Vardaan - 11 in Hindi Mythological Stories by Renu Chaurasiya books and stories PDF | वरदान - 11

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वरदान - 11

वह दरबार में पहुँचा।इतने बड़े महल और भव्य दरबार को उसने पहले कभी नहीं देखा था।चारों ओर मंत्री, सेनापति और दरबारी खड़े थे।जैसे ही उसकी नज़र दरबार के बीच खड़े अपने मित्र पर पड़ी, उसका हृदय धक से रह गया।जौहरी का बेटा सैनिकों से घिरा हुआ था।उसके चेहरे पर भय साफ दिखाई दे रहा था।वह सिर झुकाए खड़ा था।उसे देखते ही वरदान सब कुछ समझ गया।उसे समझते देर न लगी कि उसके मित्र ने सत्य बता दिया है और मणियों का रहस्य अब दरबार तक पहुँच चुका है।लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि वरदान के चेहरे पर न भय था, न क्रोध।वह शांत भाव से अपने मित्र की ओर बढ़ा।जौहरी के बेटे ने जैसे ही वरदान को देखा, उसकी आँखों में आँसू भर आए।उसे लगा कि शायद वरदान उससे नाराज़ होगा।पर वरदान ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा।उस मुस्कान ने उसके मित्र के मन का सारा भय कुछ क्षणों के लिए दूर कर दिया।अब पूरे दरबार की निगाहें उस साधारण से दिखाई देने वाले चरवाहे बालक पर टिक गई थीं।राजा ने कुछ देर तक वरदान को ध्यान से देखा।फिर उन्होंने अपने पास रखी दोनों मणियाँ मंगवाईं।मणियों को देखकर वरदान ने तुरंत पहचान लिया कि ये वही मणियाँ हैं जो कभी उसके पास हुआ करती थीं।राजा ने मणियाँ उसकी ओर बढ़ाते हुए पूछा—"क्या तुमने इन्हें पहले कभी देखा है?"वरदान ने शांत स्वर में उत्तर दिया—"हाँ महाराज, ये मणियाँ मेरी ही हैं।"दरबार में हलचल मच गई।राजा ने फिर पूछा—"क्या तुम ऐसी और मणियाँ ला सकते हो?"वरदान ने बिना घबराए मणियों की ओर देखा।फिर राजा की ओर देखकर बोला—"महाराज, क्या आपको ऐसी ही मणियाँ चाहिए?""हाँ," राजा ने उत्तर दिया, "क्या तुम ऐसी और मणियाँ ला सकते हो?"अब पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया।वरदान ने बिना किसी भय के राजा की आँखों में देखा।फिर शांत स्वर में बोला—"मैं ला सकता हूँ, महाराज।"यह सुनते ही पूरे दरबार में फुसफुसाहट होने लगी।राजा की आँखों में आश्चर्य चमक उठा।तभी वरदान ने आगे कहा—"पर पहले आप मुझे यह बताइए कि आपको ये मणियाँ क्यों चाहिए?"दरबार एकदम शांत हो गया।किसी ने भी कल्पना नहीं की थी कि एक साधारण चरवाहा बालक राजा से ऐसा प्रश्न पूछेगा।राजा कुछ क्षण तक वरदान को देखते रहे।फिर बोले—"मैं इन मणियों से अपनी पुत्री के लिए आभूषण बनवाना चाहता हूँ।"वरदान ने शांत भाव से राजा की ओर देखा।फिर बोला—"ठीक है महाराज, मैं आपके लिए एक सौ एक ही नहीं, एक लाख मणियाँ भी ला सकता हूँ।"यह सुनते ही पूरा दरबार आश्चर्य से भर उठा।