हर सुबह एक नई शुरुआत लेकर आती है, लेकिन आर्य की ज़िंदगी में ऐसा नहीं था। जब उसकी आँख खुली तब तक सुबह हो चुकी थी, लेकिन उसका कमरा अभी भी अंधेरे से ढका हुआ था। शायद इसलिए क्योंकि उसके कमरे में आने वाली रोशनी को पर्दों ने रोका हुआ था, या फिर उसके मन की तन्हाई ने उसके आस-पास भी अंधेरे में अपना घर ढूंढ लिया था, जिसमें उम्मीद की कोई किरण नज़र नहीं आती।
आर्य उठता है और अपने टेबल के पास पड़े फोन को उठाता है। वो जैसे ही फोन खोलता है, उसमें आज कोई भी कॉल या मैसेज नहीं था। ये आर्य के लिए थोड़ा शॉकिंग था क्योंकि हर सुबह तो उसका फोन कॉल और मैसेज से भरा रहता था। आर्य की नज़र उसी अंजान नंबर पर पड़ती है। उसे रात की सभी बातें याद आ जाती हैं। वो ना चाहते हुए भी वो नंबर डायल करता है और कान पर फोन लगाता है, लेकिन इस बार उधर से सिर्फ एक आवाज़ आती है!
"आप जिस नंबर से संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं, वह नंबर उपलब्ध नहीं है। कृपया करके नंबर की जाँच करें।"
आर्य उस नंबर को देखता है और सोचता है शायद सच में किसी ने प्रैंक किया होगा। वो उठकर नहाने जाता है और तैयार होकर ऑफिस के लिए निकलता है। जैसे ही वो निकलने वाला होता है तभी उसके पेट से कुछ आवाज़ आती है, जो ये साफ दर्शाती है कि उसने कल से कुछ नहीं खाया है। लेकिन आर्य के पास उतना वक्त भी नहीं था कि वो नाश्ता बनाए। वो घड़ी की ओर देखता है और खुद से बोलता है--
"लगता है आज भी भूखे पेट ही जाना पड़ेगा। काश थोड़ी ज़्यादा सैलरी मिलती होती तो एक कामवाली रख लेता।"
ये कहकर वो अपने फ्लैट से बाहर निकलता है और लॉक करके ऑफिस के लिए चल देता है।
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ऑफिस में
आर्य जैसे ही ऑफिस में पहुँचता है, उसकी मुलाकात उसके दोस्त से होती है।
"हे!! आर्य, थैंक गॉड तू आ गया। और भाई, तू अपना रिचार्ज क्यों नहीं कराता है? मैं तुझे कल रात से कॉल कर रहा हूँ, तेरी इनकमिंग ही बंद है।"
आर्य को अब समझ आता है कि उसके फोन पर सुबह से कोई कॉल या मैसेज क्यों नहीं था। लेकिन तभी उसको डर सा लगता है। अगर मेरे फोन की इनकमिंग ही बंद थी, तो वो... अंजान नंबर से कॉल कैसे आया?
आर्य को कुछ समझ नहीं आ रहा था।
"आर्य... आर्य... कहाँ खो गया? सब ठीक तो है ना?"
"हाँ... हाँ... मैं ठीक हूँ।"
आर्य हल्की मुस्कान के साथ जवाब देता है।
दोनों ऑफिस के अंदर जाते हैं, लेकिन आज आर्य का मन काम पर नहीं था। किसी तरह वो अपना काम निपटा कर घर की ओर निकलता है। उसने दिन में भी कुछ ज़्यादा नहीं खाया था। उसको भूख भी लगी थी। वो एक ठेले पर रुकता है और अपने लिए पाव भाजी पैक करा लेता है।
थक हार कर वो अपने घर पहुँचता है और ताला खोलता है। अंदर आते ही उसे एक अजीब सी खुशबू आती है। उसे समझ नहीं आता किस चीज़ की खुशबू है। वो खुशबू किचन से आ रही थी। वो किचन में जाता है और देखता है तो किचन के स्लैब पर गरम-गरम खाना रखा था और सब कुछ आर्य के पसंद का।
वो थोड़ा डर जाता है। उसे समझ नहीं आता, जब दरवाज़ा बंद था तो यहाँ खाना कैसे आया। वो पास जाकर देखता है तो खाना बिल्कुल ताज़ा था और उसमें से इतनी अच्छी खुशबू आ रही थी कि आर्य की भूख और बढ़ रही थी। लेकिन उसे ये भी समझ नहीं आ रहा था कि ये खाना आया कहाँ से।
तभी उसे याद आया कि उसके घर की एक चाबी बराबर वाली आंटी के पास रहती है। वो कभी-कभी आर्य को खाना भी दे देती हैं। उसे लगा ये आंटी ने ही भेजा होगा। वो नहाने का भी इंतज़ार नहीं करता और खाना खाना शुरू करता है।
खाना बहुत ही अच्छा बना था। वो खाना खाकर सारे डिश और प्लेट अपने गेट के बाहर रख देता है, जैसे वो हमेशा करता था। जब भी पड़ोस की आंटी उसको खाना देती थीं। वो अंदर आकर नहाने चला जाता है और थकान की वजह से उसे तुरंत नींद आ जाती है और वो गहरी नींद में सो जाता है।
लेकिन उसकी नींद ज़्यादा समय तक नहीं रहती।
ठीक 2 बजे तेज़ फोन की घंटी बजती है।
आर्य डर के उठ जाता है। वो देखता है उसका फोन रिंग कर रहा है, लेकिन उसने तो अभी भी रिचार्ज नहीं कराया था, तो ये कॉल कैसे आ सकती है?
