Routes - 6 in Hindi Motivational Stories by shiromani mathur books and stories PDF | राहें - 6

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राहें - 6

पुत्र सुख

मनु खाना खाने बैठा - थाली की सब्जी में बाल उसे फिर दिख
गया, बाल देखते ही मनु जोर से चिल्लाया- "खाना बनाना नहीं
आता, तो मत बनाया करो- मैं यह खाना नहीं खा सकता कभी मुझे
ढंग से खाना नहीं मिलता- इस घर का यही हाल है'- बड़बड़ाता
हुआ मनु थाली छोड़कर खड़ा हो गया।
मधु अन्दर से बाहर आते हुये बोली- "रूक बेटा मैं दूसरी सब्जी
ला देती हूँ।"
मनु - नहीं, मुझे खाना नहीं खाना है।
मधु बोली- बेटा मैं दूसरी सब्जी बना देती हूँ।
मनु बोला- मैने कितनी बार कहा है, मैं तुम्हारा बेटा नहीं हूँ।
मुझे बेटा मत कहा करो, चली आई बेटा कहने वाली- मुझे स्कूल
जाने के लिये देर हो रही है। कहते हुये - मनु ने बस्ता उठाया और
स्कूल भूखा ही चल दिया।
मधु उसे भूखा स्कूल जाते देखती रही और दुखी होती रही।
सोचती रही- मैं इसे कैसे समझाऊँ? पता नहीं ईश्वर की क्या इच्छा
है, जो इसकी ही सब्जी में बाल निकलता है, बाल निकलने पर वह
खाना नही खाता और इसके खाना नहीं खाने से मुझे अच्छा नहीं
लगता- मैं मानती हूँ मैं इसकी मॉ नहीं हूँ परन्तु इंसान तो हूँ । मैं और
इसके पापा खाना खा लें और यह भूखा रह जाये तो मन को अच्छा
नहीं लगता इसी तरह मधु विचारों में खो गई।
उसे मालूम है कि मनु उससे बहुत चिढ़ता हैं। रोज कोई ना
कोई बात पर बिगड़ जाता है फिर जली कटी सुनाकर मुझे भी दुखी
करता है और स्वयं भी खुश नहीं रहता। कई बार सोच चुकी हूँ कि
वापस चली जाऊँ - परन्तु फिर इस घर व अपने अंधकारमय भविष्य
को देखकर यहीं रह जाती हूँ। मधु इन्हीं विचारों में खोई ना जाने
क्या-क्या सोचती रही .. कैसे उसका यहाँ आना हुआ। उसने वैधव्य
का दुख भोगा। पति की मृत्यु के बाद परिजनों ने उसे ठुकराना शुरू
कर दिया था। छोटी छोटी चीजों के लिये वह तरस गई थी। ससुराल
के दुखों से परेशान होकर मायके गई तो वहाँ भी दिनभर काम करती
फिर भी भाभी समय-समय पर ताना मारती और ढंग से व्यवहार नही
करती थी। बार बार अपमानित करती रहती . मधु विचारों में खोई
अपने ऑसू पोछ रही थी तभी गृहस्वामी सुभाष गुप्ता घर आ गये,
मधु को उदास देखकर बोले- क्या बात है, लगता है मनु ने आज
फिर कुछ बोल दिया है ?
मधु ने खुद को सयंमित करते हुये कहा - चलो खाना खा लो,
खाना लगाती हूँ।
सुभाष ने कहा - तुमने भी नहीं खाया है? अपना और मेरा दोनों
का खाना लगाओं।
मधु दो थाली में खाना लगाकर ले आई-खाते खाते सुभाष ने
पूछा-आज क्या बात हुयी? जो इतनी उदास हो?
