mind power in Hindi Motivational Stories by Vijay Erry books and stories PDF | मन की शक्ति

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मन की शक्ति

(मन की शक्ति)लेखक: विजय शर्मा एरीपंजाब के एक छोटे से गाँव में मानव नाम का एक युवक रहता था। वह पढ़ा-लिखा, समझदार और मेहनती था, लेकिन उसके चेहरे पर हमेशा उदासी छाई रहती थी। गाँव के लोग अक्सर कहते—“मानव, तुम्हारे पास सब कुछ तो है। अच्छा परिवार है, घर है, खेत हैं, फिर भी तुम इतने परेशान क्यों रहते हो?”मानव हल्की मुस्कान देकर बात टाल देता, क्योंकि वह जानता था कि उसकी सबसे बड़ी कैद किसी जेल की चारदीवारी नहीं, बल्कि उसका अपना मन था।उसे हर समय किसी न किसी बात की चिंता लगी रहती। कभी भविष्य की, कभी असफलता की, कभी लोगों की राय की। वह हमेशा सोचता—"अगर मैं असफल हो गया तो?""अगर लोग मेरा मजाक उड़ाएँगे तो?""अगर मेरे सपने पूरे नहीं हुए तो?"इन विचारों ने उसे ऐसा जकड़ रखा था कि वह खुलकर जीना ही भूल गया था।एक दिन गाँव में एक वृद्ध संत आए। उनकी आँखों में अद्भुत शांति थी। लोग दूर-दूर से उनके दर्शन करने आने लगे।मानव भी उनके पास पहुँचा।“बाबा जी, मैं खुश रहना चाहता हूँ, लेकिन मेरा मन मुझे चैन नहीं लेने देता।”संत मुस्कुराए।“बेटा, क्या तुम सचमुच आज़ाद हो?”मानव हैरान हो गया।“जी, मैं तो आज़ाद देश में रहता हूँ।”संत ने कहा—“देश की आज़ादी और मन की आज़ादी अलग बातें हैं। तुम्हारा शरीर तो स्वतंत्र है, लेकिन तुम्हारा मन भय, चिंता और अपेक्षाओं का गुलाम है।”ये शब्द मानव के दिल में उतर गए।पहला पाठ : हाथी की रस्सीअगले दिन संत मानव को मेले में ले गए।वहाँ एक विशाल हाथी खड़ा था। उसके पैर में केवल एक पतली सी रस्सी बंधी थी।मानव बोला—“इतना शक्तिशाली हाथी इस छोटी सी रस्सी को तोड़कर भाग क्यों नहीं जाता?”संत ने कहा—“जब यह छोटा था, तब इसे इसी रस्सी से बांधा जाता था। उस समय यह लाख कोशिश करता, लेकिन रस्सी नहीं तोड़ पाता। धीरे-धीरे इसके मन ने मान लिया कि वह कभी आज़ाद नहीं हो सकता। अब इसमें शक्ति तो बहुत है, लेकिन विश्वास नहीं।”फिर संत ने मानव की ओर देखा।“क्या तुम भी इसी हाथी की तरह नहीं हो? तुम्हारे भीतर असीम शक्ति है, लेकिन तुमने खुद को कमजोर मान लिया है।”मानव चुप हो गया।उसे लगा जैसे कोई उसके मन का राज पढ़ रहा हो।दूसरा पाठ : पिंजरे का दरवाज़ाकुछ दिनों बाद संत उसे एक पक्षी विक्रेता के पास ले गए।एक तोता पिंजरे में बैठा था। पिंजरे का दरवाज़ा खुला था, फिर भी वह उड़ नहीं रहा था।“यह बाहर क्यों नहीं आता?” मानव ने पूछा।दुकानदार बोला—“यह कई वर्षों से पिंजरे में है। अब इसे खुला आसमान डराता है।”संत बोले—“मनुष्य भी ऐसा ही है। वह अपनी आदतों, डर और सीमाओं के पिंजरे में रहता है। जब स्वतंत्र होने का अवसर मिलता है, तब भी बाहर निकलने से डरता है।”मानव को अपने जीवन की याद आ गई।कितने अवसर आए थे, लेकिन उसने केवल डर के कारण उन्हें छोड़ दिया था।तीसरा पाठ : नदी और पत्थरएक दिन संत उसे नदी किनारे ले गए।तेज़ बहाव वाली नदी चट्टानों से टकराकर आगे बढ़ रही थी।संत ने पूछा—“बताओ, यह नदी क्यों नहीं रुकती?”“क्योंकि इसका लक्ष्य समुद्र तक पहुँचना है।”“बिल्कुल। रास्ते में कितने ही पत्थर आएँ, नदी रुकती नहीं। वह रास्ता बदल लेती है, लेकिन बहना नहीं छोड़ती।”फिर संत बोले—“मन की शक्ति भी यही है। बाधाएँ तुम्हें रोक नहीं सकतीं, जब तक तुम खुद रुकना न चाहो।”मानव के मन में पहली बार आशा की किरण जगी।संघर्ष की शुरुआतउस रात उसने अपने कमरे में बैठकर एक कागज़ निकाला।