पिछले भाग में आपने पढ़ा...
अर्जुनपुर शहर के वीरान शिव विहार पार्क में एक युवती रिया मल्होत्रा की रहस्यमय हत्या होती है। उसके शव के पास खून से बना एक अजीब प्रतीक मिलता है—आधा लाल वृत्त और उसके बीच से गुजरती एक सीधी लाल रेखा।
एसीपी काव्या सिंह और फोरेंसिक विशेषज्ञ डॉ. निखिल वर्मा जाँच शुरू करते हैं, लेकिन घटनास्थल से कोई स्पष्ट सुराग नहीं मिलता। तभी पुलिस मुख्यालय में खुलासा होता है कि यही लाल निशान तीन वर्ष पुराने एक बंद हो चुके हत्या के मामले में भी मिला था।
कमिश्नर राजीव खन्ना एक पुरानी फाइल निकालते हैं, जिस पर सिर्फ एक नाम लिखा होता है—
डिटेक्टिव आर्यन राठौर।
उसी समय शहर से तीन सौ किलोमीटर दूर, एक पहाड़ी कस्बे में बैठा आर्यन वही लाल निशान देखकर धीमे स्वर में कहता है—
"तो... तुम वापस आ गए।"
अब आगे...
उसने तस्वीर उठाई...
और बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
"तो... तुम वापस आ गए।"
कमरे में फिर से सन्नाटा छा गया।
सिर्फ़ दीवार पर टंगी पुरानी घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी।
आर्यन राठौर की निगाहें अब भी उस तस्वीर पर जमी थीं। तस्वीर में कुछ भी असामान्य नहीं था—सिवाय उस खून से बने चिन्ह के।
आधा लाल वृत्त... और उसके बीच से गुजरती एक सीधी लाल रेखा।
लेकिन आर्यन के लिए यह सिर्फ़ एक निशान नहीं था।
यह एक अधूरा वादा था...
एक ऐसा ज़ख्म, जो पंद्रह वर्षों में भी नहीं भरा था।
उसने धीरे-धीरे तस्वीर मेज़ पर रखी और कुर्सी की पीठ से टिक गया।
बारिश की पहली बूँद खिड़की के शीशे से टकराई।
फिर दूसरी...
कुछ ही क्षणों में पूरी पहाड़ी घाटी बारिश की आवाज़ से भर गई।
आर्यन ने खिड़की के बाहर देखा।
धुंध पहाड़ों को निगल चुकी थी।
उसे बारिश कभी पसंद नहीं थी।
क्योंकि...
उसकी ज़िंदगी का सबसे भयानक केस भी ऐसी ही एक बरसाती रात में शुरू हुआ था।
...
"साहब..."
पीछे से धीमी आवाज़ आई।
"चाय रख दूँ?"
आर्यन ने बिना मुड़े कहा—
"रख दीजिए, गणेश काका।"
करीब साठ वर्ष के गणेश काका ट्रे मेज़ पर रखकर चुपचाप तस्वीर को देखने लगे।
उनके चेहरे का रंग बदल गया।
"यह..."
उनके होंठ काँप उठे।
"फिर से...?"
आर्यन ने पहली बार उनकी ओर देखा।
"हाँ।"
कमरे में कुछ पल तक कोई कुछ नहीं बोला।
गणेश काका धीरे से कुर्सी पर बैठ गए।
"मैंने सोचा था... वह कहानी यहीं खत्म हो गई थी।"
आर्यन हल्का-सा मुस्कराया।
"कुछ कहानियाँ खत्म नहीं होतीं, काका..."
"वे सिर्फ़ इंतज़ार करती हैं।"
गणेश काका की नज़र तस्वीर से हट ही नहीं रही थी।
"क्या वही आदमी है?"
आर्यन ने तुरंत उत्तर नहीं दिया।
उसने तस्वीर को दोबारा उठाया।
उसकी उँगलियाँ उस लाल निशान पर रुक गईं।
"अगर वही होता..."
वह धीमे स्वर में बोला—
"तो यह निशान बिल्कुल वैसा नहीं बनाता।"
गणेश काका ने हैरानी से पूछा—
"क्या मतलब?"
आर्यन ने तस्वीर उनकी ओर बढ़ा दी।
"ध्यान से देखिए।"
गणेश काका ने चश्मा लगाया।
"मुझे तो सब एक जैसा लग रहा है।"
"नहीं।"
आर्यन की आवाज़ बिल्कुल शांत थी।
"लोग निशान देखते हैं...
मैं उसे बनाने वाले का हाथ देखता हूँ।"
उन्होंने तस्वीर मेज़ पर रखी।
"आधा वृत्त पूरा करने में जिस तरह का दबाव डाला गया है...
