Teri Meri Khamoshiyan - 15 in Hindi Love Stories by Mystic Quill books and stories PDF | तेरी मेरी खामोशियां। - 15

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तेरी मेरी खामोशियां। - 15

सुबह की ताज़ा धूप जब सुल्तान मेंशन के आँगन में उतरी, तो घर में चहल-पहल शुरू हो चुकी थी। नायरा रात भर ठीक से सो नहीं पाई थी, मगर अपने जज़्बातों को चेहरे पर छुपाकर वह सुबह-सुबह ही रसोई में अम्मी और सानिया भाभी की मदद के लिए पहुँच गई।
दादी के कहे मुताबिक, आज नाश्ते के बाद अमन को कुछ ज़रूरी कागजात लेकर शहर के बड़े वकील के पास जाना था। दादी चाहती थीं कि अमन अपनी ज़िम्मेदारी समझे, इसलिए उन्होंने साफ़ कह दिया था कि नायरा भी इस बहाने बाहर घूम आएगी और अमन के साथ ही जाएगी।

अमन दादी की बात टाल नहीं सका, मगर उसका मूड बेहद खराब था।
जब गाड़ी सुल्तान मेंशन से निकली, तो अंदर एक अजीब सा सन्नाटा था। अमन पूरी रफ्तार से गाड़ी चला रहा था। नायरा ने माहौल को हल्का करने के लिए धीरे से कहा, "अमन जी... गाड़ी है, हवाई जहाज़ नहीं। इतनी जल्दी भी क्या है?"

अमन ने बिना उसकी तरफ देखे स्टीयरिंग को और कसते हुए कहा, "मुझे अपना काम वक्त पर करने की आदत है, और मुझे रास्ते में फिजूल की बातें पसंद नहीं।"

नायरा ने बुदबुदाते हुए कहा, "हूँ... बात करने को फिजूल कह रहे हैं। रोबोट हैं पूरे!"
"कुछ कहा तुमने?" अमन ने आँखें तरेरीं।
"नहीं, मैंने तो बस अल्लाह को याद किया," नायरा ने मासूमियत से खिड़की के बाहर देखते हुए कहा।

तभी अचानक, सामने से आते एक तेज़ रफ़्तार ऑटो को बचाने के चक्कर में अमन ने पूरी ताकत से ब्रेक मारा।

किर्र्र्र...

गाड़ी एक ज़ोरदार झटके के साथ रुकी। उस झटके से नायरा खुद को संभाल नहीं पाई। वह सीधे आगे की तरफ़ फेंकाई, मगर इससे पहले कि उसका सिर डैशबोर्ड से टकराता, अमन का मज़बूत हाथ तेज़ी से आगे बढ़ा और उसने नायरा के माथे को अपनी हथेली में सुरक्षित थाम लिया।

झटके के थमते ही, नायरा की आँखें डर के मारे बंद थीं। जब उसने धीरे से अपनी पलकें उठाईं, तो उसने देखा कि वह अमन के बेहद करीब थी। अमन का एक हाथ उसकी हिफाज़त में आगे था, और दूसरा हाथ स्टेयरिंग पर कसा हुआ था। दोनों की सांसें एक-दूसरे से टकरा रही थीं। अमन की गहरी, कड़वी आँखें सीधे नायरा की आँखों में झांक रही थीं।

कुछ सेकंड के लिए वक्त जैसे ठहर गया। नायरा को अपने दिल की धड़कन साफ़ सुनाई दे रही थी। इस अनचाहे रोमांटिक पल ने उसके दिल में एक अजीब सी हलचल पैदा कर दी।

मगर जैसे ही अमन को अहसास हुआ कि वह क्या कर रहा है, उसने झटके से अपना हाथ पीछे खींच लिया। वह अपनी उस कमज़ोरी और अनचाहे खिंचाव से झल्ला गया। उसने अपनी कड़वी ज़ुबान का सहारा लेते हुए कहा, "गाड़ी में बैठने की तमीज़ नहीं है क्या तुम्हें? या फिर करीब आने का कोई भी मौका छोड़ना नहीं चाहतीं?"