उसने अपने सारे डर लिखे—असफलता का डरलोगों की आलोचना का डरभविष्य की चिंतागरीबी का भयअकेलेपन का डरफिर उसने एक-एक डर को पढ़ा।उसे एहसास हुआ कि इनमें से अधिकांश डर कभी सच हुए ही नहीं थे।वे केवल उसके मन की कल्पनाएँ थीं।उसे प्रसिद्ध गीत की पंक्तियाँ याद आईं—"ज़िंदगी कैसी है पहेली हाय,कभी ये हँसाए, कभी ये रुलाए..."और वह मुस्कुरा पड़ा।मन का युद्धपरिवर्तन आसान नहीं था।अगले कई महीनों तक उसके भीतर संघर्ष चलता रहा।जब भी नकारात्मक विचार आते, वह खुद से कहता—“मैं अपने विचार नहीं हूँ। मैं उनका देखने वाला हूँ।”धीरे-धीरे उसके भीतर आत्मविश्वास बढ़ने लगा।उसने गाँव के बच्चों को निःशुल्क पढ़ाना शुरू कर दिया।लोगों ने उसकी सराहना की।लेकिन कुछ लोगों ने आलोचना भी की।पहले वह टूट जाता था।अब वह मुस्कुराकर कहता—“हर किसी को खुश करना मेरा काम नहीं है।”एक नई परीक्षाकुछ समय बाद उसके पिता बीमार पड़ गए।घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी।मानव फिर चिंता में डूबने लगा।उसे लगा कि सारी सीख व्यर्थ हो गई।वह संत के पास पहुँचा।“बाबा जी, कठिनाइयाँ खत्म क्यों नहीं होतीं?”संत हँसे।“कठिनाइयाँ खत्म नहीं होतीं बेटा, लेकिन उन्हें देखने का दृष्टिकोण बदल जाता है।”“मतलब?”“पहले तू तूफान देखकर डर जाता था। अब तू जहाज चलाना सीख रहा है।”ये शब्द सुनकर मानव की आँखें चमक उठीं।मन की असली शक्तिसमय बीतता गया।मानव ने महसूस किया कि बाहरी परिस्थितियाँ पहले जैसी ही थीं।कभी सुख आता, कभी दुख।कभी लाभ होता, कभी हानि।लेकिन अब उसका मन पहले जैसा नहीं था।उसे समझ आ गया था कि खुशी बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि मन की अवस्था में है।वह रोज़ सुबह ध्यान करता।प्रकृति में घूमता।अच्छी पुस्तकें पढ़ता।और हर रात तीन चीज़ों के लिए ईश्वर का धन्यवाद करता।धीरे-धीरे उसके भीतर ऐसी शांति आने लगी, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी।अंतिम शिक्षाएक दिन संत गाँव छोड़कर जाने लगे।पूरा गाँव उन्हें विदा करने आया।मानव की आँखें नम थीं।“बाबा जी, आपने मुझे बहुत कुछ सिखाया। जाते-जाते एक अंतिम शिक्षा दे दीजिए।”संत मुस्कुराए।“बेटा, याद रखना—मन सबसे बड़ा मित्र भी है और सबसे बड़ा शत्रु भी।”“इसे अपना मित्र कैसे बनाऊँ?”“इसे वर्तमान में रखना सीखो। जब मन भूतकाल में जाता है तो पछतावा पैदा होता है। भविष्य में जाता है तो चिंता पैदा होती है। वर्तमान में रहता है तो शांति पैदा होती है।”मानव ने उनके चरण स्पर्श किए।मन की आज़ादीकई वर्षों बाद मानव गाँव का सबसे सम्मानित व्यक्ति बन गया।लोग उसके पास सलाह लेने आने लगे।एक युवक ने उससे पूछा—“मानव जी, सफलता का सबसे बड़ा रहस्य क्या है?”मानव मुस्कुराया।“मन की आज़ादी।”“वह कैसे?”“जिस दिन तुम लोगों की राय, असफलता के भय और बेकार की चिंताओं से मुक्त हो जाओगे, उसी दिन तुम्हारी असली यात्रा शुरू होगी।”फिर उसने आकाश की ओर देखा।एक पक्षी खुले आसमान में उड़ रहा था।उसे उस पिंजरे वाले तोते की याद आ गई।उसने मन ही मन कहा—"अब मैं भी उड़ना सीख गया हूँ।"उसे महसूस हुआ कि सच्ची स्वतंत्रता धन, पद या प्रसिद्धि में नहीं होती।सच्ची स्वतंत्रता अपने मन पर विजय पाने में होती है।क्योंकि जिस व्यक्ति ने अपने मन को जीत लिया, उसने पूरी दुनिया को जीत लिया।शिक्षामनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसका मन है। यदि मन भय, चिंता और नकारात्मक विचारों से मुक्त हो जाए, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं रहता। मन की आज़ादी ही जीवन की सबसे बड़ी आज़ादी है।