मंत्री, सेनापति और दरबारी एक-दूसरे का मुँह देखने लगे।वरदान ने आगे कहा—"तब आप अपनी राजकुमारी के लिए एक नहीं, अनेक आभूषण बनवा सकेंगे।"फिर उसने कुछ क्षण रुककर राजा की ओर देखा और बोला—"पर महाराज, बदले में मुझे क्या मिलेगा?"दरबार में सन्नाटा छा गया।किसी ने भी नहीं सोचा था कि एक साधारण ग्वाला बालक राजा से ऐसा प्रश्न पूछेगा।पर वरदान के चेहरे पर न लालच था, न भय।वह केवल अपना उत्तर जानना चाहता था।अब पूरे दरबार की निगाहें राजा पर टिक गईं।राजा ने कुछ देर तक वरदान को ध्यान से देखा।उसकी आँखों में न डर था, न लालच, न घमंड।एक साधारण ग्वाले के वेश में खड़ा वह बालक पूरे आत्मविश्वास के साथ उनसे बात कर रहा था।राजा कुछ क्षण मौन रहे।फिर बोले—"तुम जो कुछ भी माँगोगे, हम तुम्हें देंगे।""धन, भूमि, सोना, चाँदी, पशु, वस्त्र... जो चाहो माँग लो।"पूरा दरबार शांत हो गया।सबकी निगाहें अब वरदान पर थीं।राजा ने फिर कहा—"यदि तुम सचमुच ऐसी मणियाँ ला सकते हो, तो तुम्हें तुम्हारे मन का पुरस्कार दिया जाएगा।""महाराज, मुझे दो चीज़ें चाहिए।"राजा ने कहा—"निःसंकोच होकर कहो।"वरदान ने अपने मित्र की ओर देखा, जो अब भी सैनिकों से घिरा खड़ा था।फिर बोला—"पहली बात, मेरे मित्र और उसके पिता को तुरंत रिहा किया जाए।""इनकी कोई गलती नहीं है। जो हुआ, वह हो चुका। मैं इनके विरुद्ध कोई शिकायत नहीं रखता।"यह सुनकर जौहरी का बेटा आश्चर्य से वरदान को देखने लगा।राजा ध्यान से उसकी बात सुनते रहे।वरदान ने आगे कहा—"और दूसरी बात...""मेरी माँ का छह महीने तक पूरा ध्यान रखा जाए।""उन्हें राशन, पानी, वस्त्र और आवश्यकता की हर वस्तु दी जाए। उन्हें किसी प्रकार का कष्ट न हो।"फिर उसने शांत स्वर में कहा—"और मुझे छह महीने का समय दिया जाए।"पूरा दरबार स्तब्ध था।जिस बालक के सामने धन, सोना और वैभव पाने का अवसर था, उसने अपने लिए कुछ नहीं माँगा।उसने अपने मित्र, उसकी पिता और अपनी माँ के बारे में सोचा।राजा कुछ देर तक उसे देखते रहे।राजा ने तुरंत आदेश दिया—"वरदान ने जो कुछ माँगा है, उसकी प्रत्येक बात पूरी की जाए। उसकी माता के घर छह महीने तक राशन, पानी और आवश्यकता की सभी वस्तुएँ नियमित रूप से पहुँचाई जाएँ। और जौहरी तथा उसके पुत्र को तुरंत रिहा कर दिया जाए।"राजा का आदेश मिलते ही सैनिकों ने उसे स्वीकार किया।इसके बाद वरदान ने राजा से आज्ञा ली और अपने मित्र के पास गया।उसने आगे बढ़कर अपने मित्र को गले लगा लिया।दोनों की आँखें नम थीं।फिर वरदान जौहरी के पास गया और झुककर उन्हें सम्मानपूर्वक प्रणाम किया।जौहरी यह देखकर स्तब्ध रह गया।जिस बालक के साथ उसने छल किया था, वही बालक आज उसके सामने सम्मान और विनम्रता के साथ खड़ा था।उसकी आँखें पश्चाताप से भर आईं।