Raaz - Part 4 in Hindi Horror Stories by Aarushi Singh Rajput books and stories PDF | Raaz - Part 4

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Raaz - Part 4

तीनों एकदम वहीं ठिठक गए।

वह कोई गाना नहीं था… बस एक धुन थी।

कोई शब्द नहीं, फिर भी वह बहुत गहराई तक महसूस हो रही थी। उसमें एक अजीब-सा दर्द था, ऐसा जैसे वह बहुत पुराना हो और कहीं लंबे समय से दबा हुआ हो।

मेहर ने घबराकर अवंतिका का हाथ कसकर पकड़ लिया।
चोटू दो कदम पीछे हट गया, उसका चेहरा डर से सफेद पड़ चुका था।

लेकिन अवंतिका वहीं खड़ी रही।

उसे वहाँ से तुरंत निकल जाना चाहिए था, लेकिन उसके पैर जैसे जमीन से चिपक गए थे।

उस धुन में कुछ ऐसा था जो उसे अपना-सा लग रहा था।
जैसे उसने इसे पहले भी कहीं सुना हो…

लेकिन कहाँ, कब… उसे कुछ याद नहीं था।

फिर भी दिल बार-बार कह रहा था—यह धुन अनजानी नहीं है, कहीं न कहीं उससे जुड़ी है।

"अवंतिका..." मेहर ने उसका हाथ दबाया, "चलो यहाँ से चलते हैं।"

मेहर की आवाज़ सुनकर वह जैसे होश में आई।

उसने एक बार फिर अंधेरे रास्ते की तरफ देखा। वहाँ अब पूरी तरह सन्नाटा था, और धुन बंद हो चुकी थी।

ऐसा लग रहा था जैसे जिसने वह धुन बजाई थी, उसे पता चल गया हो कि कोई उसे सुन रहा है।

"हाँ… चलो," अवंतिका ने धीमे से कहा।

तीनों जल्दी-जल्दी हवेली से बाहर निकल आए।

जैसे ही वे खुले मैदान में पहुँचे, धूप की गर्माहट उनके चेहरे पर पड़ी।

अवंतिका ने गहरी साँस ली—उसे महसूस हुआ कि अंदर वह ठीक से सांस भी नहीं ले पा रही थी।

चोटू बाहर आते ही घुटनों के बल बैठ गया और ज़मीन छूकर भगवान को धन्यवाद करने लगा।

मेहर उसे देखकर बोली, "ये क्या कर रहा है?"

चोटू ने बिना ऊपर देखे कहा,

"भगवान का शुक्रिया… कि ज़िंदा बाहर आ गया।"

मेहर हल्का-सा मुस्कुराई, लेकिन उसके चेहरे पर डर साफ था।

तभी अवंतिका की नज़र फिर से हवेली पर गई और वह अचानक रुक गई।

तीसरी मंज़िल की एक खिड़की खुली थी।

और उसमें कोई खड़ा था।

एक औरत… लंबे काले बाल, सफेद कपड़े, बिल्कुल स्थिर।
वही चेहरा… जिसे उसने पुरानी तस्वीर में देखा था, और वही जो दिल्ली की सड़क पर स्ट्रीट लाइट के नीचे दिखाई दी थी।
अवंतिका का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।

"मेहर… ऊपर देख, उस खिड़की में," उसने कहा।
मेहर ने ऊपर देखा।

"कहाँ?"

"वहीं, तीसरी मंज़िल…"।

कुछ पल देखने के बाद मेहर ने सिर हिला दिया।
"वहाँ तो कोई नहीं है।"

"क्या…?"

अवंतिका ने फिर ऊपर देखा। खिड़की बंद थी। वहाँ कोई नहीं था।

लेकिन वह जानती थी कि एक पल पहले वहाँ कोई था।
वापसी के पूरे रास्ते कोई कुछ नहीं बोला।

सिर्फ कदमों की आवाज़ गूंज रही थी।

रास्ते में सूखे पेड़ खड़े थे। अचानक अवंतिका रुक गई।
उनकी शाखाएँ अब काली कोठी की तरफ नहीं, बल्कि सीधे उनकी तरफ झुकी हुई थीं।

जैसे वे उन्हें देख रही हों।

Guest House पहुँचकर वह सीधे अपने कमरे में गई।
उसने नोटबुक निकाली और लिखना शुरू किया

काली कोठी के अंदर 

• दीवारों पर औरतों की तस्वीरें, जिनके चेहरे मिटाए गए थे।
• धूल भरी हवेली में एक साफ़ मेज़।
• ताज़े नंगे पैरों के निशान।
• अँधेरे रास्ते से आती रहस्यमयी धुन।
• और सबसे बड़ा सवाल—यह धुन मुझे जानी-पहचानी क्यों लगी?

कुछ देर रुककर उसने अगली लाइन लिखी

तीसरी मंज़िल की खिड़की वाली औरत सिर्फ मुझे दिखी… क्यों?

शाम हो चुकी थी। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।

"ठक… ठक…"

अवंतिका ने दरवाज़ा खोला। बाहर एक बूढ़ी औरत खड़ी थी सफेद बाल, गहरी झुर्रियाँ, और एक बंद आँख।

"लोग मुझे कमला बाई कहते हैं," उसने कहा।

उसकी आवाज़ भारी और शांत थी।

"आप…?" अवंतिका ने पूछा।

"तू आज काली कोठी गई थी," उसने सीधे कहा।
यह सवाल नहीं था।

"हाँ…"

कमला बाई ने उसे गहराई से देखा, फिर उसकी आँखें भर आईं।

"तू वही है… जिसका इंतज़ार सदियों से किया जा रहा था," उसने धीमे से कहा।

अवंतिका सन्न रह गई।

"किसका इंतज़ार?"

कमला बाई ने बस एक नाम लिया

"श्यामला…"

और फिर वह चुप हो गई।

उसी पल हवा चलने लगी।

मई की गर्मी में भी वह हवा ठंडी थी… बहुत ठंडी।

और उस हवा के साथ…

बहुत दूर से वही धुन फिर सुनाई दी।

लेकिन इस बार अवंतिका को लगा

वह धुन बाहर नहीं… उसके अंदर से उठ रही है।