धर्मराज की सभा
प्रथम अध्याय : यमलोक की आपातकालीन सभा (आगे)
चित्रगुप्त की वाणी समाप्त होते ही समूची देवसभा मौन हो गई। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो स्वयं काल भी अगले क्षण की प्रतीक्षा कर रहा हो।
धर्मराज कुछ देर तक गहन चिंतन में डूबे रहे। फिर उन्होंने अपने राजदंड को धीरे से भूमि पर स्पर्श कराया। क्षणभर में पूरा सभामंडप दिव्य प्रकाश से आलोकित हो उठा।
उन्होंने गंभीर स्वर में आदेश दिया—
"चित्रगुप्त! जिस मनुष्य की चर्चा अभी हुई है, उसे तत्काल देवसभा में प्रस्तुत किया जाए। न्याय केवल कर्मों का लेखा देखकर नहीं, सत्य को सामने रखकर किया जाता है।"
आदेश मिलते ही दो विशालकाय यमदूत प्रणाम कर बिजली की गति से पृथ्वी लोक की ओर प्रस्थान कर गए।
कुछ ही क्षणों बाद सभा के विशाल द्वार खुलने लगे।
दोनों यमदूतों के मध्य एक व्यक्ति भीतर लाया गया। उसके चेहरे पर भय और विस्मय दोनों स्पष्ट दिखाई दे रहे थे।
वह था—बाबा मोतीलाल।
जीवनभर अपार धन, ऐश्वर्य और वैभव में रहने वाला मोतीलाल जैसे ही यमलोक में पहुँचा, उसकी दृष्टि चारों ओर घूमने लगी।
सुगंधित पुष्पों की मनोहारी सुवास वातावरण में व्याप्त थी। निर्मल जल के झरने मधुर संगीत उत्पन्न कर रहे थे। गंधर्वों का दिव्य गायन पूरे आकाश में गूँज रहा था। अप्सराएँ लयबद्ध नृत्य कर रही थीं। उस अलौकिक सौंदर्य को देखकर वह क्षणभर के लिए अपने भय को भी भूल गया।
उसने मन ही मन सोचा—
"यदि स्वर्ग इतना सुंदर है, तो पृथ्वी का समस्त वैभव इसके सामने कुछ भी नहीं।"
परंतु जैसे ही उसकी दृष्टि धर्मराज पर पड़ी, उसका शरीर काँप उठा। धर्मराज के मुख पर करुणा थी, पर उनकी आँखों में ऐसा तेज था जिससे असत्य स्वयं काँप उठे।
पूरे सभामंडप में गहरा मौन छा गया।
धर्मराज ने चित्रगुप्त की ओर देखकर पूछा—
"चित्रगुप्त! क्या यही वह मानव है?"
चित्रगुप्त ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया—
"महाराज! न्याय की मर्यादा यही कहती है कि पहले इसकी पहचान की पुष्टि कर ली जाए। मैं गण-प्रमुख से आग्रह करता हूँ कि इसकी सत्यता की जाँच करें।"
धर्मराज ने संकेत किया।
गण-प्रमुख आगे बढ़े। उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से उस मनुष्य के स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर का परीक्षण किया। उसके कर्मचिह्नों को परखा। कुछ क्षण बाद उन्होंने हाथ जोड़कर कहा—
"महाराज! इसमें तनिक भी संदेह नहीं। यही वह व्यक्ति है—बाबा मोतीलाल।"
धर्मराज सिंहासन से उठ खड़े हुए।
उनका स्वर अब पहले से अधिक गंभीर था।
"मानव! तेरे कर्मों का लेखा देखकर स्पष्ट होता है कि तूने अनेक बार मृत्यु को भी टालने का प्रयास किया। धन और प्रभाव के बल पर तूने पृथ्वी के न्याय को भ्रमित किया। तूने कानून खरीदे, अधिकारियों को खरीदा और लोगों की करुणा को भी अपने व्यापार का साधन बना लिया।"
मोतीलाल का सिर झुक गया।
धर्मराज आगे बोले—
"परंतु तू यह भूल गया कि मेरी गणसेना की आँखों में अधिक समय तक धूल नहीं झोंकी जा सकती। पृथ्वी का न्याय देर से चल सकता है, कर्म का न्याय कभी नहीं रुकता।"
सभा में बैठे सभी देवता ध्यानपूर्वक सुन रहे थे।
धर्मराज ने आगे कहा—
"तेरे जीवन में कुछ पुण्य कर्म भी थे। उन्हीं के कारण तुझे इस दिव्य लोक का दर्शन प्राप्त हुआ। किन्तु इसे पुरस्कार मत समझ। यह केवल तेरे कर्मों का संतुलन है। अब तू अपने दुष्कर्मों का दंड भोगने के लिए तैयार हो जा।"
इतने में चित्रगुप्त विनम्रता से आगे आए।
"महाराज! यदि आज्ञा हो तो एक निवेदन करूँ?"
