From Addictio To Life - 1 in Hindi Drama by Tarun Mandavi books and stories PDF | नशे से जिंदगी तक - एपिसोड 1

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नशे से जिंदगी तक - एपिसोड 1

क्या कोई इंसान जानबूझकर अपने हंसते-खेलते जीवन को आग लगा सकता है? शायद नहीं। लेकिन जब वक्त का पहिया उल्टा घूमता है, तो इंसान खुद अपने हाथों से अपनी तबाही का रास्ता चुन लेता है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। मेरा नाम सुरेन्द्र है। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मुझे खुद पर यकीन नहीं होता कि मैं वही सुरेन्द्र हूँ जो कभी अपने माता-पिता की आँखों का तारा हुआ करता था। मैं एक सीधे-साधे मध्यमवर्गीय परिवार से आता हूँ। घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी, माता-पिता सरकारी नौकरी में थे और मुझे दुनिया की हर खुशी देना चाहते थे। मैं उनका इकलौता बेटा था, इसलिए लाड़-प्यार कुछ ज़्यादा ही था। कॉलेज के शुरुआती दिनों तक मैं अपनी पढ़ाई में अव्वल था, लेकिन कहते हैं ना कि 'संगत' इंसान का भविष्य तय करती है। मेरी किस्मत तब बदली जब कॉलेज में मेरी दोस्ती कुछ ऐसे लड़कों से हुई जिनके लिए 'नशा' सिर्फ एक शौक नहीं, बल्कि खुद को कूल दिखाने का जरिया था। मुझे आज भी याद है वह पहली शाम। कॉलेज के पास के एक सुनसान ढाबे पर हम सब बैठे थे। टेबल पर बियर की बोतलें सजी थीं। मेरे दोस्त रोहन ने एक ग्लास मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा, "ले भाई, पी कर देख! मर्द है तो डर मत, एक घूंट से कुछ नहीं होता।" शुरुआत में मैंने बहुत मना किया। मेरी परवरिश ने मुझे रोका, मेरी माँ का मुस्कुराता चेहरा मेरी आँखों के सामने आया। लेकिन दोस्तों के तानों और "तू तो डरपोक है" जैसी बातों ने मेरे आत्मसम्मान को चोट पहुँचाई। मैंने कांपते हाथों से वह ग्लास उठाया और एक ही सांस में खाली कर दिया। वह बियर का पहला कड़वा घूंट दरअसल मेरी ज़िंदगी की मिठास को हमेशा के लिए खत्म करने का पहला कदम था। धीरे-धीरे यह शौक मेरी आदत बन गया। पहले जो बियर हफ़्ते में एक बार होती थी, वह अब रोज़ की कहानी बन चुकी थी। नशा चढ़ते ही मेरे अंदर का डर गायब हो जाता और मुझे लगता कि मैं दुनिया का सबसे ताकतवर इंसान हूँ। लेकिन जब सुबह होश आता, तो अंदर ही अंदर एक खौफनाक पछतावा मुझे खाने लगता। मैं खुद से वादा करता कि आज के बाद हाथ नहीं लगाऊँगा, लेकिन शाम होते ही मेरे कदम खुद-ब-खुद ठेके की तरफ बढ़ जाते। बर्बादी तब और बढ़ गई जब बियर से मेरा मन भर गया। एक दिन दोस्तों ने कहा कि असली मज़ा तो व्हिस्की में है। जब मैंने पहली बार व्हिस्की का कड़ा घूंट अंदर लिया, तो ऐसा लगा जैसे मेरे दिमाग की नसें सुन्न हो गई हों। वह नशा इतना गहरा था कि मैं पूरी तरह उसका गुलाम बन गया। अब हालत यह थी कि सुबह उठते ही मुझे सबसे पहले शराब की जरूरत होती थी। घर में हर बात पर झगड़े होने लगे। माता-पिता मेरी लाल आँखें और लड़खड़ाती ज़ुबान देखकर रोने लगे थे। एक रात, मैं बुरी तरह धुत्त होकर घर पहुँचा। पापा ने मुझे डांटने के लिए हाथ उठाया, तो नशे के अंधेरे में मैंने उनका हाथ झटक दिया और उन्हें धक्का दे दिया। पापा फर्श पर गिर पड़े और माँ चीख उठी। अगली सुबह जब मेरी आँख खुली, तो देखा कि पापा की अलमारी खुली हुई थी और माँ ज़मीन पर बैठकर रो रही थी। पापा घर पर नहीं थे। टेबल पर एक चिट्ठी रखी थी, जिस पर पापा के हाथों से कुछ ऐसा लिखा था जिसे पढ़कर मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई और मेरे हाथों से शराब की जो बोतल थी, वह छूटकर फर्श पर चकनाचूर हो गई...