वह आखिरी सुबह
नीलगढ़ की सुबह कभी रोशनी के साथ नहीं आती थी। यहाँ सवेरा किसी पुराने कैनवास पर बिखरे स्लेटी और सफ़ेद रंगों के धुंधले घोल जैसा होता था, जो धीरे-धीरे पहाड़ियों की ढलानों पर फैलता था। समुद्र तल से बाईस सौ मीटर की ऊँचाई पर बसा यह छोटा सा कस्बा जब ओस और धुंध की चादर से बाहर निकलने की कोशिश करता, तब तक दोपहर के बारह बज चुके होते थे। देवदार और बलूत के ऊँचे, काले पेड़ इस धुंध में किसी खामोश पहरेदार की तरह खड़े रहते थे, मानो वे सदियों पुराना कोई ऐसा रहस्य छुपा रहे हों जिसे ज़ुबान पर लाना गुनाह था।
शर्मा हवेली की पहली मंज़िल की खिड़की से बाहर देखते हुए मीरा ने अपने शॉल को कंधों पर और कस लिया। शीशे पर जमी भाप में उसने अपनी उँगली से एक लकीर खींची। बाहर, नील झील का पानी उस धुंधलके में भी एक अस्वाभाविक, गहरा नीला रंग समेटे हुए था एक ऐसा नीला रंग जो किसी नदी का नहीं होता, किसी समंदर का नहीं होता, बल्कि उस गहराई का होता है जहाँ रोशनी पहुँचकर दम तोड़ देती है।
कमरे में ठंडी हवा की एक पतली सी लहर खिड़की की दरार से छनकर आई और टेबल पर रखी चाय की प्याली से उठती भाप को उड़ा ले गई।
"आर्यन?" मीरा ने बिना मुड़े पुकारा। उसकी आवाज़ हवेली के सीलन भरे, ऊँचे काष्ठ-स्तंभों से टकराकर धीमी होकर लौट आई।
कमरे के दूसरे कोने में पुरानी, भारी शीशम की स्टडी टेबल पर कागज़ों के बिखरे ढेर के बीच आर्यन बैठा हुआ था। उसकी लंबी, पतली उँगलियाँ एक पुराने नक्शे के ऊपर तेज़ी से दौड़ रही थीं। आँखों पर चढ़ा मोटा चश्मा नाक की नोक पर खिसक आया था, और उसकी गहरी, भूरी आँखें किसी अदृश्य पहेली के ताने-बाने में उलझी हुई थीं। पिछले छह महीनों में आर्यन बदल गया था उसकी आँखों के नीचे गहरे काले घेरे पड़ गए थे, हल्की दाढ़ी बढ़ आई थी, और उसकी हँसने की आदत जैसे नीलगढ़ की धुंध में ही कहीं गुम हो गई थी।
"हूँ?" आर्यन ने बिना सिर उठाए जवाब दिया। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी अनुपस्थिति थी, जैसे वह शरीर से तो इस कमरे में था, लेकिन उसकी चेतना किसी बहुत दूर की दुनिया में टहल रही थी।
"चाहो तो चाय ठंडी होने का इंतज़ार कर सकते हो," मीरा ने मुड़ते हुए कहा। उसकी आवाज़ में थोड़ी नाराज़गी और ढेर सारी चिंता घुली हुई थी। "रात के तीन बजे से तुम उसी टेबल पर बैठे हो, आर्यन। यह रिसर्च... यह इतिहास का भूत तुम्हें निगल जाएगा एक दिन।"
आर्यन ने एक गहरी साँस ली। उसने चश्मा उतारा और अपनी आँखों को मसलते हुए मीरा की तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर एक फीकी, थकी हुई मुस्कान उभरी। "यह इतिहास नहीं है, मीरा। इतिहास तो वह होता है जो बीत चुका हो, जो मर चुका हो। लेकिन नीलगढ़... नीलगढ़ में कुछ भी मरता नहीं है। सब कुछ यहीं सांस ले रहा है, बस दीवार की दूसरी तरफ़।"
मीरा ने अपनी आँखें मूँद लीं। वही बातें। पिछले तीन महीनों से आर्यन हर दूसरी बातचीत में ऐसे शब्द इस्तेमाल करने लगा था जिनका कोई व्यावहारिक अर्थ नहीं निकलता था। कभी 'परतें', कभी 'गूँज', तो कभी 'दिशाहीन समय'। एक चित्रकार होने के नाते मीरा कल्पनाशीलता को समझती थी उसकी अपनी उँगलियों पर हमेशा वाटरकलर और ऑयल पेंट के निशान रहते थे, उसकी अपनी दुनिया कैनवास पर रंगों के खेल से सजती थी लेकिन आर्यन का यह पागलपन कल्पना नहीं था। यह एक भयावह खिंचाव था जो उसे मीरा से दूर खींच रहा था।
