहद धीमी, नरम और गर्माहट भरी फुसफुसाहट में कहा। "अपना ख्याल रखना। बिज़नेस की बिल्कुल चिंता मत करना, मुझे पूरा यकीन है कि तुम सब कुछ अकेले, एक माहिर खिलाड़ी की तरह संभाल लोगी।"

कविता ने अपनी आँखों के कोनों में उमड़ते खारे आंसुओं को ज़ोर से पलकें झपकाकर रोक लिया। उसने दीपक का चेहरा देखा और एक छोटी सी, मगर बेहद शातिर और आत्मविश्वास भरी मुस्कान दी। "तुम्हारी कविता अब बहुत मज़बूत हो चुकी है, दीपक। तुम फ़िक्र मत करो... बस जल्दी वापस आ जाना। यह महल... और मैं, दोनों ही तुम्हारे बिना बहुत अधूरे महसूस करते हैं।"

दीपक ने एक आखिरी बार उसे अपनी आँखों में भरा, एक गहरी मुस्कान दी और गाड़ी में बैठ गया। गाड़ी के भारी दरवाज़े के बंद होने की 'थड' की आवाज़ गूँजी। गाड़ी के टायर बजरी को कुचलते हुए धीरे-धीरे महल के भारी, ज़ंग लगे लोहे के गेट से बाहर निकल गए। हवा में जलते हुए ईंधन की हल्की सी गंध छूट गई। कविता ओस से भीगे उस आँगन में तब तक बुत बनकर खड़ी रही, जब तक वह गाड़ी दूर धुंधले क्षितिज में पूरी तरह ओझल नहीं हो गई।

उसने हवा में एक लंबी और ठंडी सांस छोड़ी।

जैसे ही गाड़ी ओझल हुई, कविता के चेहरे के वे कोमल, भावुक और भीगे हुए भाव धीरे-धीरे, एक जादू की तरह गायब होने लगे। उसकी आँखों में अब आंसुओं की जगह एक ऐसी सर्द दृढ़ता और खौफनाक चमक थी, जो किसी अंडरग्राउंड कातिल और एक शातिर सीईओ (CEO) के सख्त रूप को एक साथ दर्शा रही थी। उसने अपनी रीढ़ सीधी की, अपने चेहरे पर एक फौलादी नकाब ओढ़ा और अपनी गाड़ी में बैठकर बिज़नेस हेडक्वार्टर की तरफ रुख किया।

आज वह महज़ दीपक की नाज़ुक पत्नी नहीं, बल्कि उसके हज़ारों करोड़ के साम्राज्य की एक खूंखार संरक्षक बनने जा रही थी। उसे इस जालिम दुनिया को दिखाना था कि 'कविता' अब केवल एक सुंदर चेहरा या कोई बीता हुआ राज़ नहीं है, बल्कि वह उस साम्राज्य की सबसे बड़ी और जानलेवा ताक़त है, जिसे भेद पाना अब किसी भी दुश्मन के लिए मुमकिन नहीं।

 

एपिसोड 11: काले पन्ने और एक भयानक राज़ 

दीपक के शहर से बाहर जाते ही, कांच और फौलाद से बने उस विशाल हेड ऑफिस के टॉप फ्लोर की हवा जैसे अचानक सर्द हो गई थी। कविता ने सीईओ की उस भारी, काले चमड़े की कुर्सी संभाल ली थी। लेकिन एसी (AC) की ठंडी भिनभिनाहट के बीच, उसके शातिर दिमाग में कॉर्पोरेट प्रोजेक्शन की फाइलें नहीं, बल्कि दीपक की वह कांपती हुई आवाज़ गूँज रही थी। उसे एक-एक शब्द याद था कि कैसे दीपक ने अपनी रूह काँप जाने वाले उन स्याह दिनों के बारे में बताया था—जब उसे इस आलीशान महल में एक नौकर से भी बदतर रखा गया था, और उसका अपना सगा मामा, रणजीत सिंह, वकीलों के सामने झूठे प्यार का नाटक करके उसकी संपत्ति के कागज़ों पर बेरहमी से अंगूठे लगवाता था।

कविता की गहरी आँखों में अब कोई नरमी नहीं थी, बल्कि एक ठंडी, विनाशकारी आग सुलग रही थी। उसने इंटरकॉम पर अपने स्टाफ को बेहद सर्द और स्पष्ट निर्देश दिए—पिछले बीस सालों के हर एक अकाउंट का ब्यौरा, हर पुरानी प्रॉपर्टी का पेपर और रणजीत सिंह की हर एक गतिविधि की फाइल उसकी विशाल कांच की टेबल पर होनी चाहिए। साथ ही, उसने उन पुराने वकीलों को भी तुरंत तलब किया जो उस खौफनाक दौर में दीपक के लीगल एडवाइजर हुआ करते थे।

कुछ ही देर में, ऑफिस का भारी दरवाज़ा खुला और वे सफेद बालों वाले वकील डरते-काँपते कविता के सामने खड़े थे। ऑफिस के उस ठंडे सन्नाटे में कविता की तीखी नज़रें किसी भूखे शिकारी की तरह उनके चेहरे के हर भाव, हर पसीने की बूँद को पढ़ रही थीं। टेबल पर पुरानी, पीली पड़ चुकी फाइलों का एक भारी अंबार था, जिनसे उठने वाली पुरानी धूल और सीलन की महक दीपक के बचपन के दफ़न हो चुके दुख की खामोश गवाह थी।

"दीपक की मासूमियत और उसके अकेलेपन का फायदा रणजीत सिंह ने किस हद तक उठाया, यह मैं बखूबी जानती हूँ," कविता की आवाज़ में एक अजीब सी खौफनाक शीतलता और तेज़ धार थी, जो उन वकीलों की रीढ़ में सिहरन पैदा कर रही थी। "पर मेरा सवाल यह है कि तुम लोग तब कहाँ थे? तुम कानून के रक्षक थे या उस शैतान के हाथ के खिलौने? एक मासूम बच्चे पर हो रहे जुल्म को देखकर क्या तुम्हारी आत्मा ने एक बार भी तुम्हें नहीं झकझोरा?"

वकीलों के झुर्रियों भरे चेहरे पर खौफ और सालों पुराने अपराधबोध की गहरी लकीरें उभर आईं। उनमें से एक सीनियर वकील ने, जिसका हाथ मेज़ पर रखी उन धूल भरी फाइलों को छूते हुए बुरी तरह कांप रहा था, अपना सिर झुकाकर एक बेहद धीमी और कांपती आवाज़ में कहा, "मैडम... हम सब जानते थे कि रणजीत सिंह क्या कर रहा है। लेकिन हम सिर्फ लीगल एडवाइजर थे। हमारा दायरा सीमित था। हमें सिर्फ वहीं साइन करने होते थे जहाँ दीपक सर की रज़ामंदी हो... या जहाँ रणजीत सिंह ने उन्हें मजबूर किया हो। यह पारिवारिक मामला था, और सबूतों के बिना हम उस पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं कर सकते थे।"

उस बूढ़े वकील की आँखें नम हो गई थीं। उसने अपना चश्मा उतारा और एक गहरी, कांपती सांस लेकर वह बात कही जिसने कुर्सी पर शांत बैठी उस हत्यारी की रूह को झकझोर दिया, "पर मैडम... आज पहली बार किसी ने दीपक सर की ज़िंदगी के उन काली रातों के पन्नों को पलटने की हिम्मत की है। सच कहूँ तो, भगवान दुश्मन को भी ऐसी ज़िंदगी न दे। वह बचपन नहीं था, वह एक मासूम बच्चे के लिए अंतहीन डरावनी रात थी।"

वकील ने अपने कांपते हाथों से उन पुरानी फाइलों की ओर इशारा किया, "जो अताह साम्राज्य उनके माता-पिता ने अपने इकलौते बच्चे के सुनहरे भविष्य के लिए खड़ा किया था, उनकी मौत के बाद वह सब धूल में मिल गया। दीपक सर को महलों का मालिक होना था, पर उन्हें नौकर से भी बदतर ज़िंदगी दी गई। मामा ने उन पर इतने शारीरिक और मानसिक ज़ुल्म किए कि वे जीना ही भूल गए थे।"

कविता की मुट्ठी मेज़ के नीचे इतनी ज़ोर से कस गई कि उसके नाख़ून उसकी खुद की हथेली में धँस गए और चमड़े की कुर्सी चरमरा उठी। रणजीत सिंह के प्रति उसकी नफरत अब उसके उन पुराने दिनों से भी कहीं अधिक घातक हो गई थी, जब वह खून से सनी अंडरग्राउंड फाइटिंग रिंग में लोगों की हड्डियां तोड़ती थी। लेकिन तभी... वकील ने चारों ओर देखकर फुसफुसाते हुए एक ऐसी बात कही, जिसने कमरे के तापमान को जैसे शून्य कर दिया:

"रणजीत सिंह ने अनगिनत फ्रॉड किए हैं, मैडम। लेकिन मुझे तो... मुझे कभी-कभी ऐसा लगता था कि दीपक सर के माता-पिता की वह अचानक मौत कोई आम सड़क हादसा नहीं था। उनकी उस मौत के पीछे कहीं न कहीं उस रणजीत सिंह का ही हाथ था।"

उस विशाल कमरे की हवा जैसे एक झटके में रुक गई। एसी की आवाज़ भी मानो उस सन्नाटे में डूब गई। कविता की धड़कनें एक पल के लिए पूरी तरह ठहर गईं।

दीपक के अनाथ होने का... उसकी पच्चीस सालों की घुटन का... और उसकी ज़हर पीने तक की नौबत आने का असली ज़िम्मेदार कोई बाहरी दुश्मन या किस्मत नहीं, बल्कि उसका अपना सगा मामा था!

मर्डर! एक खौफनाक और सुनियोजित हत्या, जिसने एक मासूम दीपक की दुनिया को नर्क बना दिया था।

कविता की आँखों में अब एक पल पहले वाला वह मानवीय दर्द या हमदर्दी का एक कतरा भी नहीं बचा था; वहाँ अब केवल एक विनाशकारी, खौफनाक शून्यता थी। उसके भीतर की वह बेरहम हत्यारी, जिसे दीपक के बेपनाह प्यार ने हमेशा के लिए सुला दिया था, आज अपने पति के इंसाफ और प्रतिशोध की उस धधकती आग में पहले से कहीं ज़्यादा खूँखार और सर्द होकर वापस जाग उठी थी।

कविता ने अपनी कुर्सी से उठते हुए वकीलों की तरफ देखकर एक बेहद ठंडी, मौत जैसी मुस्कान दी। रणजीत सिंह ने सालों पहले एक ऐसी भूल कर दी थी, जिसकी कीमत उसे अब अपनी दौलत से नहीं, बल्कि अपनी रूह से चुकानी थी।

कविता अब सिर्फ हज़ारों करोड़ के साम्राज्य की एक सीईओ नहीं थी, वह अब एक 'यमदूत' थी जो अपने पति के लिए न्याय... और उसके जालिम मामा के लिए एक बेहद खौफनाक मौत लेकर आई थी।

 

एपिसोड 12: जागता हुआ शिकारी

उस रात महल की सर्द फिज़ाओं में एक अजीब सा दमघोंटू भारीपन था। सन्नाटा इतना गहरा और खौफनाक था कि दीवार पर टंगी पुरानी पेंडुलम घड़ी की हर एक 'टिक-टिक' किसी आने वाले बड़े हादसे की आहट जैसी लग रही थी। कमरे में सिर्फ खिड़की से छनकर आती चाँदनी की एक पतली, नीली लकीर थी। कविता उस आलीशान, अंधेरे बेडरूम के बीचों-बीच बुत बनकर खड़ी थी। उसकी आँखें खुली थीं, लेकिन उसका शातिर मन किसी बेहद अँधेरी और खूनी भूलभुलैया में भटक रहा था।

बूढ़े वकील के उन काँपते हुए शब्दों ने उसके ज़हन पर गहरे, रिसते हुए घाव कर दिए थे। वह बार-बार उस छोटे से, सहमे हुए दीपक के बारे में सोच रही थी—वह मासूम बच्चा, जिसकी आँखों में माँ-बाप का सुरक्षित प्यार होना चाहिए था, उसे बेरहम ज़ुल्मों की मार और चाबुकों का खौफ दिया गया। उसे वह सर्द रात याद आई जब दीपक ने नम आँखों से बताया था कि उसे प्यार और रिश्तों जैसे लफ्ज़ों से ही नफरत क्यों है। आज कविता को पूरी तरह समझ आ रहा था कि दीपक की रूह पर लगे वे ज़ख्म महज़ वक़्त के 'हादसे' नहीं थे, बल्कि एक बेहद खौफनाक और सोची-समझी खूनी साज़िश की गहरी लकीरें थीं।

वह नंगे पैर ठंडे संगमरमर पर चलते हुए भारी, मेहराबदार खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई। बाहर के घनघोर, हवाओं से चीखते अंधेरे में उसे सिर्फ एक ही खौफनाक सवाल मंडराता दिख रहा था—दीपक के माता-पिता की अचानक मौत का स्याह रहस्य।

क्या वह महज़ एक दुर्भाग्यपूर्ण सड़क हादसा था? या फिर रणजीत सिंह के अंधी दौलत के लालच की वेदी पर दी गई एक सुनियोजित, बेरहम बलि? यह सवाल अब उसके गले की वह कंटीली हड्डी बन चुका था, जिसे निगलना नामुमकिन था। दीपक के उस भयानक, कब्र जैसे बचपन और उसकी बर्बादी के कालचक्र का केंद्र बिंदु वही एक 'हादसा' था। कविता का वह शिकारी दिमाग अब उस पहेली की हर एक कड़ी को सुलझाने में जुट चुका था—अंधेरे में उसे साफ़ नज़र आ रहा था कि रणजीत सिंह के झुर्रियों भरे हाथों पर सिर्फ धोखाधड़ी की नीली स्याही नहीं, बल्कि अपनों के खून के गहरे, लाल दाग भी लगे हैं।

उसने खुद के खून से सने अतीत को याद किया। वह भी सड़कों की अंतड़ियां चीर देने वाली भूख, हड्डियों को गला देने वाली ठंड और ग़रीबी से लड़कर, अखाड़ों में हड्डियां तोड़कर यहाँ तक पहुँची थी। लेकिन उसके दुश्मन तो 'हालात' और 'किस्मत' थे—कोई इंसान नहीं। पर दीपक का दुश्मन? उसका दुश्मन तो खुद उसी के आलीशान घर की छत के नीचे घात लगाए बैठा था, उसे 'मामा' कहकर अपना झूठा हक जताने वाला एक आदमखोर दरिंदा।

कविता पलटी और उसने कमरे में रखे उस आबनूस के बड़े आईने की तरफ अपने कदम बढ़ाए। चाँद की उस सर्द रोशनी में आईने के भीतर उसे अपनी वही खौफनाक, पुरानी परछाई दिखाई दी—वो खूंखार 'कविता', जो अंडरग्राउंड रिंग में अपनी कातिलाना चालों और बिना पलक झपकाए जान लेने के लिए जानी जाती थी। उसकी आँखों में दीपक के साथ बिताए गए उन कुछ महीनों की मासूमियत अब हमेशा के लिए मर चुकी थी; उसकी जगह मौत के उस पुराने, ज़हरीले और सर्द नशे ने ले ली थी, जो अपने शिकार को चीर-फाड़ देने के लिए काफी था। जिस इंसान 'कविता' को दीपक के निश्छल प्यार और आंसुओं ने सुला दिया था, वह 'कातिल' कविता आज अपने पति की आँखों से गिरे एक-एक आंसू का लहू से हिसाब लेने के लिए वापस जाग चुकी थी।

उसने अपनी मुट्ठी इतनी ज़ोर से भींची कि उसके तेज़ नाखून उसकी ही हथेली के मांस में गहराई तक चुभ गए। खून की कुछ लाल बूँदें रिसकर फर्श पर गिर गईं। पर हथेलियों के उस तीखे दर्द ने उसे कमज़ोर नहीं, बल्कि और भी ज़्यादा खूंखार और आक्रामक बना दिया था।

"दीपक ने मुझे उजाले का रास्ता दिखाया है, मुझे एक नई ज़िंदगी दी है," कविता ने आईने में अपनी ही सर्द, खूनी आँखों में सीधा झाँकते हुए, बर्फ जैसी ठंडी और कातिलाना आवाज़ में खुद से वादा किया। "लेकिन उस रणजीत सिंह का हिसाब चुकता करने के लिए... मैं एक बार फिर हँसते हुए उस काले, खौफनाक अंधेरे में उतरूँगी। मैं वह शिकारी बनूँगी, जिसके बुने मौत के जाल से आज तक कोई नहीं बचा। उसने मेरे दीपक का बचपन छीना है, मैं उसकी पूरी कायनात, उसकी सांसें छीन लूँगी। 

