अध्याय–2 : एक घर, जहाँ सन्नाटा रहता है
सुबह के छह बजे थे। अलार्म बजने से कुछ क्षण पहले ही उमा की आँख खुल गई। यह वर्षों की आदत थी। उसने धीरे से बिस्तर छोड़ा ताकि महेश की नींद न टूटे। खिड़की का पर्दा हटाया तो पूर्व दिशा में हल्की लालिमा फैलने लगी थी। शहर अभी पूरी तरह जागा नहीं था, लेकिन उमा का दिन शुरू हो चुका था। रसोई में गैस जली। चाय चढ़ी। टोस्टर में ब्रेड रखी गई। प्रेशर कुकर में दाल चढ़ गई। मशीन की तरह उसके हाथ काम कर रहे थे। हर काम का समय निश्चित था—
छह बजकर दस मिनट पर चाय,
छह बजकर बीस मिनट पर नाश्ता,
सात बजे तक टिफ़िन तैयार।
करीब साढ़े छह बजे महेश बाहर आया।
हाथ में मोबाइल था और कानों में ब्लूटूथ ईयरफ़ोन।
"गुड मॉर्निंग," उमा ने मुस्कराकर कहा।
महेश ने सिर हिलाकर औपचारिक-सा उत्तर दिया।
उसकी निगाह अब भी मोबाइल स्क्रीन पर थी।
"आज नाश्ते में पोहा बनाया है," उमा ने कहा।
"हूँ..."बस इतना ही।
नाश्ते की मेज़ पर दोनों आमने-सामने बैठे थे, लेकिन उनके बीच बातचीत से अधिक मोबाइल की स्क्रीनें थीं। महेश बीच-बीच में किसी ईमेल का उत्तर देता, कभी किसी वीडियो कॉन्फ़्रेंस का संदेश पढ़ता। उमा कई बार उसे देखती, मानो किसी अवसर की प्रतीक्षा कर रही हो।
"सुनो..." उसने धीरे से कहा।
"हाँ... बोलो।"
"अगले रविवार अगर समय हो तो कहीं चलें?"
महेश ने बिना सिर उठाए कहा,
"देखता हूँ। शायद दिल्ली से टीम आ रही है।"
"अगर न आए तो?"
"फिर देखते हैं।"
यह 'देखते हैं' उमा के जीवन का सबसे लंबा शब्द बन चुका था। इस शब्द में न हाँ थी, न ना—सिर्फ़ टल जाना था। महेश जल्दी-जल्दी नाश्ता समाप्त कर उठा।
"टिफ़िन बैग में रख दिया है," उमा ने कहा।
"ठीक है।"
"शाम को जल्दी आओगे?"
महेश जूते पहनते हुए बोला, "कोशिश करूँगा।"
उमा जानती थी—'कोशिश' का अर्थ अक्सर 'नहीं' होता है।दरवाज़ा बंद हुआ। लिफ़्ट की आवाज़ आई। फिर सब शांत। पूरा फ्लैट एकाएक खाली हो गया। उमा कुछ क्षण दरवाज़े को देखती रही। उसे हमेशा लगता था कि शायद अभी घंटी बजेगी और महेश कहेगा—
"आज छुट्टी लेते हैं, चलो कहीं घूमने चलते हैं।"
लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ। उसने धीरे-धीरे घर समेटना शुरू किया। बिस्तर ठीक किया, कपड़े तह किए, पौधों में पानी डाला। नौ बजे तक सारे काम समाप्त हो गए। अब पूरा दिन उसके सामने पड़ा था—लंबा, शांत और बोझिल।उसने पुस्तक रैक खोली। शादी से पहले की कई किताबें अब भी वहीं रखी थीं—उपन्यास, कविता-संग्रह, मनोविज्ञान और दर्शन की पुस्तकें। उसने एक किताब उठाई, दो पन्ने पढ़े और फिर वापस रख दी। पढ़ने के लिए मन का शांत होना भी आवश्यक होता है। दीवार पर टँगी एक फ़्रेम की ओर उसकी नज़र गई।वह उसकी स्नातकोत्तर उपाधि का प्रमाणपत्र था।कभी वह विश्वविद्यालय की मेधावी छात्राओं में गिनी जाती थी। मनोविज्ञान उसके लिए केवल विषय नहीं, आनंद था। वह कॉलेज में पढ़ाना चाहती थी। शोध करना चाहती थी।उसी समय महेश उसके जीवन में आया था। दोनों परिवारों की सहमति से विवाह हुआ। महेश पढ़ा-लिखा, सफल और विनम्र युवक था। उमा को लगा था कि उसके सपनों को एक साथी मिल गया है। शादी के कुछ महीनों बाद एक दिन महेश ने सहज भाव से कहा था—