"मुझे यह सब नहीं सुनना, आर्यन," मीरा ने उसके पास आकर उसकी टेबल पर हाथ रखते हुए कहा। मीरा के बाएँ गाल का छोटा सा तिल उसकी उदासी में भी एक अजीब सी मासूमियत जोड़ देता था। "आज हमारी आर्ट गैलरी में दिल्ली से कुछ लोग आने वाले हैं। तुमने वादा किया था कि तुम मेरे साथ चलोगे। तुमने कहा था कि हम आज शाम ढलने से पहले झील के किनारे टहलने जाएँगे... बिल्कुल वैसे ही जैसे हम तीन साल पहले शादी के बाद आए थे।"
आर्यन ने मीरा का हाथ अपने हाथों में ले लिया। उसकी उँगलियाँ बहुत ठंडी थीं, जैसे बर्फ़ के पानी में डुबोकर निकाली गई हों। उसने मीरा की हथेली पर बने पेंट के धब्बों को अपनी अँगूठे से हल्के से सहलाया।
"मीरा..." उसकी आवाज़ अचानक बहुत नरम, बहुत कातर हो गई। "क्या तुम्हें कभी ऐसा लगता है कि यह घर, यह बाज़ार, यह झील... यह सब एक भ्रम है? जैसे हम किसी आईने के सामने खड़े हों और जो हमें दिख रहा है, वह असल में हम नहीं हैं, बल्कि हमारी परछाई है?"
"आर्यन! बंद करो यह सब!" मीरा ने अपना हाथ झटके से छुड़ा लिया। उसकी भूरी आँखों में डर की एक लकीर तैर गई। "तुम डॉक्टर हो, तुम एक इतिहासकार हो! क्या हो गया है तुम्हें? जब से हम इस हवेली में आए हैं, जब से तुम्हारी दादी की मौत हुई है, तुम दिन-ब-दिन उस बंद कमरे की तरफ़ खिंचते जा रहे हो! ऊपर की मंज़िल पर ताला लगा है, फिर भी तुम रात-रात भर वहाँ सीढ़ियों के पास जाकर खड़े रहते हो। तुम किससे बात करते हो रात को?"
आर्यन शांत रहा। उसने अपनी पुरानी कॉटन की शर्ट के कॉलर को ठीक किया और कुर्सी से खड़ा हो गया। उसने अपने कंधे पर वह पुराना, चमड़े का थैला टाँगा जो हमेशा किताबों और डायरियों से भरा रहता था।
"मैं आज भैरवगढ़ किले के पुराने रिकॉर्ड्स देखने जा रहा हूँ," आर्यन ने धीमी आवाज़ में कहा। उसने अपनी कोरडरॉय की जैकेट उठाई और पहन ली। "और फिर... फिर मुझे झील के उत्तरी छोर पर जाना है। डॉ. सक्सेना ने कुछ पुराने कागज़ात ढूँढे हैं।"
"तुम मेरे सवाल का जवाब टाल रहे हो, आर्यन," मीरा ने उसका रास्ता रोकते हुए कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी। "अगर आज तुम उस गैलरी में नहीं आए, अगर तुमने आज इस सनक को बंद नहीं किया... तो मैं दिल्ली लौट जाऊँगी। मैं रोहन को फोन कर दूंगी।"
आर्यन रुक गया। उसने मीरा के चेहरे को बहुत ध्यान से देखा, जैसे वह उसकी एक-एक रेखा को, उसके हर भाव को अपने दिमाग में हमेशा-हमेशा के लिए छाप लेना चाहता हो। उसकी आँखों में अचानक एक ऐसा दर्द उभरा जो मीरा ने पहले कभी नहीं देखा था एक ऐसा दर्द जो किसी के बिछड़ने से पहले ही उसके दिल में घर कर लेता है।
"तुम कहीं नहीं जाओगी, मीरा," आर्यन ने बहुत धीरे से कहा, और अपने दोनों हाथों से मीरा के चेहरे को थाम लिया। उसकी ठंडी उँगलियों का स्पर्श मीरा की त्वचा पर सिहरन पैदा कर गया। "तुम नीलगढ़ छोड़कर कभी नहीं जा सकतीं... क्योंकि तुम..." वह वाक्य अधूरा छोड़ गया।
"क्योंकि मैं क्या, आर्यन?"