महल के बाहर उस रात, चीखती हवाओं ने भी जैसे आने वाले उस भयानक तूफ़ान और अनहोनी को भांप लिया था। मीलों दूर बैठे उस जालिम रणजीत सिंह को शायद इस बात की रत्ती भर भी भनक नहीं थी कि उसने जिस कमज़ोर दीपक को सालों से अपने पैरों तले कुचला था, आज उसकी रक्षा के लिए अंधेरे से एक ऐसा खूंखार शिकारी खड़ा हो चुका है, जिसकी डिक्शनरी में 'दया' या 'माफी' नाम का कोई शब्द ही नहीं है।

रणजीत सिंह की खौफनाक मौत और उसके पतन की उल्टी गिनती अब उस दीवार घड़ी की टिक-टिक के साथ शुरू हो चुकी थी। कविता अब महज़ एक नाज़ुक पत्नी नहीं, बल्कि प्रतिशोध और मौत की एक जीवंत, खूनी मूर्ति बनकर तैयार थी।

 

एपिसोड 13: शिकार का चक्रव्यूह

अगली सुबह, कांच और फौलाद से बने उस विशालकाय और आलीशान बोर्डरूम की ठंडी हवा में एक ऐसा तनावपूर्ण सन्नाटा था, जो किसी की भी सांसें रोक दे। कमरे का भारी एसी (AC) बिना आवाज़ किए चल रहा था, लेकिन वहाँ बैठे लोगों को ठंड से ज़्यादा एक अनजान खौफ की सिहरन महसूस हो रही थी। कविता उस लंबी, शीशे की टेबल के मुखिया की भारी चमड़े की कुर्सी पर इस तरह बैठी थी मानो वह कोई कॉर्पोरेट कुर्सी नहीं, बल्कि अंडरवर्ल्ड का कोई खूनी सिंहासन हो। उसके चेहरे पर वह नाज़ुक सौम्यता बिल्कुल गायब थी जिसे दीपक रोज़ बड़े प्यार से देखा करता था; आज वहाँ एक भूखे शिकारी की वह सर्द, बेबाक क्रूरता थी, जो अपने लक्ष्य की गर्दन पर वार करने से पहले पल भर की भी चूक नहीं करती। उसके ठीक सामने दो लोग बुत बनकर बैठे थे—एक कंपनी का पुराना, सफेद बालों वाला सी.ए., जो रणजीत सिंह के उस काले दौर का वफादार साझीदार रहा था, और दूसरा आज का नया सी.ए.।

मेज के ठंडे कांच पर पिछले दो दशकों की पुरानी फाइलों का एक भारी अंबार लगा था—धूल भरी बैलेंस शीट, पीले पड़ चुके प्रॉपर्टी पेपर्स और टैक्स की जटिल फाइलें, जिनसे गुज़रे हुए सालों की सीलन भरी महक आ रही थी। कविता की तीखी, शिकारी निगाहें उन पन्नों पर किसी लेज़र बीम की तरह दौड़ रही थीं, जो महज़ कागज़ नहीं, बल्कि एक-एक अंक को चीर कर अंदर छिपा खौफनाक सच देख रही थीं। सन्नाटे में सिर्फ पन्ने पलटने की सरसराहट गूँज रही थी।

"रणजीत सिंह ने सिर्फ पैसे नहीं चुराए हैं," कविता ने अपने हाथ में पकड़े एक लाल पेन से दो अलग-अलग फाइलों के भारी अमाउंट्स को ज़ोर से सर्कल करते हुए एक बेहद ठंडी और खुरदरी आवाज़ में कहा। लाल पेन के कागज़ पर रगड़ने की 'खर्र-खर्र' की आवाज़ ने कमरे की शांति को चीर दिया। उसकी आवाज़ में वो लोहे जैसी कड़क और मौत की आहट थी, जिसे सुनकर वह पुराना सी.ए. अपनी कुर्सी पर थर-थर कांपने लगा। "उसने एक ऐसा कानूनी मायाजाल बुना था ताकि दीपक की संपत्ति कानून की नज़रों में पूरी तरह 'गायब' दिखाई दे। ये फर्जी कंपनियाँ, ये जान-बूझकर दिखाए गए भारी नुकसान... इन सबकी सड़ी हुई जड़ें एक ही इंसान के घर तक जाती हैं।"

उसने अपनी भारी कुर्सी को थोड़ा आगे खिसकाया और टेबल पर झुककर उस पुराने सी.ए. की खौफज़दा आँखों में सीधा झाँका। "तुमने उसके हर फ्रॉड पर अपनी मुहर लगाई है। तुमने उस ज़ुल्म को अपनी कलम से कानूनी जामा पहनाया है। अगर तुम उम्रकैद की सड़न से बचना चाहते हो, तो रणजीत सिंह ने सारा पैसा कहाँ और कैसे छुपाया है—हर एक लिंक, हर एक बेनामी अकाउंट मुझे आज शाम ढलने तक मेरी टेबल पर चाहिए। कोई गलती की गुंजाइश नहीं है।"

बूढ़े सी.ए. का ठंडा पसीना उसके माथे से रिसकर उन पुरानी फाइलों के पन्नों पर टपक रहा था। उसकी सांसें अटक रही थीं। वह अपनी हड्डियों तक यह बात जान चुका था कि अब वह किसी मामूली, अनुभवहीन मालकिन से नहीं, बल्कि एक ऐसी खूंखार महिला से बात कर रहा है जिसने मौत को बहुत करीब से देखा है और जो पलक झपकते ही उसकी जान ले सकती है।

लेकिन कविता का शातिर दिमाग जानता था कि सिर्फ इन कागज़ों की सफेद लड़ाई उसे उस खूनी अंजाम तक नहीं ले जाएगी, जहाँ उसे रणजीत सिंह को ज़िंदा दफन करना है। उसने उसी वक्त उस ठंडे कॉर्पोरेट ऑफिस की गोपनीयता से बाहर निकलकर, अंडरवर्ल्ड के अपने पुराने गुरु, भैरव को कॉल किया।

"भैरव, मुझे रणजीत सिंह का पूरा काला अतीत चाहिए," कविता ने फोन पर बेहद ठंडी, सटीक और नपी-तुली आवाज़ में कहा। "खासकर वह मनहूस दिन, जब दीपक के माता-पिता का 'हादसा' हुआ था। पुलिस की वो दबी हुई पुरानी रिपोर्ट्स, उस वक्त के बिके हुए चश्मदीद, या कोई भी छोटा सा सुराग जो उस खूनी साजिश की तरफ इशारा करता हो—मुझे सब कुछ चाहिए।"

फोन के दूसरी तरफ से भैरव, जो खुद भी शहर की उन अंधेरी, खून से सनी गलियों का एक मंझा हुआ खिलाड़ी था, उसने अपनी भारी, खुरदरी आवाज़ में जवाब दिया, "दीपक का इंसाफ अब सिर्फ तुम्हारा इंतकाम नहीं, मेरी जिम्मेदारी भी है, कविता। मेरा पूरा अंडरग्राउंड नेटवर्क काम पर लग चुका है। सड़कों के इस घने अंधेरे में हमारी आँखें पुलिस की वर्दी से कहीं ज़्यादा तेज़ देखती हैं।"

भैरव ने एक गहरी सांस ली और आगे जो कहा, वह इस खौफनाक खेल का सबसे बड़ा 'मास्टरस्ट्रोक' था: "रणजीत सिंह पर बाहर से नज़र रखने के लिए मेरे हथियारबंद आदमी तो लग ही चुके हैं। लेकिन उसके सबसे काले राज़ उसकी उस ऊंची चार दीवारी के भीतर दफ़न हैं। इसलिए, मैंने अपने सबसे भरोसेमंद और तेज़-तर्रार आदमी को एक ज़रूरतमंद इंसान के भेष में आज सुबह ही उसके घर में 'नौकर' के तौर पर भेज दिया है।"

अब रणजीत सिंह की हर एक सांस, हर एक कदम की आहट कविता के पास पहुँचने वाली थी। वह अंधेरे में किससे मिल रहा है? उसकी उस भारी सेफ की चाबी कहाँ है? उसके पुराने दस्तवेज़ और गुनाह किस तिजोरी में छिपे हैं? सब कुछ... अब कविता की मुट्ठी में कैद था।

फोन रखने के बाद, कविता उस शांत बोर्डरूम की काँच की एक बड़ी, साउंडप्रूफ खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई। नीचे पूरा शहर, दौड़ती गाड़ियाँ और इंसान किसी छोटे से खिलौने की तरह दिख रहे थे—वही बेरहम शहर, जहाँ वह कभी भूखी-प्यासी, मौत से लड़ती घुमा करती थी, और जहाँ उसी रणजीत सिंह ने उसके मासूम दीपक के बचपन को एक ज़िंदा नर्क बनाया था। काँच में उसकी सर्द और कातिलाना परछाई उभर रही थी।

अब वह कोई भोली-भाली, नाज़ुक पत्नी नहीं थी। वह अब एक ऐसी खौफनाक सीईओ (CEO) थी जो ऑफिस के ठंडे एसी के अंदर से वित्तीय साज़िशों का जाल काट रही थी और बाहर से भैरव के ज़रिए मौत और खूनी साज़िशों का पर्दाफाश कर रही थी। मीलों दूर बैठे रणजीत सिंह को भनक तक नहीं थी कि उसने जिस कमज़ोर दीपक को सालों तक अपनी उंगलियों पर नचाया था, अब उसी दीपक की पत्नी ने उसके चारों तरफ एक ऐसा जानलेवा, अदृश्य चक्रव्यूह बुन दिया है, जहाँ से उसका ज़िंदा निकलना अब नामुमकिन है।

इंसाफ का यह खौफनाक सिलसिला अब शुरू हो चुका था, और दीपक मीलों दूर इस पूरे खूनी तूफान से पूरी तरह बेखबर था। कविता ने अपने पति को जानबूझकर इस अंधेरे से सुरक्षित रखा था, ताकि वह जब वापस लौटे, तो उसे खून-खराबे का कोई दाग न दिखे, बल्कि एक नया, महफूज़ साम्राज्य मिले... और उस शैतान मामा का हमेशा के लिए खात्मा।

 

एपिसोड 14: अंधेरे की अदालत

रात के दो बज रहे थे। शहर की चकाचौंध और शोर-शराबे से मीलों दूर, ज़मीन के नीचे बने उस पुराने, खंडहर हो चुके 'अंडरग्राउंड एरीना' की सीलन भरी हवा में आज भी सूख चुके पसीने, उड़ती धूल और पुराने जमे हुए खून की वह दमघोंटू, ज़हरीली गंध मौजूद थी, जिसे कविता अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी नहीं भूल सकती थी। यह वही खौफनाक नर्क था जहाँ एक डरी-सहमी अनाथ बच्ची, अखाड़े की धूल फांक कर खूंखार 'कविता' बनकर तैयार हुई थी—बेरहम, बिजली सी तेज़ और मौत के बेहद करीब रहने वाली एक कातिल।

मगर आज रात यह मनहूस जगह किसी खूनी फाइट के लिए नहीं, बल्कि एक बेहद 'खामोश और जानलेवा युद्ध' के शंखनाद के लिए चुनी गई थी। छत से लटकते एक टिमटिमाते हुए पीले बल्ब की रोशनी में कविता वहाँ अखाड़े के ठीक बीचों-बीच खड़ी थी। उसके चारों तरफ घने अंधेरे में भैरव और उसके सबसे भरोसेमंद, खामोश साए जैसे वफादार लोग बुत बनकर खड़े थे। उन सख्त चेहरों पर वह अटूट वफादारी थी जो सिर्फ खून से लिखे हुए वादों में ही पाई जाती है।

कविता की लाल आँखों में जो बदले की दहकती हुई ज्वाला थी, उसने एरीना के उस भारी अंधेरे को भी चीर कर रख दिया था। वह अपने जूतों की भारी 'खट-खट' के साथ तेज़ी से आगे बढ़ी, उसकी मुट्ठियाँ इतनी कसकर भींची हुई थीं कि उसकी उंगलियों के पोर सफेद पड़ गए थे और हाथों की नीली नसें किसी सांप की तरह उभर आई थीं।

"भैरव... उस शैतान रणजीत सिंह ने मेरे दीपक का मासूम बचपन छीना है," कविता की आवाज़ में किसी कंटीली, बर्फीली हवा की सरसराहट थी, जो उस बड़े से हॉल में गूँज उठी। "उसने उसे उसी के घर में एक नौकर से भी बदतर बनाकर रखा, उसे अंदर तक टूटने पर मजबूर किया। और उसके माता-पिता की मौत? वह सिर्फ एक हादसा नहीं, एक सोची-समझी खूनी साज़िश थी। कभी-कभी लगता है कि मैं खुद जाऊँ और उस दरिंदे को पल-पल तड़पा कर मार दूँ। हर उस आंसू के बदले उसका एक अंग काट दूँ!"

उसके उन खौफनाक शब्दों में बिल्कुल वही पुरानी, ज़हरीली हत्यारी वाली कशिश थी, जो सामने वाले की पल भर में सांसें रोक देने की ताकत रखती थी। वह वाकई उस दरिंदे को अपने हाथों से टुकड़े-टुकड़े कर देने के लिए खून की प्यासी हो रही थी।

तभी, सन्नाटे को चीरते हुए भैरव तेज़ी से आगे बढ़ा और उसने कविता के गुस्से से कांपते हुए कंधे पर अपना भारी, खुरदरा हाथ रख दिया। भैरव की आवाज़ में एक पिता जैसी गहरी फिक्र और एक मंझे हुए गुरु का वह फौलादी ठहराव था, जिसने इस अंधेरी दुनिया में कविता को हमेशा सही रास्ता दिखाया था।

"नहीं बेटा... यह रास्ता बिल्कुल नहीं!" भैरव ने बेहद सख्ती और भारी आवाज़ में कहा। "तेरी एक नई ज़िंदगी है। दीपक ने अपने प्यार से जिसे सींचा है, क्या तू उस पाक रिश्ते को खून के धब्बों से दागदार करना चाहती है? अगर तूने आज मौत का वह पुराना रास्ता चुना, तो तू सिर्फ एक 'कातिल' बनकर रह जाएगी। कानून की नज़रों में तू गुनाहगार होगी, और इसका अंजाम? तुझे अपने दीपक से हमेशा के लिए जुदा होना पड़ेगा। क्या तू उस जुदाई को बर्दाश्त कर पाएगी?"

