🔥♥️ हुक्म और हसरत 🔥♥️
#Arsia
हाथों का वो एक पल का साथ, सदियों की दुआ बन गया,
जिसे छूना भी मुनासिब न था, वही दिल की वजह बन गया।
वो ख़ामोश रहा, हम भी कुछ कह न सके,
मगर उस ख़ामोशी में इश्क़... बेआवाज़ पलता रहा।
दरवाज़े की चौखट पर अर्जुन खड़ा था।
आज वो हमेशा वाला अर्जुन नहीं लग रहा था।
उसके बाल, जिन्हें वो हमेशा करीने से सेट रखता था, आज बिखरे हुए थे। काली शर्ट की बाँहें कोहनी तक मुड़ी हुई थीं, और पहली बार उसकी शर्ट भी ठीक से टक नहीं थी।
उसका चेहरा थका हुआ था...
आँखें पूरी तरह लाल थीं, जैसे कई घंटों से उसने नींद नहीं ली हो... या शायद कई बरसों से चैन से सोया ही न हो। 🥀
सिया का दिल बैठ गया।
"अ... अर्जुन..." 🥺
अर्जुन ने उसकी ओर देखा तक नहीं।
उसकी नज़र सीधे उस डायरी पर पड़ी, जो अब भी सिया के हाथों में थी।
वो धीमे कदमों से आगे बढ़ा।
कमरे में फैली खामोशी अब और भारी हो चुकी थी।
कुछ पल बाद उसकी आवाज़ गूँजी—
"राजकुमारी..."
आवाज़ शांत थी...
लेकिन उसमें छिपा दर्द साफ़ महसूस किया जा सकता था।
"आपको कोई अधिकार नहीं है मेरी चीज़ें छीनने का।"
उसने अब भी उसकी तरफ़ नहीं देखा।
"मेरी निजी ज़िंदगी में इस तरह दख़ल देना... आपको शोभा नहीं देता।" 😑
हर शब्द सिया के दिल में उतरता चला गया।
"अर्जुन... मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था। मैं बस—"
"बस..." उसने धीरे से कहा।
"कृपया... और कुछ मत कहिए।"
वो डायरी उसके हाथों से लेकर बहुत सावधानी से वापस बक्से में रख देता है।
फिर बक्सा बंद करके दीवार की ओर मुँह करके खड़ा हो गया।उसकी पीठ अब भी सिया की ओर थी।
जैसे वो नहीं चाहता था कि कोई उसकी आँखों में छिपा तूफ़ान देख पाए। कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
सिया कुछ पल उसे देखती रही।आज सुबह जिम में उसके घायल हाथ...उसकी लाल आँखें...और अब ये टूटा हुआ स्वर...सब कुछ उसे भीतर तक बेचैन कर रहा था।
धीरे-धीरे वो उसके पास आई।
"अर्जुन..." उसकी आवाज़ बेहद नरम थी।
"क्या आप ठीक हैं...?" 🥺
कोई जवाब नहीं।सिर्फ़ खामोशी।
सिया ने काँपते हुए अपना हाथ उसकी पीठ पर रख दिया।
उसकी पीठ एक पल को तन गई।
लेकिन उसने फिर भी कुछ नहीं कहा।
सिया ने धीरे से उसका दायाँ हाथ अपने हाथों में ले लिया।
अर्जुन ने सहज ही अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की।
"राजकुमारी..."
लेकिन इस बार...
सिया ने उसका हाथ नहीं छोड़ा।
उसने अपनी लंबी, पतली उँगलियाँ अर्जुन की खुरदुरी उँगलियों में धीरे-धीरे पिरो दीं। 🤍
उन दोनों के हाथ पहली बार इस तरह जुड़े थे।
अर्जुन का शरीर जैसे एक पल को बिल्कुल स्थिर हो गया।
सिया उसके बिल्कुल करीब आ गई।इतना करीब...