आर्यन ने उसके माथे को चूमा। एक लंबा, नम और भारी चुंबन।
"कुछ नहीं," आर्यन ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन उसकी आँखों में नमी साफ़ दिख रही थी। "मुझे जाने दो। आज शाम तक सब साफ़ हो जाएगा। मैं शाम को गैलरी आऊँगा... या हवेली पर मिलूँगा। शाम तक वापस आऊँगा, मीरा। मैं तुमसे वादा करता हूँ।"
उसने अपना हाथ हटाया, मुड़ा और भारी लकड़ी के दरवाज़े को खोलकर बाहर निकल गया। सीढ़ियों पर उसकी भारी जूतियों की आवाज़ धीरे-धीरे धीमी होती गई, और फिर हवेली के मुख्य द्वार के बंद होने की एक भारी गूँज गूँज उठी।
मीरा वहीं खिड़की के पास खड़ी रही। उसने देखा कि आर्यन धुंध से भरी सड़क पर पैदल चलता हुआ जा रहा था। उसका सुडौल, दुबला-पतला शरीर धीरे-धीरे उस सफ़ेद कोहरे में लीन हो रहा था। सड़क के मोड़ पर पहुँचकर आर्यन एक पल के लिए रुका। उसने पीछे मुड़कर हवेली की तरफ़ देखा सीधे मीरा की खिड़की की ओर। धुंध इतनी घनी थी कि मीरा उसका चेहरा साफ़ नहीं देख पा रही थी, लेकिन उसे लगा कि आर्यन उसकी तरफ़ देखकर हाथ हिला रहा था।
और फिर, वह कोहरे में पूरी तरह से गायब हो गया।
दोपहर के तीन बज चुके थे। नीलगढ़ का मौसम अचानक बदल गया था। जो धुंध सुबह स्लेटी थी, वह अब गहरे भूरे और काले बादलों का रूप ले चुकी थी। पहाड़ों पर बारिश होने वाली थी, लेकिन वह अजीब सी, नीरव बारिश थी जिसमें गड़गड़ाहट नहीं होती, बस एक निरंतर सरसराहट होती है।
मीरा अपनी गैलरी में बैठी थी। कैनवास सामने रखा था, हाथ में ब्रश था, लेकिन एक भी रंग उस पर नहीं उतरा था। टेबल पर रखी चाय दो बार ठंडी होकर फेंक दी गई थी। उसकी सहेली काव्या जोशी, जो पास के ही प्राइमरी स्कूल में इतिहास पढ़ाती थी, हाथ में दो गर्मागर्म समोसे लिए गैलरी में दाखिल हुई।
"यार मीरा! तुम आज फिर उसी सोच में डूबी हो?" काव्या ने अपनी कलाइयों की रंग-बिरंगी चूड़ियों को खनकाते हुए कहा। गोल चेहरे और छोटे बालों वाली काव्या नीलगढ़ की इस ठंडी, खामोश फिज़ा में इकलौती ऐसी चीज़ थी जो जीवंत लगती थी। "आर्यन कहाँ है? उसने तो कहा था कि वह आज तुम्हारी नई पेंटिंग्स की नुमाइश में मदद करेगा?"