दीपक को खोने के उस भयानक ख्याल ने ही कविता के पूरे जिस्म में मौत जैसी एक सर्द सिहरन पैदा कर दी। उसकी रगों में उबलते हुए खून में एक ही पल में जैसे बर्फ सी जम गई और उसकी तनी हुई मुट्ठियां ढीली पड़ गईं।

भैरव ने उसकी आँखों में सीधा देखते हुए अपनी शातिर, अंडरग्राउंड चाल समझाई, "देख, मौत तो एक ही पल में इंसान को हर दर्द से आज़ाद कर देती है। हमें उसे आज़ाद नहीं करना है, हमें उसे तिल-तिल कर मारना है। उसे उसके अपने रचे जाल में इस तरह उलझाएंगे कि वह दुनिया के सामने नंगा होगा। हम उसकी दौलत, उसका रसूख, और उसकी साख—सब कुछ छीन लेंगे। वह जिस लालच के लिए खूनी बना, उसी लालच की आग में उसे राख होते देखेंगे।"

पीले बल्ब की रोशनी में भैरव की अनुभवी आँखों में वह पुरानी, कुटिल चमक उभर आई, "पहले उसकी सारी दौलत वापस छीनेंगे, जिस पर सिर्फ दीपक का हक़ है। जब वह एक फूटी कौड़ी के लिए मोहताज होकर कानून के कटघरे में खड़ा होगा, तब उसे असल नर्क का एहसास होगा।"

कविता ने एरीना की उस भारी हवा में एक लंबी, सर्द और गहरी सांस छोड़ी। उसके अंदर धधकता हुआ खून का तूफान अब एक खतरनाक, खामोश और गहरे सागर में बदल रहा था। गुरु की बात ने उसे अंदर तक झकझोर कर रख दिया था। रणजीत सिंह को एक गोली मारकर जान से मार देना उसके लिए महज़ एक छोटी और सस्ती जीत होती, लेकिन उसे ज़िंदा रखकर उसकी बनाई हुई सारी खूनी कायनात को उसी की आँखों के सामने तबाह कर देना—यही उसके प्रतिशोध का असली और सबसे भयानक 'मास्टरप्लान' था।

रणजीत सिंह के लिए अब उस अंधेरे अखाड़े में मौत से भी बड़ी और खौफनाक सज़ा तैयार हो रही थी। कविता अब सिर्फ जज़्बातों में बहने वाली एक अंधी हत्यारी नहीं, बल्कि एक बेहद शातिर 'रणनीतिकार' (Strategist) बन चुकी थी। उसने अब उस शैतान के खिलाफ अपनी अदृश्य चालें चलनी शुरू कर दी थीं। रणजीत सिंह के खोखले साम्राज्य की गहरी नींव में अब मौत का वह मीठा ज़हर घुलने वाला था, जिसे वह अपनी आखिरी सांस तक कभी समझ ही नहीं पाएगा।

 

एपिसोड 15: शिकारी का न्योता 

कविता अच्छी तरह जानती थी कि रणजीत सिंह ने दीपक की संपत्ति का जो हज़ारों करोड़ का 'काला साम्राज्य' खड़ा किया है, उसकी ज़हरीली जड़ें और तार कहीं बहुत गहराई में, अंधेरी तिजोरियों में दफन हैं। ऐसी बेनामी दौलत तक पहुँचना किसी सी.ए. या कानून के बस की बात नहीं थी। इसके लिए तो रणजीत सिंह को ही मजबूर करना था कि वह खुद, अपने ही हाथों से अपनी मौत और तिजोरियों के राज़ खोल दे।

एक शातिर और खूंखार शिकारी को बखूबी पता होता है कि शिकार को सीधे गोली मारने के बजाय, उसे अपने ही बुने जाल में उलझाकर बाहर कैसे निकालना है। कविता ने ठीक वही किया—उसने रणजीत सिंह के अंदर पल रहे उस पुराने, कभी न बुझने वाले 'लालच' को अपना सबसे धारदार चारा बनाया।

उसने मामा को हेड ऑफिस आने का एक खुफिया संदेश भिजवाया। कविता का बुलावा पाकर चौंक तो गया, लेकिन उसके अंदर बैठा 'पुराना मालिक' तुरंत जाग उठा। सत्ता की हवस और पैसे का ज़हरीला नशा उस पर फिर से हावी हो गया। वह तुरंत अपनी चमचमाती गाड़ी से हेड ऑफिस पहुँचा।

जैसे ही रणजीत सिंह ने ऑफिस के भारी कांच के दरवाज़े को 'धकेल' कर खोला, एक सर्द हवा का झोंका उससे टकराया। उसने देखा कि आलीशान सी.ई.ओ. की भारी चमड़े की कुर्सी खाली थी और कविता एक बड़ी कांच की खिड़की के पास खड़ी बाहर के धुंधले नज़ारों में खोई थी। उसके चेहरे पर वैसी ही कोमल मासूमियत थी, जैसी दीपक की आँखों में होती थी—इतनी भोली कि कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था कि उसी शांत चेहरे के भीतर प्रतिशोध और मौत का एक खौफनाक ज्वालामुखी दहक रहा है।

जूतों की भारी आहट सुनकर, मामा को देखते ही कविता पूरी तरह बदल गई। उसने अपनी नज़रें ज़मीन पर झुका लीं और बिना किसी झिझक के, उस आदमखोर दरिंदे के पैरों में झुककर आशीर्वाद लिया। जिस फौलादी हाथ से उसने कभी रिंग में हड्डियां तोड़ना और खून बहाना सीखा था, उसी हाथ को आज उसने उस जालिम 'मामा' के जूतों पर स्पर्श कराया, जिसकी वजह से दीपक ने अपनी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा घुटनों के बल रोते हुए बिताया था। उसका दिल नफरत और गुस्से से फट रहा था, लेकिन वह चेहरे पर एक झूठी, आज्ञाकारी मुस्कान लिए खड़ी रही।

"खुश रहो बहू," रणजीत सिंह ने अपने सोने के फ्रेम वाले चश्मे के पीछे से अपनी कुटिल आँखों से उसे परखा। उसकी भारी आवाज़ में वही चाशनी में डूबा नकलीपन था, जैसे कोई शिकारी अपनी चाल चलने से पहले शिकार को प्यार से थपथपा रहा हो। "अचानक मुझे यहाँ बुलाने की क्या ज़रूरत पड़ गई?"

कविता ने अपनी आँखों में एक ऐसी गहरी 'घबराहट' उतारी, जो अंडरग्राउंड दुनिया के किसी भी बड़े से बड़े खिलाड़ी को धोखा दे दे। उसने अपने हाथ आपस में मलते हुए कहा, "मामा जी, दीपक बिज़नेस के सिलसिले में बाहर हैं, और मैं... मैं इस जटिल बिज़नेस की बारीकियाँ नहीं समझ पा रही हूँ। एक बहुत बड़ी डील सामने है, और अगर इसे नहीं संभाला गया तो कंपनी को भारी नुकसान हो सकता है। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं किसे बुलाऊं।"

रणजीत सिंह के झुर्रियों भरे चेहरे पर एक कुटिल, विजयी मुस्कान तैर गई। उसकी आँखों में दौलत की एक खौफनाक चमक थी, जिसे उसने बड़ी चालाकी से छुपा लिया।

कविता ने अपनी आवाज़ में शहद सी मिठास घोली, जो असल में एक जानलेवा ज़हर था, "कल रात ही दीपक से बात हुई थी। उन्होंने साफ़ कहा कि इस पूरी दुनिया में अगर कोई एक इंसान है जिस पर वह आँख मूंदकर भरोसा कर सकते हैं, तो वह सिर्फ आप हैं। उन्होंने याद दिलाया कि उस डरावने हादसे के बाद जब सब कुछ बिखर गया था, तो आपने ही उस साम्राज्य को टूटने से बचाया था।

रणजीत सिंह का सड़ा हुआ अहंकार अब सातवें आसमान पर पहुँच गया था। उसे लगा कि वह अब भी वही ताकतवर इंसान है जिसे दीपक का बेवकूफ परिवार अपना तारणहार मानता है।

"बेटा," रणजीत सिंह ने एक दिखावटी फिक्र जताते हुए भारी आवाज़ में कहा, "यह साम्राज्य तो मेरे खून-पसीने से बना है। दीपक तो नासमझ है, पर तुम मेरी बात समझ रही हो, यह जानकर अच्छा लगा। तुम चिंता मत करो, मैं वापस इस कंपनी की बागडोर संभालूँगा। सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा।"

कविता ने उसे एक फीकी, पर बेहद शातिर मुस्कान दी। रणजीत सिंह को लगा कि उसने उस नाज़ुक लड़की को आसानी से जीत लिया है, उसे लगा कि उसने फिर से उस ताकतवर कुर्सी पर कब्ज़ा कर लिया है। पर उस मूर्ख दरिंदे को यह नहीं मालूम था कि वह जिस भारी कुर्सी पर बैठने के लिए इतना बेताब था, वह दरअसल उसके लिए बिछाया गया मौत का एक अदृश्य 'इलेक्ट्रिक चेयर' है।

कविता ने उसे अंदर आने का रास्ता तो बड़ी शालीनता से दे दिया था, लेकिन बाहर निकलने के सारे दरवाज़े उसने कब के हमेशा के लिए बंद कर दिए थे। खूनी खेल अब शुरू हो चुका था—रणजीत सिंह को अब वही करना था जो कविता चाहती थी, और वह भी अपने ही लालच की भयानक कीमत पर।

 

एपिसोड 16: काले धन की चाल

कविता ने मौत का यह जाल बेहद बारीकी और खामोशी से बुना था। एक शातिर, पुरानी मछली को फँसाने के लिए चारे का बहुत कीमती और विश्वसनीय होना ज़रूरी था। गुरु भैरव ने इस खूनी खेल के लिए अपने अंडरग्राउंड नेटवर्क के सारे संसाधन एक झटके में झोंक दिए—दस भारी, काले चमड़े के बैग्स, जो ताज़े और कड़क नोटों से ठसाठस भरे थे। हवा में नई करेंसी की वह तेज़, कागज़ी महक थी, जो रणजीत सिंह जैसे लालची इंसान का ईमान डिगाने और उसे कोई भी बड़ा जोखिम उठाने के लिए मजबूर करने के लिए काफी थी।

जब रणजीत सिंह तक इस करोड़ों की 'डील' की खबर पहुँची, तो दौलत की गंध पाते ही उसकी धूर्त आँखों में एक खौफनाक चमक दौड़ गई। उसने एक बेहद पेचीदा शर्त रखी—वह इस भारी डील पर चर्चा ऑफिस की चारदीवारी और कैमरों की नज़रों के बीच नहीं, बल्कि शहर की चकाचौंध से मीलों दूर, एक सुनसान प्राइवेट फार्महाउस के बंद दरवाज़ों के पीछे करेगा। कविता को ठीक यही चाहिए था। उसने इस खुफिया बैठक की कमान भैरव और अपने सबसे भरोसेमंद लोगों को सौंपी, जो महंगे सूट पहनकर, बड़े 'इन्वेस्टर्स' का स्वांग रचकर उस रात वहाँ पहुँचे थे।

रात के घने अंधेरे और झींगुरों की तेज़ आवाज़ के बीच, फार्महाउस के उस बंद कमरे में बैठक शुरू हुई। कमरे की पीली, मद्धम रोशनी में रणजीत सिंह एक तरफ अपनी भारी कुर्सी पर बैठा था, और उसके सामने भैरव और उसके साथी। टेबल के ठीक बीचों-बीच उन दस भारी कैश बैग्स का एक ऐसा पहाड़ लगा था, जिसे देखकर किसी की भी नीयत डोल जाए।

मीटिंग का यह हिस्सा अत्यंत तनावपूर्ण और महत्वपूर्ण था। रणजीत सिंह ने अपने सोने के फ्रेम वाले चश्मे को ठीक किया और बड़े रौब के साथ, कागज़ों की 'सरसराहट' करते हुए बिजनेस का ब्लूप्रिंट टेबल पर फैला दिया। यह कोई साधारण बातचीत नहीं थी; यह एक गहरा और शातिर दिमागी खेल था। रणजीत सिंह ने ऐसी पेचीदा कानूनी रणनीतियाँ, टैक्स-सेविंग प्लान्स, और मुनाफे के ऐसे जटिल आँकड़े पेश किए कि कोई भी सामान्य व्यक्ति उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था। वह अपनी पुरानी सत्ता और दौलत के नशे में चूर था; अपनी बुद्धि का घमंड दिखाते हुए उसे लग रहा था कि वह सामने बैठे इन अजनबियों को बड़ी आसानी से अपनी चालों में फँसा रहा है।

लेकिन भैरव और उसके साथियों ने उस पर भरोसा जताने में कोई जल्दबाजी नहीं की। सिगार के धुएं और कॉफी की महक के बीच, उन्होंने एक-एक बिंदु पर लंबी, तीखी बहस की, लगातार चुभते हुए काउंटर-क्वेश्चंस किए ताकि रणजीत सिंह को रत्ती भर भी शक न हो कि यह उसके लिए बिछाया हुआ मौत का जाल है। यह मीटिंग दो घंटे से भी ज्यादा खिंच गई। रणजीत सिंह की हर एक दलील को काटा गया, उसे हर पहलू पर पसीना पोंछते हुए सफाई देने के लिए मजबूर किया गया, जिससे उसका अहंकार और आत्मविश्वास और भी बढ़ गया कि सामने वाले लोग वाकई एक गंभीर और बड़ी डील कर रहे हैं। उसे लगा कि वह अपनी शर्तों पर उन्हें उंगलियों पर नचा रहा है।

अंत में, जब माहौल पूरी तरह से तैयार हो गया, रणजीत सिंह मेज़ पर थोड़ा आगे झुका। उसकी आँखों में लालच का एक गंदा पर्दा गिर चुका था। उसने अपनी आवाज़ को बेहद धीमा और रहस्यमयी फुसफुसाहट में बदलते हुए कहा, "देखिए, डील डन है। लेकिन कागज़ों पर हम सिर्फ इनमें से दो ही बैग्स का ज़िक्र करेंगे, बाकी के आठ बैग्स का नहीं। यह आठ बैग्स की रकम मैं आपको सीधे ब्लैक मनी में हाई-प्रॉफिट के साथ रिटर्न करूँगा। इस तरह हम दोनों इनकम टैक्स और कानून की नज़रों से पूरी तरह बचे रहेंगे।"

भैरव ने एक पल के लिए अपनी ठंडी आँखों में 'झुकाव' लाया, मानो वह इस जोखिम भरी बात को मान रहा हो, और फिर सहमति में सिर हिलाते हुए एक सर्द आवाज़ में कहा, "डील।"

मीटिंग खत्म हुई। रणजीत सिंह के झुर्रियों भरे चेहरे पर उस बेहिसाब दौलत का नशा साफ़ झलक रहा था, जिसे उसने इतने सालों तक अपने काबू में रखा था। उसने तुरंत अपने एक खास आदमी को इशारा किया, "यह दो बैग्स दीपक की कंपनी के ऑफिशियल अकाउंट्स में भिजवा दो।"

फिर उसने बाकी के उन आठ भारी बैग्स की तरफ देखा, उसकी रगों में लालच का एक ज़हरीला सैलाब सा दौड़ गया। उसने उन बैग्स को खुद अपनी निगरानी में उठवाया और अपनी पर्सनल, काले रंग की गाड़ी की डिक्की में रखवाया। डिक्की के बंद होने की भारी 'धम्म' की आवाज़ ने रात के सन्नाटे को चीर दिया।

रणजीत सिंह गाड़ी में बैठा और अकेले ही उन आठ बैग्स के साथ बजरी को कुचलता हुआ वहाँ से निकल गया। उसे लग रहा था कि उसने अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी, शातिर और सुरक्षित चोरी कर ली है। पर उस मूर्ख को इस बात की भनक तक नहीं थी कि फार्महाउस से कुछ दूरी पर, पेड़ों के घने अंधेरे में खड़ी कविता की सर्द नज़रें उसकी गाड़ी की लाल टेल-लाइट्स और हर गतिविधि पर टिकी हुई थीं।

कविता ने अपनी जगह से एक कदम भी नहीं बढ़ाया, न ही रणजीत सिंह का पीछा करने की कोई कोशिश की। उसने बस एक तेज़ शिकारी की तरह उसकी गाड़ी के उस दिशा में जाने को अपने दिमाग में नोट किया, जहाँ वह अब अपना यह नया खजाना छुपाने जा रहा था। चारे ने अपना काम कर दिया था, और अब वह लालची शिकार खुद चलकर अपने उस गुप्त ठिकाने की ओर जा रहा था, जहाँ तक पहुँचना कविता का अगला और सबसे बड़ा लक्ष्य था।

 

एपिसोड 17: अनदेखा जाल (The Grand Relay Chase)

रणजीत सिंह जैसे खूंखार और मंझे हुए खिलाड़ी के पीछे चलना, सीधे मौत के जबड़े में हाथ डालकर उसके दांत गिनने जैसा था। वह एक ऐसा लोमड़ी नुमा इंसान था जो अपने आस-पास चलने वाली हवाओं की सरसराहट तक पर पैनी नज़र रखता था। कविता ने अपने पुराने तजुर्बे से इस खौफनाक सच्चाई को समझ लिया था। अगर वह खुद या उसके सीधे-सादे आदमी एक ही गाड़ी से मामा का पीछा करते, तो रणजीत के रियरव्यू मिरर (Rearview Mirror) में उनका अक्स पकड़े जाने में चंद मिनट भी नहीं लगते।

इसलिए, कविता एक बेहद शांत और ठंडी मुद्रा में अपने एयर-कंडीशन्ड ऑफिस लौट आई, जबकि शहर के घने अंधेरे में पर्दे के पीछे... गुरु भैरव ने उस 'अनदेखे जाल' की बुनाई शुरू कर दी, जो अंडरग्राउंड दुनिया की सबसे जटिल, भव्य और शातिर 'रिले-ट्रैकिंग' (Relay-Tracking) प्रणाली थी।

यह पीछा किसी एक गाड़ी या एक इंसान का नहीं था; यह एक अदृश्य, जानलेवा ऊर्जा का पीछा था जो पूरे शहर में रणजीत की परछाई बनकर दौड़ने वाली थी।