नायरा का दिल इस बात पर ज़रा सा दुखा, मगर इस बार उसने रोने के बजाय हिम्मत दिखाई। उसने अपना पल्लू ठीक किया और थोड़े चुलबुले अंदाज़ में कहा, "अमन जी, ब्रेक आपने इतनी ज़ोर से मारा कि न्यूटन का नियम भी फेल हो जाए, और गलती मेरी? वैसे... शुक्रिया, मेरा सिर फूटने से बचाने के लिए।"

अमन उसकी इस बेबाकी पर हैरान रह गया। वह उम्मीद कर रहा था कि नायरा रोने लगेगी, मगर उसने तो पलटकर जवाब दे दिया था।

अमन ने गाड़ी दोबारा आगे बढ़ाते हुए ठंडे और कड़वे लहजे में कहा, "ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है। तुम जैसी लड़कियों को मैं बहुत अच्छे से जानता हूँ। पहले मासूमियत का नाटक करती हो, फिर घर के बड़ों को अपनी तरफ़ करती हो, ताकि मर्द को अपनी उंगलियों पर नचा सको। मगर एक बात कान खोलकर सुन लो... मेरे सामने तुम्हारा यह नाटक काम नहीं करेगा।"

नायरा ने उसकी कड़वाहट को महसूस किया। उसने खिड़की की तरफ़ मुंह कर लिया। उसकी आँखों में एक पल को आँसू आए, मगर उसने उन्हें तुरंत पोंछ दिया। उसने मन ही मन फैसला कर लिया: 'आप मुझे जितना चाहे दूर ढकेलें अमन जी, मेरी ज़ुबान पर तंज कसें... मगर मैं हार नहीं मानूंगी। आपके इस कड़वे मुखौटे के पीछे जो टूटा हुआ इंसान छिपा है, मैं उसे ढूंढ कर ही रहूंगी।'

दूसरी तरफ़: सुल्तान मेंशन का पिछला हिस्सा
शाम को जब गाड़ी वापस सुल्तान मेंशन आई, तो अमन बिना नायरा की तरफ़ देखे सीधे अपने कमरे की तरफ़ चला गया। नायरा भारी कदमों से आँगन की तरफ़ बढ़ी, जहाँ रहीम चाचा पौधों को पानी दे रहे थे।
नायरा को देखकर पुराने वफादार नौकर रहीम चाचा के चेहरे पर फिक्र की लकीरें उभर आईं।

"बहू बीवी..." रहीम चाचा ने धीमे से पुकारा, "छोटे साहब की बातों का बुरा मत मानना। उनका मिज़ाज कड़वा ज़रूर है, पर दिल मैला नहीं है।"

नायरा रुकी और उसने रहीम चाचा की तरफ़ देखा, "रहीम चाचा, वो हमेशा इतने गुस्से में क्यों रहते हैं?"

रहीम चाचा ने इधर-उधर देखते हुए आवाज़ धीमी की, "साहब को बचपन में जो घाव मिले हैं, उन्होंने उन्हें ऐसा बना दिया है। जब घर बिखरता है, तो सबसे ज़्यादा दर्द बच्चों को होता है। छोटे साहब ने अपनों को बदलते देखा है... बस इसीलिए वो किसी नए रिश्ते पर यकीन नहीं कर पाते।"

रहीम चाचा की यह बात सीधे नायरा के दिल में उतरी। उसे अब और मजबूती मिल गई थी।
दूर बरामदे में खड़ी निखार यह सब देख रही थी। उसके होठों पर एक शातिर मुस्कान थी।

"हंस लो नायरा, जितना हंसना है..." निखार ने अपने हाथ में पकड़े हुए गुलाब की पंखुड़ियों को मरोड़ते हुए बुदबुदाया, "अमन की नफ़रत ही तुम्हें इस घर से बाहर का रास्ता दिखाएगी। और बहुत जल्द, मैं इस नफ़रत की आग में थोड़ा और घी डालने वाली हूँ।"