"वह किले की तरफ़ गया है," मीरा ने बिना कैनवास से नज़र हटाए कहा। उसकी उँगलियाँ ब्रश को इतनी कसकर भींचे हुए थीं कि उसके पोर सफ़ेद पड़ गए थे। "उसका कहना है कि उसे कुछ ढूँढना है। काव्या... मुझे डर लग रहा है। आर्यन पहले जैसा नहीं रहा। वह बातें करता है जो मेरे सिर के ऊपर से निकल जाती हैं।"
काव्या का चुलबुला चेहरा एक पल के लिए गंभीर हो गया। उसने खिड़की के बाहर देखा, जहाँ नील झील का पानी हवा के झोंकों के बावजूद अजीब तरह से शांत था। उसमें कोई लहर नहीं उठ रही थी।
"नीलगढ़ का इतिहास थोड़ा भारी है, मीरा," काव्या ने धीमी आवाज़ में कहा, जैसे कोई राज़ बता रही हो। "मेरे दादा जी कहते थे कि इस कस्बे में जो लोग बहुत ज़्यादा गहराई में उतरने की कोशिश करते हैं, पहाड़ उन्हें अपना हिस्सा बना लेते हैं। आर्यन एक शोधकर्ता है, उसे पुरानी इमारतों और पुरानी कहानियों का चस्का है। लेकिन तुम चिंता मत करो, वह आ जाएगा। शाम के चार ही तो बजे हैं।"
"लेकिन काव्या, मेरा दिल बैठा जा रहा है," मीरा ने ब्रश नीचे रखते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी हड़बड़ाहट आ गई थी। "सुबह जब वह गया... उसकी आँखें ऐसी थीं जैसे वह आख़िरी बार मुझे देख रहा हो। उसने मुझसे कहा 'शाम तक वापस आऊँगा'। उसने कभी इस तरह वादा नहीं किया था।"
"तुम ज़रूरत से ज़्यादा सोच रही हो," काव्या ने उसके कंधे को सहलाते हुए कहा। "चलो, मैं तुम्हें चाय बनाकर पिलाती हूँ। और सुनो, नींद की गोलियाँ लेना बंद करो जो डॉ. सक्सेना ने तुम्हें दी हैं। वे तुम्हारे दिमाग को और भारी कर रही हैं।"
लेकिन मीरा का ध्यान काव्या की बातों पर नहीं था। उसकी नज़र गैलरी की दीवार पर टंगी अपनी ही एक पुरानी पेंटिंग पर अटक गई थी। वह पेंटिंग उसने दो साल पहले बनाई थी नील झील का एक नज़ारा। लेकिन आज, इस धुंधले उजाले में, उस पेंटिंग में कुछ अलग लग रहा था। झील के पानी के नीचे... क्या उसने हमेशा से वहाँ एक धुंधली सी, उल्टी इमारत बनाई थी? या वह रंग की कोई गलती थी?
मीरा उस पेंटिंग के पास जाने ही वाली थी कि गैलरी का पुराना लैंडलाइन फोन चीख उठा।
ट्रिंग... ट्रिंग...
सन्नाटे को चीरती हुई वह आवाज़ इतनी तेज़ थी कि मीरा और काव्या दोनों उछल पड़ीं। मीरा का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। उसने काव्या की तरफ़ देखा, जिसकी आँखों में भी अचानक एक अनजाना सा डर तैर गया था।
मीरा ने काँपते हाथों से रिसीवर उठाया।
"हैलो?" मीरा की आवाज़ हलक में ही अटक कर रह गई।
दूसरी तरफ़ से कोई आवाज़ नहीं आई। बस एक भारी, सन्नाटेदार साँस की आवाज़ आ रही थी। जैसे कोई बहुत दूर से, बहुत गहराई से फोन पर साँस ले रहा हो। हवा का एक ऐसा झोंका, जिसमें पानी की नमी और सड़े हुए पत्तों की गंध थी।
"हैलो? आर्यन? तुम हो क्या?" मीरा चिल्लाई।
"मैडम... मीरा शर्मा?" फोन पर एक रूखी, भारी आवाज़ उभरी। यह आर्यन नहीं था। यह इंस्पेक्टर वीरेंद्र रावत की आवाज़ थी नीलगढ़ थाने का प्रभारी।
"हाँ... मैं मीरा बोल रही हूँ। इंस्पेक्टर, क्या हुआ? आर्यन कहाँ है?"