"कहो चित्रगुप्त।"
"मेरा विचार है कि दंड देने में शीघ्रता उचित नहीं होगी। यह व्यक्ति अकेला अपराधी नहीं था। इसके पीछे एक विशाल तंत्र कार्य कर रहा था। यदि आज गण-प्रमुख इसके जीवन का संपूर्ण वृत्तांत देवसभा के सामने रखें, तो भविष्य के न्याय के लिए भी यह अत्यंत उपयोगी होगा।"
धर्मराज ने कुछ क्षण विचार किया और फिर बोले—
"उचित कहा, चित्रगुप्त। न्याय केवल दंड देने का नाम नहीं, सत्य को पूर्ण रूप से जानने का भी नाम है।"
फिर उन्होंने पूरी सभा की ओर दृष्टि डालते हुए कहा—
"देवगण! स्मरण रखो—मनुष्य संसार को कुछ समय तक धोखा दे सकता है, पर अपने कर्मफल को कभी नहीं। कर्म का न्याय न बिकता है, न झुकता है और न किसी की सिफारिश स्वीकार करता है। धन से खरीदी गई प्रतिष्ठा मृत्यु तक साथ रहती है, किंतु चरित्र से अर्जित सम्मान युगों तक जीवित रहता है। और जहाँ करुणा व्यापार बन जाए, वहाँ अधर्म अपने चरम पर पहुँच चुका होता है।"
धर्मराज ने गण-प्रमुख की ओर देखा।
"गण-प्रमुख! अब आप इस मानव के जीवन का सम्पूर्ण वृत्तांत सुनाइए। यह जन्म से कैसा था? किन परिस्थितियों ने इसे इस मार्ग पर पहुँचाया? इसने कैसे पूरे देश में छल और शोषण का जाल फैलाया? आज देवसभा के सामने सत्य का एक-एक पृष्ठ खुलना चाहिए।"
गण-प्रमुख ने धर्मराज को प्रणाम किया, सभा के मध्य आए और गंभीर स्वर में बोले—
"महाराज... यह व्यक्ति जन्म से अपराधी नहीं था। इसके जीवन की कहानी एक साधारण बालक से आरम्भ होती है। किन्तु धीरे-धीरे लालच ने इसकी बुद्धि पर ऐसा पर्दा डाला कि इसने मनुष्य की करुणा को भी व्यापार बना दिया। यदि देवसभा अनुमति दे, तो मैं इसके जीवन का पहला अध्याय सुनाना आरम्भ करूँ।"
धर्मराज ने कहा—
"आरम्भ कीजिए। आज कोई तथ्य छिपाया नहीं जाएगा। सत्य ही इस सभा का एकमात्र साक्षी है।"
इतना सुनते ही समूची देवसभा एकाग्र होकर गण-प्रमुख की ओर देखने लगी।
यहीं से बाबा मोतीलाल के जीवन का रहस्य खुलना प्रारम्भ हुआ...
क्रमशः...
Jayguru