कमरे में खामोशी इतनी गहरी थी कि नायरा की तेज़ होती सांसें साफ सुनाई दे रही थीं। अमन की तेज़ और तल्ख नज़रें नायरा पर जमी थीं, जबकि निखार एक कोने में खड़ी अपनी जीत की मुस्कान छिपाने की कोशिश कर रही थी।
नायरा ने अपनी जलती हुई कलाई को दूसरे हाथ से थाम लिया। उसने अमन की आँखों में देखा—वहाँ नफ़रत नहीं, बल्कि एक ऐसा डर था जो अमन को सच देखने से रोक रहा था।
"अमन जी..." नायरा की आवाज़ में कांपती हुई मगर गहरी सच्चाई थी, "अगर आप मेरी बात का यकीन नहीं करना चाहते, तो न करें। लेकिन... अगर आपको ये लगता है कि मैं निखार के साथ बदतमीज़ी कर सकती हूँ, तो आप मुझे अभी भी नहीं जानते।"
अमन का चेहरा लाल हो गया। "मैं क्या जानता हूँ और क्या नहीं, ये मैं बेहतर समझता हूँ। तुम..."
तभी दादी की गूँजती हुई आवाज़ दरवाज़े पर सुनाई दी, "अमन! ये क्या तमाशा लगा रखा है?"
सबने मुड़कर देखा। दादी दरवाज़े पर खड़ी थीं, उनके साथ अम्मी (नजमा बेगम) भी थीं। उनकी नज़रें बिखरे हुए सूप और नायरा के जलते हुए हाथों पर टिकी थीं।
अमन थोड़ा झिझका, "दादी... ये..."
दादी ने अमन की बात बीच में ही काट दी। उन्होंने सीधे निखार की तरफ देखा, जिनकी मुस्कान अब फीकी पड़ रही थी। "निखार, तुम यहाँ क्या कर रही हो? और ये सूप किसलिए?"
निखार हकलाते हुए बोली, "दादी... वो... सूप... मैं तो बस भाभी को देने आई थी।"
"दादी," नायरा ने बीच में बात रखते हुए शांति से कहा, "निखार बहुत ख्याल रखती है मेरा। शायद सूप देते वक्त उनका हाथ फिसल गया होगा, और मैंने गलती से उसे झटक दिया। इसमें किसी की गलती नहीं है।"
अमन और निखार दोनों चौंक गए। निखार को लगा कि नायरा शायद उसकी साज़िश बेनकाब कर देगी, और अमन हैरान था कि नायरा ने खुद पर इल्ज़ाम क्यों लिया।
दादी ने एक गहरी नज़र नायरा पर डाली। उन्हें पता था कि नायरा सच क्या छुपा रही है। उन्होंने निखार से कहा, "निखार, तुम जाओ यहाँ से। और आइंदा से किसी के कमरे में कुछ लेकर जाने की ज़रूरत नहीं है, नौकर हैं घर में।"
निखार अपना सा मुंह लेकर वहाँ से निकल गई। कमरे में अब अमन, नायरा, दादी और अम्मी रह गए थे।
नजमा बेगम ने तुरंत नायरा के हाथों को अपने हाथों में लिया, "मेरे बच्चे! ये क्या हाल बना लिया?" उन्होंने अमन को डाँटते हुए कहा, "अमन! खड़े क्या हो? मरहम लाओ इसे!"
अमन चुपचाप वहां से फर्स्ट-एड किट लाने चला गया। अम्मी और दादी ने नायरा को मरहम लगाया। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान अमन वहीं खड़ा रहा, उसकी आँखें लगातार नायरा पर टिकी थीं। वह समझ नहीं पा रहा था कि जो लड़की कुछ देर पहले उस पर चिल्ला रही थी, उसने निखार को बचाने के लिए खुद को गलत क्यों कहा?
जब दादी और अम्मी कमरे से बाहर गईं, तो अमन ने मरहम का डिब्बा नायरा की तरफ बढ़ाया।
"क्यों किया?" अमन ने अपनी आवाज़ को सामान्य करने की कोशिश करते हुए पूछा।
नायरा ने उसकी तरफ देखा और ठंडे लहजे में कहा, "ताकि घर का माहौल न बिगड़े। और शायद इसलिए भी, क्योंकि मैं जानती हूँ कि अगर मैं सच बोलती, तो आप तब भी निखार का ही साथ देते। आप उसे अपना समझते हैं और मुझे... पराया।"
अमन के सीने में जैसे कोई कांटा चुभ गया। उसने कुछ कहना चाहा, मगर शब्द उसके गले में ही अटक गए। वह चुपचाप पलटा और सोफे पर जाकर लेट गया।
उस रात, अमन को नींद नहीं आई। वह बार-बार नायरा का वह चेहरा देख रहा था, उसमें न गुस्सा था, न शिकायत। सिर्फ एक अजीब सा ठहराव था। पहली बार अमन को लगा कि जिस 'दीवार' को उसने खड़ा किया है, नायरा उसे तोड़ नहीं रही है, बल्कि उसे अपना बना रही है।
वहीं दूसरी ओर, निखार गुस्से से पागल हो रही थी। उसने अपनी माँ रुकसाना को बुलाकर कहा, "अम्मी, वो लड़की बहुत चालाक है। उसने दादी का भरोसा जीतने के लिए खुद को गलत साबित कर दिया। अब अगर अमन को मुझसे दूर करना है, तो मुझे कुछ और बड़ा करना होगा।"
रुकसाना बेगम ने कुटिलता से हँसते हुए कहा, "अगले हफ़्ते सनाया आ रही है, निखार। सनाया को अमन से कितना लगाव है, ये तो तू जानती है। अगर सनाया ने नायरा को अपनाना मना कर दिया, तो अमन खुद नायरा को इस घर से निकाल देगा।"
निखार की आँखों में एक नई चमक आ गई। "सनाया... हाँ, यही सबसे सटीक हथियार है।"