फोन पर एक लंबा सन्नाटा छा गया। इतना लंबा कि मीरा को अपने ही दिल की धड़कन किसी हथौड़े की तरह अपने कानों में बजती हुई सुनाई देने लगी।
"मैडम..." रावत की आवाज़ में एक अजीब सी हिचकिचाहट थी, एक भारीपन था जो किसी भी पुलिस अफ़सर के स्वभाव के ख़िलाफ़ था। "आपको अभी... तुरंत नील झील के पास आना होगा। उत्तरी छोर पर। जो पुराना लकड़ी का घाट है।"
"क्यों? क्या हुआ है वहाँ? आर्यन ठीक तो है ना? बोलिए इंस्पेक्टर!" मीरा का गला सूख गया। उसके पैर काँपने लगे।
"आप बस यहाँ आ जाइए, मैडम। और... अपने साथ कोई गरम शॉल ले आइएगा। मौसम बहुत खराब हो रहा है।"
कॉल कट गई।
सिग्नल जाने की बीप-बीप की आवाज़ उस खामोश गैलरी में गूँजती रही। रिसीवर मीरा के हाथ से छूटकर नीचे गिर पड़ा और तार के सहारे हवा में झूलने लगा।
नील झील का उत्तरी छोर नीलगढ़ का सबसे सुनसान इलाका था। यहाँ बलूत के पेड़ इतने घने थे कि दिन में भी धूप ज़मीन तक नहीं पहुँच पाती थी। पुराना लकड़ी का घाट आधी सदी पहले टूट चुका था और उसके काले, सड़े हुए खंभे पानी से बाहर निकले हुए किसी कंकाल की उँगलियों जैसे लगते थे।
जब मीरा और काव्या वहाँ पहुँचीं, तो वहाँ तीन पुलिस की गाड़ियाँ खड़ी थीं, जिनकी लाल-नीली बत्तियाँ घने कोहरे में तैर रही थीं। कुछ स्थानीय लोग दूर खड़े होकर फुसफुसा रहे थे। हवा में एक अजीब सा सन्नाटा था ऐसा सन्नाटा जो किसी अनहोनी के बाद ही छाता है।
मीरा ने दौड़ना शुरू कर दिया। उसके नंगे पैर गीली मिट्टी और नुकीले पत्थरों पर पड़ रहे थे, लेकिन उसे दर्द का अहसास नहीं हो रहा था। उसका शॉल कंधे से फिसलकर गिर गया, लेकिन उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
"मीरा! रुको!" काव्या पीछे से चिल्लाई, लेकिन मीरा सुन नहीं रही थी।
घाट के पास, दो पुलिसवाले एक सफ़ेद प्लास्टिक की चादर के पास खड़े थे। पानी से भीगी हुई चादर ज़मीन पर पड़ी किसी चीज़ को ढके हुए थी। इंस्पेक्टर रावत टोपी हाथ में लिए मुँह फेरकर खड़े थे। जब उन्होंने मीरा को आते देखा, तो उनके चेहरे पर गहरा अफ़सोस छा गया।
"इंस्पेक्टर!" मीरा हाँफ रही थी। उसकी भूरी आँखें पागलों की तरह चारों तरफ़ घूम रही थीं। "आर्यन कहाँ है? आप लोगों ने मुझे यहाँ क्यों बुलाया है? वह कहाँ है?"
रावत ने आगे बढ़कर मीरा को रोकने की कोशिश की। "मैडम... आप आगे मत जाइए। पहले खुद को संभालिए..."
"हटो मेरे रास्ते से!" मीरा ने रावत को ज़ोर से धक्का दिया। उसकी ताक़त देखकर रावत भी चौंक गए।
मीरा उस सफ़ेद चादर के पास घुटनों के बल गिर पड़ी। उसके हाथ काँप रहे थे। उसने हिम्मत जुटाकर चादर के एक कोने को पकड़ा और धीरे से पीछे खींच दिया।
चादर के नीचे आर्यन पड़ा हुआ था।
उसका चेहरा बिल्कुल शांत था। आँखें आधी खुली हुई थीं, जिनमें आसमान का स्लेटी रंग जम चुका था। उसके काले बाल गीले होकर उसके माथे से चिपके हुए थे। उसके कपड़े वही कोरडरॉय की जैकेट और पुरानी शर्ट पानी से पूरी तरह सराबोर थे। लेकिन सबसे अचरज की बात यह थी कि उसके चेहरे पर किसी तरह की तड़प या डर का कोई निशान नहीं था। ऐसा लग रहा था जैसे वह दर्द में नहीं, बल्कि किसी गहरी, सुहानी नींद में सो रहा हो।
"आर्यन?" मीरा ने उसके गाल को छुआ। उसका शरीर बर्फ़ से भी ज़्यादा ठंडा था। "आर्यन... उठो ना। देखो, मैं आ गई। तुम... तुम तो शाम को आने वाले थे ना? तुमने वादा किया था ना कि तुम शाम तक वापस आओगे? अभी तो शाम भी नहीं हुई, आर्यन... उठो!"