कि उसकी साँसों की गर्माहट अर्जुन महसूस कर सकता था।
वो बहुत धीमे स्वर में फुसफुसाई—
"मैं आपके साथ हूँ, अर्जुन..." ❤️
"हर बात जानना ज़रूरी नहीं होता... लेकिन किसी का साथ देना ज़रूरी होता है।"
अर्जुन की पलकों ने धीरे-धीरे आँखों को ढँक लिया।
उसने आँखें बंद कर लीं।
सिया के खुले बालों से आती फूलों की भीनी-सी खुशबू उसके आसपास फैल गई।
एक पल के लिए...उसे लगा जैसे बरसों बाद उसके भीतर फैला शोर थोड़ा-सा शांत हुआ हो।
उसने बहुत गहरी साँस ली।
लेकिन अगले ही पल...उसने धीरे से अपना हाथ उसकी पकड़ से छुड़ा लिया।
बिना उसकी ओर देखे बस इतना कहा—
"कुछ दर्द... बाँटे नहीं जाते, राजकुमारी।"
"उन्हें इंसान अकेले ही जीता है..."
उसकी बंद आँखों के कोने से एक अकेला आँसू चुपचाप नीचे गिर पड़ा...
लेकिन उसने उसे भी पोंछ लिया...
इससे पहले कि सिया उसे देख पाती।
कमरे में गहरी खामोशी पसरी हुई थी।
सिया की उँगलियाँ अब भी अर्जुन की उँगलियों में उलझी हुई थीं।वो धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ी।
उसका मन बार-बार अर्जुन का चेहरा देखने को मचल रहा था।आज वो उसकी आँखों में छिपा हर दर्द पढ़ लेना चाहती थी।वो चाहती थी...बस एक बार...
अपनी उँगलियों से उसकी लाल आँखों को छू ले...उनमें ठहरी सारी तकलीफ़ अपनी हथेलियों में समेट ले...और उससे कह दे कि अब उसे अकेले कुछ भी सहने की ज़रूरत नहीं है। 🥺❤️
सिया ने धीरे से अपना दूसरा हाथ उठाया।
उसकी उँगलियाँ अर्जुन के चेहरे से बस कुछ इंच दूर थीं...
कि तभी—
"दीदी...!!" 😄
बाहर से किसी की चहकती हुई आवाज़ पूरे कमरे में गूँज उठी।
"दीदी... आप कहाँ हैं?"
दोनों जैसे एक पल में वर्तमान में लौट आए।
सिया ने चौंककर दरवाज़े की ओर देखा।
रोशनी...
उसने हल्की-सी घबराहट में तुरंत अपना हाथ अर्जुन के हाथों से अलग कर लिया।जैसे ही उसकी उँगलियाँ अर्जुन की पकड़ से छूटीं...अर्जुन ने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोल दीं।कुछ पल पहले तक जो गर्माहट उसके हाथों में थी...
वो अचानक गायब हो चुकी थी।
उसे पहली बार एहसास हुआ...अभी कुछ क्षण पहले कोई अनमोल-सी चीज़ उसे थामे हुए थी...
और अब...
वो खाली हो गया था। 🥀
उसकी उँगलियाँ अनजाने में हल्का-सा मुड़ गईं...मानो अब भी उस स्पर्श को रोक लेना चाहती हों।
सिया ने उसकी ओर देखा।
उसके होंठ हिले...
"अर्जुन... मैं..."
लेकिन उसकी बात पूरी होने से पहले ही—
धड़ाम!
रोशनी बिना दस्तक दिए कमरे के अंदर आ गई।
"अरे... दीदी!" 😍
वो खुशी से लगभग दौड़ती हुई सिया के पास पहुँची और उसका हाथ पकड़ लिया।"मैं आपको पूरे महल में ढूँढ़ रही थी!" 🤭
सिया ने हल्की मुस्कान लाने की कोशिश की।
"क्या हुआ, रोशनी?"
रोशनी की आँखें खुशी से चमक रही थीं।
"मेरे कमरे में चलिए ना... मुझे आपको कुछ दिखाना है!"
"अभी...?" सिया ने अनमने मन से पूछा।
"हाँ, अभी!" 😆
"बहुत ज़रूरी है!"
