“आठवें आयोग की आठ कलाएं” (व्यंग्य)
हिंदी बेल्ट में आठवें नम्बर को जीवन में बहुत बड़ा महत्व दिया जाता है। मसलन कुछ उच्च पदों पर आसीन लोगों का कुछ लोग नवीं फेल कहकर मजाक उड़ाते रहते हैं जो कि ठीक बात नहीं है। वह लोग आठवीं पास भी तो हैं। यह क्या मामूली बात है? आठ नम्बर हमारे यहाँ एक महत्वपूर्ण एवं निर्णायक नंबर माना जाता है। महाभारत में गंगापुत्र भीष्म भी अपने पिता की आठवीं संतान थे। उनके बाकी सात भाई तो जीवित ना रह सके मगर उन्हे इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त हुआ था। इसी तरह भगवान श्रीकृष्ण भी अपने माता -पिता की आठवीं संतान थे। वह भी सकुशल एवं निर्बाध रहे जबकि उनके अन्य भाई जी नहीं सके। आठ की महिमा अपरंपार है। पर आजकल तो आठवें वेतन आयोग की चर्चा जोरों पर है। जहाँ छठवें वेतन आयोग के भारी भरकम एरियर ने लोगों की ज़िन्दगी बदल दी थी। उस दौर में एरियर के बदौलत सरकारी कर्मियों ने कारें, प्लाट और मकान इतने खरीदे कि जीडीपी में उछाल आ गया था।लोग सातवें वेतन आयोग से ही ऐसे उम्मीद लगाए बैठे थे मगर छठवें से अलहदा सातवें वेतन आयोग को सरकार ने समय से लागू कर दिया तो लोगों को ज्यादा एरियर नहीं मिल सका। सो अब लोगों की उम्मीदें आठवें वेतन आयोग पर टिकी हैं। देश में क्रिकेट के बाद सबसे ज्यादा चर्चित विषय फिटमेंट फैक्टर है। हर बंदा अपनी -अपनी कैल कुलेशन करने बैठा है कि उसे कितना मिलना है और उसके कितने सपने इससे पूरे होंगे। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जब से आठवें वेतन आयोग के गठन की घोषणा हुई है तब से ही सरकारी कर्मचारियों की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। आमतौर पर सरकारी कर्मचारी अपने काम के वर्कलोड से काफी नाखुश रहा करते हैं उनके भी मन में खुशी ने आखिरकार दस्तक दी। जबकि सरकारी कर्मियों के घरवालों के तो मन में लडडू फूटने लगे हैं। एकाउंट्स वाले अंसारी साहब जिनकी आवाज बहुत कम सुनने को मिला करती थी । क्योंकि पहली बात तो अपने काम के वर्कलोड से गुमसुम रहा करते थे, और अगर नाखुश नहीं होते थे तो गुटखा की पीक को मुँह में भरे रहते थे जिससे उनके चेहरे के मनोभाव पता नहीं लग पाते थे। वो हजरात आजकल खुशी से गुनगुनाते रहते हैं। वह आठवें वेतन आयोग से जुड़ी सोशल मीडिया की हर पोस्ट और रील देखा करते हैं और कोई भी नया अपडेट होने पर चहकते हुए लोगों को खुशमिजाजी से मोबाइल खोल कर दिखाते और फिर जोड़ – गाँठ कर बताते "भाईजान मेरे हिसाब से तो 34 परसेंट इंक्रीमेंट पक्का है। अगर इंफ्लेशन इंडेक्स को सरकार ने ठीक से कंसीडर किया तो यह बढ़त 44-45 परसेंट तक भी हो सकती है”।उनकी बात पर विभाग के लोगों को संशय होता तो कोई गूगल करता तो कोई एआई से पूछता।गुप्ता जी का तो यह प्रिय शगल बन गया था। वह रोज आफिस में आकर मोबाइल में ऊँची आवाज में हैंडफ्री करके एआई से पूछते कि “आठवें वेतन आयोग के लागू होने से सरकारी कर्मचारियों की सेलरी कितने परसेंट बढ़ेगी ” ?