वह पहले वाले मामलों से अलग है।"
गणेश काका समझ नहीं पाए।
आर्यन ने एक कागज़ लिया।
लाल पेन उठाया।
एक बार वही निशान बनाया।
फिर दूसरी बार।
दोनों देखने में लगभग एक जैसे थे।
लेकिन उसने पेन की नोक पर उँगली रखकर कहा—
"पहली बार मैंने जल्दी में बनाया।
दूसरी बार...
बहुत सोचकर।"
गणेश काका अब भी उलझे हुए थे।
आर्यन ने समझाया—
"हर इंसान का हाथ लिखते समय एक अलग दबाव डालता है।
जैसे हस्ताक्षर अलग होते हैं...
वैसे ही चित्र भी।"
उसने तस्वीर की ओर इशारा किया।
"यह निशान उसी आदमी ने नहीं बनाया...
जिसने पंद्रह साल पहले बनाया था।"
गणेश काका की आँखें फैल गईं।
"मतलब..."
"या तो वह मर चुका है...
या..."
आर्यन कुछ क्षण रुका।
"...किसी ने उससे यह निशान सीखा है।"
कमरे की हवा अचानक और भारी लगने लगी।
इतने में मोबाइल की घंटी बजी।
स्क्रीन पर नाम चमका—
कमिश्नर राजीव खन्ना।
आर्यन ने कॉल उठाई।
"तुम्हें तस्वीर मिल गई?"
"मिल गई।"
"क्या सोचते हो?"
आर्यन ने बिना देर किए कहा—
"तुम लोगों ने अपराध-स्थल सील कर दिया?"
"हाँ।"
"किस समय?"
"रात दो बजकर उनचास मिनट।"
"उसके बाद वहाँ कौन-कौन गया?"
दूसरी तरफ़ कुछ क्षण की चुप्पी रही।
"फोरेंसिक टीम...
एसीपी काव्या...
डॉ. निखिल...
और मैं।"
आर्यन ने धीरे से कहा—
"सूची अधूरी है।"
कमिश्नर चौंक गए।
"तुम वहाँ आए भी नहीं...
फिर कैसे—?"
"क्योंकि अगर तस्वीर असली है...
तो अपराध-स्थल पर एक पाँचवाँ आदमी भी गया था।"
फोन के दूसरी ओर फिर सन्नाटा छा गया।
कमिश्नर की आवाज़ अब पहले जैसी नहीं रही थी।
"तुम्हें इतना यकीन कैसे है?"
आर्यन ने तस्वीर फिर से उठाई।
"क्योंकि जिसने यह निशान बनाया...
उसने शव रखने के बाद इसे दोबारा छुआ है।"
"क्या?"
"देखो राजीव..."
आर्यन की आवाज़ और धीमी हो गई।
"यह आदमी हत्या करने नहीं आया था...
यह संदेश देने आया था।"
कमिश्नर ने गहरी साँस ली।
"तुम कब तक पहुँच रहे हो?"
आर्यन ने खिड़की से बाहर देखा।
बारिश अब तेज़ हो चुकी थी।
पहाड़ धुंध में गुम थे।
"तीन घंटे।"
"मैं इंतज़ार करूँगा।"
फोन कट गया।
आर्यन कुछ क्षण वहीं खड़ा रहा।
फिर उसने अलमारी खोली।
अंदर धूल जमी कई पुरानी फ़ाइलें रखी थीं।
सबसे नीचे एक काले रंग का धातु का बक्सा था।
उसने उसे बाहर निकाला।
ताला खोला।
अंदर सिर्फ़ तीन चीज़ें थीं—
एक पुराना पुलिस बैज...
एक टूटी हुई चाँदी की चेन...
और एक मोटी फ़ाइल, जिस पर लाल अक्षरों में लिखा था—
"फ़ाइल–27 : गोपनीय"
आर्यन ने फ़ाइल खोली।
पहले ही पन्ने पर वही चिन्ह बना था—
आधा लाल वृत्त... और उसके बीच से गुजरती एक सीधी लाल रेखा।
लेकिन इस बार...
उस चिन्ह के नीचे किसी ने हाथ से सिर्फ़ एक वाक्य लिखा था—
"जब यह निशान फिर दिखाई दे... समझ लेना कि खेल दोबारा शुरू हो चुका है।"
आर्यन का चेहरा एक पल में सख्त हो गया।
वह लिखावट वह कहीं भी पहचान सकता था।
यह नोट उसी व्यक्ति ने लिखा था...
जिसे पंद्रह वर्ष पहले पूरी दुनिया ने मृत मान लिया था।
क्रमशः