Antarnihit 54 in Hindi Classic Stories by Vrajesh Shashikant Dave books and stories PDF | अन्तर्निहित - 54

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अन्तर्निहित - 54

[54]

“सारी तैयारियां हो चुकी है। आप दोनों कल भोर होते ही अपने अभियान पर निकल सकते हो।” विजेंदर ने सूचना दी। 

शैल ने कह, “सब कुछ सज्ज हैं न? कोई त्रुटि तो नहीं रह गई? एक बार पुन: सब देख लेना।”

“निश्चिंत रहिए महोदय। मैं दो बार सब देख चुका हूँ।”

“ठीक है। सारा जी, कल प्रात: यहाँ से वह आश्रम तक वाहन से जाएंगे। पश्चात नदी के मार्ग पर अपनी यात्रा और अन्वेषण प्रारंभ करेंगे।” 

“ठीक है, शैल।” 

“आपके उत्तर में ऊष्मा और ऊर्जा दोनों का अभाव प्रकट हो रहा है। क्या बात है?” 

“क्या हमारा अभियान सात दिनों में सम्पन्न हो जाएगा?” 

“मैं नहीं जानता।” 

“सात दिनों के पश्चात तो मुझे जाना होगा।” सारा ने दीर्घ श्वास लेते हुए कहा। 

“हाँ, अब छ: दिन शेष रहे हैं। यह भी सत्य है कि पश्चात आपको जाना होगा। किन्तु कल हम जिस स्वामीजी को मिलकर आए थे उनके वचन का स्मरण तो होगा ही?”

“क्या कहा था?”

“इस देश को छोड़कर तुम कहीं नहीं जाओगी, कभी नहीं। यही कहा था न?”

“कहा तो यही था। किन्तु कैसे होगा?”

“विजेंदर, कुछ उपाय ढूंढो जिससे सारा जी भारत में रुक सके। जब तक मीरा का रहस्य हाथ न लगे तब तक हमें उन्हें रोकना होगा।” शैल ने कहा। 

‘भगवान करे यह रहस्य, रहस्य ही रहे।’ सारा ने मनोमन कहा।  

“एक उपाय है। सारा जी भारत की नागरिकता के लिए आवेदन कर लें तो यह संभव है। उसे यहाँ की नागरिकता मिल जाए तो ...।”

“विजेंदर, उपाय तो ठीक है किन्तु क्या यह संभव है? और वह भी सात दिनों में?”

“सारा जी, भारत सरकार ने नागरिकता संशोधन अधिनियम 2024 लागू कर दिया है। इसके अंतर्गत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के नागरिकों को भारत नागरिकता दे सकता है।”

“महोदय, इन अधिनियम के अंतर्गत केवल वहाँ के अल्पसंख्यक अर्थात गैर मुस्लिम को ही यह लाभ उपलब्ध है। सारा जी वहाँ के अल्प संख्यक नहीं हैं। उस पर यह अधिनियम लागू नहीं होगा।”

“तो क्या करें? कोई उपाय?”

“यदि वह मुस्लिम धर्म त्याग दे तो?”

“इस पर भी बात नहीं बन सकती क्यों कि सारा जी की नागरिकता, सारे कागज के अनुसार वे मुस्लिम है। अत: धर्म परिवर्तन करने पर उसे कोई लाभ नहीं होगा।” शैल ने कहा। 

“किन्तु मूलत: तो मैं हिन्दू हूँ।” सारा ने कहा। 

“आप थीं। अब उसका कोई आधार या प्रमाण है क्या? एक बार मुस्लिम बन जाने पर सारा हिन्दुत्व मीट जाता है।” विजेंदर ने कहा। 

“चलो छोड़ो, अभी भी सात दिन हैं न? तब तक क्यों चिंता करें? हो सकता है हमें सात दिनों के भीतर रहस्य हाथ लग जाए।”

“सारा जी, शैल महोदय का कहना उचित है। सात दिनों तक आप ऐसी चिंता छोड़ दो। तब तक मैं भी कोई उपाय खोजता हूँ।” विजेंदर ने कहा। 

“सात नहीं, छ: दिन, विजेंदर।” विजेंदर ने सहमति प्रकट की। 

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“तीन दिन तो पूरे हो गए। अभी तक कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ। ऐसे कब तक चलते रहेंगे?” 

“सारा जी, जब तक मीरा की मृत्यु का रहस्य नहीं मिलता, यूं ही चलते रहना है। आप कहीं थक तो नहीं गई? निराश तो नहीं हो गई?”

“नहीं शैल। ऐसी कोई बात नहीं है। ऐसे चलते चलते एक दिन हम सतलज नदी के उद्गम स्थान मानसरोवर – तिबेट तक पहुँच जाएंगे।”

“उसके लिए कुल एक हजार चार सौ पचास किलोमीटर चलना होगा।”

“इतना समय नहीं है मेरे पास। चार दिन और बचे हैं। तब तक कुछ हो तो ठीक है नहीं तो मैं चली जाऊँगी।”

“अभी भी चार दिन हैं न?”

“है तो सही।” कहकर सारा कुछ क्षण मौन हो गई। पश्चात बोलीं, “यह नदियां इतनी लंबी लंबी क्यों होती हैं? इतना दूर तक जाने की उसे क्या आवश्यकता थी?”

“सारा जी, नदी को दोष क्यों देना? वह तो इतने सारे क्षेत्र को जीवन देती है।”

“और इसी क्षेत्र के एक छोटे से किसी अज्ञात बिन्दु पर मीरा नाम की युवती को मृत्यु भी देती है। उस पर रहस्य रच देती है।”

“इस पर भी नदी का दोष?”