वह मन ही मन अपनी मूर्खता पर पछताने लगा।उसे समझ आ गया कि उसने लालच में आकर कितनी बड़ी भूल की थी।जिस असाधारण और उदार हृदय वाले बालक से उसके बेटे की सच्ची मित्रता हुई थी, उसी मित्रता को उसने अपने स्वार्थ के कारण टूटने की कगार पर पहुँचा दिया था।वरदान घर लौटा तो उसकी माँ झोपड़ी के बाहर उसकी प्रतीक्षा कर रही थी।जैसे ही उसने अपने बेटे को सकुशल देखा, उसकी आँखों में खुशी के आँसू भर आए।वरदान मुस्कुराते हुए अपनी माँ के पास गया और बोला—"माँ, आज मुझे दरबार में काम मिल गया है।"छोटी रानी ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।वरदान आगे बोला—"अब मुझे पूरे छह महीने के लिए बाहर जाना होगा। इसलिए आप मेरी चिंता मत करना।""महाराज ने आपके रहने, खाने-पीने और आपकी हर आवश्यकता का प्रबंध कर दिया है। छह महीने तक आपको किसी बात की चिंता करने की आवश्यकता नहीं होगी।"छोटी रानी ने बेटे का चेहरा अपने दोनों हाथों में लिया।उसके मन में गर्व भी था और बिछड़ने का दुःख भी।वह बोली—"बेटा, जहाँ भी रहना, सत्य और धर्म का साथ कभी मत छोड़ना। यही तुम्हारी सबसे बड़ी शक्ति है।"वरदान ने मुस्कुराकर अपनी माँ के चरण स्पर्श किए।"आप आशीर्वाद दीजिए माँ। मैं अपना कार्य पूरा करके अवश्य लौटूँगा।"माँ के चरण स्पर्श करके वरदान ने उनका आशीर्वाद लिया।उसने एक बार अपनी छोटी-सी झोपड़ी की ओर देखा, फिर अपनी बाँसुरी उठाई और अपनी छोटी-सी चादर कंधे पर रख ली।इसके बाद वह बिना पीछे मुड़े अपनी मंज़िल की ओर चल पड़ा।वह चलता रहा…चलता रहा…और आगे बढ़ता रहा।उसके पास न धन था, न कोई सेना, न कोई सेवक।उसके साथ केवल उसकी बाँसुरी थी, जिसकी मधुर धुन जंगलों तक को मोहित कर देती थी, और एक छोटी-सी चादर, जो उसकी एकमात्र साथी थी।उसके हृदय में अपनी माँ का आशीर्वाद था और मन में अपने वचन को पूरा करने का दृढ़ संकल्प।वरदान चलता रहा…दिन निकलते, शाम ढलती और फिर रात हो जाती।जहाँ कहीं उसे आश्रय मिल जाता, वहीं वह अपनी छोटी-सी चादर बिछाकर विश्राम कर लेता।कभी किसी विशाल वृक्ष की छाया उसके लिए घर बन जाती, तो कभी किसी गुफा का कोना उसकी रात का सहारा बनता।जब उसे भूख लगती, तो वह जंगल के फल खाकर अपना पेट भर लेता।कभी-कभी वह अपने कौशल से छोटा-मोटा शिकार भी कर लेता और जंगल की अग्नि पर उसे पकाकर खा लेता।यही उसका भोजन था, यही उसकी यात्रा का सहारा।कठिनाइयों से भरी उस यात्रा में न उसके होंठों पर कोई शिकायत थी, न मन में कोई भय।अपने वचन को निभाने का संकल्प लिए वह निरंतर अपनी मंज़िल की ओर बढ़ता चला जा रहा था।एक दिन वरदान घने जंगल से होकर जा रहा था।अचानक आकाश में काले बादल छा गए। देखते ही देखते तेज़ आँधी चलने लगी और मूसलाधार वर्षा शुरू हो गई।