द ग्रैंड चेज़ (The Grand Chase):

जैसे ही मामा की गाड़ी उस फार्महाउस के भारी लोहे के गेट से बाहर निकली, पहली टीम सक्रिय हो गई। रात के अंधेरे में सड़क किनारे खड़ी एक साधारण सी दिखने वाली काली गाड़ी का इंजन बिना आवाज़ किए चालू हुआ। उसने जानबूझकर एक सुरक्षित दूरी बनाए रखी, सिर्फ उसकी लाल टेल-लाइट्स पर नज़र टिकाए।

दो किलोमीटर बाद, जब सड़क ने एक तीखा मोड़ लिया, तो उस काली गाड़ी ने बस अपनी हेडलाइट्स को एक बार 'डिम-फुल' किया। यह एक खामोश इशारा था। पलक झपकते ही, अंधेरे में छिपे एक भारी-भरकम बाइकर ने रेस दी। उसकी बुलेट की 'धड़-धड़' करती आवाज़ गूँजी और उसने काली गाड़ी को ओवरटेक करते हुए रणजीत की गाड़ी का पीछा शुरू कर दिया। यह 'हैंड-ऑफ' (Hand-off) इतना तरल और सटीक था कि एक आम इंसान की नज़रें इस मौत के खेल को कभी पकड़ ही नहीं पातीं।

आगे रणजीत सिंह अपनी गाड़ी में इत्मीनान से बैठा था। एसी (AC) की ठंडी हवा चल रही थी और स्टीरियो पर पुराने गानों की धीमी धुन गूँज रही थी। उसने कई बार अपनी धूर्त आँखों से चालाकी से अपने रियरव्यू मिरर को खंगाला। पर उसे क्या पता था कि वह किस चक्रव्यूह में है! उसकी आँखों ने हर बार एक अलग चेहरा या एक अलग गाड़ी देखी। कभी एक टैक्सी, कभी एक डिलीवरी बॉय, तो कभी कोई ट्रक। भैरव का 'कोऑर्डिनेशन' किसी स्विस घड़ी की सुई जैसा बारीक और सटीक था।

जब सड़क खुली और हाईवे का डामर आया, तो तेज़ रफ्तार गाड़ियों ने कमान संभाल ली। टायरों के डामर पर रगड़ने की चीखें रात के सन्नाटे को चीर रही थीं। जब रास्ता तंग गलियों और भारी ट्रैफिक में बदला, तो बाइकर्स ने अपना जादू दिखाया—गाड़ियों के बीच से सांप की तरह रेंगते हुए।

लेकिन असली खेल तब शुरू हुआ, जब रणजीत की गाड़ी शहर की सीमा लांघकर उन कच्चे, ऊबड़-खाबड़ और पथरीले रास्तों पर उतरी, जहाँ किसी भी इंजन की हल्की सी आवाज़ भी मीलों दूर तक गूँज सकती थी। वहीं, भैरव के आदमियों ने इंजनों को हमेशा के लिए बंद कर दिया। अब बारी थी सबसे खौफनाक और खामोश चेज़ की। उन्होंने अपनी काली साइकिलों को थाम लिया।

पैडल घूमने की 'चर्र-चर्र' की बेहद धीमी आवाज़ के सिवा वहाँ कोई शोर नहीं था। दबे पाँव, बिल्कुल एक बे-शब्द परछाई की तरह, वे घनी कंटीली झाड़ियों के बीच से साइकिलें दौड़ा रहे थे। वे अपनी हड्डियों तक जानते थे कि एक सूखे पत्ते का भी पैर के नीचे आकर खटकना या किसी सूखी टहनी का टूटना उनके पूरे मिशन को तबाह कर सकता है और उन्हें मौत के घाट उतार सकता है। घंटों तक चली यह 'साइलेंट चेस' (Silent Chase) उनकी शारीरिक क्षमता, फेफड़ों की ताक़त और मानसिक धैर्य की असली अग्निपरीक्षा थी। पसीने से तर-बतर उन आदमियों ने बिना एक घूँट पानी पिए, अपनी सांसों को काबू में रखकर सिर्फ अपने लक्ष्य की लाल टेल-लाइट्स पर नज़र टिकाए रखी।

आखिरकार, टायरों के नीचे कुचलती बजरी की आवाज़ रुकी।

मामा की गाड़ी शहर के सबसे सूने और वीरान इलाके में स्थित एक पुराने, खस्ताहाल कबाड़खाने के सामने रुकी। बाहर से वह जगह ऐसी थी जहाँ कोई जानवर भी भूलकर न जाए—जंग लगी लोहे की ऊँची दीवारें, सड़े हुए मोटर-ऑयल की बदबू और सन्नाटे की एक खौफनाक, दमघोंटू चादर। पीछा कर रहे आदमियों ने तुरंत अपनी साइकिलें दूर झाड़ियों में दफन कर दीं और कीचड़ में रेंगते हुए, बिना कोई आवाज़ किए गोदाम के पिछले हिस्से तक जा पहुँचे।

उनकी सांसें सीने में थमी हुई थीं। रणजीत सिंह ने गाड़ी की डिक्की खोली। 'क्लिक'। वह एक-एक करके उन आठ भारी बैग्स को बाहर निकाल रहा था। उसका झुर्रियों भरा चेहरा पसीने से लथपथ था, सांसें फूल रही थीं, लेकिन उसकी आँखों में उस बेहिसाब दौलत की एक खूंखार चमक थी।

भैरव के आदमियों ने एक धूल भरी, टूटी हुई खिड़की के कांच से अपनी आँखें टिका दीं। अंदर का खौफनाक नज़ारा देखकर उनका दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। रणजीत सिंह ने ज़मीन पर बिछी एक सीलन भरी, पुरानी चटाई को झटके से हटाया। नीचे एक भारी, जंग लगा लोहे का 'ट्रैप-डोर' (Trap-door) था। जैसे ही उसने पूरा ज़ोर लगाकर उस भारी दरवाज़े को खोला, लोहे की 'चरमराहट' गूँजी... जो ज़मीन की गहराई में किसी सीक्रेट दुनिया का रास्ता खोल रहा था।

जैसे ही वह खुफिया दरवाज़ा खुला, नीचे से पीले रंग की रोशनी की एक झिलमिलाहट ऊपर आई। वह एक बेहद गहरा और विशाल तहखाना था। नीचे उतरने के बाद जो नज़ारा दिखा, वह किसी भी इंसान की आँखें चौंधिया देने और रूह कंपा देने वाला था—दीवारों से सटी हज़ारों-करोड़ की ताज़ी नकद गड्डियाँ, सोने की चमकती हुई भारी ईंटें, और पुराने ज़माने के उन जमीनों के अनगिनत दस्तावेज़, जो दीपक के माता-पिता की असली विरासत थे। तहखाने की हवा में पुराने कागज़ों और सोने की एक अजीब सी ज़हरीली महक थी।

यह सिर्फ कागज़ या पैसा नहीं था... यह दीपक के बचपन की बेरहमी से लूटी हुई खुशियाँ थीं, उसके मृत पिता का खून-पसीने से बना साम्राज्य था, और रणजीत सिंह के बीस सालों के खौफनाक गुनाहों का सबसे बड़ा और चीखता हुआ सबूत था।

कविता के शातिर नेटवर्क ने आज उस तिलिस्म को भेद दिया था, जिसे रणजीत ने सालों की मेहनत से सात तालों और मौत के पहरे के नीचे छुपाया था।

अब शिकार का सबसे गुप्त 'अड्डा' कविता की नज़रों के बिल्कुल सामने था। तहखाने में खड़े रणजीत सिंह को अभी भी लग रहा था कि वह इस दुनिया का सबसे ताकतवर और सुरक्षित इंसान है, लेकिन उस मूर्ख दरिंदे को यह नहीं मालूम था कि उसने अपने ही पतन और मौत के गड्ढे का रास्ता खुद अपनी चलकर दिखाया है। चक्रव्यूह अब पूरी तरह बंद हो चुका था।

 

एपिसोड 18: दौलत की वापसी और खून का हिसाब

रात का तीसरा पहर—रात का वह सबसे मनहूस, गहरा और खौफनाक वक़्त जब हवा भी मानो सांस लेना भूल जाती है। पूरा शहर एक भारी नींद में डूबा था, लेकिन रणजीत सिंह के उस आलीशान, सीलन भरे महल के एक बंद कमरे में जीत के घमंड का जश्न मनाया जा रहा था। हवा में महंगी विदेशी शराब और सिगार के गाढ़े धुएं की दमघोंटू महक तैर रही थी। उस करोड़ों की 'ब्लैक मनी' डील की कामयाबी के नशे में उसने आज इतनी शराब पी ली थी कि उसका सड़ा हुआ गुरूर सातवें आसमान पर पहुँच गया था। भारी मखमली सोफे पर बेसुध पड़ा वह दरिंदा, नशे में खर्राटे लेते हुए यह ख्वाब देख रहा था कि वह अब दुनिया का सबसे ताकतवर इंसान बन चुका है। उस मूर्ख को यह भनक तक नहीं थी कि वह जिस रात को अपनी सबसे बड़ी 'जीत' समझ कर सो रहा है, वही रात उसका सबसे खौफनाक 'अंत' लेकर आ रही है।

दूसरी ओर, शहर के बाहरी छोर पर मौजूद उस वीरान, खस्ताहाल कबाड़खाने में सन्नाटा चीरने वाली एक जानलेवा और खामोश हलचल जारी थी। हवा में जंग लगे लोहे और पुराने मोटर-ऑयल की तीखी गंध थी। घने अंधेरे में कविता और भैरव अपने सबसे खूंखार, काले लिबास पहने वफादार आदमियों के साथ वहाँ साये की तरह मौजूद थे। किसी हॉलीवुड थ्रिलर की सबसे बारीक और जानलेवा साज़िश की तरह, बिना एक भी आवाज़ किए, ताले में मास्टर-की (Master-key) घूमने की सिर्फ एक हल्की सी 'क्लिक' की आवाज़ हुई। गोदाम का भारी दरवाज़ा खुला और वे दबे पाँव उस ज़ंग लगे लोहे के ट्रैप-डोर तक पहुँच गए।

भारी दरवाज़े को उठाकर जैसे ही वे सीढ़ियां उतरे और तहखाने की पीली, टिमटिमाती हुई ठंडी लाइटें 'भक' से जलीं, कविता की आँखें फटी की फटी रह गईं। बेसमेंट की उस सीलन भरी हवा में पुराने कागज़ों और धातु की गंध थी। वहाँ न केवल आज शाम के लाए हुए वे आठ काले बैग्स रखे थे, बल्कि ज़मीन के नीचे बीस सालों का एक पूरा लूटा हुआ 'साम्राज्य' दबा पड़ा था। लोहे के पुराने, भारी ट्रंकों में ठसाठस भरा करोड़ों का कैश, नीली रोशनी में चमकती सोने की भारी ईंटें और वे बेशकीमती प्रॉपर्टी पेपर्स, जिनकी स्याही भी अब वक़्त के साथ पीली पड़ चुकी थी। यह महज़ पैसा नहीं था—यह दीपक के मासूम बचपन का वह कीमती हिस्सा था जिसे रणजीत सिंह ने अपनी क्रूरता के पंजों से नोंच लिया था।

कविता की लाल आँखों में नफरत का एक ऐसा खौफनाक उबाल था, जिसे दबाना अब उसके लिए नामुमकिन था। उसने एक भारी सोने की ईंट को हाथ में उठाते हुए कहा, "उस दरिंदे ने दीपक के भोलेपन का इस हद तक इस्तेमाल किया? यह दौलत तो इतनी है कि वह सात पुश्तों तक बैठ कर खा सकता था, लेकिन इस एक-एक पैसे का असली हकदार सिर्फ और सिर्फ दीपक है।"

भैरव ने अंधेरे में बस अपना हाथ उठाकर एक शांत इशारा किया और अंडरग्राउंड दुनिया के सबसे तेज़, फौलादी हाथों ने पलक झपकते ही काम संभाल लिया। उन्होंने पसीने से भीगे चेहरों के साथ एक ऐसी खामोश इंसानी चेन बनाई, जो किसी हथियार फैक्ट्री की असेंबली लाइन की तरह बिना रुके काम कर रही थी। एक-एक काला बैग, सोने की भारी ईंटें और पीली पड़ी फाइलों का एक-एक पन्ना—सब कुछ बहुत सलीके से, बिना कोई खटपट किए तहखाने की उस कब्र से बाहर निकलता गया। ट्रकों के भारी टायर दबे पाँव बजरी कुचलते रहे।

सुबह की पहली धुंधली किरण आसमान में फूटने से पहले ही, वह विशाल तहखाना एक ऐसी खोखली, भयानक और खाली जगह बन चुका था, जैसे वहाँ पिछले बीस सालों में कभी कुछ था ही नहीं; सिर्फ उड़ती हुई धूल बाकी थी। कविता ने दीपक की उस लूटी हुई पूरी दौलत को रातों-रात उस महफूज़ जगह पर पहुँचा दिया था, जहाँ से रणजीत सिंह उसे अपनी पूरी जिंदगी, एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाकर भी नहीं ढूंढ सकता था।

जब भैरव ने सुबह की सर्द हवा में कविता के पास आकर एक गहरी सांस लेते हुए कहा कि रणजीत सिंह की 'रीढ़ की हड्डी' अब हमेशा के लिए टूट चुकी है, तो कविता का खौफनाक चेहरा बिल्कुल शांत और भावहीन था। पर वह शांति किसी विनाशकारी, खूनी तूफान के आने से ठीक पहले वाले सन्नाटे की तरह थी।

"नहीं भैरव," उसकी आवाज़ में एक ऐसी ठंडी आग थी जो किसी की भी रूह कंपा दे। "यह पैसा सिर्फ कागज़ और धातु का टुकड़ा है। दीपक ने पच्चीस साल जिस नर्क में बिताए हैं, उसकी कीमत यह दौलत कभी नहीं चुका सकती। उसकी रूह का वह घाव तब लगा था, जब उसके माता-पिता को उस 'हादसे' के नाम पर मारा गया था।"

उसकी मुट्ठी इतनी ज़ोर से भींची थी कि उसके पोर सफेद पड़ गए थे और नाख़ून हथेली में धंस गए थे। अब यह खूनी खेल पूरी तरह से बदल चुका था। दीपक की सारी दौलत वापस लेकर उसने रणजीत सिंह को एक ही रात में सड़क का 'भिखारी' तो बना दिया था, लेकिन वह अब उस 'कातिल' के चेहरे से नकाब भी नोचना चाहती थी।

"जब तक मैं उस खूनी करतूत का पूरा हिसाब नहीं ले लेती, तब तक मेरी रूह को शांति नहीं मिलेगी। अब वक़्त आ गया है उस बरसों पुरानी राख को कुरेदने का," कविता ने अपनी लाल, शिकारी आँखों से क्षितिज की ओर देखते हुए ठान लिया था।

मीलों दूर उस महल में, रणजीत सिंह के लिए अब सुबह का चढ़ता हुआ लाल सूरज सिर्फ रोशनी नहीं, बल्कि उसकी बर्बादी और तबाही का सबसे भयानक पैगाम लेकर आने वाला था। उस बेसुध इंसान को अभी तक यह नहीं पता था कि उसकी सिर्फ तिजोरी ही नहीं, बल्कि उसका पूरा घमंड और वजूद रात के अंधेरे में लुट चुका है।

कविता का अगला खौफनाक मिशन अब रणजीत सिंह की उस सबसे बड़ी 'खूनी साज़िश' का सच ज़मीन फाड़कर बाहर लाना था, जो आज भी उस अंधेरे अतीत के पीले पन्नों में दबी हुई थी। इंसाफ की यह जंग अब एक नए, खूनी और सबसे खतरनाक चरण में प्रवेश कर चुकी थी।

 

एपिसोड 19: मिलन की रात और कल का वादा 

महल के भारी लोहे के मुख्य द्वार पर दीपक की गाड़ी के टायरों की बजरी कुचलने की 'चर्र-चर्र' और इंजन की धीमी गड़गड़ाहट रात के सन्नाटे में गूँजी। हवा में ओस और ठंडी रातरानी की तेज़ महक थी। दीपक जैसे ही गाड़ी के भारी दरवाज़े को खोलकर बाहर निकला, उसे लगा जैसे समय की टिक-टिक एक पल के लिए पूरी तरह ठहर गई हो। कविता, जो शायद पिछले कई घंटों से उस भारी नक्काशीदार दरवाज़े की चौखट पर अपनी नज़रें गड़ाए बुत बनकर खड़ी थी, किसी तेज़ बिजली की गति से दौड़ती हुई आई और दीपक के चौड़े सीने से लिपट गई।