वो डरते हुए फोन उठाता है।
कॉल उसी अंजान नंबर से थी।
आर्य को समझ नहीं आता वो कॉल उठाए या नहीं, लेकिन वो फिर भी डरते हुए कॉल उठाता है और बोलता है—
"हैलो!! कौन??"
दूसरी तरफ से कोई आवाज़ नहीं आती, सिर्फ कुछ खुरचने की आवाज़ आती है।
आर्य डरते हुए फिर बोलता है..
"कौन है!!"
अब खुरचने की आवाज़ बंद हो जाती है और एक बहुत मीठी सी लड़की की आवाज़ आती है...
"आर्य..."
आर्य चौंक जाता है और फिर पूछता है—
कौन... और आपको मेरा नाम कैसे पता? कौन है??"
दूसरी तरफ से एक हँसी की आवाज़ आती है। फिर वो बोल रही है—
"हम्म... खाना कैसा लगा..?"
आर्य: "हम्म? खाना कौन सा खा..."
वो बोलते-बोलते रुक जाता है। तभी उसे याद आता है जब वो घर आया था, जो खाना रखा हुआ था।
दूसरी तरफ से फिर आवाज़ आती है, लेकिन इस बार आवाज़ थोड़ा गुस्से में होती है..
"तुमने जवाब नहीं दिया। खाना कैसा लगा?"
आर्य को कुछ समझ नहीं आता। वो फिर पूछता है..
"तुम हो कौन और यहाँ क्यों कॉल कर रही हो?"
दूसरी तरफ से फिर आवाज़ आती है, इस बार और गुस्से में—
"मैंने पूछा खाना कैसा लगा? तुम्हें मेरे खाने की कदर ही नहीं है।"
अब वो लड़की रोने लगती है।
"तुम भी बाकियों जैसे हो... धोखेबाज़... गद्दार...
इतना कहते ही वो चीखने लगती है। चीखने की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि आर्य डर जाता है और फोन को कान से हटा देता है। वो कॉल कट करने की कोशिश करता है, लेकिन कॉल कट ही नहीं होती। वो फोन को साइड में फेंक देता है। उसमें से अभी भी चीखने की आवाज़ आ रही थी।
अचानक से चीखने की आवाज़ रुक जाती है।
आर्य को लगता है कॉल कट गई, लेकिन कॉल अभी भी चालू थी। वो फोन उठाता है और कान पर रखता है। तभी दूसरी तरफ से बहुत थकावट भरी आवाज़ आती है—
"तुमने मेरे खाने की कदर नहीं की... तुम ये खाना डिज़र्व ही नहीं करते..."
आर्य इससे पहले कुछ कहता, उसके पेट में बहुत तेज़ दर्द होता है। उसके हाथ से फोन गिर जाता है। वो दर्द में कराहता है—
"आह्ह..."
तभी उसे उल्टी जैसा लगता है। वो बाथरूम में जाता है। इतने में उसे उल्टी हो जाती है, लेकिन उसकी उल्टी में खाने की जगह बहुत सारे बाल निकलते हैं और खून ही खून।
उसे समझ नहीं आता।
तभी उसकी नज़र बाथरूम के शीशे पर पड़ती है, जिसमें एक परछाईं नज़र आती है। आर्य का दम घुटने लगता है। उसके मुँह से बाल निकलना बंद नहीं होते। तभी उसका फोन दोबारा बजता है।
उसकी साँसें अब धीमी होने लगी थीं। उसके मुँह से इतने बाल निकलते हैं कि उसका दम घुटने लगता है।
तभी उसकी आँख खुल जाती है।
उसका माथा पसीने से तर था और साँसें ऊपर-नीचे हो रही थीं। वो अपने आस-पास देखता है।
सब एक सपना था।
वो खुद को देखता है। वो ठीक था। सब वैसा ही था।
वो उठकर सबसे पहले बाहर जाकर बर्तन चेक करता है। अगर वो खाना पड़ोस वाली आंटी ने रखा था, तो उन्होंने अब तक बर्तन उठा लिए होंगे।
वो जैसे ही बाहर का दरवाज़ा खोलता है, बर्तन वहाँ नहीं होते। वो जगह खाली थी।
वो चैन की साँस लेता है कि ये सिर्फ एक सपना था।
वो दरवाज़ा बंद करके घर के अंदर चला जाता है।
लेकिन जिस पर आर्य की नज़र नहीं जाती, वो था बराबर के घर पर लगा हुआ ताला...
और जहाँ बर्तन रखे थे, वहाँ पर खून के निशान...
जो धीरे-धीरे गायब हो गए...