बारिश इतनी तेज़ थी कि कुछ ही क्षणों में वरदान पूरी तरह भीग गया।अपने बचाव के लिए वह इधर-उधर आश्रय खोजने लगा।तभी उसकी नज़र पहाड़ की चट्टानों के बीच बनी एक गुफा पर पड़ी।वह दौड़कर गुफा के द्वार तक पहुँचा।बारिश रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी।मजबूर होकर वरदान गुफा के भीतर चला गया।गुफा के अंदर गहरा सन्नाटा था। चारों ओर अँधेरा फैला हुआ था।लेकिन उसी अँधेरे के बीच कहीं दूर से हल्की-सी सुनहरी रोशनी दिखाई दे रही थी।वरदान कुछ पल वहीं खड़ा उस रहस्यमयी प्रकाश को देखता रहा।उसके मन में जिज्ञासा जाग उठी।वह सावधानी से एक-एक कदम बढ़ाता हुआ उस रोशनी की ओर चल पड़ा।जैसे-जैसे वह आगे बढ़ता गया, वह प्रकाश और भी स्पष्ट होता गया…वरदान धीरे-धीरे उस रोशनी के पास पहुँचा।उसने देखा कि एक विशाल चट्टान के बीचों-बीच एक दिव्य तलवार गड़ी हुई थी।तलवार की मूठ पर जड़ा हुआ एक बड़ा हीरा अपनी अद्भुत आभा से पूरी गुफा को प्रकाशित कर रहा था। उसी हीरे की चमक दूर से दिखाई दे रही थी।कुछ क्षणों के लिए वरदान उस अद्भुत दृश्य को निहारता रह गया।उसने सोचा, "यही तो वह रोशनी है जिसे मैं बाहर से देख रहा था।"वह तलवार को देखने के लिए धीरे-धीरे आगे बढ़ा और उसे छूने के लिए अपना हाथ बढ़ाने ही वाला था कि अचानक उसकी नज़र तलवार के पास गई।तलवार की रक्षा दो विशाल विषैले साँप कर रहे थे।दोनों फन फैलाए तलवार के चारों ओर कुंडली मारे बैठे थे। उनकी आँखें अंगारों की तरह चमक रही थीं और उनकी फुफकार से पूरी गुफा गूँज रही थी।यह देखकर वरदान तुरंत रुक गया।वह कुछ देर तक वहीं खड़ा उन दोनों साँपों को ध्यान से देखता रहा।उसने कोई जल्दबाज़ी नहीं की।वह समझ गया कि यह कोई साधारण तलवार नहीं है… और उसकी रक्षा करने वाले भी साधारण जीव नहीं हैं।कुछ देर तक वरदान शांत खड़ा रहा।फिर उसने धीरे से अपनी बाँसुरी निकाली।उसने आँखें बंद कीं और एक शांत, मधुर धुन बजानी शुरू कर दी।बाँसुरी की धुन गुफा में गूँजने लगी।वह स्वर इतना कोमल, इतना मधुर और इतना सम्मोहक था कि मानो स्वयं प्रकृति भी उसे सुनने के लिए ठहर गई हो।धीरे-धीरे दोनों विषैले साँपों का क्रोध शांत होने लगा।उनकी फुफकार बंद हो गई।फन झुकने लगे और वे मंत्रमुग्ध होकर उसी धुन को सुनने लगे।यह कोई साधारण बाँसुरी नहीं थी।यह वही दिव्य बाँसुरी थी, जिसे वर्षों पहले उस देवता ने राजा को वरदान स्वरूप दी थी।उस बाँसुरी में अद्भुत शक्ति थी।उसकी धुन सुनकर केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षी और वन के हिंसक जीव भी शांत हो जाते थे।अब वही दिव्य धुन गुफा के वातावरण को भी शांत कर रही थी।वरदान धैर्यपूर्वक बाँसुरी बजाता रहा, और दोनों विषैले साँप बिना कोई आक्रमण किए उसकी मधुर तान में पूरी तरह खो गए।