कमला सुबह चार बजे उठी थी। रात भर की बारिश ने मिट्टी की दीवारों में नमी भर दी थी, पर वह इस आदी थी। चूल्हे पर पानी चढ़ाया, बचे हुए आटे से दो रोटियाँ बनाईं। एक उसने खुद खाई, दूसरी कागज में लपेटकर झोले में रख दी। अमित को कॉलेज भेजने के बाद वह सीधे शर्मा जी के बंगले जाएगी। वहाँ सुबह का काम जल्दी निपटाना था। आज शाम को अमित का कॉलेज में सम्मान समारोह था। उसे पुरस्कार मिलना था। कमला के कदम जैसे हवा में उड़ रहे थे। उसने सोचा, आज काम खत्म करके जल्दी वापस आएगी। अमित के लिए नई कमीज़ सिली थी। कल ही बाजार से कपड़ा लाई थी।
शर्मा जी का बंगला गली के आखिर में था। दो मंजिला। बाहर गाड़ियाँ खड़ी रहतीं। कमला वहाँ पिछले आठ साल से काम कर रही थी। सुबह बर्तन मांजना, फर्श पोछना, कपड़े धोना। दोपहर को छुट्टी। फिर शाम को दो घंटे। महीने की तीन हजार रुपये। शर्मा जी की बीवी, जिन्हें सब मैम कहते थे, हमेशा कुछ न कुछ कहती रहतीं। पर कमला चुपचाप सब सहन कर लेती। उसे पता था, गुस्सा करने से काम नहीं चलता। अमित की पढ़ाई बाकी थी। बीए अंतिम वर्ष। उसके बाद एमए। फिर नौकरी। फिर माँ को इस ज़िंदगी से निकालेगा। यही सपना था।
आज जब कमला पहुँची, तो मैम का चेहरा कुछ और ही था। आँखें लाल। होंठ काँप रहे थे।
"अरे आ गई चोरनी," मैम ने दरवाज़े पर ही कहा।
कमला समझी, शायद मज़ाक है। वह हँसकर अंदर बढ़ी। "मैम, आज थोड़ा जल्दी जाना होगा। बेटे का समारोह है।"
"समारोह? तुम्हारे जैसों का कोई समारोह नहीं होता। तुम्हारा तो सिर्फ जेल जाना तय है।"
कमला चौंकी। "मैम?"
"चुप। मेरी दादी की चांदी की चम्मच गायब है। कल शाम तक तो थी। आज सुबह नहीं मिल रही। कल तुम्हारे अलावा और कोई नहीं आया था।"
"मैम, मैंने कुछ नहीं लिया। मैं तो सिर्फ बर्तन मांजे थे।"
"झूठ। तुम जैसी औरतें सब झूठ बोलती हैं। गरीबी का नाटक करती हो। और अंदर से सब चोर।"
कमला की आँखों में आँसू आ गए। "मैम, मैं आठ साल से यहाँ हूँ। कभी कुछ..."
"आठ साल से चोरी कर रही हो। आज पकड़ी गई।"
मैम की आवाज़ इतनी ऊँची थी कि पड़ोस की आयी भी बाहर आ गई। कमला काँप रही थी। उसने अपना झोला खोला। "देख लीजिए मैम। मेरे पास कुछ नहीं है।"
"अरे वाह। चोर चोरी करके झोले में थोड़े ही रखता है। बेच आई होगी।"
कमला फर्श पर बैठ गई। "मैम, मैं अपनी कसम खाती हूँ। मैंने कुछ नहीं लिया।"
"कसम? तुम्हारी कसम कौन लेता है।"
तभी गेट की घंटी बजी। अमित आया था। कॉलेज की किताबें हाथ में थीं। उसने माँ को फर्श पर बैठा देखा। मैम को गुस्से में खड़ा देखा।
"माँ, क्या हुआ?" अमित दौड़ा।
कमला उठने की कोशिश की। पर मैम ने रोक लिया। "रुको। जब तक चम्मच नहीं मिलती, तब तक यहीं रुको।"
अमित ने माँ का हाथ पकड़ा। "माँ?"