सिया का मन बिल्कुल नहीं था।
उसकी नज़र बार-बार अर्जुन की ओर जा रही थी।
वो उसे इस हालत में अकेला छोड़कर नहीं जाना चाहती थी।
लेकिन रोशनी का उत्साह देखकर...
वो उसे मना भी नहीं कर पाई। 🥺
उसने एक बार फिर अर्जुन की ओर देखा।
अर्जुन अब भी वहीं खड़ा था...
सिर झुकाए...चेहरे पर वही खामोशी ओढ़े।जैसे कुछ हुआ ही न हो।
सिया ने धीमे से कहा—
"मैं... बाद में आपसे बात करूँगी।" ❤️
अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया।बस हल्का-सा सिर झुका दिया।
रोशनी सिया का हाथ पकड़कर उसे लगभग खींचते हुए कमरे से बाहर ले गई।
दरवाज़ा धीरे से बंद हो गया।
कमरे में फिर वही गहरा सन्नाटा लौट आया।
अर्जुन कुछ पल तक उसी बंद दरवाज़े को देखता रहा, जहाँ से सिया अभी-अभी गई थी।
उसने धीरे-धीरे अपनी मुट्ठी खोली।
उसकी उँगलियों में अब भी सिया की उँगलियों की हल्की-सी गर्माहट जैसे बाकी थी। 🤍
उसने अपनी हथेली को बड़ी देर तक देखा...
मानो उस स्पर्श को अपनी यादों में हमेशा के लिए कैद कर लेना चाहता हो।
अनजाने में उसकी उँगलियाँ उसी जगह पर ठहर गईं...
जहाँ कुछ पल पहले सिया की उँगलियाँ उसकी उँगलियों में उलझी हुई थीं।उसने धीरे से अपनी हथेली को अपने होंठों तक उठाया...और बिना कुछ कहे...
अपनी आँखें बंद कर लीं। 🌸
एक पल के लिए उसके होंठ उसी जगह ठहर गए...
जहाँ कुछ देर पहले सिया का स्पर्श ठहरा था। ❤️
उसने एक गहरी साँस ली...
जैसे उस पल को अपने भीतर हमेशा के लिए संजो लेना चाहता हो।फिर बहुत धीमे से उसके होंठों से एक शब्द निकला—
"मोह..."
और अगले ही पल उसने अपनी हथेली सीने से लगा ली।
उसकी आँखों के कोने में ठहरा एक आँसू चुपचाप गाल पर लुढ़क आया...
लेकिन हमेशा की तरह...
उसने उसे भी किसी को देखने नहीं दिया। 💔
💞उसने बस उँगलियाँ मेरी उँगलियों में क्या पिरो दीं...
बरसों से जमी ख़ामोशी भी धड़कने लगी।💞
जिस हाथ ने कभी किसी का सहारा नहीं माँगा,
वो उसी एक छुअन का क़ैदी बन गया।
मोह था... या मोहब्बत,
मैं आज तक समझ न पाया...
बस इतना जान गया,
उसके हाथ छूटते ही...
मेरी हथेली पहली बार ख़ाली-सी लगने लगी। 🥀❤️
***
उस दिन के बाद...
अर्जुन ने जैसे खुद को पूरी तरह बदल लिया था। 🥀
अब वो जानबूझकर सिया से दूरी बनाने लगा था।वो हर समय उसकी सुरक्षा में मौजूद रहता...लेकिन कभी उसके सामने नहीं आता।अगर गलियारे में सामने पड़ भी जाता...
तो बिना उसकी ओर देखे रास्ता बदल लेता। 😑
उसकी आवाज़...जो हर सुबह "सुप्रभात, राजकुमारी।" कहती थी...अब जैसे कहीं खो गई थी।
सिया को उसकी मौजूदगी की आदत हो चुकी थी।
उसकी चाय...बालकनी की सुबहें...छोटी-छोटी नोकझोंक...
सब कुछ जैसे अचानक उससे छिन गया था।
उसे पहली बार एहसास हुआ...
