Andha prem in Hindi Love Stories by Rishabh Vishwakarma books and stories PDF | अन्धा प्रेम

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अन्धा प्रेम

अन्धा प्रेम 

          राम जनपद के शङ्कर पुर गाँव में जयराम नामक एक युवक रहता है। उसकी पत्नी का नाम उपासना है। वे दोनों एक कुशल मङ्गल, ऐश्वर्य, समृद्धिशाली सुन्दर युग्म के दम्पति हैं। कार्तिक शुक्ल पक्ष पूर्णिमा तिथि को रात्रि के निशीथ काल के आरम्भ में अपने कक्ष में एक पलङ्ग पर बैठकर, झरोखा से चन्द्र देव को प्रेम से निहारते हुए दोनों दम्पति एक दूसरे से मधुर वाणी में रमणीय बातें कर रहे थे।
          जयराम नें कहा - हे प्रिय अर्धाङ्गिनी! हे मृगनयनी! तुम अपनी इस मृगी के समान सुन्दर नेत्रों से चन्द्रमा को देखो। यह शुक्ल पक्ष की कार्तिक पूर्णिमा बड़ी मनोहर और शोभावान है। इसे देख कर हिमकण के भाँति मन में शीतलता और कामदेव की भाँति कामुकता की व्युत्पत्ति हो रही है। हमारे विवाह के आज पूरे एक वर्ष हो चुके हैं। अब हमें पुत्र हेतु चेष्टा करनी चाहिए, ताकि हमारा वंश आगे बढ़ सके।
          उपासना नें कहा - हे प्राणनाथ! हे स्वामी! आप उचित कह रहे हैं कि अब हमें पुत्र के लिए चेष्टा करनी चाहिए। आज का दिवस् भी बड़ा सुहावना है और चाँद अपनी आभामयी चान्दनी से हमारे मन को हर रहा है, मानो कह रहा हो कि हमें पुत्र हेतु रात्रि मिलन करना चाहिए।
          इतना कह कर दोनों दम्पति रात्रि मिलन के लिए उद्यत हो गएँ और दोनों मिलकर शुभ समय त्रियामा काल में रात्रि मिलन (स्त्री प्रसङ्ग) किया। रात्रि मिलन के पश्चात उपासना गर्भवती हो गईं, मानो मुरझाया जीवन फिर से खिल उठा।
उनके आँगन में हर्षोल्लास छा गया, वे दिन प्रतिदिन आनन्दित रहने लगें, अपने-अपने सभी दुखों को भूल गयें और मात्र सुख का ही आनन्द लेने लगें।
          वे दोनों परस्पर सदा प्रेम भाव ही रखते थें न कि द्वेष। प्रेम का प्रभाव इतना बढ़ गया कि प्रेम के अतिरिक्त उन दोनों दम्पति को कुछ भी दिखाई या सुनाई नहीं देता था। जहाँ पर भी आते जाते थे या जहाँ कहीँ भी कोई मिल जाता था तो वहीँ पर प्रेम की कथा होने लगती थी। दोनों दम्पति के मन, हृदय, बुद्धि में मात्र प्रेम का ही प्रधानता थी। वे शृङ्गार रस में आठों पहर डूबे रहते थें। उनको शृङ्गार रस के अतिरिक्त कोई भी रस सूझ नहीं पड़ता था। उनके लिए शृङ्गार रस ही सर्वस्व, समृद्धि, ऐश्वर्य, सुख, शान्ति था। वह जो भी गुणगान करते थें मात्र शृङ्गार रस में न कि किसी अन्य रस में। उनका दिनचर्या देखकर उनके आँगन में मानों शृङ्गार रस की वर्षा हो रही हो ऐसा प्रतीत होता था । जब उनसे कोई नहीं मिलता था, तब परस्पर में ही प्रेम की व्याख्या कर अपने आनन्द को बढ़ाते थें।
          उनके रक्त के एक-एक बूँद में प्रेम की अपार धारा बहने लगी, मानों समुन्द्र का जल और बढ़ता ही जा रहा हो। रक्त में अग्नि समाहित रहती है और वही अग्नि रक्त रूपी प्रेम को सदैव प्रकाशित करती थी। उनके रोम-रोम में प्रेम रूपी अमृत बहता था, जो दोनों की शोभा बढ़ाता था। वह दोनों मुख से प्रेम की व्याख्या करते थे, कर्ण से श्रवण करते थे, नेत्रों से देखते थे, बुद्धि से जानते थे और हृदय से अनुभव करते थे। उन्होंने प्रेम के माध्यम से अपना जीवन एक सहज सुन्दर पवित्र पुष्प के जैसा बना लिया था, जिस पर चलना बड़ा सुगमता हो गया था उनके के लिए। मानों उनके जीवन से काँटा रूपी दुख, कष्ट, पीड़ा अथवा तीनों ताप सदा के लिए छोड़ चले हों।