वह महज़ कोई आम आलिंगन नहीं था, बल्कि अँधेरे और उजाले में ढली दो रूहों का एक गहरा, खामोश महा-मिलन था। दीपक ने उसे अपनी मज़बूत, फौलादी बाहों में इस कदर कसकर भर लिया कि मानो वह अपनी कविता को इस ज़ालिम दुनिया की हर खौफनाक और बुरी नज़र से हमेशा के लिए अपनी पसलियों में छुपा लेना चाहता हो। जुदाई की उन चंद सर्द रातों ने दोनों के बीच के उस चुम्बकीय खिंचाव को कई गुना बढ़ा दिया था, जो सिर्फ एक-दूसरे की सांसों की छुअन से ही शांत हो सकता था। उस बर्फीली रात में, उनके जिस्मों की वह तेज़ गर्माहट ही उनका एकमात्र महफूज़ ठिकाना थी। दुनिया का सारा ज़हरीला कॉर्पोरेट शोर, करोड़ों के प्रोजेक्ट्स की भारी चिंताएं और साज़िशों का वह दमघोंटू बोझ, महल के उन ऊँचे मेहराबदार गलियारों के बाहर ही अपना दम तोड़ चुका था।

दीपक ने अपने कोट से छनती हल्की सी गर्माहट के बीच कविता का ठंडा चेहरा अपनी हथेलियों में थाम लिया। उसकी गहरी आँखें पोर्च की पीली रोशनी में कविता के चेहरे के हर भाव को पढ़ रही थीं—उसने उसे इतना हसीन, इतना मज़बूत और इतना अपना पहले कभी नहीं देखा था। पर मासूम दीपक अभी भी उस रूह कंपा देने वाली, खौफनाक सच्चाई से कोसों दूर था जो इस वक्त कविता के सीने में किसी ज्वालामुखी की तरह धधक रही थी। वह नहीं जानता था कि जिस नाज़ुक हाथ को उसने प्यार से अपना मानकर थामा है, उस हाथ ने आज ही रात एक खौफनाक खूनी साम्राज्य की जड़ें काट दी हैं।

कविता की गहरी, शिकारी आँखों में आज एक अजीब सी चमकती हुई नमी थी। वह साफ देख पा रही थी कि उसका दीपक, जिसने हज़ारों करोड़ की इतनी बड़ी जालिम दुनिया जीती है, असल में अंदर से कितना टूटा हुआ और मासूम है। वह उस आदमखोर 'विलेन' को नंगा कर चुकी थी जिसने दीपक के माता-पिता को खूनी साज़िश से मरवाकर उसके बचपन में सिर्फ चाबुक और खौफ भर दिया था। कविता के सीने में दीपक के लिए धड़कता प्यार अब एक गहरी ममता और मौत के खौफनाक प्रतिशोध के एक ऐसे घातक मिश्रण में बदल चुका था, जहाँ वह दीपक को हर उस पुराने ज़ख्म से हमेशा के लिए महफूज़ कर देना चाहती थी, जिसने उसे अंदर तक खोखला किया था।

उसने अपने कांपते हुए ठंडे हाथ दीपक के गालों पर रखे और रात के सन्नाटे में एक बेहद धीमी, रेशमी मगर फौलादी इरादे वाली आवाज़ में फुसफुसाते हुए कहा, "दीपक... कल सुबह मैं तुम्हें तुम्हारी ज़िंदगी की सबसे बड़ी खुशी देने वाली हूँ। एक ऐसा तोहफा जिसका असली हक़दार सिर्फ तुम हो। तुम्हारे उन सारे अनसुलझे सवालों के जवाब... कल सुबह तुम्हें मिल जाएंगे।"

दीपक की आँखों में अचानक कौतूहल और हैरानी का एक गहरा भाव तैर गया। उसने अपनी भौहें सिकोड़ते हुए पूछा, "कल सुबह? तुम किस बारे में बात कर रही हो, कविता?"

कविता ने अपनी एक ठंडी उंगली धीरे से उसके होंठों पर रख दी। उसकी भारी सांसों और आवाज़ में एक अजीब सा गहरा नशा था, जो दीपक के मन में उठ रहे सभी सवालों के तूफ़ान को एक ही पल में शांत कर गया। "अभी नहीं... कल सुबह तक का इंतज़ार करो। अभी मेरा पूरा वजूद, मेरी हर धड़कन सिर्फ तुम्हारी है। मुझे इस वक्त सिर्फ तुम चाहिए, दीपक।"

दीपक ने बिना और कोई सवाल किए, उसे अपनी मजबूत बाहों में उठा लिया और महल की उन घुमावदार, पुरानी सीढ़ियों की ओर बढ़ गया। उस सर्द रात, उनके उस विशाल बेडरूम में कोई बत्ती नहीं जली। घने अंधेरे में सिर्फ खिड़की से छनकर आती नीली चाँदनी थी। उस भारी सन्नाटे में सिर्फ उनकी तेज़ साँसों की ताल और उनकी बेकाबू धड़कनों का खामोश संगीत गूँजता रहा। यह खौफनाक और लंबी जुदाई उनके इस मिलन को आग की तरह और अधिक तीव्र, और अधिक गहरा बना चुकी थी। उस रात उन्होंने कोई बातचीत नहीं की, कोई कॉर्पोरेट फाइलें या साज़िशों के पन्ने नहीं खोले; उन्होंने बस एक-दूसरे के जिस्म और रूह की उस अछूती गहराई को छुआ, जहाँ अतीत का कोई खौफनाक साया या मौत का डर नहीं था।

यह अंधेरे में मिली जन्नत का वह सुकून भरा पल था, जहाँ केवल दो रूहें अपने वजूद को एक-दूसरे की गर्माहट में पूरी तरह विलीन कर रही थीं। बाहर शहर की ज़ालिम दुनिया शांत थी, महल के भीतर मोहब्बत अपने चरम पर जल रही थी, और महलों के बाहर... रणजीत सिंह की खौफनाक तबाही की पहली सुबह, अपनी पूरी खूँखार और जानलेवा तैयारी के साथ सूरज की पहली खूनी किरण के फूटने का बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी।

 

एपिसोड 20: पर्दा-फाश

सुबह की पहली सर्द किरण, जो अमूमन दुनिया के लिए नई उम्मीदों का संदेश लेकर आती है, आज एक बेहद खौफनाक और खूनी सच का उजाला लेकर आई थी। शहर की दौड़ती-भागती हलचल से मीलों दूर, उस वीरान और पुराने कबाड़खाने में हवा पूरी तरह ठहरी हुई थी; मानो वह भी आने वाले तूफ़ान के खौफ से सांस लेना भूल गई हो। गोदाम के बाहर बजरी पर टायरों की आवाज़ के साथ गाड़ी रुकी। कविता और दीपक बाहर उतरे—दीपक के चेहरे पर एक गहरी हैरानी और उलझन के भाव थे, लेकिन उसका मन कविता के उस खामोश भरोसे के प्रति पूरी तरह समर्पित था।

जैसे ही उन्होंने भारी, जंग लगे लोहे के दरवाज़े को धकेला, लोहे की एक लंबी 'चरमराहट' गूँजी। जब वे उस सीलन भरे गोदाम के भीतर दाखिल हुए, तो वहाँ का डार्क और तनावपूर्ण नज़ारा किसी अंडरग्राउंड युद्ध-कक्ष (War Room) जैसा था। गोदाम की मद्धम, पीली रोशनी में गुरु भैरव, जो अंडरग्राउंड दुनिया के सबसे गहरे और खूनी राज़ों के रखवाले थे, एक भारी-भरकम, पुरानी लोहे की मेज के पीछे किसी चट्टान की तरह खड़े थे। उनके ठीक सामने पिछले बीस सालों का वह सड़ा हुआ, काला इतिहास फाइलों के रूप में फैला हुआ था, जिसकी कागज़ी सीलन और धोखे की गंध ही किसी का भी दम घोंटने के लिए काफी थी।

दीपक ने जब अंधेरे में खड़े भैरव की उन अनुभवी आँखों को देखा, तो उसे अपने दर्दनाक अतीत और कविता के उस अनकहे, खूनी संघर्ष के बीच एक मजबूत सेतु नज़र आया। उसने बिना कुछ कहे, पूरे सम्मान से आगे बढ़कर उनके चरण स्पर्श किए, लेकिन भैरव की आँखों में जो मौत जैसी खौफनाक गंभीरता थी, उसने दीपक के दिल की धड़कन को कुछ पल के लिए पूरी तरह रोक दिया।

"दीपक," भैरव की भारी, खुरदरी आवाज़ गोदाम की उन ऊँची, खोखली लोहे की दीवारों में किसी चेतावनी की तरह गूँज उठी, "आज तुम जो देखोगे, उसके बाद तुम्हारी दुनिया कभी पहले जैसी नहीं रहेगी। ये फाइलें सिर्फ कागज़ के टुकड़े नहीं हैं, ये तुम्हारे पिता के उस साम्राज्य का कत्लनामा है जिसे तुम्हारे अपनों ने ही लिखा था।"

कविता ने तुरंत आगे बढ़कर दीपक का ठंडा और कांपता हुआ हाथ अपने हाथों में ले लिया। उसकी पकड़ बेहद मज़बूत और फौलादी थी, जैसे वह अपने दीपक को उस विनाशकारी तूफ़ान में बिखरने से थामे रखना चाहती हो जो अब बस फूटने ही वाला था। सन्नाटे में दीपक के कांपते हाथों ने उस पुरानी फाइल का पहला पीला पन्ना पलटा। कागज़ के पलटने की 'खर्र' की आवाज़ ने खामोशी को चीर दिया।

पन्ना पलटते ही जैसे उस गोदाम में समय हमेशा के लिए रुक गया। पहले पेज पर उन दर्जनों नकली कंपनियों के नाम थे, जिन्हें रणजीत सिंह ने बड़े शातिर तरीके से दीपक के नाम पर खड़ा किया था। अगले पन्नों पर बैंक स्टेटमेंट्स का वह खौफनाक जाल था, जिसमें करोड़ों-अरबों रुपयों की हेर-फेर का बारीक हिसाब था—वह पैसा, जो दीपक के मृत माता-पिता की खून-पसीने की गाढ़ी कमाई थी। जैसे-जैसे दीपक की नज़रें उन फाइलों के पन्नों पर दौड़ती गईं, उसका मासूम चेहरा पहले किसी लाश की तरह सफेद पड़ा, और फिर धोखे और गुस्से की भयंकर तपिश से लाल होकर तमतमा उठा। रणजीत सिंह ने सिर्फ उसका पैसा नहीं चुराया था, उसने एक अरबों के वारिस को उसी के महल में एक 'नौकर' की तरह चाबुक खाकर जीने के लिए मजबूर किया था।

गोदाम में सन्नाटा इतना गहरा और दमघोंटू था कि दीपक के सीने से निकलती भारी, खौलती हुई सांसों की 'हांफने' की आवाज़ भी साफ सुनाई दे रही थी। वह अब कागज़ों पर उस नंगे, कड़वे सच को देख रहा था जिसे उसके जालिम मामा ने 'परिवार' के पवित्र नाम पर सालों तक दबाए रखा था। उसकी आँखों में अब आंसुओं का एक कतरा भी नहीं था, बल्कि वहाँ एक ऐसी शुष्क, दहकती हुई खूनी अग्नि थी जो पूरी दुनिया को भस्म कर देने को तैयार थी। उसके चौड़े कंधे पत्थर की तरह तन गए थे, और उसके चेहरे और गर्दन की नीली नसों में खून का उबाल इतना तेज़ था कि वे किसी सांप की तरह साफ उभर आई थीं।

"यह... यह सब उस शैतान ने किया?" दीपक की आवाज़ इंसान की नहीं, बल्कि किसी पिंजरे में कैद भूखे शेर की दहाड़ जैसी थी। वह खौफनाक दहाड़ गोदाम की जंग लगी लोहे की दीवारों से टकराकर जब वापस लौटी, तो वह किसी भी कमज़ोर दिल इंसान की रूह कंपा देने के लिए काफी थी।

दीपक की उँगलियों ने मेज़ पर रखी उन फाइलों को इस ज़ोर से जकड़ लिया था कि पुराने कागज़ बुरी तरह मुड़ने और फटने लगे थे। उसका गुस्सा अब उस डरे-सहमे, मासूम बच्चे का नहीं था जिसने बचपन में बेल्ट की मार खाई थी; वह अब उस ताकतवर 'मालिक' का खौफनाक गुस्सा था जिसे धोखे से बेघर कर दिया गया था। वह ज़हरीला धोखा, जो उसने मामा पर आँख मूंदकर भरोसा करके सहा था, अब पूरी तरह से एक 'अपराधी' के वीभत्स चेहरे पर आकर ठहर गया था।

कविता ने खामोशी से अपना हाथ आगे बढ़ाया और धीरे से उसके तने हुए कंधे पर रख दिया। उसके उस सर्द स्पर्श में एक खौफनाक और पक्का आश्वासन था—'तुम इस जंग में अकेले नहीं हो'। दीपक ने एक लंबी, धधकती हुई सांस ली और अपनी लाल नज़रें कविता की कातिलाना आँखों में मिलाईं। बिना एक लफ्ज़ कहे, उस एक खूंखार नज़र में खून का सारा हिसाब तय हो चुका था।

"रणजीत सिंह," दीपक ने अपने दाँत किटकिटाते हुए और उन्हें बुरी तरह पीसते हुए कहा। उस एक नाम के उच्चारण में ही एक बहुत ही भयानक और दर्दनाक मौत की कसम छुपी थी।

कल रात तक दीपक महज़ एक मोहरा था, लेकिन इस सुबह का उजाला उसके अंदर के सोए हुए 'शिकारी' को हमेशा के लिए जगा चुका था। 

 

एपिसोड 21: दौलत से बड़ा मकसद

गोदाम की उस बेहद ठंडी, सीलन भरी और धुंधली हवा में अचानक दीपक की एक हल्की सी हंसी गूंज उठी। उस खौफनाक सन्नाटे में वह हंसी किसी विक्षिप्त या पागल इंसान की बिल्कुल नहीं थी; बल्कि यह उस आज़ाद रूह की गहरी सांस थी जिसने सदियों की गुलामी के बाद अपनी ज़िंदगी की सबसे भारी लोहे की बेड़ियाँ आज हमेशा के लिए तोड़ दी थीं।

"मामा... ओह मामा," दीपक ने बेहद धीमी, लेकिन हर एक शब्द में पिरोई गई एक ऐसी फौलादी गंभीरता के साथ कहा जो गोदाम की उस दमघोंटू खामोशी को चीर रही थी। "तुमने मेरा पैसा लूटा, मेरी रातों की नींदें लूटीं, और मेरे बचपन के हर एक पल को नर्क बना दिया। पर तुम एक चीज़ कभी नहीं लूट सके—मेरा नसीब।"

उसने टेबल पर फैली उन पुरानी, धूल जमी फाइलों और पीले पड़ चुके कागज़ों की तरफ इशारा किया, जो रणजीत सिंह के बीस साल के खौफनाक पापों का नंगा चिट्ठा थीं। उसकी आवाज़ में अब उस सहमे हुए, बेल्ट खाने वाले बच्चे के डर का कोई नामोनिशान नहीं था। "यह बेशुमार दौलत... ये अंधेरे में चमकती सोने की ईंटें... ये सब मेरे माता-पिता के खून-पसीने की कमाई थी। तुमने मुझे कंगाल करने की कोशिश में खुद को एक ज़हरीली दीमक की तरह गिरा लिया। तुमने सोचा था कि तुम मुझे अंदर से खोखला कर रहे हो, पर तुम नादान थे। तुमने मुझे उन दुखों की भयंकर आग में तपाकर और भी अधिक मज़बूत बना दिया है।"

अचानक, दीपक अपनी जगह से मुड़ा और अपने भारी कदमों के साथ कविता के बिल्कुल सामने आकर खड़ा हो गया। कविता के लिए यह पल पूरी तरह से स्तब्ध कर देने वाला था। दीपक ने अपनी नज़रें मिलाईं और धीरे से झुककर कविता के सामने अपने दोनों हाथ पूरे सम्मान से जोड़ दिए। कविता ने हड़बड़ाकर, एक अजीब सी घबराहट में उसके हाथ नीचे करने की कोशिश की, लेकिन दीपक ने उसके ठंडे हाथों को अपनी हथेलियों में इतनी मज़बूती से थाम लिया कि वह इंच भर भी हिल न सकी।