कि अर्जुन की खामोशी भी उसकी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुकी थी।
एक सुबह...
महल की संगमरमर की सीढ़ियाँ रात की नमी से हल्की फिसलन भरी थीं।
सिया जल्दी-जल्दी नीचे उतर रही थी।
तभी उसका पैर अचानक फिसल गया।
"आह...!" 😨
वो नीचे गिरने ही वाली थी...
कि किसी ने पीछे से उसकी कमर को मज़बूती से थाम लिया।
एक मज़बूत बाँह उसकी पतली कमर के चारों ओर कस गई। ❤️
सिया की साँस जैसे वहीं अटक गई।उसने धीरे से पलटकर देखा...
अर्जुन।
दोनों के बीच अब मुश्किल से कुछ इंच की दूरी थी।
सिया साफ़ महसूस कर सकती थी...
उसकी खुरदुरी उँगलियाँ उसकी कमर पर टिकी हुई थीं।
उसकी पकड़ मज़बूत थी...
लेकिन बेहद संभालकर।
अर्जुन की साँसों की गर्माहट उसके चेहरे को छू रही थी।
उसके शरीर से आती जंगल, भीगी मिट्टी और हल्की वुडी खुशबू ने जैसे पूरे पल को अपने अंदर समेट लिया।
सिया की धड़कनें बेकाबू हो गईं। 💗
अनजाने में उसके दोनों हाथ अर्जुन के चौड़े कंधों पर टिक गए।काले कोट के मोटे कपड़े के पार भी...उसे उसकी मज़बूत मांसपेशियाँ साफ़ महसूस हो रही थीं।
उसकी उँगलियाँ अनजाने में अर्जुन के बाइसेप को हल्का-सा छू गईं।
लेकिन...
अर्जुन की आँखें अब भी उसकी आँखों से नहीं मिलीं।
उसने धीरे से सिया को सीधा खड़ा किया।और हमेशा की तरह सपाट आवाज़ में बोला—
"संभलकर, राजकुमारी।" 😑
बस इतना कहकर...वो बिना उसकी ओर देखे आगे बढ़ गया।
"अ... अर्जुन..." 🥺
सिया ने धीमे से पुकारा।
लेकिन वो रुका नहीं।उसकी चाल वैसी ही स्थिर रही...
मानो उसने पीछे से आती उस आवाज़ को सुना ही न हो।
सिया देर तक वहीं खड़ी रही।
आज भी...उसने उसे गिरने नहीं दिया।
लेकिन अपने दिल के करीब भी आने नहीं दिया।
*”*
दूसरी ओर...
महल की बालकनी में शाम की ठंडी हवा बह रही थी।
काव्या रेलिंग के सहारे खड़ी दूर आसमान को निहार रही थी।तभी पीछे से विवेक दो कप कॉफी लेकर आया।
"मैडम..."
"आपकी पसंद की कॉफी।"
काव्या मुस्कुराई।
"वाह... आज सूरज पश्चिम से निकला क्या?"
विवेक हँस पड़ा।
"नहीं..."
"बस किसी खास के लिए कॉफी बनाने का मन कर गया।"
काव्या ने बनावटी गुस्से से उसे देखा।
"अच्छा जी?" 😏
दोनों साथ खड़े होकर कॉफी पीने लगे।
कुछ देर बाद...
विवेक ने धीरे से काव्या का हाथ पकड़ने की कोशिश की।
काव्या ने तुरंत मुस्कुराते हुए उसकी कलाई पर हल्की-सी चपत लगा दी। 🤭
"क्या कर रहे हैं आप?"
विवेक शरारत से मुस्कुराया।
"कुछ नहीं..."
"बस हाथ ठंडे थे..."
