मेरा देश एक हिंदी कहानी— विजय शर्मा 'एरी' —सूरज अभी पूरी तरह ऊगा भी नहीं था कि सूबेदार रामसिंह अपने आंगन में खड़े हो गए। हाथ में वही पुरानी लाठी, कंधे पर वही फौजी कंबल, और आंखों में वही चमक जो पचास साल पहले सीमा पर पहरा देते समय हुआ करती थी। गांव का नाम था — कुशालगढ़, राजस्थान की उस पट्टी में बसा एक छोटा-सा गांव, जहां रेत के टीलों के पीछे से हर सुबह सूरज कुछ इस तरह निकलता था मानो खुद तिरंगे का केसरिया रंग लेकर आया हो।आज छब्बीस जनवरी थी। गणतंत्र दिवस। गांव के प्राथमिक विद्यालय में हर साल की तरह झंडा फहराने की तैयारी थी, और इस बार यह जिम्मेदारी सूबेदार रामसिंह के पौत्र अर्जुन को सौंपी गई थी — कक्षा आठ का वह लड़का, जिसकी आंखों में सपने तो बहुत थे, पर देश के लिए कुछ करने का जज़्बा अभी जागा नहीं था।"दादाजी, मुझे समझ नहीं आता," अर्जुन ने चाय की भाप में उंगलियां सेंकते हुए कहा, "स्कूल में हर साल यही होता है — झंडा फहराओ, दो गाने गाओ, मिठाई बांटो, बस्ता उठाओ और घर आ जाओ। इसमें आन-बान-शान जैसी क्या बात है?"रामसिंह जी की मूंछों के नीचे एक हल्की मुस्कान तैर गई। उन्होंने लाठी आंगन की दीवार से टिकाई और पौत्र के पास बैठ गए। "बेटा, तुमने कभी सोचा है कि यह जो कपड़ा है, जो झंडा है, इसमें इतनी ताकत कहां से आई? यह सिर्फ रंग नहीं है — यह लाखों लोगों की सांसों से बुना गया है।"अर्जुन ने चाय का प्याला नीचे रख दिया। दादाजी जब इस तरह बोलना शुरू करते थे, तो पूरा घर सुनने बैठ जाता था।"सन उन्नीस सौ इकहत्तर की बात है," रामसिंह जी ने आंखें आधी बंद कर लीं, जैसे समय की परतें उधेड़ रहे हों, "मैं तब तुम्हारी उम्र से थोड़ा ही बड़ा था — बीस साल का जवान। लोंगेवाला की चौकी पर तैनात था। रेत ही रेत, दूर-दूर तक कुछ नहीं। दुश्मन की टैंकों की कतार रात के अंधेरे में हमारी तरफ बढ़ रही थी, और हम मुट्ठी भर सैनिक थे। पर जानते हो हमने हार क्यों नहीं मानी?"अर्जुन ने सिर हिलाया, नहीं जानता।"क्योंकि हमारी पीठ पीछे कोई खाली मैदान नहीं था — हमारी पीठ पीछे करोड़ों घर थे। हर घर में एक मां अपने बेटे की सलामती की दुआ मांग रही थी। हर आंगन में एक बूढ़ा बाप अपनी लाठी टेककर आकाश की ओर देख रहा था। हमने सोचा, अगर हम एक कदम पीछे हटे, तो वह एक कदम पूरे देश की इज़्ज़त पर आंच लाएगा। तो हमने पीछे हटना छोड़ दिया, डटे रहे। सुबह जब हवाई फौज ने मदद भेजी, तो दुश्मन का हर टैंक रेत में जल रहा था। उस दिन जब चौकी पर तिरंगा फिर लहराया, तो मेरी आंखों में आंसू थे — पर वे आंसू डर के नहीं, गर्व के थे।"रामसिंह जी की आवाज़ भारी हो गई थी। अर्जुन चुपचाप सुन रहा था, उसकी आंखों में अब वह सवाल नहीं था, बल्कि कुछ और उग आया था — जिज्ञासा से गहरी कोई चीज़।"पर दादाजी, वह तो लड़ाई की बात है। आज तो शांति है। आज के ज़माने में यह आन-बान-शान किस काम की?"रामसिंह जी उठे और घर के अंदर गए। कुछ देर बाद एक पुराना, धूल भरा बक्सा लेकर लौटे। उसमें से एक तमगा निकाला, फिर एक पुरानी तस्वीर, और आखिर में एक मुड़ा-तुड़ा खत।"यह खत मेरे साथी हवलदार गोपाल का है। कारगिल की लड़ाई में हम साथ थे। यह खत उसने अपने बेटे के लिए लिखा था, पर भेज नहीं पाया — वह लौटकर नहीं आया।" रामसिंह जी ने खत खोला और पढ़ना शुरू किया:"मेरे प्यारे बेटे, जब तुम यह पढ़ोगे, शायद मैं तुम्हारे पास नहीं होऊंगा। पर याद रखना, देश कोई नक्शे पर खींची लकीर नहीं है। देश वह मिट्टी है जिसमें तुम्हारी नाल गड़ी है, वह हवा है जो तुम्हें सांस देती है, वह भाषा है जिसमें तुम्हारी मां तुम्हें लोरी सुनाती है। जब भी तिरंगा देखो, समझ लेना कि उसमें केसरिया मेरे और मेरे जैसे लाखों साथियों के बलिदान का रंग है, सफेद हमारी उस नीयत का रंग है जो कभी मैली नहीं हुई, और हरा उस उम्मीद का रंग है जो हर आने वाली पीढ़ी में हम बोकर जाते हैं। बीच का चक्र हमेशा चलते रहने का, कभी न रुकने का संदेश है। इसे सलाम करना कोई रस्म नहीं, यह एक वादा है — कि तुम भी इस मिट्टी का कर्ज़ चुकाओगे, चाहे वर्दी पहनकर हो या न हो।"