unknown language in Hindi Motivational Stories by Vijay Erry books and stories PDF | अनजानी भाषा

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अनजानी भाषा


अनजानी भाषा
भाषाएँ केवल शब्दों से नहीं बनतीं। कुछ भाषाएँ आँखों में बसती हैं, कुछ मौन में, और कुछ सीधे आत्मा तक पहुँच जाती हैं।
राघव एक प्रसिद्ध भाषाविद् था। उसने संसार की पचास से अधिक भाषाएँ सीख रखी थीं। संस्कृत, फ़ारसी, अरबी, ग्रीक, लैटिन, तिब्बती, चीनी—शायद ही कोई भाषा हो जिसे वह पढ़ न सकता हो। लोग कहते थे, "यदि दुनिया में कोई भाषा है, तो राघव उसे समझ सकता है."
लेकिन राघव हमेशा मुस्कुरा देता और कहता, "अभी बहुत कुछ बाकी है."
एक दिन उसे हिमालय की तलहटी में बसे एक छोटे से गाँव के बारे में पता चला। कहा जाता था कि वहाँ रहने वाले लोग ऐसी भाषा बोलते हैं जिसे आज तक कोई समझ नहीं पाया। कई विद्वान वहाँ गए, महीनों रहे, पर खाली हाथ लौट आए।
राघव का मन उत्सुक हो उठा। उसने अपना सामान बाँधा और यात्रा पर निकल पड़ा।
तीन दिन की कठिन यात्रा के बाद वह उस गाँव पहुँचा। गाँव बेहद शांत था। मिट्टी के घर, पहाड़ों से उतरती निर्मल धारा, हवा में देवदार की सुगंध और लोगों के चेहरों पर अद्भुत संतोष।
गाँव वालों ने उसका स्वागत मुस्कुराकर किया। वे आपस में कुछ बोलते थे, पर उनकी बोली किसी भी ज्ञात भाषा से बिल्कुल अलग थी। उसमें न कोई परिचित ध्वनि थी, न कोई व्याकरण।
राघव ने अपनी डायरी निकाली और हर शब्द लिखना शुरू कर दिया। उसने ध्वनियों को तोड़ा, उनके अर्थ खोजे, संकेतों पर ध्यान दिया। पर कुछ भी समझ नहीं आया।
दिन बीतते गए।
एक दिन उसने देखा कि गाँव की एक वृद्धा बिना कुछ बोले एक रोते हुए बच्चे को गोद में लेकर शांत कर देती है। बच्चा कुछ ही क्षणों में मुस्कुराने लगता है।
दूसरे दिन उसने देखा कि एक किसान घायल पक्षी को अपने हाथों में लेकर कुछ अनजानी ध्वनियाँ बोलता है। थोड़ी देर बाद पक्षी उड़ जाता है।
राघव ने सोचा, "क्या यही वह रहस्यमयी भाषा है?"
उसने उन ध्वनियों की नकल करने की कोशिश की। परिणाम शून्य।
एक शाम वह गाँव के सबसे वृद्ध व्यक्ति के पास पहुँचा। सफेद दाढ़ी, चमकती आँखें और चेहरे पर गहरी शांति।
राघव ने इशारों में पूछा, "आपकी भाषा मैं क्यों नहीं समझ पा रहा?"
वृद्ध मुस्कुराया।
उसने ज़मीन पर दो वृत्त बनाए। एक छोटा, दूसरा बड़ा।
फिर छोटे वृत्त पर हाथ रखकर बोला, "ज्ञान."
बड़े वृत्त पर हाथ रखकर बोला, "अनुभव."
राघव कुछ समझा, कुछ नहीं।
वृद्ध उसे अगले दिन जंगल में ले गया।
रास्ते में एक घायल हिरण पड़ा था। गाँव वाले उसके चारों ओर खड़े थे। कोई दवा नहीं लगा रहा था। कोई मंत्र नहीं पढ़ रहा था। सब केवल मौन थे।
कुछ देर बाद एक लड़की आगे बढ़ी। उसने हिरण के सिर पर हाथ फेरा। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
हिरण धीरे-धीरे उठ खड़ा हुआ और जंगल में चला गया।
राघव हैरान रह गया।
उसने पूछा, "उसने क्या कहा?"