          उपासना प्रत्येक छोटी बड़ी बातों पर बड़ी गहराई से ध्यान देती थीं। उनके लिए जो उपयोग न हो उसका उपयोग कभी भी नहीं करती थीं और जो उपयोगी वस्तु थी मात्र उसी का उपयोग करती थीं। घर का सारा काम करती थीं, किन्तु भारी वस्तुओं को उठाती नहीं थीं ताकि सन्तान को किसी भी प्रकार का कष्ट या पीड़ा न हो। वह सवेरे पहले ही निद्रा त्याग देती थीं और शाम को पहले ही निद्रा अवस्था में चली जाती थीं। दिन प्रतिदिन मात्र अपने सन्तान के प्रेम में ही डूबी रहती थीं, मानों जैसे सन्त ब्रह्म में लीन हो।
          जैसे एक माली अपने फुलवारी से अत्यधिक प्रेम करता है, उसी प्रकार उपासना अपने उदर पर हाथ फेरते हुए, प्रेम की गीत गाते हुए (लोरी) बड़ी प्रसन्नता के साथ प्रेम करती थीं। वह कभी श्री श्रीरामचन्द्र की कहानी, तो कभी शिव की कहानी, तो कभी श्रीकृष्ण की कहानी, तो कभी श्रवण कुमार की कहानी को गीत रूप में गाकर सन्तान को श्रवण कराती थीं। वह कभी कजरी तो कभी कहरवा गाती थीं। कभी खेत-खलिहान विचरण करती थीं तो कभी बाग-बगीचा। वह कभी अपने केशों को फूलों से संयोजित करती थीं तो कभी सोलह शृङ्गार कर सन्तान को अपने हृदय में बसा कर प्रेम पूर्वक लाड़ लड़ाती थीं।
          उन्हें सन्तान से इतना लगाव हो गया कि अब जीवन में क्या हो रहा है और क्या नहीं हो रहा है इसका ज्ञात नहीं। सन्तान हेतु ईश्वर से प्रतिदिन प्रार्थना करती थी कि वह सुरक्षित और शीघ्र ही इस संसार में आ जाए। अपने अर्धाङ्ग से सन्तान के भविष्य की कामना करती थीं और अपने परिवारों से सन्तान हेतु आशीर्वाद लेती थीं। अपनी सन्तान के लिए वह राम भरोसे कुछ भी कर देती थीं, जिससे उसे परमानन्द प्राप्त हो। यद्यपि कोई उनके सन्तान के बारे में कुछ कह दे तो वह तुरन्त क्रोधित हो जाती थीं, इसमें अपना और पराया नहीं देखती थीं।वह अपने सन्तान के विरुद्ध एक शब्द भी नहीं सुनना चाहती थीं, जिसके कारण अन्य लोगों से शत्रुता के समान होने लगीं।
          जो सन्तान अभी तक इस संसार में जन्म तक नहीं लिया, वे उससे नेत्र मूँद कर इतना प्रेम करने लगीं कि मानों प्रेम ही इनके वश में हो गया हो न कि ये। "वश" शब्द भी सोचता होगा कि मेरा पाला किससे पड़ा है, भला एक माता के आगे क्या प्रेम कुछ कर सकता है? जो भी करना होता है मात्र माता ही करती हैं, क्योंकि प्रेम तो सदैव माता के वश में रहता है। यदि जहाँ माता और सन्तान की व्याख्या हो, वहाँ पर प्रेम नमित हो जाता है और प्रेम को जिस तरह माता नचाये, वह उसी तरह नाचता है। अतः समस्त सन्तों नें माना है कि माता और सन्तान का सम्बन्ध अटूट है, जिसे खण्डित नहीं किया जा सकता। अभी तक यह निर्धारित भी नहीं हुआ है कि सन्तान उदर में तो है, किन्तु वह इस संसार में जन्मेगा कि नहीं। माता नें इन सब परिस्थितियों के पश्चात भी (जो अभी तक इस संसार में आया भी नहीं है) बिना जन्मे सन्तान से इतना गहरा प्रेम किया कि स्वयं ब्रह्मा को अपनी लेखनी बदलना पड़ा, तब जाकर माता नें ठीक नौ माह पश्चात आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष पूर्णिमा तिथि को हृष्ट-पुष्ट सुरक्षित सन्तान को जन्म दिया।
          इसी के कारण समस्त सन्तों नें कहा कि ईश्वर की कृपा से माता और सन्तान हेतु "प्रेम अन्धा होता है"। तभी से "प्रेम अन्धा होता है" इस वाक्य की रचना हुई और सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त हो गया। इसी के कारण यह ऋषभदास (ऋषभ विश्वकर्मा) "प्रेम अन्धा होता है" वाक्य को एक सरल-सा लघु रूप या नये रूप में "अन्धा प्रेम" का नाम दिया। तब जाकर "प्रेम अन्धा होता है" इसका संक्षिप्त रूप "अन्धा प्रेम" हुआ। इस कथा का नाम भी "अन्धा प्रेम" ही रखा, क्योंकि इसका वर्णन आँख मूँद के प्रेम करने पर है।

         कवि - ऋषभ विश्वकर्मा (ऋषभदास)