अर्जुन की आंखें नम हो गईं। उसने पहली बार महसूस किया कि झंडा सिर्फ कपड़ा नहीं, एक जीवित वादा है।"दादाजी, तो फिर हम इस वादे को कैसे निभाएं? हम तो फौज में नहीं जा रहे।"रामसिंह जी ने पौत्र के कंधे पर हाथ रखा। "बेटा, देश की सेवा सिर्फ सरहद पर बंदूक थामने से नहीं होती। जो डॉक्टर ईमानदारी से मरीज़ का इलाज करता है, जो शिक्षक बिना भेदभाव हर बच्चे को पढ़ाता है, जो किसान अन्न उगाकर करोड़ों पेट भरता है, जो सफाईकर्मी सुबह-सुबह गलियां साफ करता है — ये सब भी उतने ही बड़े सैनिक हैं। आन का अर्थ है अपनी बात पर अडिग रहना, बान का अर्थ है अपने कर्तव्य से न डिगना, और शान का अर्थ है इस मिट्टी के हर कण पर गर्व करना। यह वादा हर उस इंसान का है जो ईमानदारी से अपना काम करता है।"उस दिन विद्यालय के मैदान में जब अर्जुन झंडे की डोरी थामे खड़ा हुआ, तो उसके भीतर कुछ बदल चुका था। सामने सैकड़ों बच्चे कतार में खड़े थे, शिक्षक गण पीछे, और गांव के बुज़ुर्ग सूबेदार रामसिंह सबसे आगे, सीना ताने, सलामी की मुद्रा में।प्रधानाचार्य ने माइक पर कहा, "अब झंडा फहराया जाएगा। कृपया राष्ट्रगान के लिए खड़े हों।"अर्जुन ने डोरी खींची। धीरे-धीरे तिरंगा हवा में फैला, केसरिया, सफेद और हरा — तीनों रंग सुबह की सुनहरी धूप में जगमगा उठे। हवा का एक झोंका आया और झंडा पूरी शान से लहरा उठा, जैसे वह भी अपने सैनिकों को, अपने किसानों को, अपने शिक्षकों को, अपनी मांओं को नमन कर रहा हो।राष्ट्रगान गूंजने लगा। "जन गण मन अधिनायक जय हे..." हर स्वर के साथ अर्जुन की रीढ़ सीधी होती गई। उसने देखा, बगल में खड़ी उसकी दादी की आंखों में आंसू थे। दूर खड़े रामसिंह जी की सलामी में वही दृढ़ता थी जो पचास साल पहले लोंगेवाला की रेत में थी। और स्कूल के सबसे पीछे कतार में खड़ा वह छोटा बच्चा, जिसके पैरों में जूते तक नहीं थे, उसकी आंखों में भी वही चमक थी जो किसी सम्राट के मुकुट में भी शायद ही मिले।गीत समाप्त हुआ। तालियों की गूंज के बीच, प्रधानाचार्य ने अर्जुन को मंच पर बुलाया। "आज हमारे विद्यार्थी अर्जुन कुछ पंक्तियां सुनाना चाहते हैं," उन्होंने घोषणा की। यह अर्जुन के लिए भी आश्चर्य था — उसने रात में दादाजी की बातें सुनकर कुछ पंक्तियां लिख ली थीं, अनजाने में।उसने कांपते हाथों से कागज़ निकाला और पढ़ना शुरू किया:मेरा भारत, मेरी आन, बान, शान,हर सांस में बसा तेरा ही गान।रेत में जला दुश्मन का हर टैंक,पर मिट्टी का कण-कण रहा अडिग, निडर, निष्कलंक।तू केसरिया बलिदानों का,तू श्वेत निष्ठा के अरमानों का,तू हरा भविष्य के सपनों का,तू चक्र गति के, न रुकने के वादों का।मैं वर्दी न पहनूं भले,पर कर्तव्य न छोडूंगा कभी मैले,हर सुबह जब सूरज उगेगा,मेरा भारत मुझमें फिर जगेगा।तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा मैदान गूंज उठा। रामसिंह जी की आंखों से इस बार आंसू छिपे न रह सके। उन्होंने अपने पौत्र को गले लगाया और धीरे से कान में कहा, "आज तुमने भी सलामी दे दी, बेटा। इससे बड़ी कोई और सेवा नहीं।"शाम को जब सूरज ढल रहा था और तिरंगा फिर धीरे-धीरे उतारा जा रहा था, अर्जुन ने अपने दादाजी से पूछा, "दादाजी, क्या हर पीढ़ी को यह वादा नए सिरे से निभाना पड़ता है?"रामसिंह जी ने आसमान की ओर देखा, जहां पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे। "हां बेटा, यही तो हमारे देश की सबसे बड़ी ताकत है। हर पीढ़ी अपने-अपने ढंग से इस मिट्टी का कर्ज़ चुकाती है। तुम्हारी बारी अब शुरू हुई है। और जब तुम बूढ़े होकर अपने पोते को यह कहानी सुनाओगे, तब यह वादा फिर आगे बढ़ जाएगा — पीढ़ी दर पीढ़ी, सदियों तक, जब तक यह तिरंगा आसमान में लहराता रहेगा।"रात गहरी हो चुकी थी, पर कुशालगढ़ के आंगन में एक दीया अब भी जल रहा था — ठीक वैसे ही जैसे हर भारतीय के हृदय में देश के लिए एक दीया सदा जलता रहता है, न बुझने वाला, न कभी थकने वाला। वह दीया ही तो असली आन है, असली बान है, असली शान है — मेरे भारत की, हम सबके भारत की।★ ★ ★— विजय शर्मा 'एरी'