उसने आर्यन के कंधों को पकड़कर हिलाना शुरू कर दिया। "उठो, आर्यन! यह मज़ाक अच्छा नहीं है! तुम जानते हो मुझे ऐसे मज़ाक से नफ़रत है! उठो!"
"मीरा... बस करो..." काव्या ने रोते हुए मीरा को पीछे से पकड़ लिया और उसे अपने गले से लगा लिया। "मीरा, संभालो खुद को... वह चला गया..."
"नहीं! वह नहीं गया!" मीरा चीखी। उसकी चीख उस घने जंगल में, उस शांत झील के ऊपर गूँज उठी। "वह मर नहीं सकता! उसने मुझसे वादा किया था! वह झूठ नहीं बोलता!"
रावत ने डॉ. सक्सेना की तरफ़ इशारा किया, जो थोड़े फासले पर खड़े थे। सक्सेना ने आकर मीरा को एक इंजेक्शन देना चाहा, लेकिन मीरा ने हाथ मारकर सिरिंज नीचे गिरा दी।
"किसी को छूने नहीं दूँगी मैं इसे!" मीरा आर्यन के शव पर झुक गई। उसने अपना चेहरा आर्यन के ठंडे सीने पर रख दिया।
लेकिन तभी... मीरा का ध्यान एक अजीब बात पर गया।
आर्यन के सीने से पानी की कोई बूँद नहीं टपक रही थी। उसके कपड़े भीगे हुए थे, लेकिन जब मीरा ने अपना कान उसके सीने पर रखा, तो उसे पानी की सड़ांध या झील की मिट्टी की गंध नहीं आई। वहाँ आर्यन के वही पुराने परफ्यूम की गंध थी चंदन और सूखी पत्तियों की गंध। और सबसे भयानक बात आर्यन की दाहिनी हथेली भींची हुई थी।
मीरा ने काँपते हाथों से आर्यन की उँगलियों को खोलने की कोशिश की। उँगलियाँ अकड़ चुकी थीं, लेकिन जब मीरा ने ज़ोर लगाया, तो हथेली धीरे से खुली।
आर्यन की हथेली पर... त्वचा के अंदर, नीले रंग का एक अजीब सा निशान बना हुआ था। वह कोई चोट का निशान नहीं था। वह ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उसकी हथेली को इतनी कसकर पकड़ा हो कि उँगलियों के नीले निशान उसकी त्वचा के अंदर ही छप गए हों। एक ऐसा निशान जो मृत्यु के बाद ही उभर सकता था।
"यह... यह क्या है?" मीरा ने फुसफुसाया।
रावत ने जल्दी से झुककर आर्यन की हथेली पर चादर ढक दी। "मैडम, बॉडी को पोस्टमॉर्टम के लिए ले जाना होगा। आप घर चलिए।"
"उसने पानी में दम नहीं तोड़ा, इंस्पेक्टर!" मीरा अचानक खड़ी हो गई। उसकी आँखों में से आँसू बंद हो गए थे, उनकी जगह एक भयानक, ठंडी स्तब्धता ने ले ली थी। "उसके फेफड़ों में पानी नहीं है! वह डूबा नहीं है!"
रावत ने डॉ. सक्सेना की तरफ़ एक गहरी, चेतावनी भरी नज़र डाली। सक्सेना ने अपनी नज़रें झुका लीं।
"मैडम, रिपोर्ट आने दीजिए," रावत ने रूखेपन से कहा, लेकिन उनकी आँखों में छिपा डर मीरा से छुप न सका। "यहाँ मौसम खराब हो रहा है। काव्या, इन्हें हवेली ले जाओ।"
पुलिसवाले आर्यन के शव को स्ट्रेचर पर उठाकर गाड़ी की तरफ़ ले जाने लगे। मीरा वहीं खड़ी देखती रही। उसका दिमाग़ सुन्न हो चुका था। ऐसा लग रहा था जैसे उसकी आत्मा उसके शरीर को छोड़कर हवा में तैर रही हो और वह ऊपर से इस पूरे दृश्य को देख रही हो एक टूटी हुई औरत, एक नीली झील, और एक मरा हुआ आदमी जिसे सफ़ेद चादर में लपेटकर ले जाया जा रहा था।
क्या यह सच था? या यह किसी परछाई की कहानी थी?
