Dream House in Hindi Fiction Stories by swati books and stories PDF | Dream House

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Dream House

रीतिका आज बहुत खुश है क्योंकि उसका सपना जो पूरा हो गया। उसने बचपन से ही एक सपना देखा था कि उसका अपना घर हो, जिसके बाहर नेमप्लेट पर उसका नाम "डॉ. रीतिका" लिखा हुआ हो। आज उसने अपने सपनों को जब हकीकत में साकार होते देखा, तो उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। आज वह शायद दुनिया में सबसे ज्यादा खुश थी। वह घर था तो छोटा, पर उसके लिए उससे ज्यादा सुन्दर घर कोई भी नहीं हो सकता था। दो रूम, एक किचन, बाथरूम और उसका एक और सपना—जो था वॉक-इन क्लोजेट। आज वह अपने सारे सपनों को जैसे आँखों के सामने पूरा होते हुए देख रही थी कि पीछे से आवाज़ आई, "जल्दी-जल्दी सामान को सेट करो, याद है न कल से वापस कॉलेज जाना है? छुट्टियाँ खत्म हो गई हैं।" यह आवाज़ और किसी की नहीं, बल्कि रीतिका की मम्मी की थी।
​रीतिका, जो पिछले एक साल से दिल्ली यूनिवर्सिटी में हिंदी पढ़ा रही है, अपने नए घर का काम खत्म करवाने और सामान कों अपने नए घर में रखवाने के लिए उसने छुट्टियाँ ली थीं, जिसका आज आखिरी दिन था। यह याद आते ही वह वापस अपने काम में लग जाती है और साथ में उसकी मम्मी और बहन (रिया) भी उसकी मदद करवाने लगती हैं। 

रात के 10 बज चुके थे, तभी आर्यन (रीतिका छोटा भाई) और पापा आते हैं। उनके हाथ में खाना है, जो अभी-अभी वे बाहर से लेकर आए हैं। खाने को देखते ही रिया यह देखने के लिए भागती है कि आखिर खाने में क्या-क्या लाया गया है। इसे देखकर लगता है कि पापा सही ही कहते हैं कि, "लोग जीने के लिए खाते हैं, और यह खाने के लिए जीती है।" 
मम्मी और रिया खाना निकालने चली जाती हैं और रीतिका अपना वॉक-इन क्लोजेट सँभालने में लग जाती है। वह बड़े प्यार से अपने एक-एक कपड़े, पर्स, मेकअप, ज्वेलरी-पेंडेंट्स और सैंडल्स से लेकर जूतों तक को बड़े करीने से सजाकर रख रही होती है। रखें भी क्यों ना? आखिर इतनी मेहनत की थीं उसने ये सब कमाने में। वो रख ही रही होती है की एक आवाज़ आती है ​"खाना निकल चुका है, आ जाओ!" उसकी बहन ही यह बात चिल्लाकर बताती है। रीतिका उठकर जाती है और अपने परिवार के साथ बैठकर खाना खाने लगती है। तभी उसके पापा बोलते हैं कि, "हम खाना खाकर वापस घर चले जाएँगे।" फिर वह बोलती है कि, "आज यहीं रुक जाएँ," पर अगले दिन उन्हें भी काम पर जाना होता है और  आर्यन का भी कॉलेज है , यह बोलकर वे कहते हैं कि आज ही जाना होगा। शालीमार बाग से रोहिणी तक जाना इतना दूर भी नहीं है और फिर गाड़ी भी अपनी है तो चिंता की कोई बात नहीं है यह सोच कर वो हाँ कर देती है। सब लोग खाने के बाद चले जाते है, और रीतिका अपने घर में अकेले रह जाती है।

रीतिका भी थक चुकी थीं लेकिन फिर भी वो ख़ुश थीं की आज वो अपने घर में सोएगी। अपने कपड़े बदलकर वो सोने चली जाती है, पर नींद कहाँ से आएं ख़ुशी जो इतनी है। अपने घर, भविष्य कों सोचते-सोचते वो कब सो जाती है उसको पता ही नहीं चलता।

(अब कल से उसका कॉलेज वापस शुरू हो रहा है तो देखना तो बनता है की आखिर क्या होगा उसके साथ?)