"सोचा थोड़ा गर्म कर लूँ।" 😂
"बहुत शरारती होते जा रहे हैं आप।"
"आपकी संगत का असर है।"
काव्या हँस पड़ी। 😊
कुछ पल तक दोनों चुप रहे।
फिर विवेक धीरे से उसके थोड़ा और करीब आया।
उसकी आवाज़ बेहद धीमी थी।
"आज आप... बहुत सुंदर लग रही हैं।" ❤️
काव्या ने तुरंत भौंहें उठा दीं।
"अच्छा...? बाकी दिनों में सुंदर नहीं लगती क्या?" 😏
विवेक ने मुस्कुराकर सिर हिलाया।
"लगती तो रोज़ हैं..."
"लेकिन आज..."
उसने कुछ पल उसे देखा।
"...आज ज़रा ज़्यादा सुंदर लग रही हैं।" 🤍
काव्या की मुस्कान खुद-ब-खुद गहरी हो गई।
उसने शर्माते हुए कॉफी का कप होंठों से लगा लिया।
"आप भी ना..." ☺️
विवेक ने धीरे से कहा—
"अगर हर दिन ऐसा ही मुस्कुराती रहीं..."
"तो शायद मुझे हर दिन आपसे प्यार थोड़ा और हो जाएगा।"
काव्या ने नज़रें झुका लीं।
शाम की ठंडी हवा में...दोनों की हल्की-हल्की मुस्कानें किसी नए रिश्ते की शुरुआत का एहसास करा रही थीं।
उधर...
महल के शाही किचन में...
नया स्टाफ मेंबर "आकाश" अकेला खड़ा था। उसके चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान फैल गई।उसने जेब से एक छोटी-सी शीशी निकाली।उसमें हल्के नीले रंग का तरल भरा था। उसने सावधानी से उसकी कुछ बूंदें एक मसाले में मिला दीं।फिर अपने मोबाइल पर कॉल मिलाई।
दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई—
"काम हो गया?"
आकाश की मुस्कान और गहरी हो गई।
"ये सिर्फ शुरुआत है..."
"पहली चाल उसके शरीर पर होगी..."
"अगली उसके दिल पर..."
वो धीमे से हँसा।
"और जिस दिन अर्जुन टूटेगा..."
"उसी दिन हमारा असली खेल शुरू होगा।" 🔥
फोन कट गया।आकाश ने शीशी वापस जेब में रखी...
और ऐसे काम करने लगा...
मानो वो महल का सबसे ईमानदार कर्मचारी हो। 😏
लेकिन उसकी आँखों में छिपी साज़िश...
आने वाले तूफ़ान की गवाही दे रही थी।
*****
रात धीरे-धीरे और गहरी होती जा रही थी। महल की दीवारों पर फैला सन्नाटा जैसे किसी अनजाने तूफ़ान का इंतज़ार कर रहा था। डिनर के समय सब कुछ बिल्कुल सामान्य लग रहा था।सिया ने सबके साथ खाना खाया।
अर्जुन ने हमेशा की तरह सिर्फ़ कॉफी पी और किसी ज़रूरी कॉल का बोलकर वहाँ से चला गया। किसी को अंदाज़ा भी नहीं था...कि आने वाले कुछ घंटे पूरे महल की ज़िंदगी बदल देने वाले थे।
कुछ देर बाद...
सिया अपने कमरे में बैठी किताब पढ़ रही थी।
अचानक उसके माथे पर तेज़ दर्द उठा।
उसने सिर पकड़ लिया।
"आह..." 😣
उसकी साँसें धीरे-धीरे भारी होने लगीं।
दिल की धड़कनें अनियंत्रित-सी महसूस होने लगीं।
कमरे की हर चीज़ उसकी आँखों के सामने धुंधली पड़ने लगी।
उसने उठने की कोशिश की...
लेकिन उसके कदम लड़खड़ा गए। माथे पर पसीने की बूँदें चमकने लगीं। होंठ सूख चुके थे।
"को... कोई है...?" उसकी धीमी आवाज़ कमरे में ही खो गई।
जारी(..)
© Diksha
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यह भाग 2000+ शब्दों का है। इसे लिखने में मुझे बहुत समय, मेहनत और प्यार लगा है। यदि आपको यह अध्याय पसंद आया हो, तो कृपया इसे रेटिंग दें और अपने रिव्यू ज़रूर साझा करें।
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