Aadhyamik Darshan in Hindi Spiritual Stories by Janshi Saroha books and stories PDF | आध्यात्मिक दर्शन - प्रस्तावना

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आध्यात्मिक दर्शन - प्रस्तावना

यह पुस्तक मैं,मेरे गुरुदेव प्रभु श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर अनन्तश्रीविभूषित स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज  जी  के आशीर्वाद एवं प्रभु श्रीं नारायण की कृपा से लिखने का प्रयास करूंगी ।

यह पुस्तक आध्यात्मिक दर्शन करवाने में हम सब की सहकारी रहेगी । जो प्रश्न सनातन धर्म पर उठाए जाते है इस पुस्तक में उन सभी प्रश्नों के उत्तर आप को मिलेंगे । हमारे धर्म ग्रंथों में जो कहानियां हमें सुनाई गई ... आप सब को क्या लगता है , क्या वे केवल कहानियां है ? तो ऐसा नहीं है परमसत्य तो कुछ और ही है ... 

हमारे धर्म ग्रंथों में हर एक कहानी के पीछे बहुत बड़ी एक आध्यात्मिक सीख छुपी हुई है । महान ऋषि मुनियों ने यूँ ही तो कुछ नहीं लिख दिया ... क्या बताना चाहते थे हमारे सनातन धर्म के महान ऋषि मुनि .. और क्या रहस्य छिपा है उन सब कहानियों के पीछे ..? 

मनुष्य केवल उन ग्रंथों और कहानियों के शब्दों के जाल में ही फंस कर रह गए। उन शब्दों के पीछे का आध्यात्मिक और सात्विक अर्थ क्या है ."उस पर गहराई से विचार कम ही किया गया".. और अब जब उन शब्दों के अर्थ को समझाया जाता है तब भी लोग उस बात को स्वीकार ही नहीं करते ... 

ऐसे कितने ही प्रश्न है जो सनातन पर उठे है .. जैसे — पृथ्वी शेषनाग पर कहाँ टिकी है ?, गणेश जी पार्वती माता के मैल से कैसे उत्पन्न हुए ?, 33 कोटि देवी देवता का उल्लेख क्यो है ?, सनातन धर्म कितना पुराना है ... ? , और अगर सनातन धर्म इतना ही प्राचीन है तो इसमें( डायनासोर) जैसे जीवों का वर्णन क्यों नहीं .?  महाभारत और रामायण जैसे प्राचीन ग्रंथों पर उठाए गए प्रश्न जैसे प्रभु राम अगर विष्णु भगवान का अवतार थे तो उन्होंने पहले ही क्यों नहीं जान लिया कि रावण की नाभि में अमृत है .. प्रभु राम भगवान थे तो उन्होंने अपनी पत्नी सीता जी का परित्याग क्यों किया ? और ऐसे ही बहुत से प्रश्न है .... (जिनके उत्तर मैं, प्रभु हरि की कृपा से 

लिखने का प्रयत्न करूंगी।)

 

सत्य तो ये है ... हमारा भारतवर्ष कई वर्षों तक गुलाम रहा कभी मुगल साम्राज्य तो कभी यूरोपियन .. कई आक्रमणकारियों ने हमारे धर्म में न जाने कितने बदलाव कर दिए .. न जाने कितने महत्वपूर्ण ग्रन्थ और पुस्तकों को जला दिया गया (जैसे नालंदा विश्वविद्यालय)... अब इतना सब झेलता हुआ ये भारतवर्ष न जाने कितना पिछड़ गया आपको क्या लगता है ये आक्रमणकारी अगर हमारे देश में न आते तो आज भारत कहां होता ... विश्व में शायद सबसे आगे हो सकता था भारतवर्ष । "यदि भारत ने इतने आक्रमण और विनाश न झेले होते, तो संभव है कि उसका ज्ञान, शिक्षा और आध्यात्मिक विकास और भी आगे बढ़ता।"

"विदेशी आक्रमणों और राजनीतिक परिवर्तनों के कारण भारत की अनेक प्राचीन परंपराओं, ग्रंथों और ज्ञान केंद्रों को क्षति पहुँची। फिर भी सनातन परंपरा की मूल शिक्षाएँ आज तक जीवित हैं।"

... इतना सब हो गया लेकिन साँच को आँच की आवश्यकता नहीं है सत्य तो सदैव सत्य ही रहता है ... बात चाहे नैतिक मूल्यों की हो या फिर धर्म की सत्य ही जीतता है ।

एक और विशेष बात ये कि .... धर्म या ईश्वर को समझने का हर प्राणी का अपना अपना तरीका होता है ... "केवल धर्मग्रंथों को पढ़ लेने मात्र से ईश्वर का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं होता। ग्रंथ मार्गदर्शन करते हैं, परंतु अनुभव साधना, श्रद्धा और भक्ति से प्राप्त होता है।" , ग्रंथों में जो लिखा गया है वो ऋषि मुनियों का अपना अनुभव और आध्यात्मिक ज्ञान है । 

परन्तु मनुष्य यदि ईश्वर को जानना चाहता है तो उसके लिए चाहिए सच्ची श्रद्धा,पूर्ण समर्पण, अनन्य भक्ति ,ज्ञान और परमसत्ता की स्वीकृति । मीराबाई जी, तुलसीदास जी, कबीरदास जी, रसखान जी , और न जाने कितने ही भक्त हुए जिन्होंने अपने प्रेम से ईश्वर को प्राप्त किया .. परन्तु अब घोर कलिकाल में मनुष्य ने प्रभु का चिंतन करना ही छोड़ दिया । "आज के समय में भौतिकवाद और संशय पहले की अपेक्षा अधिक दिखाई देता है।" ।

नास्तिक प्राणी अकसर आध्यात्मिक मनुष्य से पूछते है कहा है तुम्हारा ईश्वर तुमने देखा क्या ईश्वर को ? और अगर देखा है तो हमे भी दिखाओ ? 

अब विचार करने वाली बात है कि अगर एक आस्तिक मनुष्य सत्य  में अपने ईश्वर का अनुभव किया होगा तो वो संसार में उस बात का बखान कभी नहीं करेगा । 

अक्सर नास्तिक प्राणी सोचते है कि आस्तिक मनुष्य के पास उनके सवालों का कोई जवाब नहीं .. परंतु सत्य ये है कि एक आध्यात्मिक और आस्तिक व्यक्ति कभी अपनी आध्यात्मिक यात्रा नहीं बताता । आस्तिक को अपने ईश्वर का अनुभव हो भी जाएगा तब भी वह अपने अनुभव का प्रदर्शन नहीं करेगा । सच्चा साधक अपने अनुभवों को अहंकार का विषय नहीं बनाता । और आस्तिक व्यक्ति सदैव ही उन प्रश्नों के उत्तर देने से इसलिए बचता है क्यूंकि उन्हें ये समझ आ जाता है कि जो व्यक्ति केवल तर्क के लिए प्रश्न पूछते है , उन्हें उत्तर देकर भी संतुष्ट नहीं किया जा सकता । 

और वह अपने समय को निरर्थक वाद विवाद में नष्ट नहीं करना चाहता । 

तो चलिए प्रारंभ करते उन प्रश्नों के उत्तर को जो सनातन धर्म पर उठाए जाते  है। मैं यहां प्रयास करूंगी कि इन सभी प्रश्नों के सटीक , सरल , सात्विक, सत्य, आध्यात्मिक , वैज्ञानिक उत्तर आपको दे सकूं। 

 

हरि ॐ ...