"मेरी नौकरी में लगातार तबादले होते रहेंगे। अगर तुम नौकरी करोगी तो कठिनाई होगी। वैसे भी मेरी आय पर्याप्त है। तुम चाहो तो घर संभालो।"महेश ने आदेश नहीं दिया था।लेकिन प्रेम में कही गई हर बात कई बार आदेश से भी अधिक प्रभावशाली होती है। उमा ने बिना किसी विरोध के अपनी नौकरी छोड़ दी। उसे विश्वास था कि परिवार के लिए किया गया त्याग एक दिन प्रेम बनकर लौटेगा। समय बीतता गया। महेश का वेतन बढ़ता गया।घर बड़ा होता गया। सुविधाएँ बढ़ती गईं लेकिन दोनों के बीच संवाद छोटा होता गया।उमा को धीरे-धीरे महसूस हुआ कि उसने नौकरी ही नहीं छोड़ी, उसने अपना सामाजिक संसार भी खो दिया है। सहेलियाँ दूर होती गईं।कॉलेज छूट गया। अपने निर्णयों का अधिकार भी कहीं पीछे रह गया। दोपहर के बारह बजे दरवाज़े की घंटी बजी। कामवाली आई। आधे घंटे में काम निपटाकर चली गई फिर वही सन्नाटा। उमा ने टीवी चलाया। समाचार, धारावाहिक, रियलिटी शो—कुछ भी मन नहीं लगा। उसने टीवी बंद कर दिया। दोपहर का भोजन उसने अकेले किया। अकेले खाने की भी एक अलग आवाज़ होती है।चम्मच की हल्की खनक, प्लेट का सरकना और बीच-बीच में गहरी साँसें। भोजन के बाद वह कुछ देर सोना चाहती थी, पर नींद नहीं आई। उसने मोबाइल उठाया। रात वाले अनजान नंबर की चैट अब भी खुली थी। वह कुछ देर उसे देखती रही। क्या उसे संदेश भेजना चाहिए? नहीं... कहीं वह गलत अर्थ न निकाल ले ,लेकिन तभी स्क्रीन चमकी।
शोभित: "सुप्रभात। उम्मीद है आज का दिन कल से बेहतर होगा।"
उमा अनायास मुस्करा दी।उसने उत्तर दिया—"सुप्रभात।"
कुछ ही क्षण में दूसरा संदेश आया—
"आज मुस्कुराई थीं?"
उमा ने लिखा—"थोड़ी देर के लिए।"
"कारण?"
"तुम्हारा संदेश।"
शोभित ने जवाब दिया—"तो आज का लक्ष्य पूरा हुआ।"
उमा ने पहली बार महसूस किया कि किसी ने उसके मुस्कुराने को भी महत्व दिया है।
कुछ देर बाद शोभित ने पूछा—"आज क्या कर रही हो?" उमा ने कमरे के चारों ओर देखा फिर लिखा—
"कुछ नहीं। यही तो समस्या है।"
शोभित ने उत्तर दिया—"कुछ नहीं करना भी कभी-कभी सबसे कठिन काम होता है।"
उमा ने मोबाइल अपने पास रख लिया। उसे आश्चर्य हो रहा था कि एक अनजान व्यक्ति उसके मन की बात कैसे समझ लेता है। शाम ढलने लगी। सूरज की किरणें बालकनी से खिसककर दीवार पर चढ़ गईं। उमा ने फिर महेश को संदेश भेजा—
"आज जल्दी आ पाओगे?"
कुछ देर बाद उत्तर आया—
"नहीं। एक ज़रूरी प्रेज़ेंटेशन है। खाना खा लेना।"
उमा ने संदेश पढ़ा और मोबाइल मेज़ पर रख दिया।उसकी आँखों में आँसू नहीं थे। शायद आँसू भी बार-बार बुलाने पर आना छोड़ देते हैं। रात को उसने फिर शोभित से बात की लेकिन आज उसने अपने बारे में कुछ नहीं कहा। सिर्फ़ एक प्रश्न पूछा—
"शोभित... क्या सचमुच हर शादी में कुछ वर्षों बाद बातें कम हो जाती हैं?"
शोभित ने उत्तर देने में समय लिया फिर लिखा—
"बातें कम नहीं होतीं, उन्हें कम कर दिया जाता है। रिश्ते अचानक नहीं टूटते, वे हर दिन थोड़ा-थोड़ा चुप होते जाते हैं और एक दिन दोनों को लगता है कि सामने वाला बदल गया है, जबकि सच यह होता है कि दोनों ने एक-दूसरे को सुनना बंद कर दिया होता है।"
उमा उस उत्तर को देर तक पढ़ती रही। उसे लगा, जैसे किसी ने उसके घर का दरवाज़ा नहीं, उसके मन का बंद कमरा खोल दिया हो।
शेष अगले भाग में.......
आलोक मिश्रा " मनमौजी "