धीरे-धीरे दोनों विषैले साँप बाँसुरी की मधुर धुन में इतने खो गए कि उन्हें अपने चारों ओर की कोई सुध-बुध ही न रही।उनकी फुफकार शांत हो चुकी थी। फन झुक गए थे और उनकी आँखों में अब क्रोध नहीं, बल्कि गहरा सम्मोहन था।यह अवसर देखकर वरदान ने बाँसुरी बजाना बंद नहीं किया।वह उसी मधुर धुन को बजाते हुए बहुत सावधानी से तलवार की ओर बढ़ने लगा।उसका हर कदम हल्का, नपा-तुला और अत्यंत सावधान था।उसे अच्छी तरह पता था कि यदि उससे ज़रा-सी भी आहट हुई या उसने कोई जल्दबाज़ी की, तो उसकी बाँसुरी का रचा हुआ सम्मोहन टूट जाएगा।तब वे दोनों विषैले साँप फिर से जाग उठेंगे और उस पर टूट पड़ेंगे।इसीलिए वह बिना किसी घबराहट के, धैर्य और संयम के साथ एक-एक कदम आगे बढ़ाता रहा।अब वह तलवार के बिल्कुल सामने खड़ा था...और बाँसुरी की मधुर तान अब भी पूरी गुफा में गूँज रही थी।वरदान ने बाँसुरी की मधुर धुन बजाते हुए धीरे-धीरे अपना हाथ आगे बढ़ाया और तलवार की मूठ को दृढ़ता से पकड़ लिया।अगले ही क्षण पूरी गुफा भयंकर गर्जना से गूँज उठी।ऐसा प्रतीत हुआ मानो कोई अद्भुत दिव्य शक्ति उसके चारों ओर एक विशाल घेरा बना रही हो।तलवार की मूठ में जड़ा हीरा प्रचंड प्रकाश से चमक उठा।उसी क्षण उसमें से एक सुनहरी प्रकाश-किरण निकली और सीधी आकर वरदान की छाती में समा गई।जैसे ही वह दिव्य शक्ति उसके भीतर प्रवेश कर गई, उसका रोम-रोम अलौकिक ऊर्जा से भर उठा।उसका पूरा शरीर तेजस्वी हो उठा।उसकी गहरी काली आँखें धीरे-धीरे सुनहरे रंग की हो गईं।उसका दुबला-पतला शरीर पल भर में एक बलिष्ठ, तेजस्वी और आकर्षक किशोर राजकुमार के समान दिखाई देने लगा।उसके चारों ओर नीली और सुनहरी आभा का एक दिव्य घेरा बन गया।अचानक उसका शरीर स्वयं ही धरती से कुछ फुट ऊपर उठ गया।उसके वस्त्र और बाल उस दिव्य ऊर्जा के प्रवाह में लहराने लगे।पूरी गुफा उस अद्भुत प्रकाश से जगमगा उठी।ऐसा लग रहा था मानो वर्षों से सुप्त पड़ी कोई महान शक्ति अपने वास्तविक स्वामी को पहचान चुकी हो…।उधर दोनों विषैले साँपों का व्यवहार भी पूरी तरह बदल चुका था।जो कुछ क्षण पहले तक फन फैलाकर उस दिव्य तलवार की रक्षा कर रहे थे, अब वे पूरी तरह शांत थे।दोनों साँप धीरे-धीरे वरदान के समीप आए।उन्होंने अपने फन झुका दिए और आज्ञाकारी सेवकों की भाँति उसके सामने सिर झुकाकर खड़े हो गए।उनकी आँखों से क्रोध पूरी तरह समाप्त हो चुका था।उनका पहले वाला उग्र स्वभाव मानो उसी क्षण विलीन हो गया था।अब वे अपने नए स्वामी के सामने विनम्र और शांत भाव से खड़े थे।ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वे वर्षों से उसी क्षण की प्रतीक्षा कर रहे हों, जब कोई योग्य व्यक्ति उस दिव्य तलवार को धारण करेगा।