"कविता," दीपक की भारी आवाज़ में एक हल्का सा कंपन था, जो उसके भीतर दबे दर्द की गहराइयों को बयां कर रहा था। "मामा जैसे इंसान मेरी ज़िंदगी पर एक मौत का काला साया बनकर मंडरा रहे थे। मैं एक ऐसा अनाथ बच्चा था जो अपने ही घर की चारदीवारी में एक कैदी था, और वह खौफनाक अंधेरा इतना गहरा था कि मुझे अपने वजूद की रोशनी भी दिखाई नहीं देती थी। तुमने उस खूनी अंधेरे में एक मसीहा बनकर कदम रखा। आज तुमने मुझे मामा का वह घिनौना चेहरा दिखा दिया, जिसे देखने की हिम्मत मुझमें कभी नहीं थी। इस सच्चाई का कर्ज़, इस नई ज़िंदगी का कर्ज़ मैं सात जन्मों तक नहीं चुका सकता।"

दीपक ने गोदाम के उस धुंधले अंधेरे में खड़ी उन भारी-भरकम वैनों की तरफ इशारा किया, जिनमें उनका वह लूटा हुआ, हज़ारों-करोड़ का साम्राज्य भरा हुआ था।

"रही बात इस दौलत की," दीपक का चेहरा एक चट्टान जैसी दृढ़ता से भर गया, उसकी आँखों में भविष्य की एक ऐसी ज़बरदस्त चमक थी जो कविता ने पहले कभी नहीं देखी थी। "यह कल भी मेरे लिए सब कुछ नहीं थी, और आज भी नहीं है। मैं इस दौलत से कोई नया महल या घमंड का आलीशान साम्राज्य नहीं खड़ा करूँगा। मैं एक ऐसा 'सपोर्ट सिस्टम' बनाऊंगा, एक ऐसा फाउंडेशन तैयार करूँगा जहाँ न तो कोई दूसरी कविता सड़कों की अंतड़ियां चीर देने वाली भूख और ठंड में घिसटते हुए उस अंडरग्राउंड नर्क तक पहुँचेगी, और न ही कोई दूसरा दीपक अपने ही घर में चाबुक खाकर, डर-डर के जीएगा। हर अनाथ, हर लाचार बच्चे को उसका खोया हुआ बचपन वापस मिलेगा।"

यह सुनते ही कविता का सीना फख्र और गर्व से फूल गया। उसने उस सीधे-सादे लड़के से प्यार किया था जिसे दुनिया और खुद उसके मामा 'कमज़ोर' समझते थे, लेकिन आज उसके सामने वह ताकतवर मर्द खड़ा था जिसने अपने रिसते हुए ज़ख्मों को 'मदद' के फौलाद में बदल देने का संकल्प लिया था। कविता की लाल, शिकारी आँखों से आँसू छलक पड़े—ये आँसू किसी बेरहम हत्यारी के नहीं थे, बल्कि एक ऐसी पत्नी के थे जिसे अपने पति की عظमत (महानता) पर नाज़ था।

उसने आगे बढ़कर दीपक को अपनी मज़बूत बाहों में कसकर समेट लिया। अब तक उसे लग रहा था कि वह इस खूनी लड़ाई में दीपक की रक्षा करने वाली एक 'ढाल' है, लेकिन आज उसे समझ आया कि दीपक की यह महान और निश्छल सोच उसकी रूह के उन पुराने, नासूर बन चुके ज़ख्मों के लिए सबसे बड़ा मरहम थी, जिन्हें वह सालों से अंडरग्राउंड दुनिया में ढो रही थी।

पास ही अंधेरे में खड़े गुरु भैरव, जो अब तक खामोशी से यह सब देख रहे थे, उनकी कठोर, तजुर्बेकार आँखों में भी आज एक नमी और चेहरे पर एक गहरी संतुष्टि भरी मुस्कान थी। उन्होंने इस काले अंडरवर्ल्ड में अपनी पूरी ज़िंदगी गुज़ार दी थी, पर आज पहली बार एक खूंखार हत्यारी को एक रक्षक और एक डरे हुए, पंख कटे परिंदे को एक मसीहा बनते देखा था।

 

एपिसोड 22: आखिरी राज़ और तूफ़ान से पहले की शांति

गोदाम के उस धुंधले, सीलन भरे और बर्फ जैसे ठंडे सन्नाटे में, जहाँ हवा भी मानो जम चुकी थी, कविता ने दीपक के कांपते हुए फौलादी हाथों को मजबूती से अपने हाथों में जकड़ लिया। गोदाम की पीली, टिमटिमाती रोशनी में उसकी आँखों में इस वक्त दीपक के लिए जो असीम सम्मान और गहरा प्रेम तैर रहा था, वह ज़मीन के नीचे दबी किसी भी सांसारिक दौलत से कहीं बढ़कर था।

"दीपक, आज तुम्हारे इस फैसले ने मेरा सिर गर्व से ऊँचा कर दिया है," कविता ने अपनी भारी पर बेहद ठंडी आवाज़ में कहा, जो उस खाली जगह में गूँज उठी। "उस बेशुमार दौलत को एक पल में ठुकरा देना, जिसके लिए लोग बेझिझक खून की नदियां बहा देते हैं... यह साबित करता है कि रणजीत सिंह जैसा दरिंदा तुम्हारी उस पाक रूह को छू तक नहीं पाया है।"

दीपक ने कोई लफ्ज़ नहीं कहा, उसने बस खामोशी से आगे बढ़कर कविता को अपने चौड़े सीने से लगा लिया। वह उस सर्द, मनहूस रात में कविता के जिस्म की गर्माहट को महसूस करना चाहता था, क्योंकि उसके अंदर का अंतर्ज्ञान उसे चीख-चीख कर बता रहा था कि आने वाली सुबह उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा और सबसे खौफनाक इम्तिहान लेकर आएगी। कविता के गले से लिपटे होने के बावजूद, उसकी गहरी आँखों में एक ऐसी बैचेनी और चिंता थी, जो उसके मन में दबे उस 'सबसे काले और खूनी सच' को उगलने के लिए मजबूर कर रही थी। वह राज़, जिसे सुनते ही दीपक का पहले से छलनी दिल एक बार फिर से चकनाचूर होने वाला था।

कविता ने धीरे से खुद को उसके आगोश से अलग किया और एक कातिलाना गंभीरता के साथ दीपक की आँखों में सीधा झाँका। हवा में एक अजीब सा दमघोंटू तनाव छा गया।

"दीपक... मामा का असली घिनौना चेहरा अभी बाकी है। तुमने अभी तक उस शैतान को पूरी तरह नहीं देखा, जिसने तुम्हारी मासूम ज़िंदगी को उस कालकोठरी में धकेला, जहाँ सिर्फ ख़ौफ़ और नफरत थी। तुम्हारे माता-पिता का अंत... वह कोई हादसा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी खूनी साज़िश थी।"

ये शब्द जैसे ही हवा में तैरे, दीपक के पूरे वजूद पर मानो आसमान से हज़ारों बिजलियाँ एक साथ गिर गईं। उसके कानों में एक सन्न कर देने वाली सीटी बजने लगी। उस पर एक ऐसा गहरा और घातक प्रहार हुआ, जिसके लिए उसका मासूम मन कभी तैयार नहीं था। उसका चेहरा अचानक किसी बेजान लाश की राख जैसा सफेद पड़ गया, और फिर अगले ही पल... उसकी चौड़ी आँखों में खौलते हुए लाल अंगारे धधकने लगे।

कविता ने देखा कि दीपक का बदन किसी पत्थर की चट्टान की तरह सख्त हो गया है। उसके गले और माथे की नीली नसें किसी सांप की तरह खतरनाक रूप से बाहर उभर आई थीं और हाथों की मुट्ठियाँ इस कदर भींची थीं कि उंगलियों के पोर खून की कमी से सफेद पड़ गए थे। गोदाम में पसरी यह खामोशी कोई आम गुस्सा नहीं था—यह वह खौफनाक शांति थी, जो किसी प्रलयंकारी ज्वालामुखी के फटने से ठीक एक सेकंड पहले होती है।

कविता घबराकर तुरंत उसके सामने आई और उसके गुस्से से कांपते हुए चौड़े कंधों को अपनी पूरी ताकत से मजबूती से थाम लिया।

"दीपक! मेरी तरफ देखो! अपना आपा मत खोना। मैं तुम्हें किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती। हम मामा को उसके पापों की सज़ा कानून के ज़रिए दिलवाएंगे, पर अभी नहीं। तुम्हें खुद को हर हाल में संभालना होगा!"

दीपक का फौलादी बदन अब भी अंदर तक थरथरा रहा था, उसकी सांसें भट्टी की तरह तेज़ चल रही थीं, पर कविता के हाथों की उस जानी-पहचानी गर्माहट ने उसके उबलते हुए खून की रफ्तार को थोड़ा धीमा किया। कविता ने बिना एक पल की भी देर किए अपना आखिरी और सबसे शातिर मास्टरप्लान समझाया:

"हम अभी इसी वक्त मामा के घर जाएंगे। मैं उनके सामने ऐसा जाल बिछाऊंगी कि वे खुद-ब-खुद उस बरसों पुरानी खूनी सच्चाई को उगल देंगे। बाहर पुलिस पहले से ही हमारे इशारों पर तैनात होगी। तुम्हें बस खामोश रहना है, मामा को बोलने देना है। किसी भी हाल में अपना संयम मत खोना।"

कविता ने तुरंत अंधेरे में खड़े गुरु भैरव की ओर देखकर एक तीखा इशारा किया। वे दस काले भारी बैग्स, जो अब रणजीत सिंह की खौफनाक तबाही का सबसे बड़ा 'चारा' बन चुके थे, फिर से भैरव के फौलादी हाथों के हवाले कर दिए गए। भैरव ने उन रुपयों के बैग्स के साथ बिना कोई आवाज़ किए मामा के घर की ओर प्रस्थान किया। टायरों की 'चर्र-चर्र' के साथ गाड़ियाँ गोदाम से बाहर निकलीं।

कविता ने दीपक का ठंडा हाथ थाम लिया। अब वे दोनों मौत की एक ऐसी अंतिम और निर्णायक लड़ाई की ओर बढ़ रहे थे, जहाँ रणजीत सिंह का खौफनाक अंत किसी हथियार से नहीं, बल्कि उसकी अपनी ही अंधी 'ग्रीड' (लालच) के हाथों होना था। गाड़ी के अंदर अंधेरे में दीपक की साँसें भारी और तेज़ थीं, पर सामने सड़क पर टिकी उसकी उन लाल, अंगारी आँखों में अब सिर्फ और सिर्फ एक ही मकसद था—अपने माता-पिता के बहे खून का बेरहम इंसाफ।

 

एपिसोड 23: तूफ़ानी दस्तक

उस सीलन भरे गोदाम से निकलकर दीपक और कविता की काले रंग की एसयूवी (SUV) सीधे रणजीत सिंह के आलीशान घर की ओर किसी भूखे चीते की तरह दौड़ पड़ी। डामर की सड़क पर टायरों के रगड़ने की चीखें और तेज़ रफ्तार हवा का शोर था, लेकिन गाड़ी के अंदर का सन्नाटा इतना भारी और दमघोंटू था, जैसे किसी भयानक प्रलय के आने से ठीक पहले की मुर्दा शांति हो।

रणजीत सिंह के उस विशाल, रोशनी से नहाए महलनुमा घर के भारी लोहे के गेट के सामने गाड़ी 'क्रीच' की आवाज़ के साथ रुकी। दीपक ने स्टीयरिंग व्हील पर अपनी पकड़ ढीली की और एक लंबी, गहरी सांस सीने में भरी। बाहर से वह घर बिल्कुल शांत और खूबसूरत दिख रहा था, लेकिन आज रात उसके अंदर एक ऐसा खौफनाक शतरंज का खेल शुरू होने वाला था, जहाँ महज़ मोहरे नहीं पिटने थे... बल्कि सच की ठंडी और तेज़ धार से गर्दनें काटी जानी थीं।

जैसे ही दोनों ने घर के आलीशान, महकते हुए हॉल के अंदर कदम रखा, वहाँ एक खुशनुमा पारिवारिक माहौल था। महंगी चाय की प्यालियों की 'खनक' और हल्की-हल्की हँसी गूँज रही थी। रणजीत सिंह विशाल झूमर की पीली रोशनी के नीचे, अपने भारी-भरकम सोफे पर पूरे प्रभाव और गुरूर में धंसा बैठा था। आसपास परिवार के कुछ बड़े लोग अपनी-अपनी दुनिया और गपशप में मस्त थे।

दीपक और कविता ने आगे बढ़कर पूरी गरिमा और झूठे सम्मान के साथ रणजीत सिंह और बाकी बड़ों के पैर छुए। कविता के चेहरे पर आज ऐसी निर्मल, अछूती मासूमियत थी, जिसे देखकर कोई अंडरवर्ल्ड का बड़ा से बड़ा खिलाड़ी भी उसे एक खूंखार 'शिकारी' नहीं मान सकता था। दूसरी तरफ दीपक का शरीर अंदर से किसी लोहे की ठंडी चट्टान की तरह सख्त हो चुका था, उसकी रगों में उबलता हुआ खून दौड़ रहा था, लेकिन उसने अपने इस खौफनाक क्रोध को एक बेहद महीन, चालाकी भरी मुस्कान के भारी पर्दे के पीछे छिपा रखा था।

आशीर्वाद लेने के बाद दीपक सीधे मुड़ा और रणजीत सिंह की आँखों में आँखें डालकर उसके ठीक सामने खड़ा हो गया। उसने अपनी आवाज़ में शहद सी मिठास घोली, एक ऐसा मीठा ज़हर जो सीधे दिमाग पर असर करता है—

"मामा जी, मैं आपका तहे दिल से धन्यवाद करने आया हूँ। मैं शहर में नहीं था और कविता को इस हज़ारों करोड़ के बिजनेस का रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं था। पर आपने उसके एक बार कहने पर जिस तरह हमारी इतनी बड़ी डील में मदद की... अगर आप न होते तो शायद यह मौका हाथ से निकल जाता।"

यह सुनते ही रणजीत सिंह का सड़ा हुआ अहंकार एक झटके में सातवें आसमान पर पहुँच गया। वह मखमली कुर्सी पर थोड़ा पीछे की ओर झुका और दीपक के चौड़े कंधे पर एक 'अभिभावक' जैसा भारी हाथ रखा। उसकी आँखों में चमकती वह दौलत की नकली चमक किसी के भी लिए भ्रम पैदा कर सकती थी। उसने एक दिखावटी और मज़ाकिया लहज़े में कहा—

"अरे बेटा, इसमें धन्यवाद कैसी? यह तो मेरा फर्ज़ था। तुम्हारे और मेरी इस प्यारी बहू के लिए तो मैं अपनी जान भी दे सकता हूँ। यह तो बस एक मामूली सी बिजनेस मीटिंग थी, बेटा। मेरे लिए यह कोई नई बात नहीं है।"

दीपक ने एक पल के लिए अपनी ठंडी, भेदती हुई नज़रों को रणजीत सिंह की उन धूर्त आँखों में गड़ा दिया—ठीक वही आँखें, जिन्होंने बीस साल पहले उसके माता-पिता की दर्दनाक मौत की खूनी नियति लिख दी थी। दीपक ने अपनी मुस्कान को और अधिक गहरा किया, कमरा अब धीरे-धीरे शांत होने लगा था। उसने कविता की तरफ मुड़ते हुए बातों का रुख बदला:

"सच कह रही हो कविता, मामा जी तो इस कॉर्पोरेट दुनिया के सबसे माहिर खिलाड़ी हैं। इनकी रफ्तार का कोई सानी नहीं है। बड़ी से बड़ी डील तो ये चुटकियों में क्लोज़ कर देते हैं। मुझे याद है, मामा जी का एक रिकॉर्ड रहा है—ये ज़्यादा से ज़्यादा 15 या 20 मिनट में ही सामने वाले को अपनी चालों में उलझाकर डील पक्की कर देते हैं। उससे ज़्यादा वक़्त इन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी में किसी भी डील पर नहीं लिया।"

दीपक यहाँ अचानक रुक गया।

हॉल में पसरी रही हल्की आवाज़ें एकदम से सन्न हो गईं। दीवार पर टंगी पुरानी घड़ी की 'टिक-टिक' अब साफ सुनाई दे रही थी। दीपक ने एक लंबी और गहरी सांस ली, जैसे वह हवा में मौजूद रणजीत के फैलते हुए डर को अपने नथुनों से महसूस कर रहा हो। फिर उसने अपनी गर्दन को धीरे से घुमाया और सीधे रणजीत सिंह के झुर्रियों भरे चेहरे को ताका।

"लेकिन मामा जी..." दीपक की आवाज़ अब धीमी या मीठी नहीं, बल्कि किसी तेज़ धार वाली बर्फ की छुरी जैसी थी, जो सीधे गले पर रखी गई हो। "मुझे बस एक बात समझ नहीं आ रही। जो माहिर खिलाड़ी 15 मिनट में खेल खत्म कर देता है, भला उस दिन उस फार्महाउस पर आपने पूरे दो घंटे कैसे ले लिए?