कमला ने बेटे को देखा। उसके होठ काँप रहे थे। पर उसने कहा, "कुछ नहीं बेटा। मैम की एक चीज़ गुम हो गई है। ढूँढ रहे हैं।"
मैम ने अमित को घूरा। "ओहो, तो यह है तुम्हारा लाडला। पढ़ लिखकर बड़ा आदमी बनेगा। पर माँ चोर है। बेटा क्या सीखेगा?"
अमित का चेहरा लाल हो गया। "मैम, आप क्या कह रही हैं?"
"वही जो सच है। तुम्हारी माँ ने मेरी चांदी की चम्मच चुराई है।"
"मेरी माँ चोर नहीं है," अमित की आवाज़ भी काँप रही थी।
"तो कौन है? मैं? मेरे बच्चे? हम अपनी चम्मच चुराकर तुम्हारी माँ पर इल्ज़ाम लगाएँ?"
पड़ोस की आयी ने कहा, "मैम, शायद कहीं गिर गई हो।"
"गिरी नहीं है। चुराई गई है।"
कमला ने अमित का हाथ ज़ोर से पकड़ा। "चल बेटा। हम चलते हैं।"
"कहाँ चलोगी? पुलिस बुलाऊँ?" मैम ने फोन उठाया।
कमला रुक गई। उसने मैम को देखा। आठ साल का हर दिन आँखों के सामने घूम गया। सर्दियों में ठंडे पानी में बर्तन मांजना। गर्मियों में चूल्हे के पास खड़े होकर रोटियाँ बनाना। बीमार होने पर भी काम पर आना। कभी एक दिन की छुट्टी नहीं। और आज...
"मैम," कमला की आवाज़ अचानक शांत हो गई। "आप जो कह रही हैं, वह झूठ है। मैंने आपकी चम्मच नहीं चुराई।"
"देखो, कितनी बेशर्म है।"
"मैं बेशर्म नहीं हूँ। मैं गरीब हूँ। पर चोर नहीं।"
अमित की आँखों में आँसू थे। उसने माँ को देखा। माँ का चेहरा पीला पड़ गया था। पर उसकी पीठ सीधी थी। आठ साल की ज़िल्लत एक पल में सामने आ गई थी। वह समझ गया कि माँ रोज़ क्या सहती होगी। उसे याद आया, कई बार माँ रात को घर आकर सो जाती थी बिना खाए। कई बार उसके हाथ में चोट के निशान होते थे। वह पूछता तो माँ कहती, "बर्तन फिसल गया।"
मैम फोन पर कुछ बोल रही थीं।
तभी ऊपर से एक आवाज़ आई। "मम्मी।"
शर्मा जी का बेटा, रोहन, सीढ़ियों से उतर रहा था। उसने कहा, "वो चम्मच मैंने कल रात कोने में रख दी थी। मुझे लगा कहीं गिर जाएगी। मैं भूल गया था बताना।"
मैम का हाथ हवा में रुक गया। फोन का बटन दबा ही था।
रोहन ने नीचे आकर कोने की अलमारी खोली। एक कपड़े में चम्मच लपेटी हुई थी। उसने चम्मच माँ को दिखाई।
मैम का चेहरा बदल गया। एक पल के लिए चुप्पी छा गई।
फिर मैम ने कहा, "अच्छा हुआ मिल गई। वैसे भी मुझे शक था कि..."
