धोखा
रामचंद्र के पुत्र सुभाष की शादी बड़ी धूमधाम से हुयी। नगर में
चर्चा का विषय रहा। सुभाष भिलाई स्टील प्लांट में असिस्टेंट मैनेजर
है। लड़की भिलाई के प्रतिप्ठित व्यापारी की पुत्री है। दोनो परिवारों
में बेहद खुशी का माहौल था। रामचन्द्र के तीन बेटों में सुभाष ही पढ़
लिख कर इन्जीनियर बना और परीक्षा पास करते ही भिलाई स्टील
प्लांट नौकरी लग गई, माता पिता के खुशी का ठिकाना नहीं था।
फिर शादी भी अच्छे घर की पढ़ी लिखी लड़की से हो गई परिवार में
खुशियों की बहार थी। बहू दहेज में भी बहुत सामान लाई थी।
शादी के कुछ दिनों बाद ही सुभाष पत्नी स्नेहा के साथ भिलाई
अपने क्वाटर में रहने चले गये । उन्हें प्लांट की ओर से अच्छा क्वार्टर
मिला था। शानदार बड़ा बंगलानुमा क्वार्टर, आगे पीछे सुन्दर फूलों
का बगीचा सुगन्ध से भरा रहता था। स्नेहा भी खुश रहने का दिखावा
करती सुभाष के खाने पहनने की पूरी व्यवस्था करती और सुभाष के
डयूटी जाते ही स्वतंत्र हो जाती, फिर अपनी सहेलियों व मित्रों से
दिन भर बातों पर लगी रहती। उसके बचपन का साथी मयंक उसका
प्रिय मित्र था स्नेहा उसी से शादी करना चाहती थी परन्तु सामाजिक
कारणों से स्नेहा के माता पिता मयंक के साथ शादी करने को तैयार
नही हुये। सुभाष को हर दृष्टिकोण से पढ़ा लिखा, सुशील, सभ्य और
आर्थिक रूप से सक्षम देखकर अपनी बेटी के उज्जवल भविष्य को
देखते हुये स्नेहा की शादी सुभाष से कर दी। परन्तु स्नेहा मयंक को
भूल नही पा रही थी सुभाष के काम पर जाते ही मयंक स्नेहा के घर
आ जाते और दोनों साथ साथ रहते व घूमने जाते और सुभाष के
आफिस से आने के पूर्व मयंक वापस चला जाता।
स्नेहा अपने रूपजाल व वाक चातुर्य से सुभाष को प्रभावित
करती थी। सीधा साधा सुभाष उसकी बातों में आ जाता था।
एक दिन स्नेहा बोली- आप बैंक एकाउन्ट और सर्विस बुक में
किसे नामिनी बनाये हो ।
सुभाष ने कहा- मॉँ का नाम है।
स्नेहा बोली - अब मैं आ गई हूँ तो मेरा भी ख्याल करो । मा
तो वृद्धा हैं, मेरा नाम डलवाना चाहिये।
सुभाष ने कहा- ठीक है मैं माँ की जगह तुम्हारा नाम डलवा
देता हूँ। शादी से पहले माँ का नाम डाला था। अब चेंज कर देता
हूँ। सुभाष ने बैंक एकाउन्ट व सर्विस बुक में नामिनी (उतराधिकारी)
में माता के नाम को हटाकर स्नेहा का नाम डलवा दिया।
अब स्नेहा बहुत खुश थी। सुभाष को खुश करने के लिये उसके
इचछानुसार ही हर काम करती थी उसे खुश करने के लिये कहती
तुम्हें पाकर मैं बहुत खुश हूँ तुम मेरा बहुत ख्याल रखते हो। धीरे
से स्नेहा ने सुभाष का 20 लाख रू. (बीस लाख रूपये) का बीमा भी
करवा दिया और बीमा पॉलिसी में भी वह नामिनी बन गई।
सुभाष की अनुपस्थिति में मयंक का आना जाना बढ़ता जा रहा
था। मयंक कई बार स्नेहा से कहता - "'तुम्हारे बिना अच्छा नहीं
लगता तुम कहो तो मैं सुभाष को रास्ते से हटाने का सब प्रबन्ध कर
लेता हूँ।
स्नेहा बोली- 'थोड़ा रूक जाओ अभी तो सुभाष का बीमा
करवाया है। कम से कम दो महीने और रूको।"
स्नेहा बहुत चतुर थी इसलिये हर कार्य को योजनाबद्ध ढंग से
कर रही थी कि किसी को भी शंका ना हो। वह सुभाष को हर तरह
से खुश रखती थी। हर रविवार उसका सुभाष के साथ घूमने का
प्रोग्राम निश्चित रहता था, वह कहाँ पैसे रखता है, उसका किन लोगों
के साथ मिलना जुलना व उठना बैठना है, स्नेहा सदैव नजर रखती।
सास ससुर से भी वह सम्बन्ध बनाये हुयी थी। सुभाष अपनी डयूटी
में व्यस्त रहते थे। रात को घर में स्नेहा के साथ गपशप कर के सो
जाते।
मयंक की दोस्ती नगर के मनचले व गुंडे लड़को के साथ थी।
स्नेहा के साथ साथ मयंक की नजर स्नेहा के पैसों पर भी लगी थी।
वह एक एक दिन गिनता जा रहा था और सुभाष को रास्ते से हटाने
का प्लान बनाता रहता।
सुभाष प्रति रविवार स्नेहा के साथ सुबह पैदल घूमने जाते।
परन्तु इस रविवार को स्नेहा सुभाष के साथ नहीं गई । तबियत ठीक
ना होने का बहाना बनाकर वह घर पर ही रूकी रही। मौसम सुहाना
था। मंद मंद हवा चल रही थी, सुभाष अकेले ही घूमने गये। वह
सड़क पर अकेले विचार मग्न घूम रहे थे कि पीछे से ट्रक ने उन्हें
जोर से टक्कर मारी जिससे वे वहीं गिर पड़े और ट्रक उनके ऊपर
से निकल गई सर में चोट आने व ज्यादा खून बहने के कारण उन्होंने
सड़क पर ही दम तोड़ दिया। आसपास के लोग उन्हें अस्पताल
लेकर गये। अस्पताल में डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
सुभाष के पार्थिव शरीर को गॉँव में लाया गया। माता पिता का रो-रो
कर बुरा हाल था। बड़े अरमानों से उन्होंनें उसे पढ़ाया लिखाया था
व शादी की थी, बुढ़ापे का सहारा उनकी ऑखों के सामने से जा रहा
था। अपनी जीवन की अनुपम निधि का बिछुड़ना कष्टप्रद था।
स्नेहा पन्द्रह दिन बड़ी मुश्किल से ससुराल में रही, एक दिन
सब जेवर व कीमती सामान लेकर अपने मायके चली गई फिर कभी
वापस नही आई। सुभाष के माता पिता उसे वापस लाने गये तो स्नेहा
के मायके के पड़ोसियों से पता चला वह अब यहाँ भी नही रहती
अपने पुराने पुरूषमित्र मयंक के साथ शादी करके कहीं दूसरे शहर
में रहती है।
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डॉ. शिरोमणि माथुर
दल्ली राजहरा