रात के नौ बज चुके थे।
शर्मा हवेली में इतना सन्नाटा था कि दीवारों के अंदर दौड़ते हुए दीमक की आवाज़ भी साफ़ सुनाई दे सकती थी। बाहर मूसलाधार बारिश शुरू हो चुकी थी। बिजली तीन घंटे पहले ही जा चुकी थी। पूरे घर में सिर्फ़ एक मोमबत्ती जल रही थी, जो मीरा के बेडरूम की ड्रेसिंग टेबल पर रखी हुई थी।
काव्या दो घंटे पहले ही गई थी। उसने मीरा को सुलाने की बहुत कोशिश की थी, उसे जबरदस्ती दो नींद की गोलियाँ भी खिलाई थीं। लेकिन दवाइयों का असर मीरा के दिमाग़ पर नहीं हो रहा था। उसका दुख इतना गहरा, इतना असीम था कि कोई रसायन उसे सुला नहीं सकता था।
मीरा पलंग पर बैठी थी। उसने आर्यन की वही पुरानी कोरडरॉय जैकेट अपने लपेट रखी थी, जो उसने सुबह पहनी थी। जैकेट में अभी भी आर्यन की महक बाकी थी। वह बार-बार अपनी उँगलियों से जैकेट के कॉलर को छूती और फिर अंधेरे कमरे में ताकती।
आर्यन अब इस दुनिया में नहीं था। वह लकड़ी का बक्सा, वे किताबें, वह आधी लिखी रिसर्च... सब अनाथ हो चुके थे।
लेकिन मीरा के अंदर रोने की इच्छा मर चुकी थी। उसकी जगह एक भयानक, खालीपन ने ले ली थी। एक ऐसा सवाल जो उसके अंदर किसी दीमक की तरह उतर रहा था 'अगर आर्यन डूबा नहीं, तो उसकी मौत कैसे हुई? और उसकी हथेली पर वह नीला निशान किसका था?'
अचानक, हवेली के बाहर हवा का एक तेज़ झोंका आया। खिड़की के पट बड़े ज़ोर से टकराए और मोमबत्ती बुझ गई।
कमरा पल भर में गहरे, स्याह अंधेरे में डूब गया।
मीरा ने अपनी आँखें मूँद लीं। बारिश की बूँदें छत पर किसी की भारी जूतियों की तरह बज रही थीं।
टप... टप... टप...
तभी, मीरा के कान में एक आवाज़ आई।
यह बारिश की आवाज़ नहीं थी। यह हवा की सनसनाहट भी नहीं थी।
हवेली के मुख्य दरवाज़े के बाहर, गीले पत्थरों पर किसी के चलने की आवाज़ आ रही थी।
छप... छप... छप...
धीमी, भारी और गीली पदचाप। पैर हवेली के बरामदे तक आए। और फिर... रुक गए।
मीरा का जिस्म पूरी तरह से ऐंठ गया। उसकी साँसें सीने में ही अटक गईं। उसने अपने दोनों हाथों से आर्यन की जैकेट को कसकर भींच लिया।
दरवाज़े के बाहर कोई खड़ा था।
कोई खटखटा नहीं रहा था। कोई पुकार नहीं रहा था। बस... कोई खड़ा था।
मीरा ने अंधेरे में अपनी आँखें फाड़कर दरवाज़े की दरार की तरफ़ देखा। दरवाज़े के नीचे से, जहाँ से हवा आती थी, पानी की एक पतली सी धार रेंगती हुई कमरे के अंदर आ रही थी। नील झील के पानी की धार।
और फिर मीरा को अहसास हुआ... उस दरवाज़े के पार से किसी के साँस लेने की आवाज़ नहीं आ रही थी।
हवा वहाँ थमी हुई थी। सन्नाटा वहाँ जम चुका था।
उस रात मीरा को नींद नहीं आई। लेकिन नींद नहीं आई इसलिए नहीं कि वह रो रही थी। बल्कि इसलिए कि उसे लगा कि बाहर कोई खड़ा है जो साँस ननहीं ले रहा।