कमला ने मैम को नहीं देखा। उसने अमित को देखा। फिर रोहन को देखा। उसने अपना झोला उठाया। हाथ से चेहरा पोंछा। और बिना कुछ कहे दरवाज़े की ओर बढ़ी।
"अरे कमला, सुनो तो," मैम ने पीछ से कहा। "गलती हो गई।"
कमला ने पलटकर देखा। "गलती नहीं हुई मैम। ज़िल्लत हुई है। आठ साल की।"
वह बाहर निकली। धूप तेज़ थी। अमित साथ चल रहा था। दोनों चुप थे। काफ़ी दूर चलने के बाद अमित रुका। उसने माँ का हाथ पकड़ा।
"माँ, मैंने कभी नहीं पूछा। पर आज पूछ रहा हूँ। आप रोज़ यही सहती हैं?"
कमला ने बेटे को देखा। उसके गाल पर आँसू थे। उसने हाथ उठाया और बेटे के आँसू पोंछे।
"नहीं बेटा। रोज़ नहीं। कभी कभार।"
"झूठ मत बोलो माँ।"
कमला मुस्कुराई। वह मुस्कुराहट में दर्द था। "बेटा, ज़िल्लत तो हर गरीब की किस्मत में लिखी होती है। पर ज़िल्लत से बड़ी होती है माँ की ममता। तुम्हारे भविष्य के सामने यह ज़िल्लत कुछ नहीं है।"
अमित रोने लगा। सड़क किनारे खड़ा होकर। कमला ने उसे गले लगाया।
"चलो। तुम्हारा समारोह है। देर हो रही है।"
"माँ, मैं समारोह में नहीं जाऊँगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि आज मुझे पता चला कि असली सम्मान कहाँ है। आज मैं आपके साथ घर जाऊँगा। आपके हाथ की रोटी खाऊँगा।"
कमला ने बेटे के सिर पर हाथ फेरा। "नहीं बेटा। समारोह में जाना है। क्योंकि वह सम्मान मेरी ज़िल्लत का बदला है। तुम जाओगे, पुरस्कार लोगे। और जब मंच पर खड़े होकर तुम्हें तालियाँ मिलेंगी, तो मैं वहाँ कहीं पीछे खड़ी हूँगी। और मेरी आँखों में आँसू नहीं, गर्व होगा।"
अमित ने माँ का चेहरा अपने हाथों में लिया। "माँ, एक दिन मैं आपको इस ज़िल्लत से बाहर निकालूँगा।"
"नहीं बेटा," कमला ने धीरे से कहा। "तुम मुझे इस ज़िल्लत से नहीं निकालोगे। तुम इस ज़िल्लत को मिटाओगे। न सिर्फ मेरी, हर उस माँ की जो आज किसी के घर में अपनी इज़्ज़त गँवा रही है।"
दोनों फिर चलने लगे। सड़क पर धूल उड़ रही थी। पर कमला के कदम पहले से मज़बूत थे। उसने सोचा, आज शर्मा जी के घर से निकलते समय जो ज़िल्लत मिली, वह शायद आखिरी थी। कल से नई सुबह होगी। नई ज़िद होगी।
और अमित ने मन में कसम खाई। कि वह माँ की हर उस रात का हिसाब चुकाएगा जब वह रोकर सोई होगी। हर उस दिन का बदला लेगा जब किसी ने उसे चोर कहा होगा। नहीं हथियार से। नहीं गुस्से से। बल्कि अपने काम से। अपनी इमानदारी से। अपनी माँ के सपनों को सच करके।
क्योंकि ज़िल्लत सिर्फ उसी दिन तक रहती है, जब तक इंसान हार नहीं मान लेता। और कमला हार मानने वालों में से नहीं थी। वह माँ थी। और माँ की ममता में ज़िल्लत को ज़िंदगी में बदलने की ताकत होती है।
सूरज सिर पर था। दोनों माँ बेटे आगे बढ़ रहे थे। एक की आँखों में सपने थे। दूसरी की आँखों में संकल्प। और दोनों के दिल में एक दूसरे के लिए बेपनाह मोहब्बत।
ज़िल्लत आज हार गई। ममता जीत गई।