वृद्ध ने पहली बार उसकी भाषा में उत्तर दिया।
"कुछ भी नहीं."
"लेकिन फिर..."
"वह बोल नहीं रही थी। वह महसूस कर रही थी."
राघव के भीतर जैसे कोई घंटी बजी।
उस रात वह सो नहीं सका।
उसे पहली बार लगा कि शायद वह सारी उम्र केवल शब्द सीखता रहा, भाव नहीं।
अगले दिन उसने अपनी डायरी बंद कर दी।
अब वह शब्द नहीं लिखता था। लोगों के साथ खेतों में काम करता, बच्चों के साथ खेलता, नदी किनारे बैठता, पेड़ों को निहारता।
धीरे-धीरे उसे अजीब परिवर्तन महसूस होने लगा।
अब जब कोई गाँव वाला मुस्कुराता, उसे बिना बोले उसका अर्थ समझ आ जाता।
जब कोई दुखी होता, उसका दर्द भीतर तक उतर जाता।
जब कोई प्रसन्न होता, उसका आनंद स्वयं उसके चेहरे पर आ जाता।
एक दिन गाँव की एक छोटी बच्ची उसके पास आई।
उसने कुछ अनजाने शब्द बोले।
पहली बार राघव मुस्कुराया।
वह शब्द नहीं समझा था।
लेकिन उसका अर्थ समझ गया था।
वह कहना चाहती थी—"आप अब हमारे अपने हो."
उसकी आँखें भर आईं।
महीनों बाद जब वह गाँव से विदा होने लगा, वृद्ध ने उसे एक छोटी-सी लकड़ी की पट्टी भेंट की।
उस पर कोई अनजानी लिपि लिखी थी।
राघव ने पूछा, "इस पर क्या लिखा है?"
वृद्ध बोला, "अब तुम स्वयं पढ़ सकते हो."
राघव ने पट्टी को देखा।
शब्द अब भी अनजान थे।
लेकिन उसके मन में अर्थ स्पष्ट उभर आया—
"जिस दिन मन सुनना सीख जाता है, उस दिन सारी भाषाएँ अपनी हो जाती हैं."
शहर लौटकर राघव ने एक विशाल सम्मेलन में अपने अनुभव सुनाए।
सभी विद्वानों ने पूछा, "तो वह भाषा कौन-सी थी? उसका व्याकरण क्या है? उसकी लिपि कैसी है?"
राघव मुस्कुराया।
उसने मंच पर रखी अपनी वर्षों की शोध डायरी उठाई।
सबको लगा कि अब वह रहस्य बताएगा।
पर उसने पूरी डायरी बंद कर दी और कहा—
"मैं उस भाषा का एक भी शब्द नहीं लिख पाया। क्योंकि वह शब्दों की भाषा थी ही नहीं."
सभा में सन्नाटा छा गया।
राघव आगे बोला—
"हमने दुनिया की हजारों भाषाएँ बना लीं। पर सबसे महत्वपूर्ण भाषा भूल गए—करुणा की भाषा, प्रेम की भाषा, मौन की भाषा."
"जिसे सीखने के लिए शब्दकोश नहीं, संवेदनशील हृदय चाहिए."
उसके शब्द सुनकर पूरा सभागार खड़ा हो गया।
वर्षों बाद जब राघव की मृत्यु हुई, उसकी मेज़ पर वही लकड़ी की पट्टी रखी मिली।
नीचे उसने अपनी अंतिम पंक्ति लिख छोड़ी थी—
"मैंने जीवन भर भाषाएँ पढ़ीं। पर इंसान बनना तब सीखा, जब एक अनजानी भाषा ने मुझे मौन का अर्थ सिखाया."
समाप्त।
मौलिकता प्रमाणपत्र:
यह कहानी पूर्णतः मौलिक रूप से रचित है। इसका कथानक, पात्र, घटनाएँ और प्रस्तुति स्वतंत्र सृजन पर आधारित हैं तथा प्रतिलिपि जैसे साहित्यिक मंच पर प्रकाशन हेतु उपयुक्त है।
रचनाकार: विजय शर्मा ऐरी, अजनाला, अमृतसर.
संपर्क: vijayerry5@gmail.com