भीड़ में अकेली
अध्याय–1 : एक अनजान
संदेश रात के साढ़े दस बज रहे थे। शहर की ऊँची इमारतों की खिड़कियों में एक-एक करके रोशनियाँ बुझ रही थीं। सड़क पर वाहनों का शोर अब थककर धीमा पड़ चुका था। हवा में हल्की नमी थी और बालकनी में रखे तुलसी के गमले की पत्तियाँ बिना हवा के भी जैसे काँप रही थीं।उमा बालकनी की रेलिंग पर कोहनी टिकाए सामने फैले अँधेरे को देख रही थी। उसके पीछे दो कमरों का सजा-सँवरा फ्लैट था—महँगा फर्नीचर, चमचमाती फर्श, दीवारों पर आधुनिक चित्र, हर सुविधा मौजूद। किसी बाहरी व्यक्ति को यह घर किसी सुखी दंपती का घर ही लगता। लेकिन घरों का सच हमेशा दीवारों पर नहीं लिखा होता।डाइनिंग टेबल पर दो प्लेटें रखी थीं। एक खाली थी, दूसरी में रखा खाना ठंडा होकर अपनी भाप खो चुका था।घड़ी ने ग्यारह बजने का संकेत दिया। उमा ने मोबाइल उठाया। व्हाट्सऐप खोला। सबसे ऊपर पति का संदेश था—"मीटिंग चल रही है। खाना खा लेना। देर होगी।"
संदेश दो घंटे पुराना था। उमा मुस्कराई। यह मुस्कान खुशी की नहीं, आदत की थी।उसने धीरे से खाना फ्रिज में रखा, पानी पिया और फिर सोफ़े पर बैठ गई।कमरे में ऐसी खामोशी थी जिसमें अपनी साँसों की आवाज़ भी अजनबी लगने लगती है।उसने बिना किसी उद्देश्य के मोबाइल पर सोशल मीडिया खोल लिया। उँगलियाँ स्क्रीन पर चल रही थीं, मन कहीं और था।
तभी एक अनजान नंबर से संदेश आया—
"हाय।"
उमा ने देखा, फिर मोबाइल रख दिया। दो मिनट बाद फिर संदेश आया—
"हाय..."
उसने सोचा—शायद किसी ने गलत नंबर पर भेजा होगा।फिर तीसरा संदेश आया—
"आपका नाम क्या है?
"उमा ने पहली बार उत्तर टाइप किया—
"पहले आप बताइए।"
उधर से तुरंत उत्तर आया—
"मेरा नाम शोभित है। अब आप बताइए।"
उमा कुछ क्षण सोचती रही।फिर लिखा—
"मैं उमा... कहाँ रहती हूँ, नहीं बताऊँगी।"
संदेश पढ़ते ही शोभित हँस पड़ा। उसने लिखा—
"क्यों?"
उमा का उत्तर आया—
"फिर लड़के घर के चक्कर लगाने लगते हैं।"
"ओह... फिर लड़कों से बात ही क्यों करती हो?"
"वाह! सब खराब थोड़े ही होते हैं।"
"तुम तो मुझे जानती भी नहीं, फिर बात क्यों कर रही हो?"
उमा ने कुछ देर बाद लिखा—
"बस... ऐसे ही टाइम पास।"
"तो मैं टाइम पास हूँ?"
स्क्रीन पर कुछ पल तक 'Typing...' दिखाई देता रहा।फिर उमा का संदेश आया—
"नहीं... ऐसा नहीं है। मेरे पास कोई नहीं है जिससे मैं बात कर सकूँ।"
इस बार शोभित ने जल्दी उत्तर नहीं दिया। एक साधारण-सा वाक्य भी कभी-कभी किसी मनुष्य के भीतर के सबसे बड़े खालीपन का परिचय होता है।उसने लिखा—
"ऐसा क्यों?"
उमा ने मोबाइल की स्क्रीन को देर तक देखा। क्या सचमुच वह किसी अनजान आदमी को अपने मन की बात बताए? लेकिन फिर उसे लगा—जिसे वह जानती ही नहीं, वह उसके बारे में निर्णय भी कैसे करेगा? उसने लिख दिया—
"मैं अपने पति के साथ हूँ... पर अकेली हूँ।"
कुछ सेकंड तक कोई उत्तर नहीं आया। फिर शोभित ने लिखा—
"पति के साथ... फिर भी अकेली?"
"हाँ... कभी-कभी लोग भीड़ में भी अकेले होते हैं।"
शोभित ने उस संदेश को दो बार पढ़ा। उसने बहुत लोगों को शिकायत करते देखा था—पैसों की, नौकरी की, रिश्तों की। लेकिन यह शिकायत अलग थी। यह किसी सुविधा की नहीं, किसी उपस्थिति की थी। उसने केवल इतना लिखा—
"ओह..."
उमा ने फिर लिखा—
"कोई कुछ सुने तो ही कोई बोलेगा ना..."
इस बार शोभित ने बिना देर किए उत्तर दिया—
"मैं सुन रहा हूँ। तुम बोल सकती हो।"
उमा की आँखें भर आईं। कितने दिनों बाद किसी ने कहा था—
"मैं सुन रहा हूँ।"
अक्सर लोग कहते हैं—
"मैं समझता हूँ।"
लेकिन सुनने वाले बहुत कम होते हैं। उसने फिर भी अपने मन को रोका।
"तुमसे भी क्यों बोलूँ? तुम्हें तो मैं जानती भी नहीं।"
शोभित ने मुस्कराकर उत्तर लिखा—
"यही तो अच्छा है। मैं तुम्हें नहीं जानता, इसलिए तुम्हारी बातें किसी पहचान के बोझ से मुक्त रहेंगी। कभी-कभी अजनबी सबसे अच्छे श्रोता होते हैं।"
उमा कुछ देर तक मोबाइल को देखती रही।फिर उसने लिखा—"और?"
"और शायद मैं कोई सलाह भी दे सकूँ।"
यह पढ़कर उमा के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। कई दिनों बाद। उसने पहली बार महसूस किया कि किसी ने उसके अकेलेपन को हल्के में नहीं लिया। कमरे की घड़ी ने बारह बजा दिए। पति का अब तक कोई संदेश नहीं आया था। उमा ने बालकनी का दरवाज़ा बंद किया, कमरे की लाइट धीमी की और सोफ़े पर बैठकर लिखने लगी—"मुझे समझ नहीं आता कि कहाँ से शुरू करूँ..."
शोभित ने उत्तर दिया—"
जहाँ सबसे ज़्यादा दर्द हो, वहीं से।"
उमा की उँगलियाँ काँप गईं। उसने मोबाइल सीने से लगा लिया। कई वर्षों से उसके भीतर जमा शब्द आज जैसे बाहर आने का रास्ता खोज रहे थे। बाहर रात और गहरी हो गई थी। लेकिन शायद उमा के भीतर पहली बार कहीं बहुत दूर एक छोटी-सी सुबह जन्म ले रही थी...
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आलोक मिश्रा " मनमौजी "