Nakaab aur Tanhaai - 6 in Hindi Thriller by Shaziya Khan books and stories PDF | नकाब और तन्हाई - 6

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नकाब और तन्हाई - 6

किस्त 6: आँखों की गवाही


वेस्ट स्ट्रीट की वो ढही हुई इमारत अब मलबे और धूल के गुबार में लिपटी थी। एम्बुलेंस के सायरन और लोगों के शोर के बीच (नकाबपोश जैक) एक ऊंचे खंभे पर खड़ा था। उसकी सांसें फूल रही थीं और सीने में उठा दर्द उसे याद दिला रहा था कि वो फौलाद का नहीं, खून-मांस का बना एक इंसान ही है।


उसने नीचे भीड़ की तरफ देखा। तभी उसकी धड़कन रुक गई।


वही सफेद ओवरकोट, वही उलझे हुए बाल। एली! वह पुलिस की लगाई हुई पीली टेप (Crime Scene Tape) के बिल्कुल पास खड़ी थी। उसके हाथ में वही स्केचबुक थी, लेकिन आज वो उसमें कुछ बना नहीं रही थी, बल्कि उसकी आँखें फटी की फटी रह गई थीं। वह सीधे ऊपर देख रही थी—बिल्कुल जैक की आँखों में।
जैक को लगा जैसे किसी ने उसके सीने में तीर मार दिया हो। उसने फौरन अपनी नज़रें चुराईं और एक लंबे जाले के सहारे दूसरी इमारत की तरफ छलांग लगा दी। वह जितनी तेज़ी से भाग सकता था, भागा। उसे लग रहा था कि एली की नज़रें उसका पीछा कर रही हैं।
आधी रात को जब जैक अपने कमरे की खिड़की से अंदर घुसा, तो वह पूरी तरह भीग चुका था। उसने नकाब उतारा और फर्श पर ढह गया। उसका कमरा खामोश था, पर उसके दिमाग में शोर मचा था।


"क्या उसने मुझे पहचान लिया? नहीं, नकाब तो लगा था। पर क्या मेरी आँखों ने सब कह दिया?

उसके दिमाग़ में अब दिल की जंग जारी थी।   


अगली सुबह, जैक भारी मन से लाइब्रेरी पहुँचा। उसे डर था कि शायद एली वहां नहीं आएगी। लेकिन जैसे ही वो 'सेक्शन 4' की तरफ बढ़ा, उसने देखा कि एली उसी शेल्फ के पास खड़ी थी जहाँ वे पहली बार मिले थे।


जैक ने गहरी सांस ली और पास जाकर बोला, "एली? तुम... तुम कल कैफे से इतनी जल्दी चली गई थीं?

जैक ने खुद को बचाने के लिए पहले ही सवाल कर दिया।

एली मुड़ी। उसकी आँखों के नीचे हल्के काले घेरे थे, जैसे वो रात भर सोई न हो। उसने जैक को गौर से देखा, इतनी बारीकी से जैसे वो उसके चेहरे के पीछे किसी और चेहरे को ढूंढ रही हो।


"मैं कल वहीं थी जैक... वेस्ट स्ट्रीट पर। जहाँ वो हादसा हुआ था," एली की आवाज़ कांप रही थी। "मैंने उसे देखा।"


जैक का गला सूख गया।

"किसे?"


"उस नकाबपोश को। जिसे दुनिया अपना मसीहा कहती है," एली एक कदम और करीब आई।

"अजीब बात है ना जैक? जब वो मलबे के बीच खड़ा था, तो उसकी आँखों में वही सन्नाटा था जो कल मैंने तुम्हारी आँखों में देखा था। वही दर्द, वही तन्हाई।


जैक के पास कोई जवाब नहीं था। उसने अपनी डायरी का एक कोना मरोड़ा और नीची नज़रों से कहा,

इस शहर में हज़ारों लोग तन्हा हैं एली। शायद ये तुम्हारी चित्रकारी का असर है कि तुम्हें हर जगह साये नज़र आते हैं।

एली ने अपनी स्केचबुक खोली और जैक के सामने रख दी। उस पर कल रात वाले नकाबपोश का स्केच बना था, लेकिन उस स्केच में नकाब आधा फटा हुआ था और उसके नीचे जो चेहरा दिख रहा था, वो जैक से मिलता-जुलता था।


एली ने आहिस्ता से कहा,

जैक, तुम कल कैफे से क्यों भागे थे? और तुम्हारी आस्तीन पर ये चोट का निशान कैसा है?


जैक ने अपनी शर्ट की आस्तीन देखी—कल रात मलबे की खरोंच से कपड़ा थोड़ा फट गया था और खून जम चुका था। जैक की धड़कनें अब लाइब्रेरी के सन्नाटे में साफ़ सुनी जा सकती थीं।


उसने मन ही मन सोचा:


"झूठ बोलूँ तो ये दोस्ती मर जाएगी,
सच कहूँ तो उसकी जान खतरे में पड़ जाएगी।
नकाब उठाना तो आसान है इस शहर के सामने,
पर अपनी मुहब्बत की आँखों में आँखें डालना मुश्किल है।"(जारी है)
लेखक _समीर खान