एआई से उनको जैसे ही उनको मन पसंद उत्तर मिलते वैसे ही उनकी बांछे खिल जाती। उनकी इस बाल सुलभ क्रीड़ा पर दफ्तर के लोग मंद – मंद मुस्कराते। मिस गुलाटी ने अपनी शादी की डेट को आगे बढ़ा दिया है ताकि वो नये वेतन आयोग की बढ़ी हुई आमदनी से सिंगापुर की बजाय स्विटजरलैंड में अपना हनीमून मना सकें। जहाँ आठवें वेतन आयोग की प्रस्तावित आमदनी के इजाफ़े की उम्मीद ने सरकारी लोगों की खुशियों को बढ़ा दिया है। वहीं दूसरी ओर समाज के कुछ लोग इसे बात से काफी खुन्नस खाये बैठे हैं। मिसेज श्रीवास्तव, जो दिनभर अपनी बालकनी में बैठकर दूसरों के घरों की खुशियाँ और गम ताड़ने की निशुल्क सेवा किया करती थीं। वह दूसरों के घरों की सूचनाओं को निकाल कर उसमें तीन - तेरह करके फिर पूरे मोहल्ले में बाँट दिया करती थीं। वह अपने मोहल्ले के तीन पड़ोसियों से आजकल जली -भुनी रहती हैं, क्योंकि वो तीनों सरकारी थे। उनकी वेतन बढ़ने की खबरों से उन्हे बेहद नाराजगी थी।अक्सर वह अपनी बालकनी में बबडबड़ाती रहती "सरकारी कर्मचारियों को तो पहले से ही सेलरी काफी ज्यादा थी। सरकार बेवजह फिर इनकी सेलरी बढ़ा रही है।ऐसे तो इन्हें कम काम करने और ज्यादा सेलरी लेने की आदत पड़ जायेगी"।
वहीं ट्रांसपोर्ट कंपनी चलाने वाले और जीयसटी चोरी का मुकदमा झेल रहे शुक्ला जी की भी इस मसले पर कमोबेश ऐसी ही राय बन गई थी। वह भी अक्सर दांत पीसते हुए कहते “सारी मौज तो सरकारी लोगों की है । हम तो बस टैक्स भरने के लिए पैदा हुए हैं”।
इस सबके इतर सरकारी कर्मचारियों के घर का माहौल तो और भी मौजूं हो चला है। सिंह साहब का लड़का हर दिन अपने घर वालों को ताकीद करता है कि “अब मैं साठ – सत्तर हजार की स्कूटी से नहीं बल्कि बल्कि साढ़े तीन लाख की स्पोर्टस बाईक से कालेज जाऊंगा ” । मिसेज सिंह ने तो अभी से से ही खर्चों की एक लंबी लिस्ट बनानी शुरू कर दी थी। उन्होंने ड्राइंग रूम की दीवारों पर लगी सभी तस्वीरों को उतार दिया है और उस पर उन्होंने होम थियेटर लगवाने की बात फाइनल कर दी है। पूरा किचन मॉड्यूलर और ऑटोमैटिक तो हर हाल में होगा ही। मोहल्ले में जो मिसेज सक्सेना रहती हैं वह अब अक्सर इतराते हुए बताती हैं कि " मॉर्निंग वाक करने से कोई खास फ़ायदा नहीं है। इससे वजन बहुत मामूली ही घटता है मेरे हसबैंड ने कहा है कि जैसे ही वेतन आयोग का एरियर आयेगा वो मेरा लाइपोसक्सन करवा देंगे। इससे बाडी का सारा एक्स्ट्रा फैट निकल जाता है”। उनकी बात सुन कर उनके साथ मॉर्निंग वाक करने वाली महिलाएं जल – भुन जातीं और कलप कर पीठ पीछे कहतीं कि “इनके कोई बाल बच्चा तो है नहीं सो अपने फिगर को सुधारने के लिए जी भर के खर्च कर लें। हमें तो अपने बच्चों की बेहतरी पर खर्च करना है”। बच्चों ने अपनी बेहतरी की बात सुनी तो उन्होंने भी प्ले स्टेशन से लेकर हिल स्टेशन तक सपने बुनने शुरू कर दिये।
दफ्तर का माहौल खासा दिलचस्प हो चला है। दफ्तर में जो बास नामक प्राणी है जिसके हाथ में वार्षिक इंक्रीमेंट और बोनस नाम का राम बाण होता है।इसी के डर से सारे अधीनस्थ उससे साल भर डरे -डरे रहते हैं। बास नामक प्राणी भी परेशान है कि वेतन आयोग की वजह से उसके अधीनस्थों की सेलरी तो बढ़ जायेगी मगर इस सब में उनका कोई रोल नहीं होगा। सो वह हितोपदेशक की तरह जब तब समझाते रहते हैं कि “देखो, सरकार वेतन बढ़ रहा है तो सरकार हमसे उम्मीद करती है कि हमें अपनी परफॉर्मेंस भी बढ़ानी चाहिए। अब सब लोग समय से आफिस आयें -जाएं और काम और भी तेजी से किया करें"।
आफिस के लोग मन ही मन सोच रहे थे, "ये तो वही बात हो गई कि वेतन की बढ़त अभी लागू नहीं हुई मगर साहब के ताने -उलाहने पहले से ही लागू हो गये”।
सोशल मीडिया पर तो इस मसले पर मीम्स की बाढ़ आयी हुई है। कितना वेतन बढ़ेगा इसका अभी पता नहीं मगर उसपे मीम इंडस्ट्री ने पहले ही फलना -फूलना शुरू कर दिया। एक मीम तो खासा वायरल हो गया, जिसमें एक सरकारी कर्मचारी को एक आराम कुर्सी पर एसी के नीचे सोते हुए दिखाया गया है और उसके नीचे कैप्शन में लिखा है "जनता में महंगाई से शोक, पर इनकी तो हर हाल में है मौज” ।
वेतन आयोग सिर्फ आमदनी में वृद्धि ही नहीं, बल्कि सामाजिक भूचाल भी लाता है। सरकारी कर्मचारी इस घोषणा के बाद खुद अजीब असमंजस में हैं।एक तरफ तो कुछ लोगों की भड़ास, तो दूसरी ओर परिवार के असीमित सपने। वेतन आयोग जहाँ कर्मचारियों के जीवन में कुछ आर्थिक तसल्ली लाता है । वहीं समाज और पड़ोसी इसे जलन और कटाक्ष की नजरों से भी देखते हैं। सबका अपना -अपना नजरिया है। लेकिन सरकारी कर्मचारी का जीवन इन्हीं सपनों 'तानों' और जरूरी 'खर्चों' के गुणा -भाग के बीच झूलता रहता है।
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