मधु ने कहा - पता नही मनु खाना खाता है तो उसकी ही
सब्जी में बाल निकल आता है कई बार ऐसा हो चुका है। मेरे और
आपके खाने में कभी बाल नहीं निकलता और फिर उसे चिल्लाने का
अवसर मिल जाता है।
सुभाष हँसते हुये बोले - लगता है, आज भी यही हुआ है, और
वह तुम्हें जली कटी सुना गया होगा- उसकी बातों का बुरा मत माना
करो बच्चा है, धीरे-धीरे सब एडजस्ट हो जायेगा । उसकी स्थति को
भी समझो- उसे भी अपनी माँ की याद आती होगी। ना तो इतना
छोटा है कि मॉ को भूल जाये और ना ही इतना बड़ा है जो
परिस्थितियों की गंभीरता को समझे। इसलिये तुम्हीं सहन कर लिया
करो- समझाने की मुद्रा में उन्होने मधु को देख कर यह बातें कहीं
जिन्दगी में कई समझौते करने पड़ते हैं।
खाना खाकर सुभाष गुप्ता आराम के लिये पलंग पर लेट गये
और सोचने लगे कि किस तरह पत्नी श्वेता की असमय मृत्यु के
कारण वे टूट गये थे। श्वेता का इलाज उन्होनें कई जगह करवाया
था। लाखों रूपये खर्च किये परन्तु वह नहीं बची। उसके जाने के
बाद कुछ महीने बेटी प्रियंका उनके साथ रही। वह भी कब तक
रहती? उसे भी अपने घर जाना था .. उसके ससुराल जाने के बाद
वे स्वयं खाने के लिये तरस गये थे। घर का काम करें, खाना बनायें
या दुकान देखें? दुकान पर ध्यान ना देने पर नौकर लोग मनमानी
करते हैं और थक हार कर घर आने पर खाना बनाने की इच्छा नहीं
होती थी। कई बार रात को भूखे सो गये थे। फिर मनु की पढ़ाई व
खाने का भी ध्यान देना पड़ता था। मनु को खाना बनाने में तनिक भी
रूचि नहीं थी। कभी - कभी तो समोसा या खिचड़ी खाकर ही दिन
कट जाता था। मधु के आने के बाद से हम लोंगों को दोनों टाइम
का खाना मिल जाता है। घर भी साफ सुथरा रहता है। मनु इस बात
को समझता नहीं . कहीं ये भी वापस चल दी तो हमारा घर कैसे
चलेगा ? सोचते रहे .. महीनों बाद खाना बनाने वाली महिला मिली
है. मधु विधवा है, इसकी पारिवारिक समस्यायें नहीं है इसे भी जीवन
काटना है और हमें भी अपनी रोटियों के लिये कोई चाहिये- मनु इन
बातों को नही समझता। देखो - कितने दिन यह सब चलता है, मनु
को समझा कर देखता हूँ। आये दिन झगड़ा करना ठीक नहीं है।
वे मनु को समझाने का अवसर देखने लगे।
मनु भूखे पेट स्कूल गया था। उसने बहन प्रियंका को फोन
लगाकर घर का हाल चाल बताया किस तरह घर में खाना ठीक से
नहीं बनता हैं । मधु मेरी मॉ बनने का प्रयास करती है। मेरी मम्मी की
साड़ियाँ पहनती है। जब भी उसको मम्मी की साड़ी पहने देखता हूँ
तो मुझे अच्छा नहीं लगता- पापा ने उसे मम्मी की सोने की जंजीर
व टॉप्स भी दे दिये हैं। मुझे मधु का रवैया अच्छा नहीं लगता। इन्हीं
कारणों से पढ़ाई में भी मेरा मन नहीं लगता।
मधु इस घर में अपने को एडजस्ट करने की कोशिश करती
रही। वह सदैव सुभाष व मनु की रूचि को ध्यान में रखकर खाना
बनाती परन्तु मनु जब तब भड़क जाता और उसे जली कटी सुनाता।
धीरे धीरे मधु ने अपने अच्छे व्यवहार से सुभाष का विश्वास प्राप्त
कर लिया। सुभाष को बिजनिस के कारण या रिश्तेदारी में बाहर
जाना होता तो मधु समय निकालकर दुकान चली जाती और वहाँ भी
काम देख लेती थी। सुभाष को इस तरह बहुत सहारा मिलने लगा
और वे दुकान की बिक्री का पैसा शाम को लाकर मधु को देने लगे।