“और नहीं तो क्या?”

“आपने यह कैसे जाना कि मीरा को मृत्यु इस नदी ने दी है?”

“तो और किसने दी होगी?”

“यही तो हमें खोजना है। नदी किसी को मृत्यु नहीं देती, सारा जी।”

“क्यों नहीं देती? वर्षा में यही नदियां गांवों में मृत्यु लेकर दौड़ आती है।”

“हमारे यहाँ नदी केवल नदी नहीं होती है, माता होती है। हम उसे मैया कहते हैं। माता कभी किसी को मृत्यु नहीं देती। वर्षा में जो पानी गांवों में आता है वह नदी का नहीं, वर्षा का जल है जिसे नदी ने अपने भीतर आश्रय नहीं दिया है।”

“माता?”

“क्या आपके यहाँ नदी को माता नहीं कहते?”

“हमारे यहाँ तो माता को भी माता नहीं कहते।”

“आप तो पूर्व में कभी सरिता थीं। क्या तब भी आपका परिवार नदी को माता नहीं कहता था?”

“तब तो मैं छोटी थी, अल्प मति थी। मैं क्या जानुं?”

“कोई बात नहीं। अब तो आप यहाँ हो, नदी को माता कह सकती हो। नदी का एक नाम सरिता भी है, सारा जी।” 

सारा शैल की बात पर विचार करने लगी। तब शैल ने कहा, “हम से एक बड़ी चूक हुई है, बल्कि भूल हुई है।”

“वह क्या?”

“हमने नदी का, माता का, आशीर्वाद तो लिया ही नहीं तो वह हमें सहाय कैसे करेंगी?”

“क्या तात्पर्य है, शैल?”

“आओ, मेरे साथ आओ।” शैल नदी के प्रवाह की तरफ चलने लगा, सारा उसके पीछे। शैल नदी में प्रवेश कर गया। घुटनों तक पानी में जाकर रुक गया। झुका, नदी के पानी को अपनी दोनों हथेलियों में लिया और अर्घ्य देने लगा। मन ही मन नदी को प्रार्थना करने लगा। कुछेक अर्घ्य देने पर झुककर नदी को वंदन किया, हथेली से मस्तक पर नदी का जल अभिषेक किया। सात बार डुबकी लगाकर स्नान किया और तट पर लौट आया। 

“यह क्या था शैल?”

“मैया की पूजा और प्रार्थना। मैया प्रसन्न होकर आशीर्वाद देगी तो हमारा कार्य सफल होगा।”

“नदी कैसे आशीर्वाद दे सकती है? वह तो एक स्थूल तत्व मात्र है।”

“श्रद्धा है मेरी। आप भी एक बार मैया का आशीर्वाद लेकर तो देखो।”

“मैं नहीं मानती।”

“कोई बात नहीं। मैंने जो अभी किया वही कर लो। बस इतनी सी पूजा होती है मैया की।”

“नहीं। मैं ऐसी बातों पर विश्वास नहीं रखती। अब चलो। समय कहीं आगे न निकल जाए।” सारा चल दी, शैल भी। 

कुछ अंतर चलने पर सारा सहसा एक स्थान पर रुक गई। शैल आगे चल रहा था, उसे इस बात का ध्यान न रहा। कुछ दूर चलने के पश्चात शैल ने सहसा पीछे मुड़कर देखा तो बोल पडा, “सारा जी कहाँ गई? मेरे पीछे पीछे तो आ रही थी।” शैल ने पीछे छूटे मार्ग पर दृष्टि डाली, दूर तक देखा। 

“सारा जी कहीं भी नहीं दिख रही। कहाँ रह गई?”

शैल पार कर चुके मार्ग पर लौटने लगा। कुछ दूर जाने पर देखा तो एक शीला पर सारा जी बैठी थी। सारे वस्त्र भीगे थे। शैल चौंक गया। 

“यह क्या हो गया? क्या आप नदी में गिर गयो थीं?”

“नहीं।”

“तो यह वस्त्र कैसे भीगे?”

“मैया के आंचल में गई थी, भीगना तो था ही।” 

“क्या?”

“तुमने नदी मैया की पूजा प्रार्थना की तो मैंने भी पूजा की, प्रार्थना की।”

“किन्तु आप तो ...?”

“नहीं मानती थी किन्तु तुम्हारी पूजा और श्रद्धा देखने के पश्चात मन पर वह चित्र, वह विचार, वह भाव 

इतने छाए रहे कि मैं अन्य कुछ विचार ही नहीं सकती थी। अंतत: मैं भी मैया की शरण में चली गई। मुझे भी मैया का आशीर्वाद प्राप्त होगा न?”

“श्रद्धा में असीम क्षमता होती है। मैया बड़ी कृपालु होती है।”

“अब धीरे धीरे मेरा मन शांत हो रहा है। मन की उद्विग्नता दूर होती जा रही है। जैसे भीतर से मन प्रसन्न हो रहा हो।”

“अब सारी चिंता छोड़ दो। मैया अवश्य उचित मार्ग दिखाएगी।”

“शैल, यह क्या है कि एक बहती नदी जो केवल जल राशि मात्र है उसे जब हम मैया मानकर पुकारते हैं, उसकी शरण में जाते हैं तो शीघ्र ही मन के सारे विकार शांत हो जाते हैं। क्या यह चमत्कार है?”

“नहीं। यह चमत्कार नहीं है।”

“तो क्या है यह?”

“माता और संतान का स्नेह बंधन है यह।”

“कितना अद्भुत है!”

“वो तो है। अब हमें अपने मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।”

दोनों आगे बढ़ गए। चलते चलते संध्या हो गई।