उस आलीशान, जगमगाते कमरे में जैसे आसमान फाड़कर कोई खौफनाक बिजली कौंध गई।

रणजीत सिंह के चेहरे का रंग धीरे-धीरे उड़कर किसी मुर्दे की राख जैसा सफेद हो गया। वह गुरूर भरी मुस्कान जो उसके होंठों पर सजी थी, वह एक ही पल में कांच की तरह टूटकर बिखर गई। उसके दिमाग के किसी गहरे, अंधेरे कोने में एक भयानक धमाका हुआ।

फार्महाउस? दो घंटे?

रणजीत सिंह का हलक पूरी तरह सूख गया, मानो किसी ने उसके गले से सारी नमी निचोड़ ली हो। यह करोड़ों की ब्लैक-मनी मीटिंग तो इतनी 'खुफिया' थी कि उसकी अपनी परछाई को भी इसकी भनक नहीं थी। दीपक को यह कैसे पता चला कि वह शहर से मीलों दूर उस सुनसान फार्महाउस पर था? उसे उस खामोश मीटिंग के समय का इतनी बारीकी से अंदाज़ा कैसे है?

रणजीत सिंह के सिकुड़े हुए माथे पर पसीने की एक ठंडी बूंद उभरी और धीरे से फिसलकर उसकी कांपती हुई भौहों पर आ रुकी। उसे अचानक उस सन्नाटे में यह रूह कंपा देने वाला एहसास हुआ कि उसके सामने खड़ा दीपक अब वह 'भोला और डरा हुआ लड़का' नहीं है जिसे वह अपनी उंगलियों पर नचाता था और बेल्ट से मारता था। यह तो वह खूंखार शिकारी है जिसने आज उसके घर की दहलीज़ लांघकर सीधे उसके सीने पर मौत का निशाना साध दिया है।

रणजीत सिंह का फौलादी अहंकार, जो अब तक उसका सबसे बड़ा कवच बना हुआ था, आज पहली बार अपने ही किए हुए खूनी पापों के खौफनाक बोझ से बुरी तरह कांपने लगा था।

 

एपिसोड 24: शैतान का इकरार

महल जैसे उस आलीशान घर की हवा में अब एक ऐसा दमघोंटू और जानलेवा तनाव भर चुका था, जो किसी भी कमज़ोर इंसान की सांसें रोक दे। रणजीत सिंह का झुर्रियों भरा चेहरा, जो कुछ पल पहले सत्ता और दौलत के नशे में लाल था, अब किसी ताज़ा लाश जैसी खौफनाक सफेदी में बदल चुका था। उसके माथे पर ठंडे पसीने की घनी परत चमक रही थी, उसके हाथ-पाँव बुरी तरह कांप रहे थे और उसकी फैली हुई नज़रों में वह मौत का डर था जो इंसान की रूह को अंदर से खोखला कर देता है।

पास ही भारी मखमली सोफे पर बैठी मामी, जो अब तक इस खूनी खेल से पूरी तरह अनजान थीं, अपने पति के चेहरे का उड़ता रंग और दीपक की शांत आँखों में छिपे उस प्रलयंकारी तूफान को देखकर हतप्रभ थीं। उन्हें भनक तक नहीं थी कि जिस शख्स के साथ उन्होंने अपनी आधी ज़िंदगी एक ही छत के नीचे बिता दी, वह इंसान नहीं, बल्कि एक ऐसा आदमखोर दानव है जिसने अपने ही परिवार की नींव पर खून की भयानक होली खेली है।

तभी, सन्नाटे को चीरते हुए भारी जूतों के कदमों की 'ठक-ठक' गूँजी और घर का मुख्य दरवाज़ा एक झटके से खुला।

रणजीत सिंह ने जैसे ही कांपते हुए मुड़कर देखा, उसकी रूह शरीर छोड़ती हुई महसूस हुई। गुरु भैरव अपने उन्हीं फौलादी साथियों के साथ हॉल में दाखिल हुए, जो उस रात फार्महाउस पर महंगे सूट पहनकर 'इन्वेस्टर्स' बनकर आए थे। उनके हाथों में वही दस भारी काले चमड़े के बैग्स थे, उन बैग्स के संगमरमर के फर्श पर गिरने की भारी 'धम्म' की आवाज़ ने रणजीत के दिल की धड़कन को रोक सा दिया।

रणजीत सिंह का फौलादी अहंकार एक ही झटके में कांच की तरह चूर-चूर हो गया। वह अपनी जगह से उछला और पागलों की तरह चीखा, उसकी आवाज़ बुरी तरह फट रही थी— "तुम लोग... तुम वही इन्वेस्टर्स हो! मेरा पैसा... तुम्हें उस खुफिया तहखाने का पता कैसे चला? किसने गद्दारी की है मेरे साथ?!"

कविता के चेहरे पर एक ऐसी ठंडी, ज़हरीली और कातिलाना मुस्कान उभरी, जो रणजीत सिंह के बदन की एक-एक हड्डी में सिहरन पैदा कर देने के लिए काफी थी। उसने अपने हील्स से फर्श पर आवाज़ करते हुए एक कदम आगे बढ़ाया। उसकी आवाज़ में अब नफरत का ऐसा गहरा नशा था जो रणजीत के हर एक शब्द को बेदर्दी से कुचल रहा था।

"मामा जी, खेल खत्म हो चुका है," कविता ने एक तीखे और बर्फीले लहज़े में कहा। "आप आज भी अपने सड़े हुए गुरूर में यह नहीं समझ पाए कि आप कितने बड़े और खौफनाक चक्रव्यूह में फंसे हैं। जो पैसा आपने दीमक बनकर पिछले बीस सालों में दीपक की ज़िंदगी से लूटा, वह अब अपने सही वारिस के पास लौट आया है। उस अंडरग्राउंड तहखाने तक हमें कोई गद्दार नहीं, बल्कि आप खुद लेकर गए थे। हमारे आदमी आपके पीछे एक अदृश्य, खामोश साये की तरह थे। आप जश्न मना रहे थे, और हम आपकी तिजोरी को हमेशा के लिए कब्र बना रहे थे।"

यह सुनते ही रणजीत सिंह के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसे चक्कर आने लगे। उसका बीस साल का अपराजेय साम्राज्य, जिसे उसने अपनों के खून और फरेब से सींचा था, एक ही रात में सूखी रेत की तरह उसकी मुट्ठी से फिसल गया था। उसके घुटनों ने जवाब दे दिया और वह बेसुध होकर भारी सोफे पर गिर पड़ा।

मामी से यह मंज़र नहीं देखा गया। उन्होंने दौड़कर रणजीत सिंह का कॉलर और कुर्ता झकझोरा। उनकी आँखों से आंसुओं का सैलाब बह रहा था और आवाज़ में वो चीखता हुआ दर्द था जो किसी को भी अंदर तक तोड़ दे। "रणजीत! मेरी तरफ देखो! सच बताओ मुझे! क्या यह सच है जो मैं सुन रही हूँ? क्या तुमने अपने ही सगे, मासूम भांजे को दर-दर की ठोकरें खिलाईं और उसे मारा-पीटा? बोलो! मैं पिछले बीस सालों से किस के साथ जीती रही हूँ?"

मामी की दर्दनाक चीखें, सामने खड़े काल रूपी भैरव, और चारों तरफ से घिरते हुए मौत के खौफ ने रणजीत सिंह के दिमाग की नसें फाड़ दीं। उसका बचा-खुचा हौसला टूट गया। अब उसके पास छिपने के लिए दुनिया का कोई कोना नहीं बचा था। उस भयानक मानसिक दबाव और अपनी तबाही के सदमे में, रणजीत सिंह का दिमाग पूरी तरह सुन्न पड़ गया... और वह फूट पड़ा।

वह अचानक अपना सिर पकड़कर पागलों की तरह हँसने लगा। उसकी वह उन्मादी हँसी जल्द ही एक खौफनाक दहाड़ में बदल गई, और उसके मुँह से झाग के साथ उसका खूनी सच बाहर आने लगा।

"हाँ... हाँ! मैंने ही किया था यह सब!" रणजीत सिंह की वह वहशी दहाड़ पूरे हॉल की दीवारों से टकराई। उसकी आँखें खून की तरह लाल हो चुकी थीं और चेहरे की नसें फटने को तैयार थीं। "हाँ, मैंने ही अपनी बहन और उस कमीने बहनोई की मौत की वह भयानक साज़िश रची थी! वह कोई हादसा नहीं था... मैंने ही खुद उनकी गाड़ी के ब्रेक के तार कटवाए थे! जब उनकी गाड़ी खाई में गिरी होगी, तो मैं यहाँ जश्न मना रहा था! मैं... मैं उन हज़ारों करोड़ का अकेला मालिक बनना चाहता था! मुझे वो दौलत चाहिए थी!"

वह हाँफ रहा था, लेकिन उसका पागलपन रुकने का नाम नहीं ले रहा था। "मैंने ही इस बिज़नेस में एक-एक फ्रॉड किया, फेक कंपनियाँ बनाईं, जाली दस्तखत किए और उस अनाथ दीपक को हमेशा अंधेरे में रखा! वह तो बस एक बेवकूफ खिलौना था... एक मोहरा... जिसे मैंने बीस साल तक जूतों की नोक पर रखा और अपनी उंगलियों पर नचाया है! हाँ, मैं हूँ कातिल!"

वह अपने पापों का सड़ा हुआ चिट्ठा खोलता गया। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा वहशी उन्माद था। उसने हर उस धोखे, हर उस खून और हर उस साज़िश को बेझिझक स्वीकार कर लिया जिसे उसने सालों तक सात तालों में छुपाए रखा था। उस मूर्ख दरिंदे को ज़रा सा भी अंदाज़ा नहीं था कि उस भव्य कमरे के पिछले भारी मखमली पर्दों के ठीक पीछे... पुलिस के आला अधिकारी अपनी बंदूकों के साथ खामोशी से खड़े थे। उनके हाथ में मौजूद वॉयस रिकॉर्डर्स चालू थे, जो उस शैतान के हर एक शब्द, हर एक खूनी चीख को बारीकी से सुन रहे थे और उसे एक ऐसे कानूनी सबूत के तौर पर दर्ज कर रहे थे जो उसे सीधा फांसी के फंदे तक ले जाने वाला था।

दीपक इस पूरे खौफनाक मंज़र के बीच किसी पत्थर की मूरत सा बिना पलक झपकाए खड़ा था। उसका सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था। उसके अंदर का वह डरा हुआ बच्चा आज अपने माता-पिता के कातिल को बेनकाब होते देखकर रो रहा था... लेकिन वह फौलादी 'मर्द' आज पूरी तरह जाग चुका था जिसने आज इंसाफ की पहली और सबसे बड़ी सीढ़ी चढ़ ली थी।

कविता ने उसका ठंडा हाथ अपनी हथेलियों में मजबूती से थाम रखा था। शिकारी अब खुद अपने ही बुने खूनी जाल में पूरी तरह नंगा हो चुका था। रणजीत सिंह की अपनी ही ज़बान, आज उसके लिए मौत का सबसे पक्का फरमान बन गई थी।

 

एपिसोड 25: सुकून का नया सूरज

रणजीत सिंह के मुँह से झाग की तरह निकली उस खौफनाक स्वीकारोक्ति के साथ ही, उस आलीशान कमरे का दमघोंटू नज़ारा हमेशा के लिए बदल गया। भारी मखमली पर्दों के पीछे से निकले पुलिस के उन आला अधिकारियों के भारी जूतों की 'ठक-ठक' वाली आहट, रणजीत के हर एक पापी और खूनी शब्द पर मौत की मुहर लगा रही थी। हवा में अचानक हथकड़ियों की ठंडी धातु की वह खनक—'झन्-झन्'—उस जगमगाते घर के हर कोने में किसी मुर्दाघर के सन्नाटे की तरह गूँजी। खिड़कियों के कांच पर पुलिस की गाड़ियों की लाल और नीली घूमती हुई बत्तियाँ अब एक खौफनाक नाच कर रही थीं।

रणजीत सिंह, जो कुछ पल पहले तक खुद को कॉर्पोरेट शतरंज का सबसे अजेय खिलाड़ी समझता था, अब पसीने में नहाए एक कांपते हुए, लाचार अपराधी की तरह पुलिस के फौलादी शिकंजे में जकड़ा हुआ था। पुलिस उसे कॉलर से पकड़कर बेदर्दी से घसीटते हुए बाहर ले जाने लगी। फर्श पर घिसटते हुए, जाते-जाते उसने एक आखिरी, टूटी हुई नज़र दीपक और कविता पर डाली। लेकिन आज उसकी उस लाल नज़र में कोई धौंस, गुरूर या मौत की धमकी नहीं थी; बल्कि अपनी इस भयानक हार की वह ज़हरीली कड़वाहट थी जिसे वह चाहकर भी नहीं उगल सकता था। दूसरी ओर, दीपक की गहरी आँखों में उसके लिए अब कोई नफरत या गुस्सा भी नहीं बचा था; वहाँ सिर्फ एक ठंडी, बेबाक और कातिलाना शांति थी।

जैसे ही बाहर सड़क पर पुलिस की गाड़ी का सायरन दूर कहीं शहर की अंधेरी गलियों में जाकर शांत हुआ, उस विशाल कमरे में एक भारी, दम घोंटने वाली और रूह कंपा देने वाली खामोशी पसर गई।

तभी, मामी—जो अब तक अपनी ही झूठी दुनिया के ढहते हुए खंडहरों में दबी हुई, बेजान सी बैठी थीं—लड़खड़ाते हुए कदमों से दीपक की ओर बढ़ीं। उनके रेशमी कपड़ों की सरसराहट उस सन्नाटे में साफ सुनाई दे रही थी। उनकी सूजी हुई आँखों में उस झूठे घमंड के टूटने का गहरा दर्द था, जिसे उन्होंने बरसों तक अपने कातिल पति के रसूख के साथ जिया था।

उन्होंने अपने कांपते और ठंडे हाथों से दीपक का चेहरा थाम लिया। उनके गर्म आँसू दीपक के चौड़े कंधों पर गिरकर उसकी शर्ट को भिगो रहे थे।

"दीपक... बेटा," उनकी टूटती हुई आवाज़ रूह को कंपा देने वाली थी। "मुझे माफ़ कर देना। इस दरिंदे ने तुम्हारे बचपन और तुम्हारी खुशियों के साथ जो कुछ किया, उसे मैं अपनी ज़िंदगी के आख़िरी वक़्त तक नहीं भुला पाऊँगी। मैं तो सिर्फ एक अंधी पत्नी थी, जिसे यह पता ही नहीं था कि उसके घर की नींव अपनों के खून से सनी है। आज मुझे इस बात का सुकून है कि तुम्हें बीस साल का अधूरा न्याय मिल गया। तुम्हारे माता-पिता की रूह को आज पहली बार चैन मिला होगा।"

यह सुनकर दीपक की फौलादी आँखें भी भर आईं। उसने अपनी कांपती हुई मामी को सहारा देकर वापस सोफे पर बिठाया। उसका खूनी बदला आज पूरी तरह मुकम्मल हो चुका था, लेकिन एक परिवार के इस भयानक बिखराव ने उसके दिल के किसी गहरे कोने को नम कर दिया था। उसने अपने सीने में धधकती नफरत की जगह उस गहरे ठहराव को गले लगा लिया, जो अक्सर किसी बड़े और खौफनाक तूफान के गुज़र जाने के बाद आता है।

कुछ देर बाद, दीपक, कविता और साये की तरह खड़े गुरु भैरव ने वहाँ मौजूद परिवार के बाकी सहमे हुए सदस्यों के सामने एक आखिरी बार सिर झुकाया। फिर उन्होंने भारी मन से उस घर की दहलीज़ को हमेशा के लिए पार कर लिया—वह घर जो कभी उसका अपना था, लेकिन जिसे उसने अब एक अजनबी और मनहूस खंडहर की तरह पीछे छोड़ दिया था। उनके पीछे वह भारी दरवाज़ा हमेशा के लिए बंद हो गया।