मधु दुकान के लेन देन व हिसाब किताब में सहयोग देने लगी।
मनु अब कालेज में आ गये था। कभी कभी दुकान जाता परन्तु
जिम्मेदारी नहीं आई थी। अपने दोस्तों में ज्यादा समय बिताता था ।
एक दिन तेज मोटर साइकिल चलाते हुये मनु कुत्ते से टकरा गया
अंधेरे में काला कुत्ता दिखाई नहीं दिया और मोटर साइकिल से गिर
जाने के कारण उसकी टांगों की हड़िडयाँ टूट गई। मनु को
अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा डाक्टरों ने आपरेशन कर टॉगों में रॉड
डाली, दर्द से मनु कराहता, वह अपने काम स्वयं नहीं कर पा रहा था
ऐसे में मधु ने मनु की बहुत सेवा की, उसे खाना खिलाना, पॉट
लगाना, मुँह हाथ धुलवाना सब मधु करती। घर और अस्पताल दोनों
जगह वह समर्पण भाव से काम सम्हालती।
अस्पताल में सुभाष ने जब मधु से कहा - तुम घर चली जाओ
रात में वही सो जाना। मैं अस्पताल में मनु के पास रह जाता हूँ।
मधु बोली - आप दिन भर दुकान में काम करते हो । मैं रात में
मनु के पास रह जाती हूँ, आप घर आराम से रह पाओगे । इस
तरह उसने समझाकर सुभाष को घर भेज दिया।
सुबह जल्दी उठकर वह घर आई। अपने, सुभाष और मनु के
लिये नाश्ता बनाकर फिर अस्पताल पहुँची। मनु से नाश्ता करने के
लिये वह बार बार कह रही थी। मनु बोला - मुझे भूख नहीं है,मैं
नाश्ता नहीं करूँगा ।
मधु समझाते हुये बोली- नाश्ता नहीं करोगे तो दवा कैसे
खाओगे फिर दवा के बिना अच्छे कैसे होगे ? अच्छे बच्चे हो तो बात
मानो और नाश्ता कर लो, नाश्ते की प्लेट देते हुये मधु ने प्यार से कहा।
मन ही मन आज मनु को अपने पर बहुत पछतावा हो रहा था
सोच रहा था, कि मधु को मैं जब तब डॉटता रहता हूँ। आज मेरी
कितनी सेवा कर रही है ? रात-रात भर मेरे लिये जागती है। मेरा
मन पसंद नाश्ता बनाकर लाती है। समय पर दवा देती है और तो
कोई मेरा इतना ध्यान नहीं रखता- सोचकर वह द्रवित हो गया।
मधु के हाथ में नाश्ते की प्लेट थी, उसके हाथ को पकड़ कर मनु
बोला- माँ तुम मेरा कितना ख्याल रखती हो, मैने तुम्हें क्या क्या नही
बोला, मैं अपनी गलतियों के लिये आपसे मॉफी मॉगता हूँ ।
मनु के मुँह से अपने लिये मॉ का सम्बोधन पहली बार सुनकर
मधु गदगद हो गई, बोली- तुमने मुझे माँ कहा, मुझे सब कुछ मिल
गया। मैं ... माँ का कर्तव्य पूरा कर रहीं हूँ, तुम्हारे ऊपर कोई एहसान
नहीं है। तुम जल्दी अच्छे हो जाओ । हम सब यही चाहते हैं। बात
करते करते मधु भी भावुक हो गई। बिना प्रसव वेदना सहे ही वह
किसी बेटे की माँ थी। अग्नि को बिना साक्षी बनाये व बिना सात फेरों
के वह किसी की अर्धागंनी और किसी घर की स्वामिनी थी। आज
जैसे उसे सब कुछ मिल गया था।
कुछ दिनों बाद मधु ने मनु की शादी कर दी। घर में रौनक आ
गई। सुभाष गुप्ता भी वृद्धावस्था पाकर स्वर्ग सिधार गये। मनु ने
वृद्धावस्था में मधु की बहुत सेवा की, कोई सगा अपना बेटा भी इतनी
सेवा क्या करता जितना मनु ने उसका ध्यान रखा। पति, पुत्र व घर
की विधिवत अधिकारिणी ना होते हुये भी मधु ने सारे सुख पायें, अंत
में तृप्त होकर उसने आखिरी सॉसें ली।
                       *****
                                     डॉ. शिरोमणि माथुर 
                                     दल्ली राजहरा
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