रात का तीसरा और सबसे गहरा पहर था, और वे अपने शांत महल में लौट आए थे। उस आलीशान बेडरूम में, जहाँ कल तक साज़िशों का डर और बेचेनी का खौफनाक साया मंडराता था, आज हवा में एक अजीब सा, पवित्र सुकून तैर रहा था। बाहर की ज़ालिम दुनिया के तमाम खूनी तूफान अब पूरी तरह शांत हो चुके थे। दीपक और कविता एक-दूसरे के बेहद करीब, उस मखमली बिस्तर पर एक गहरी खामोशी में बैठे थे।

दीपक चुपचाप, बिना पलक झपकाए कविता के हसीन चेहरे को निहार रहा था। उसकी नज़रों में आज कविता के लिए केवल एक पत्नी का प्यार नहीं था, बल्कि एक असीम, रूहानी कृतज्ञता थी। उसने आज उस 'देवी' को देखा था जिसने न केवल उसकी ज़िंदगी से मौत के काले सायों को दूर किया था, बल्कि उसकी गैर-मौजूदगी में भी अपनी जान की बाजी लगाकर उन खौफनाक राज़ों का पर्दाफाश किया, जिन्हें ढूँढने में दीपक शायद अपनी पूरी ज़िंदगी राख कर देता।

कविता ने अपनी गहरी आँखों से दीपक की आँखों में झाँका—वहाँ अब अतीत का कोई खौफ या दर्द नहीं था, सिर्फ एक अथाह शांति थी। दीपक ने धीरे से उसका नाज़ुक हाथ अपने हाथों में उठाया और बेहद प्यार से अपने होंठों से लगा लिया। मौत के अंधेरे से इंसाफ की रोशनी तक का उनका यह खौफनाक और कठिन सफ़र आज मुकम्मल हो चुका था।

खिड़की से छनकर आती हुई ठंडी और रुपहली चांदनी उनके कमरों के फर्श और उनके चेहरों को छू रही थी... जैसे रात का यह सन्नाटा और आने वाला नया सूरज अब केवल उनके लिए एक नई, महफूज़ और सुनहरी शुरुआत का खामोश वादा कर रहा हो।

 

एपिसोड 26: रिश्तों की अग्निपरीक्षा

महल के उस शांत, विशाल बेडरूम में, जहाँ बीस सालों के खौफनाक और खूनी तूफ़ान ने अभी-अभी अपना दम तोड़ा था, रात का सन्नाटा बेहद गहरा और भारी था। इसी खामोशी के बीच, दीपक ने अपनी अलमारी से एक बेहद पुराना, नक्काशीदार लकड़ी का डिब्बा बाहर निकाला। डिब्बे के कब्ज़ों की एक हल्की सी 'चरमराहट' गूँजी। हवा में चंदन और पुराने कागज़ों की एक भीनी सी महक तैर गई।

उस डिब्बे के अंदर से उसने सरकारी शेयर सर्टिफिकेट्स का एक भारी सेट निकाला, और बहुत ही आदर के साथ, बिना कुछ कहे उन्हें कविता के ठंडे हाथों में थमा दिया।

कविता ने जैसे ही उन पीले पड़ चुके सरकारी कागज़ों को खोलकर देखा, कमरे की मद्धम रोशनी में उसकी आँखें हैरत से फटी की फटी रह गईं। उन भारी-भरकम कानूनी कागज़ों पर साफ़-साफ़ लिखा था कि दीपक के हज़ारों करोड़ के इस पूरे विशाल बिज़नेस एम्पायर का 90% मालिकाना हक और ओनरशिप अब कविता के नाम कर दी गई थी। यह महज़ कागज़ नहीं थे; यह उस अथाह साम्राज्य की चाबियाँ थीं, जिसके लिए पूरी दुनिया खून की नदियां बहाने को तैयार रहती थी।

कविता ने कांपते हाथों से उन कागज़ों को देखा और फिर एक अजीब से डर और हैरानी से दीपक की तरफ ताकते हुए बोली, "दीपक... यह सब क्या है? यह तुम क्या कर रहे हो?"

दीपक ने आगे बढ़कर कविता के दोनों ठंडे हाथ अपने फौलादी हाथों में ले लिए। उसकी गहरी आँखों में आज कोई राज़ नहीं था, बल्कि एक सच्चा असर और बे-इंतहा प्यार था। उसने अपना सिर थोड़ा झुकाकर कविता की उन आँखों में झाँका, जिन्होंने उसके लिए मौत से भी आँखें मिलाई थीं।

"कविता," दीपक की भारी आवाज़ में समंदर जैसा एक गहरा ठहराव था, "तुमने मेरे लिए, मेरे माता-पिता के इंसाफ के लिए जो मौत का अंडरग्राउंड खेल खेला है, उसका एहसान तो मैं अपनी जान देकर भी ज़िंदगी भर नहीं चुका सकता। एक अनाथ और डरे हुए लड़के को तुमने उसके सबसे बड़े और खूंखार दुश्मन से आज़ाद करवाया है। मैं अपनी जान तो नहीं दे सकता... पर कम से कम अपनी इस ज़िंदगी की कमाई का इतना हिस्सा तो उसके नाम कर ही सकता हूँ, जिसने बिना किसी स्वार्थ के मेरे लिए यह पूरी खूनी जंग लड़ी है।"

दीपक अभी अपनी बात पूरी ही कर रहा था कि उस विशाल कमरे में एक अजीब सी, रूह कंपा देने वाली खामोशी छा गई। यह खामोशी उसके द्वारा दिए गए उस हज़ारों करोड़ के भारी उपहार की गंभीरता को और बढ़ा रही थी। हवा तक जैसे रुक गई थी।

और तभी... सन्नाटे को चीरती हुई एक तेज़ आवाज़ गूँजी— 'चिर्रर्र...!'

कविता ने बिना एक पल भी गंवाए, अपनी उंगलियों में फंसी उन हज़ारों करोड़ के शेयर सर्टिफिकेट्स को दीपक की आँखों के ठीक सामने बेहद बेरहमी से बीच से फाड़कर दो टुकड़े कर दिए! कागज़ के वे टुकड़े, किसी सूखे पत्ते की तरह हवा में उड़ते हुए ज़मीन पर गिर पड़े।

"मैंने तुम्हारी इस बेशुमार दौलत के लिए तुमसे शादी नहीं की थी, दीपक... और न ही यह पूरी खूनी जंग मैंने इस पैसे के लिए लड़ी है," कविता की लाल आँखों में इस वक्त सच्चाई के गर्म आँसू साफ़ झलक रहे थे।

उसने एक गहरी, "हाँ... मैं इस महल में पहले तुम्हारी इसी दौलत को छीनने के नापाक मकसद से ज़रूर आई थी, मेरा शुरुआती रास्ता और शैतानी दिमाग कुछ और ही था। लेकिन दीपक... तुम्हारे साथ रहते-रहते, तुम्हारे इस निश्छल भोलेपन को देखते-देखते, मैं कब पूरी तरह तुम्हारी हो गई, मुझे खुद पता नहीं चला।"

कविता ने एक कदम आगे बढ़ाया और दीपक के चौड़े चेहरे को अपने दोनों हाथों से थाम लिया। उसके हाथों की छुअन में एक अजीब सी तड़प थी। "तुम्हारे इस पाक साथ ने मुझे अंदर से पूरी तरह बदल दिया है। मेरे बचपन के उस अनाथ, सड़क के और भूखे अधूरेपन को सिर्फ और सिर्फ तुमने दूर किया है। जो सच्चा प्यार, इज़्ज़त और सम्मान मुझे इस ज़ालिम दुनिया में बचपन से कभी नहीं मिला... वह तुमने मुझे इस महल में एक रानी की तरह दिया है। तुमने मेरी खामोश आवाज़ सुनी, तुमने मेरी इस बेरंग और खूनी ज़िंदगी में वह सारे रंग भर दिए, जिसकी मैं सड़कों पर ठोकर खाते वक्त सिर्फ ख्वाब देखा करती थी।"

कविता के रोने की आवाज़ अब थोड़ी भारी हो चुकी थी, उसकी सिसकियाँ कमरे के उस भारी सन्नाटे को बेदर्दी से चीर रही थीं।

"मैं पहले जो कुछ भी करती थी, उस अंधेरी अंडरग्राउंड दुनिया में जो खून बहाती थी... वह सिर्फ अपना पेट पालने के लिए करती थी, दीपक। मेरे सीने में जो धड़कता हुआ दिल था, वह उस नर्क में रहते-रहते एक पत्थर की ठंडी चट्टान बन चुका था। पर तुम्हारे इस सच्चे प्यार और पाक साथ ने उस पत्थर को पिघलाकर एक औरत बना दिया है। मुझे इस समाज में एक ऐसा दर्जा, एक ऐसी इज़्ज़तदार ज़िंदगी दी है, जिसकी मैं अपनी उस काली दुनिया में कल्पना भी नहीं कर सकती थी।"

यह कहते हुए कविता टूट गई और उसने दीपक के चौड़े सीने पर अपना सिर रख दिया। उसकी शर्ट को कसकर अपनी मुट्ठियों में जकड़ते हुए वह सिसक कर बोली, "मुझे तुम्हारा यह हज़ारों करोड़ का पैसा नहीं चाहिए, मुझे तो बस तुम्हारा यह सच्चा साथ चाहिए... जन्मों-जन्मों तक! मैं अब ज़िंदगी के किसी भी मोड़ पर, किसी भी हाल में तुमसे जुदा नहीं होना चाहती। मैं हमेशा-हमेशा के लिए सिर्फ तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ, दीपक।"

दीपक ने एक पल के लिए ज़मीन पर पड़े, हवा में उड़ते हुए कागज़ों के उन फटे टुकड़ों को देखा... और फिर उस टूटती हुई औरत को देखा जो हज़ारों करोड़ की उस दौलत को ठोकर मारकर सिर्फ और सिर्फ उसके प्यार के लिए एक बच्ची की तरह रो रही थी।

बिना एक लफ्ज़ कहे, दीपक ने कविता को अपनी मज़बूत बाहों में इतनी कसकर भींच लिया कि मानो वह उसे अपने वजूद के अंदर संभाल लेना चाहता हो। खिड़की से आती चांदनी में, वे दोनों एक-दूसरे के वजूद में हमेशा के लिए खो गए थे।

 

एपिसोड 27: एक नई सुबह, एक नया जीवन

वक़्त, जो कभी इस मनहूस महल में किसी खौफनाक सज़ा की तरह रेंगता था, अब किसी शांत और गहरी नदी की तरह तेज़ी से अपना रास्ता बनाता चला गया। महल के उन ऊँचे और विशाल आँगनों में, जहाँ कभी मौत की साज़िशों का घना अंधेरा और खूनी सायों का दमघोंटू शोर हुआ करता था, वहाँ अब केवल सुकून और एक रूहानी शांति का बसेरा था। 

कविता अब दीपक के बच्चे की माँ बनने वाली थी। उस पत्थर के महल में, जहाँ कभी केवल सन्नाटा, बेल्ट की मार और खौफ हुआ करता था, वहाँ अब एक नए और पवित्र जीवन की खामोश आहटें सुनाई दे रही थीं। दीपक के लिए कविता अब केवल उसकी पत्नी नहीं थी, बल्कि उसके वजूद, उसकी साँसों का दूसरा हिस्सा बन चुकी थी। वह हर पल उसका एक नाज़ुक कांच की गुड़िया की तरह ख्याल रखता—उसके मखमली बिस्तरों पर उठने-बैठने से लेकर उसके चेहरे की उस सुकून भरी मुस्कुराहट तक, दीपक के लिए सब कुछ एक मुकम्मल इबादत जैसा था। कविता का भी उन दोनों के बीच पनपे इस सच्चे, फौलादी और पाक रिश्ते को देख-देखकर मन बार-बार भर आता था। जिन हाथों ने कभी अंडरवर्ल्ड में हथियार थामे थे, वे हाथ अब एक नई जान को संवारने के लिए बेताब थे।

और फिर... सर्दियों की उस खुशनुमा सुबह, वह बहुप्रतीक्षित और मुबारक दिन आ ही गया।

अस्पताल के उस बर्फ जैसे सफेद और चकाचौंध रोशनी से भरे कमरे में, जहाँ हवा में एंटीसेप्टिक और दवाइयों की तेज़ गंध थी, अचानक एक ज़ोरदार किलकारी गूँजी। बच्चे की उस पहली, गूँजती हुई किलकारी ने जैसे सारी दुनिया के शोर को एक पल के लिए पूरी तरह स्तब्ध कर दिया। कविता ने एक अत्यंत प्यारे, तंदुरुस्त और तेजस्वी बेटे को जन्म दिया था। मौत और साज़िशों से लड़कर बचे उन दोनों के छोटे से परिवार में एक नन्ही जान ने कदम रखा था, जो उनके पिछले बीस सालों के खौफनाक अंधेरे को हमेशा के लिए मिटाने आया था।

जब दीपक ने पहली बार उस नाज़ुक, नन्हे से वजूद को अपनी चौड़ी और मज़बूत बाहों में उठाया, तो उसकी आँखों से खुशी के गर्म आंसुओं का एक भारी सैलाब उमड़ पड़ा। उसकी उन भारी और कांपती हथेलियों में वह बच्चा एक ऐसी नियामत (ईश्वर का आशीर्वाद) था, जिसे पाकर वह खुद को इस पूरी दुनिया का सबसे खुशनसीब इंसान महसूस कर रहा था। उसने अपने कांपते होंठों से धीरे से बच्चे को चूमा, उसे कविता की गोद में लिटाया और फिर अपनी पत्नी के पसीने से भीगे माथे को चूम लिया। उस एक खामोश पल में, दीपक और कविता के सीने में दफन वह सारा खूनी दर्द, वह दमघोंटू घुटन, और वह बीस साल लंबा खौफनाक अकेलापन—सब कुछ एक ही झटके में आंसुओं के साथ बह गया। अब उनके पास सिर्फ एक सुनहरा भविष्य था, अतीत का कोई ज़हरीला घाव नहीं।

अब उनकी एक बिल्कुल नई, मुकम्मल और खूबसूरत दुनिया शुरू हो चुकी थी। दीपक और कविता अपने विशाल कॉर्पोरेट साम्राज्य और परोपकारी कामों के साथ-साथ अब अपने बेटे के 'पहले डगमगाते कदमों' और 'पहली मासूम मुस्कान' की दुनिया में सिमट गए थे। वे उस बच्चे की छोटी-छोटी शरारतों में अपना वह खोया हुआ बचपन ढूँढते, जो कभी नफरत और साज़िशों की खूनी वेदी पर भेंट चढ़ गया था।

उसी बेशुमार धन-दौलत से, जिसे रणजीत सिंह ने एक गिद्ध की तरह लूटने की कोशिश की थी, दीपक ने जो विशाल 'आश्रम' और 'सपोर्ट सिस्टम' खड़ा किया था, वहाँ अब हज़ारों अनाथ बच्चों की गूँजती खिलखिलाहट से एक नई बहार आ गई थी। लेकिन, इस महल की ऊँची चारदीवारी के अंदर, उनके अपने बेटे के आने से उनकी एक वक्त की उजड़ी हुई दुनिया अब हर मायने में पूर्ण हो चुकी थी।

दीपक और कविता अपने उस मासूम बच्चे को वह हर खुशी, हर महफूज़ कोना और बेशुमार प्यार देना चाहते थे, जिसे पाने के लिए वे खुद बरसों तक अंधेरी सड़कों और बंद कमरों में तरसे थे। उस बच्चे की कोमल किलकारियां अब महल के उन खौफनाक रहे कोने-कोने को ज़िंदगी की महक से भर रही थीं।

मौत के अंधेरे से लड़कर शुरू हुआ वह खौफनाक सफर—जो एक 'अंडरग्राउंड' खूंखार हत्यारी और एक 'लाचार' बंधक मालिक के बीच के गहरे अविश्वास से शुरू हुआ था—आज मोहब्बत और एक नई ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत मुकाम पर आकर हमेशा के लिए रुक गया था। इंसाफ की यह जंग अब खत्म नहीं हुई थी, बल्कि 'कातिल और वारिस' की एक अमर कहानी बनकर वक़्त के पन्नों पर हमेशा-हमेशा के लिए सुनहरे हर्फों में अमर हो चुकी थी।